Wednesday, 6 May 2020

परमात्मा का साथ ही सर्वश्रेष्ठ है ....

इस संसार में जैसी कुटिलता भरी पड़ी है, उस से मेरा मन भर गया है| अब यहाँ और रहने की इच्छा नहीं है, परमात्मा का साथ ही सर्वश्रेष्ठ है|
परमशिव का ध्यान ही हिमालय से भी बड़ी-बड़ी मेरी कमियों को दूर करेगा| मुझ अकिंचन में अदम्य भयहीन साहस व निरंतर अध्यवसाय की भावना शून्य है| मुझे लगता है कि आध्यात्म के नाम पर मैं अकर्मण्य बन गया हूँ और अपनी कमियों को बड़े बड़े सिद्धांतों के आवरण से ढक लिया है| शरणागति के भ्रम में अपने "अच्युत" स्वरूप को भूलकर "च्युत" हो गया हूँ| जैसा प्रमाद मुझ में छा गया है वह मेरे लिए मृत्यु है ... "प्रमादो वै मृत्युमहं ब्रवीमि"|
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हे परात्पर गुरु, आपके उपदेश मेरे जीवन में निरंतर परिलक्षित हों, आपकी पूर्णता और अनंतता ही मेरा जीवन हो, कहीं कोई भेद न हो| सब बंधनों व पाशों से मुझे मुक्त कर मेरी रक्षा करो| इन सब पाशों से मुझे इसी क्षण मुक्त करो| ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ अप्रेल २०२०

'हरिः' शब्द के बाद 'ॐ' क्यों लगाते हैं? ....

"हरिः ॐ" ..... किसी ने प्रश्न पूछा है कि 'हरिः' शब्द के बाद 'ॐ' क्यों लगाते हैं? पता नहीं इसका शास्त्रोक्त उत्तर क्या है, पर अपने अनुभवों से इसका उत्तर दे सकता हूँ| इसे वही समझ सकेगा जो ध्यान की गहराइयों में उतर चुका हो| शास्त्रज्ञ विद्वान मुझे क्षमा करें क्योंकि मुझे न तो शास्त्रों का ज्ञान है और न ही मुझ में कोई विद्वता है|
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'हरिः' शब्द का प्रयोग सामान्यतः भगवान श्रीकृष्ण के लिए ही किया जाता है| इसका अर्थ समझने के लिए "गोपाल सहस्त्रनाम" का स्वाध्याय कीजिये| तंत्र शास्त्रों में 'ह' 'र' और 'इ' आदि बीजों के अर्थ दिये हुए हैं| पर मैं यहाँ वह ही लिखूंगा जो मैंने प्रत्यक्ष अनुभव किया हो|
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'ह' और 'रिः' ये दोनों प्राण-तत्व के स्पंदन की अति सूक्ष्म ध्वनियाँ हैं जो खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा में गहरे ध्यान में ओंकार की ध्वनि से पूर्व सुनाई देती हैं| गहरे ध्यान के समय खेचरी या अर्ध-खेचरी मुद्रा में जब हम सांस लेते हैं तब हमारा गला स्वतः ही खुल कर खूब चौड़ा हो जाता है| उस समय हमारी सूक्ष्म देह की सुषुम्ना नाड़ी चैतन्य हो जाती है| सांस भीतर लेते समय हमें अनुभव होता है कि घनीभूत प्राण-ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी में मूलाधार चक्र से ऊपर उठती हुई मार्ग के सभी चक्रों को भेदती हुई आज्ञाचक्र की ओर आरोहित हो रही है| उस समय एक अति सूक्ष्म ध्वनि सिर्फ स्वयं को ही सुनाई देती है| वह ध्वनि है ..... हSSSSSSSS|
आज्ञाचक्र से जब यह प्राण-ऊर्जा मूलाधार की ओर अवरोहित होती है तब एक अति सूक्ष्म ध्वनि स्वयं को ही सुनाई देती है ..... रिःइइइइइइइइइ|
गुरुकृपा से आज्ञाचक्र के भेदन के पश्चात ही ओंकार की ध्वनि यानि अनाहत नाद जिसे अनहद नाद भी कहते हैं, सुनाई देती है| फिर तो उसी को सुनते रहना चाहिए| सारी साधनाएं उसी में समाहित हैं| यह प्राण-ऊर्जा ही घनीभूत होकर कुंडलिनी महाशक्ति कहलाती है|
ह रिः और ॐ ..... इनको मिलाकर ही नवार्न मंत्र का 'ह्रीं' है जो महालक्ष्मी का और श्रीविद्या का बीज है|
ओंकार का ध्यान, साधक को आकाश-तत्व का बोध कराता है| हरिः से प्राण-तत्व का बोध होता है| पहले प्राण-तत्व है फिर आकाश-तत्व| शायद इसी लिए हरिः के बाद ॐ का उच्चारण होता है| मुझे तो यही समझ में आया है|
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प्राण-तत्व से जुड़ी हुई साधना, श्रौत्रीय ब्रहमनिष्ठ सिद्ध गुरु की आज्ञा से उनके आदेशानुसार ही करनी चाहिए, अन्यथा भटकने का डर है जिस से हानि भी हो सकती है|
ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ अप्रेल २०२०

समय परिवर्तनशील है ....

समय परिवर्तनशील है, कालचक्र तीब्रगति से आगे बढ़ रहा है| कोरोना-वायरस जैसे अदृश्य परजीवी ..... सनातन भारतीय संस्कृति के उपहास और विनाश का फल हैं| इसका समाधान भी भारत की सनातन संस्कृति से ही होगा| अमेरिका जैसी सभी महाशक्तियाँ अपने घुटनों पर हैं| जहाँ रोमन साम्राज्य था वह इटली कराह रहा है| जहाँ सल्तनत-ए-उस्मानिया (ओटोमन साम्राज्य) थी वह तुर्की अपनी विवशता से हाथ मसोस रहा है| जहाँ कभी सूर्यास्त नहीं होता था वह हकूमत-ए-बरतानिया (ब्रिटेन) भी अपने षडयंत्रों में ही अपना अस्तित्व ढूँढ रहा है| जिसने यह वायरस छोड़कर पूरी दुनियाँ की अर्थव्यवस्थाओं को विफल कर दुनियाँ पर राज करने का स्वप्न देखा है, वह चीन सब की गालियाँ खा रहा है| एक मामूली से जीव ने सब को उन की औकात दिखा दी है| इन सब आसुरी शक्तियों का प्रभाव भारत से नष्ट होगा| भारत में व्याप्त असत्य और अंधकार की शक्तियों का अस्तित्व नहीं रहेगा| भारत फिर से उठेगा| यहाँ की कालजयी संस्कृति पुनश्च जागृत होगी| भारत अखंड होगा, सनातन धर्म का पुनरोत्थान और वैश्वीकरण होगा| हमें अपनी जड़ों की ओर बापस लौटना होगा| भारत माता की जय||
३१ मार्च २०२० 

आने वाले समय में हमारे धैर्य और विवेक की परीक्षा होगी .....

आने वाले समय में हमारे धैर्य और विवेक की परीक्षा होगी .....
मुझे लगता है कि आने वाला समय अच्छा नहीं है| मनुष्य का लोभ और अहंकार बड़ा ही विनाशकारी होगा| इस भयानक विनाश से भगवान ही हमारी रक्षा कर सकते हैं| इसमें दोष किसी अन्य का नहीं, हमारी गलत सोच का ही है| यह बात कोई बताना नहीं चाहता ताकि निराशा न फैले|
राष्ट्र, समाज व स्वयं की रक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना करें| धर्म की रक्षा तो भगवान कर लेंगे| हमारे विचार, संकल्प और हमारा आचरण पवित्र हो, तभी हमारी रक्षा होगी, अन्यथा विनाश निश्चित है| ॐ तत्सत् !!
३१ मार्च २०२० 

कर्म, भक्ति और ज्ञान में यथार्थतः कोई भेद नहीं है .....

कर्म, भक्ति और ज्ञान में यथार्थतः कोई भेद नहीं है .....
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ज्ञान, भक्ति और कर्म में मुझे कहीं कोई भेद नहीं दिखाई देता है| इन तीनों के स्पंदन की आवृतियाँ थोड़ी-बहुत पृथक-पृथक हो सकती हैं, पर मूल ऊर्जा एक ही है| इनमें कोई भेद नहीं है| इसका पता तब चलता है जब हरिःकृपा से गीता में बताए हुए 'समभाव' की अति अल्प मात्रा में भी अनुभूति होती है| यह समभाव ही हमें आत्म-तत्व का बोध कराकर उसमें अधिष्ठित करता है| यह समभाव ही गीता का योग है| भगवान कहते हैं ....
"योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय| सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते||२:४८||"
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हम स्वयं में भगवान के प्रति परमप्रेम (भक्ति) जागृत कर, भगवान को कर्ता बना कर, भगवान के लिए ही कर्म करेंगे तो हमारा अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार) पवित्र होता है| अन्तःकरण के पवित्र होने पर ही ज्ञान की सिद्धी होती है| तभी समभाव में अधिष्ठान होता है| उस समय सिद्धी और असिद्धि में कोई भेद नहीं रहता| इस समत्व में स्थिति ही गीता का योग है| जैसा मुझे समझ में आया वैसा ही लिखा जा रहा है| ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
३१ मार्च २०२०

चीन के बारे में ..... मैं अपने अनुभव से कुछ कहना चाहता हूँ .....

चीन के बारे में ..... मैं अपने अनुभव से कुछ कहना चाहता हूँ|
मैंने वर्षों पहिले चार बार चीन की यात्रा की है| सन १९९० तक चीन भारत की तुलना में हर क्षेत्र में बहुत अधिक पिछड़ा हुआ देश था| सन १९८५ में मैं पहली बार चीन दो महीने के लिए गया था| उस समय वहाँ सड़कों पर निजी वाहन नहीं चलते थे| सार्वजनिक बसें बहुत कम चलती थीं| प्रायः सभी लोग बाइसिकल से ही आते जाते थे| मैं जहाँ गया था वहाँ से चीन की दीवार पास में ही थी जिसके आसपास किसी से साइकिल माँग कर साइकिल पर खूब घूमता भी था| सभी के कपड़े एक जैसे व एक ही डिजायन के हुआ करते थे| कपड़ों पर इस्तरी करना मना था| घरों में स्नानगृह नहीं होते थे| लोग सप्ताह में या महीने में एक दिन सार्वजनिक स्नान-गृह में जाकर स्नान करते थे| मेरे विचार से भारतीयों की तुलना में चीनी लोग बहुत अधिक डरपोक होते हैं| मुझे आश्चर्य होता था कि उन्होंने तिब्बत पर अधिकार कैसे कर लिया और भारत को १९६२ में लड़ाई में कैसे हरा दिया? (इस विषय पर पहिले एक लेख में कई बातें लिखी थीं, जो अब नहीं लिख रहा) काफी कुछ जानने को मिला वहाँ के बारे में|
फिर सन १९९९ व सन २००० में फिर चीन जाने का अवसर मिला तो सब कुछ बदला हुआ पाया| सड़कों पर से साइकिलें गायब हो गई थीं| लोग निजी मोटर वाहनों का उपयोग करने लगे थे| दो-चार सरकारी दुकानों की जगह बड़े बड़े बाज़ार बन चुके थे| बाज़ारों में माल तो घटिया और नकली था पर स्वतंत्र व्यवसाय आरंभ हो चुका था|
वहाँ का खानपान बहुत ही तामसी है जिसे कोई सामान्य भारतीय कभी नहीं खा सकता| खुद ही अपना भोजन बनाकर अपनी स्वयं की व्यवस्था करो| फल, मेवे और दूध तो आसानी से मिल जाते हैं जिस से शाकाहारी अपना पेट भर सकते हैं|
किसी भी भोजनालय में जाओ तो वहाँ हर टेबल पर एक बर्नर पर रखे बड़े बर्तन में जानवरों की हड्डियाँ उबलती रहती हैं| लोग उसी पानी को पीते हैं| भोजनालय के द्वार पर जीवित मछलियाँ, सांप, झींगे, केंकड़े आदि रखे जाते हैं| आपको कौन से सांप का सूप पीना है, कौन सी मछली का मांस खाना है, बता दीजिए| पक कर आ जाएगा| मक्खन भी पशुओं की चर्बी का बनाते हैं| वहाँ का मुख्य भोजन नूडल्स के साथ सूअर का मांस है| मेरे जैसे शाकाहारी का जीना तो वहाँ असंभव है|
चीन के उत्तरी भाग में लोग महीने में एक दिन, और दक्षिणी चीन में लोग सप्ताह में एक दिन स्नान करते है| घरों में स्नानघर नहीं होता| सार्वजनिक स्नानघर होते हैं| सार्वजनिक स्नानघर में दो हॉल होते हैं| निर्वस्त्र होकर एक में महिलायें और एक में पुरुष सामूहिक स्नान करते हैं|
होंगकोंग के चुंगकिंग टावर के आसपास तो कुछ नेपाली रैस्टौरेंट हैं जहाँ शाकाहारी भोजन मिल जाता है, पर चीन की मुख्य भूमि में और ताईवान में कहीं भी नहीं मिलता| होंगकोंग के चुंगकिंग टावर में भारतीयों ही भारतीयों की दुकानें हैं जहाँ के ग्राहक भारतीय, नेपाली, पाकिस्तानी और बांग्लादेशी ही अधिक होते हैं| वहाँ के एक दुकानदार ने बताया कि वहाँ संघ की शाखा भी लगती है| संघ का अस्तित्व वहाँ 'हिन्दू स्वयं सेवक संघ' के नाम से है|
चीन में अच्छी बात एक ही लगी कि वहाँ के लोग खूब मेहनती हैं| जितने का खाते हैं उस से अधिक का काम करते हैं| रूस के साइबेरिया व सुदूर-पूर्व में श्रमिकों की बहुत कमी थी अतः रूस ने लाखों चीनियों को रूस की नागरिकता दे कर अपने यहाँ बसा दिया है| रूस को चीनी श्रमिक ही अच्छे लगे क्योंकि चीनी श्रमिक खाते कम हैं और काम अधिक करते हैं|
भारत में वामपंथी लोग चीन का जितना महिमा-मंडन करते हैं, उतना वहाँ कुछ भी नहीं है| भारतीय मापदण्डों से वहाँ के समाज में कोई नैतिकता नहीं है|
३१ मार्च २०२० 

भगवान हैं .....

भगवान की पूजा करनी चाहिए लेकिन पूजा करने से भगवान नहीं मिलते| अपने भीतर के देवत्व को जगाने से ही भगवान मिलते हैं| हमें स्वयं में ही भगवान को जागृत करना पड़ेगा, तभी हम भगवान को उपलब्ध हो सकते हैं| भगवान कोई आसमान से या अन्य कहीं से उड़कर आने वाली चीज नहीं है| हमें स्वयं में ही भगवान को व्यक्त करना पड़ता है| बाकी बातें किसी काम की नहीं हैं| भगवान कहीं बाहर नहीं, हमारे में ही अव्यक्त है जिसे व्यक्त करना पड़ेगा| जिनके पीछे पीछे हम भागते हैं, उनसे कुछ भी मिलने वाला नहीं है|
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भगवान "हैं", यहीं पर "हैं", सर्वत्र "हैं", इसी समय "हैं", हर समय "हैं", वे ही हमारे हृदय में धडक रहे "हैं", वे ही इन नासिकाओं से सांसें ले रहे "हैं", इन पैरों से वे ही चल रहे "हैं", इन हाथों से वे ही हर कार्य कर रहे "हैं", इन आँखों से वे ही देख रहे "हैं", इस मन और बुद्धि से वे ही सोच रहे "हैं", हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व वे ही "हैं"| सारा ब्रह्मांड, सारी सृष्टि वे ही "हैं"| वे परम विराट और अनंत "हैं"| हम तो निमित्त मात्र, उन के एक उपकरण हैं| भगवान स्वयं ही हमें माध्यम बना कर सारा कार्य कर रहे हैं| कर्ता हम नहीं, स्वयं भगवान हैं| सारी महिमा भगवान की है| भगवान ने जहाँ भी रखा है और जो भी दायीत्व दिया है उसे हम नहीं, स्वयं भगवान ही कर रहे हैं| वे ही जगन्माता हैं, वे ही परमपुरुष हैं| हम उन के साथ एक हैं| कोई भेद नहीं है| ॐ ॐ ॐ ||