Tuesday, 5 December 2017

स्वयं को पापी कहना सबसे बड़ा पाप है ....

>>>>> स्वयं को पापी कहना सबसे बड़ा पाप है ....
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शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः ..... कृष्ण यजुर्वेद शाखा के श्वेताश्वतरोपनिषद में सनातन हिन्दू धर्म का सारा साधना पक्ष और ज्ञानयोग दिया हुआ है| इस उपनिषद् के छओं अध्यायों में जगत के मूल कारण, ॐकार-साधना, परमात्मतत्त्व से साक्षात्कार, ध्यानयोग, प्राणायाम, जगत की उत्पत्ति, जगत के संचालन और विलय का कारण, विद्या-अविद्या, जीव की नाना योनियों से मुक्ति के उपाय, और परमात्मा की सर्वव्यापकता का वर्णन किया गया है| सारी आध्यात्मिक साधनाएँ यहाँ से आरम्भ होती हैं| यह उपनिषद् अपने दूसरे अध्याय में हम सब को अमृत पुत्र कहता है| हम सब परमात्मा के अमृतपुत्र हैं|
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जो भी शिक्षा हमें जन्म से पापी होना सिखाती है वह वेदविरुद्ध होने के कारण विष के समान त्याज्य है| सिर्फ वेद ही प्रमाण हैं| कोई भी पौराणिक या आगम शास्त्रों की शिक्षा भी यदि वेदविरुद्ध है तो वह त्याज्य है| कुछ मंदिरों में आरती के बाद " पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पापसंभवः" जैसा अभद्र मंत्रपाठ करते हैं, मैं उस पर ध्यान नहीं देता क्योंकि मेरी दृष्टी में यह मन्त्र वेदविरुद्ध है|

ईसाईयत यानि ईसाई पंथ का मुख्य आधार मूल पाप यानि Original Sin का सिद्धांत है अतः वह वेदविरुद्ध, अमान्य और त्याज्य है| सारी ईसाईयत Original Sin के सिद्धांत पर खड़ी है जो खोखला और झूठा सिद्धांत है| ईसाई पंथ दो सिद्धांतों पर एक खडा है .... पहला तो Original Sin, और दूसरा Resurrection.| इनके बिना यह पंथ आधारहीन है| दोनों ही झूठे हैं|
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श्रुति भगवती तो ऋग्वेद में कहती है ..... "अहं इन्द्रो न पराजिग्ये" अर्थात मैं इंद्र हूँ, मेरा पराभव नहीं हो सकता| वेदों के चार महावाक्य हैं ....
(१) प्रज्ञानं ब्रह्म --- (ऐतरेय उपनिषद) --- ऋग्वेद,
(२) अहम् ब्रह्मास्मि --- (बृहदारण्यक उपनिषद) --- यजुर्वेद,
(३) तत्वमसि --- (छान्दोग्य उपनिषद्) --- सामवेद,
(४) अयमात्माब्रह्म --- (मांडूक्य उपनिषद) ---अथर्व-वेद |
हम महान ऋषियों की संतानें हैं, अतः जिन महावाक्यों को आधार बना कर हमारे हमारे महान ऋषियों ने तपस्या की और महान बने वे महावाक्य हमारे भी जीवन का आधार बनें| इन्हें परमात्मा की कृपा द्वारा ही समझा जा सकता है क्योंकि इनके दर्शन ऋषियों को गहन समाधि में हुए| इनकी समाधि भाषा है| इन्हें कोई श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ आचार्य ही समझा सकता है|
सारे उपनिषद् हमें प्रणव यानि ओंकार पर ध्यान करने का आदेश देते हैं| गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण का यही आदेश और उपदेश है| हमारे शास्त्रों में कहीं भी मनुष्य को जन्म से पापी नहीं कहा गया है| अतः हम स्वधर्म पर अडिग रहें और स्वधर्म का पालन करें|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ नवम्बर २०१७

समृद्धि और विकास क्या हैं ? हम समृद्ध और विकसित कैसे बनें ?

समृद्धि और विकास क्या हैं ? हम समृद्ध और विकसित कैसे बनें ?
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भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं की निरंतर आपूर्ति ही समृद्धि है| निजात्मा का विकास ही वास्तविक विकास है | समृद्धि आती है अपनी मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक क्षमताओं को विकसित करने से, अतः इन क्षमताओं को विकसित कर के ही हम समृद्ध बन सकते हैं | निजात्मा का विकास ही वास्तविक विकास है जो परमात्मा के प्रति परम प्रेम, समर्पण, और परमात्मा की कृपा से ही हो सकता है |
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हमें क्या चाहिए और हम क्या चाहते हैं, इसमें बहुत अधिक अंतर है | हमें जिस भी वस्तु की या परिस्थिति की आवश्यकता हो वह हमें तुरंत प्राप्त हो जाए यही समृद्धि है | अपने अहंकार की तृप्ति के लिए वस्तुओं को और धन को एकत्र करना कोई समृद्धि नहीं है | ईमानदारी से रुपये कमाना अपराध नहीं है, अपराध तो बेईमानी से अर्जित करना है | रूपयों का सदुपयोग होना चाहिए | दुरुपयोग से हमें भविष्य में दरिद्रता का दुःख भोगना पड़ता है | रुपयों की आवश्यकता तो सब को पडती है चाहे वह साधू, संत, वैरागी हो या गृहस्थ | भूख सब को लगती है, ठण्ड और गर्मी भी सब को लगती है, और बीमार भी सभी पड़ते हैं | भोजन, वस्त्र, निवास और रुग्ण होने पर उपचार के लिए धन आवश्यक है | जितना आवश्यक है उतना धन तो सबको कमाना ही चाहिए पर उसके पश्चात अधिक से अधिक समय परमात्मा के ध्यान में लगाना चाहिए | आज के युग में समाज अभावग्रस्त है | अतः किसी को समाज पर भार नहीं बनना चाहिए | जिन्होनें सब कुछ परमात्मा पर छोड़ दिया है उनकी बात दूसरी है |
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एक आध्यात्मिक पूँजी भी है| उस आध्यात्मिक पूँजी से सम्पन्न होने पर परिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं कि भौतिक पूँजी की भी कमी नहीं रहती |
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प्रकृति उपलब्ध जीवों की आवश्यकतानुसार ही उत्पन्न करती है | हमें जितने की आवश्यकता है , उससे अधिक पर यदि हम अपना अधिकार समझते हैं तो यह एक हिंसा ही है | आवश्यकता से अधिक का संग्रह "परिग्रह" कहलाता है | पाँच यमों (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) में अपरिग्रह भी है, जिनके बिना हम कोई आध्यात्मिक प्रगति नहीं कर सकते| सच्चे साधू संत सबसे बड़े अपरिग्रही होते हैं |
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सभी को शुभ कामनाएँ | ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
November 22, 2017

एक साथ इतने गुण कहाँ से लायें ? .....

एक साथ हम "निस्त्रैगुण्य", "निर्द्वन्द्व", "नित्यसत्त्वस्थ", "निर्योगक्षेम", व "आत्मवान्" कैसे बनें कभी इस पर भी विचार करें | बनना तो पडेगा ही क्योंकि यह भगवान का आदेश है ......

"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्" ||२.४५||

भगवान ने पाँच आदेश एक साथ दे दिए हैं | पर सभी एक दूसरे के पूरक हैं | जब तक हम इस स्थिति में नहीं पहुंचेंगे तब तक पाशों में बंधे ही रहेंगे, और पुनर्जन्म होता ही रहेगा | इसके लिए हमें किन्हीं तत्वज्ञ श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ आचार्य से मार्गदर्शन लेना ही पड़ेगा |
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इसको समझना और व्यवहार रूप में उपलब्ध करना असम्भव तो नहीं पर कठिन अवश्य है | इसको समझने के लिए अर्जुन जैसा शिष्य और भगवान श्रीकृष्ण जैसे गुरु हों, या देवर्षि नारद जैसे शिष्य और भगवान सनत्कुमार जैसे गुरु हों, तभी कल्याण हो सकता है |
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हमारे में पात्रता हो, बस यही आवश्यक है, फिर सब काम हो जाएगा |
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हे प्रभु कल्याण करो | ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!

विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता का सच ......

विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता का सच ......
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मेरा किसी से कोई द्वेष या दुर्भावना नहीं है, जो भी लिख रहा हूँ वह निष्पक्ष है| अतः बिना पूरा लेख पढ़े, कोई अति उत्साही भड़के नहीं और मुझे गालियाँ देना आरम्भ न करे|
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विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता आयोजित करवाने वाले संगठन उन व्यापारियों के समूह हैं जो सौंदर्य उत्पादन बेचते हैं| जो संगठन इसकी तैयारी करवाते हैं वे भी सौंदर्य उत्पादनों के व्यापारी है|
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ऐसी प्रतियोगिताओं का एकमात्र उद्देश्य अपने सौंदर्य उत्पादनों का विक्रय बढ़ाना है| यह एक मार्केटिंग टेक्निक मात्र है| पहले तो ये सुन्दर महिलाओं की देह दिखा कर विज्ञापनों से पैसा कमाते हैं| फिर जो सुन्दरी चुनी जाती है उसे एक वर्ष तक उनकी हर शर्त मानने को बाध्य होना पड़ता है और बिना कोई अतिरिक्त पैसे लिए विज्ञापनों का मॉडल बनना पड़ता है| एक वर्ष बाद उसे कोई नहीं पूछता| हाँ, फिल्मों में अभिनय आदि करने या मॉडलिंग के अवसर अवश्य मिल जाते हैं| यह कोई नारी सशक्तिकरण का कार्यक्रम नहीं है|
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जब विदेशी सौंदर्य उत्पादनों की माँग भारत में घट जाती है तब भारत की किसी सुन्दरी को विश्व सुन्दरी चुन लिया जाता है| यह सिर्फ एक मार्केटिंग है|
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विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता सुन्दर महिलाओं की नग्न प्राय देह का व्यवसायिक लाभ के लिए किया जाने वाला प्रदर्शन मात्र है| इंच और सेन्टीमीटर में जांघें और नितंब नापे जाते हैं, स्तन सुडौल हैं कि नहीं, होठ मानकों पर खरे उतरते हैं कि नहीं, यह देखा जाता है| फिर आखिर में सुंदरी से रटी रटाई मानवता की बातें पूछी जाती हैं, और विजेता घोषित होने पर उसे रोने का अभिनय करना पड़ता है|
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सौंदर्य उत्पादनों के बाजार की शक्तियाँ अपनी आवश्यकतानुसार इस तरह की प्रतियोगिताएँ करवाती हैं| इसमें कोई उत्साहित होने की आवश्यकता नहीं है| धन्यवाद|

प्रमाद ही मृत्यु है .....

प्रमाद ही मृत्यु है .....
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भक्तिसूत्रों के आचार्य देवर्षि नारद के गुरु भगवान सनत्कुमार ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य हैं | उन्होंने अपने प्रिय शिष्य देवर्षि नारद को सर्वप्रथम ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया था | ब्रह्मा जी के ध्यान के परिणामस्वरूप साक्षात् श्री हरि ने ही इन चारों सनक, सनंदन, सनातन, और सनत्कुमार के रूप में अवतार लिया था | शरीर से ये पाँच वर्ष की आयु वाले लगते थे तथा सर्वदा पाँच वर्ष की आयु के देह में ही रहे, अभी भी ये पाँच वर्ष की आयु के ही लगते हैं | समय समय पर हर युग में ये प्रकट हुए हैं |
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भगवान सनत्कुमार ने अपने उपदेशों में मृत्यु के अस्तित्व को नकार दिया है | महाभारत काल में महात्मा विदुर की प्रार्थना मान कर ये प्रकट हुए और धृतराष्ट्र को भी उपदेश दिए जो सनत्सुजातीय ग्रन्थ में उपलब्ध हैं | उन का कथन था .. "प्रमादो वै मृत्युमहं ब्रवीमि", अर्थात् प्रमाद ही मृत्यु है | अपने "अच्युत स्वरूप" को भूलकर "च्युत" हो जाना ही प्रमाद है और इसी का नाम "मृत्यु" है | जहाँ अपने अच्युत भाव से च्युत हुए, बस वहीँ मृत्यु है |

भगवान सनत्कुमार की जय हो | ॐ नमो भगवते सनत्कुमाराय |
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दुर्गा सप्तशती में 'महिषासुर' --- प्रमाद --- यानि आलस्य रूपी तमोगुण का ही प्रतीक है | आलस्य यानि प्रमाद को समर्पित होने का अर्थ है -- 'महिषासुर' को अपनी सत्ता सौंपना |
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तैत्तिरीयोपनिषद् भी प्रमाद से बचने का उपदेश देता है ......
धर्मं चर स्वाध्यायात् मा प्रमदः आचार्याय प्रियं धनम् आहृत्य प्रजा - तन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः सत्यात् न प्रमदितव्यम् धर्मात् न प्रमदितव्यम्। कुशलात् न प्रमदितव्यम् भूत्यै न प्रमदितव्यम् स्वाधायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् |
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हे भगवन आपकी जय हो | सभी का कल्याण करो | हमें धर्म, स्वाध्याय, और सत्य के पालन में कभी प्रमाद न हो | हम अपने अच्युत स्वरुप में रहें, कभी च्युत न हों |
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ओम् सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै |
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ||"
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभि र्व्यशेम देवहितं यदायुः ||
स्वस्ति न इन्द्रो वॄद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः |
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ||
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते |
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ||
ॐ शान्ति शान्ति शान्ति |

कृपा शंकर
१९ नवम्बर २०१७

मैं सिर्फ भारतीय मूल की देसी गायों को ही गौमाता मानता हूँ ....

गौ वंश की रक्षा ......

मैं सिर्फ भारतीय मूल की देसी गायों को ही गौमाता मानता हूँ |

विदेशी नस्ल की विलायती गायें जिन्हें सूअर के जीन के साथ मिलाकर विकसित किया गया है, गौमाता नहीं हो सकतीं | इन विलायती गायों के बछड़े किसी काम के नहीं होते | इन्होने किसानों को दुखी कर रखा है |
मेरा सुझाव है कि विलायती गायों को गौ रक्षण क़ानून से बाहर रखा जाए | गौ रक्षण सिर्फ देसी गायों का ही हो |

ॐ ॐ ॐ !!

मुझे मोक्ष या मुक्ति नहीं चाहिए ....

मुझे ऐसा कोई मोक्ष या ऐसी कोई मुक्ति नहीं चाहिए जैसी सांसारिक लोगों की अवधारणा है| मुझे परमात्मा का कार्य करने के लिए बार बार पुनर्जन्म और लाख गुणा अधिक उत्साह और अखंड ऊर्जा चाहिए|

भगवान परमशिव से प्रार्थना है कि मेरा अगला जन्म ऐसे माँ-बाप के यहाँ हो जो वेदों के पूर्ण मर्मज्ञ हों, जिनसे मैं वेदों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकूँ| जन्म भी ऐसी प्रज्ञा और बौद्धिक प्रतिभा के साथ हो जो वेदों की समाधि भाषा को समझने में समर्थ हो|

प्रारब्धवश इस जन्म में तो बुद्धि में इतना कूड़ा-कचरा बैठा है कि मैं उपनिषदों की भाषा भी समझ नहीं पा रहा हूँ, यह मेरा दुर्भाग्य है|

पर इस जन्म में भी मरते दम तक ध्यान साधना व स्वाध्याय तो चलता ही रहेगा| आत्मा नित्य मुक्त है| मैं भी नित्य मुक्त था, नित्य मुक्त हूँ, और नित्य मुक्त रहूँगा| बुद्धि पर एक कोहरा सा छाया हुआ है जो निश्चित रूप से शीघ्र ही दूर होगा|

मैं निश्चित रूप से परमात्मा के साथ एक हूँ और सदा एक रहूँगा| उनका प्रेम मेरा प्रेम है, और उनकी पूर्णता ही मेरी पूर्णता है|

ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ !!