स्वयं की (विश्व, राष्ट्र और समाज की) सारी समस्याओं, व उनके समाधान के प्रति मैं पूरी तरह सजग और अवगत हूँ। स्वयं की कमियों और क्षमता का भी पता है। परमात्मा के आदेशानुसार निज जीवन उन्हें समर्पित कर रहा हूँ।
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धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो। धर्म की पुनः प्रतिष्ठा अवश्यंभावी है, जिसे कोई नहीं रोक सकता। भगवान स्वयं धर्म की सर्वत्र पुनःस्थापना करने आ रहे हैं। हम आत्म-मुग्धता और मिथ्या अहंकार को त्याग कर सत्य-धर्मनिष्ठ बनें, अन्यथा हमारा विनाश निश्चित है। पूरे विश्व में ऐसी परिस्थितियों का निर्माण होने लगा है।
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नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥
(कठोपनिषद/१/२/२३) व (मुण्डकोपनिषद/3/2/3)
अर्थात् -- यह 'आत्मा' प्रवचन द्वारा लभ्य नहीं है, न मेधाशक्ति से, न बहुत शास्त्रों के श्रवण से 'यह' लभ्य है। यह आत्मा जिसका वरण करता है उसी के द्वारा 'यह' लभ्य है, उसी के प्रति यह 'आत्मा' अपने कलेवर को अनावृत करता है।
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हम कोई मंगते-भिखारी नहीं हैं। भगवान से कुछ मांग नहीं रहे हैं। परंतु जो कुछ भी भगवान का है उस पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। उनकी सर्वव्यापकता हमारी सर्वव्यापकता है, उनका आनंद हमारा आनंद है, और उनका सर्वस्व हमारा है। उससे कम हमें कुछ भी नहीं चाहिये। एक पिता की संपत्ति पर पुत्र का अधिकार होता है, वैसे ही उन की पूर्णता पर हमारा भी पूर्ण अधिकार है। उनकी पूर्णता से कम कुछ भी हमें नहीं चाहिए। यह शरीर महाराज भी अपना प्रारब्ध पूर्ण होते ही उनकी पूर्णता का ध्यान करते करते एक दिन छूट जाएगा। पर उनकी पूर्णता से कम कुछ भी हम स्वीकार नहीं करेंगे।
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महादेव महादेव महादेव॥ ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥ 









कृपा शंकर
२४ अगस्त २०२५
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