यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि ---
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भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय के पच्चीसवें श्लोक में स्वयं को यज्ञों में जपयज्ञ बताया है। अब प्रश्न यह उठता है कि -- हम जप किस विधि से कैसे करें? किसका जप करें? कितनी देर तक करें? आदि आदि॥ इस विषय पर अनेक मत हैं।
मेरा अनुभव यह है कि हमारे में सतोगुण, रजोगुण, और तमोगुण में से कौन सा गुण किस समय प्रधान होता है, उसी के अनुसार हमारा जप उस समय होता है। इस विषय पर मैंने अनेक लेख लिखे हैं। उस समय जैसी मेरी मनःस्थिति थी, उसी के अनुसार वे लेख लिखे गए थे। सब में कुछ न कुछ भेद अवश्य निकलेगा।
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जिसमें भक्ति है उसी से संवाद करना सार्थक है। भक्तिहीन व्यक्ति से कोई किसी भी तरह की आध्यात्मिक चर्चा करना -- अपने समय को नष्ट करना है।
जप निरंतर हर समय मूर्धा में ही करना चाहिए -- ऐसा मेरा अनुभव है। इसको समझाऊंगा। सत्संगों में तीन बार ओंकार का जप करते हैं। पहली बार मूलाधारचक्र में, दूसरी बार अनाहतचक्र में, तीसरी बार आज्ञाचक्र में करते हैं।
अपनी आध्यात्मिक स्थिति के अनुसार आज्ञाचक्र, सहस्त्रारचक्र, ब्रह्मरंध्र या अपनी चेतना में इस शरीर से बाहर निकलकर अनंतता से भी परे दिखाई दे रही ज्योति में स्थित होकर जप करें।
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मूर्धा में जप का अर्थ है कि अपने जबड़े, यानि दांतों के ऊपरी भाग से भी ऊपर, तालु से आज्ञाचक्र तक के क्षेत्र में स्थित होकर जप करें। इसे मूर्धा में जप कहते हैं। यदि इससे अधिक कुछ है, तो मुझे उसका ज्ञान नहीं है।
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जप की सर्वश्रेष्ठ विधि --- तो यह है कि हमारी देह का रोम रोम जप करे। यह पूरा ब्रह्मांड हमारा शरीर है। पूरा ब्रह्मांड, यानि पूरी सृष्टि ही भगवान के नाम का जप कर रही है। हमारी चेतना पूरे ब्रह्मांड में, पूरी सृष्टि के साथ एक हो। जप या तो राम नाम (रां) का होता है या ओंकार का। दोनों का फल एक ही है।
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अपनी बात मैंने सरलतम हिन्दी भाषा में, सरलतम शब्दों में कही है। इससे अधिक सरल और कुछ नहीं हो सकता। कोई समझे या न समझे, यह उसका भाग्य है। किसी को कोई संशय है तो किसी ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय महात्मा से मार्गदर्शन प्राप्त करें।
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पुनश्च: (बाद में जोड़ा हुआ) -- भगवान श्रीकृष्ण हमें मूर्धा में ओंकार के जप का निर्देश देते हैं। गीता के आठवें अध्याय का १२वां और १३वां मंत्र देखिये --
"सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च |
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ||८:१२||"
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् |
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ||८:१३||"
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सभी को मंगलमय शुभ कामनाएँ और नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
झुञ्झुणु (राजस्थान)
२४ अगस्त २०२३
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