मेरे में लाखों कमियाँ हैं, लेकिन भगवान ने उनकी ओर कभी ध्यान भी नहीं दिया है। मेरा अनुभव तो यह है कि भगवान हमारे में सिर्फ हमारी अभीप्सा को ही देखते हैं, अन्य बातों की ओर नहीं। वे अपनी महान आत्माओं से हमारा सत्संग भी कभी कभी करवा ही देते हैं।मेरे ही प्रिय निजात्मगण, कूटस्थ में मैं आपसे और अधिक समीप ही नहीं, आपके साथ एक हूँ। आप में और मुझ में कोई अंतर नहीं है। मैं आपके निकटतम से भी अधिक निकट, और प्रियतम से भी अधिक प्रिय हूँ। आप भी मेरे साथ एक हैं। मेरे हृदय का पूर्ण प्रेम आपको समर्पित है।
Tuesday, 19 November 2024
हमारी दृष्टि हर समय अपने लक्ष्य की ओर रहे। इधर-उधर कहीं भी दृष्टि न पड़े। हमारा लक्ष्य है परमात्मा ---
हमारी दृष्टि हर समय अपने लक्ष्य की ओर रहे। इधर-उधर कहीं भी दृष्टि न पड़े। हमारा लक्ष्य है परमात्मा। उनके जितना हमारा हितैषी अन्य कोई भी नहीं है।
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मेरुदंड में प्राण-तत्व के रूप में प्रवाहित हो रही कुंडलिनी महाशक्ति कभी भगवती महाकाली, और कभी भगवती श्रीविद्या के रूप में व्यक्त होती हैं। भगवती महाकाली भगवान श्रीकृष्ण की, और भगवती श्रीविद्या भगवान परमशिव की उपासना करवाती हैं। भगवान की उच्चतम अभिव्यक्ति कूटस्थ में है। कूटस्थ ही परमशिव हैं, और वे ही पुरुषोत्तम हैं। दोनों ही ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में व्यक्त हो रहे हैं। गीता के पुरुषोत्तम योग में भगवान स्वयं कहते हैं ---
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥"
"अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥१५:२॥"
"न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल सङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥१५:३॥"
"ततः पदं तत्परिमार्गितव्य यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५:४॥"
"निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥१५:५॥"
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
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गीता में बताई हुई ब्राह्मी स्थिति यानि कूटस्थ चैतन्य में हम निरंतर रहें ---
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बिना किसी तनाव के, शिवनेत्र होकर यानि दोनों आँखों की पुतलियों को भ्रूमध्य के समीप लाकर, भ्रूमध्य में प्रणव यानि ॐकार से लिपटी हुई दिव्य ज्योतिर्मय सर्वव्यापी आत्मा का चिंतन करते-करते, एक दिन ध्यान में विद्युत् आभा सदृश्य देदीप्यमान ब्रह्मज्योति प्रकट होती है। यह ब्रहमज्योति -- इस सृष्टि का बीज, और परमात्मा का द्वार है। इसे 'कूटस्थ' कहते हैं। इस अविनाशी ब्रह्मज्योति और उसके साथ सुनाई देने वाले प्रणवनाद में लय रहना 'कूटस्थ चैतन्य' है। यह सर्वव्यापी, निरंतर गतिशील, ज्योति और नाद - 'कूटस्थ ब्रह्म' हैं। इस कूटस्थ चैतन्य में निरंतर सदा प्रयासपूर्वक बने रहें, हमारा यह मनुष्य जीवन धन्य हो जाएगा।
गीता में भगवान कहते हैं --
"ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥१२:३॥"
"संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥१२:४॥"
अर्थात् - परन्तु जो भक्त अक्षर ,अनिर्देश्य, अव्यक्त, सर्वगत, अचिन्त्य, कूटस्थ, अचल और ध्रुव की उपासना करते हैं॥ इन्द्रिय समुदाय को सम्यक् प्रकार से नियमित करके, सर्वत्र समभाव वाले, भूतमात्र के हित में रत वे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं॥
"द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१५:१६॥"
अर्थात् - इस लोक में क्षर (नश्वर) और अक्षर (अनश्वर) ये दो पुरुष हैं, समस्त भूत क्षर हैं और 'कूटस्थ' अक्षर कहलाता है॥
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भगवान की महिमा अपार है। अनंत जन्मों तक उनकी महिमा निरंतर लिखता रहूँ तो भी उनकी महिमा समाप्त नहीं होने वाली। इसलिए यहाँ स्वयं को विराम दे रहा हूँ। मुझे स्वयं को भी नहीं पता कि मैंने क्या लिखा है। लेकिन जो भी लिखा है वह सही ही है, क्योंकि इसके पीछे उनकी ही प्रेरणा है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ नवंबर २०२३
इस संसार में सबसे अधिक कठिन कार्य है पुरुष होना ---
इस संसार में सबसे अधिक कठिन कार्य है पुरुष होना ---
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महिला दिवस पर सैंकड़ों लेख लिखे जाते हैं, लेकिन पुरुष दिवस पर आज एक भी लेख नहीं देखा। संसार में जीवित रहने के लिए महिला और पुरुष दोनों का ही योगदान होता है। पुरुषों की भलाई, स्वास्थ्य, मानसिक विकास, और उनके सकारात्मक गुणों का भी बहुत अधिक महत्व है। पुरुष ही राष्ट्र, समाज और मातृशक्ति की रक्षा कर सकते हैं। पुरुषों को भी मधुमेह, हृदय रोग, प्रोस्टेट ग्रंथि के विकार, और अनेक तरह के तनाव आदि हो सकते हैं। उन्हें भी अच्छा व्यवहार, प्रेम और सद्भावना चाहिए; सिर्फ दोषारोपण ही नहीं। अति अति विपरीत परिस्थितियों में अपने परिवार और समाज की रक्षा व उत्थान के लिए एक पुरुष ही पता नहीं कितने कष्ट उठाता है, और अपनी भौतिक दरिद्रता और गरीबी से मुक्ति पाता है।
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आध्यात्मिक दृष्टि से एक ही पुरुष हैं, और वे हैं भगवान विष्णु। अन्य सब प्रकृति हैं। पुरुष का अर्थ है पुरी में शयन करने वाला। हमारी इस देह रूपी पूरी में वे ही शयन कर रहे हैं। गीता में भगवान कहते हैं --
"अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥८:४॥"
अर्थात् - हे देहधारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! क्षरभाव अर्थात् नाशवान् पदार्थ को अधिभूत कहते हैं, पुरुष अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी अधिदैव हैं और इस देह में अन्तर्यामी रूप से मैं ही अधियज्ञ हूँ।
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"अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥८:५॥"
अर्थात् - जो मनुष्य अन्तकालमें भी मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे स्वरुप को ही प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है।
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"अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥८:८॥"
अर्थात् - हे पार्थ ! अभ्यासयोग से युक्त अन्यत्र न जाने वाले चित्त से निरन्तर चिन्तन करता हुआ (साधक) परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।
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"प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥८:१०॥"
अर्थात् - वह भक्तियुक्त मनुष्य अन्तसमय में अचल मन से और योगबल के द्वारा भृकुटी के मध्य में प्राणों को अच्छी तरहसे प्रविष्ट करके (शरीर छोड़नेपर) उस परम दिव्य पुरुषको ही प्राप्त होता है।
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"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥"
अर्थात् - आप ही आदिदेव और पुराणपुरुष हैं तथा आप ही इस संसार के परम आश्रय हैं। आप ही सब को जानने वाले, जानने योग्य और परमधाम हैं। हे अनन्तरूप ! आपसे ही सम्पूर्ण संसार व्याप्त है।
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वेदों में १८ श्लोकों का पुरुष सूक्त है। हम उन्हीं परम पुरुष को प्राप्त हों। वे ही एकमात्र पुरुष हैं --
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतोवृत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलम्॥
पुरुष एवेदम् सर्वं यद्भूतम् यच्च भव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदह्नेनाऽतिरोहति॥
एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पुरुषः। पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥
त्रिपादूर्ध्वं उदैत् पुरुषः पादोस्येहा पुनः। ततो विश्वं व्यक्रामच्छाशनान शने अभि॥
तस्माद्विराडजायत विराजो अधिपुरुषः। सहातो अत्यरिच्यत पश्चात् भूमिमतो पुरः॥
यत्पुरुषेन हविषा देवा यज्ञमतन्वत। वसन्तो अस्यासीद्दाज्यम् ग्रीष्म इद्ध्म शरद्धविः॥
सप्तास्यासन्परिधयस्त्रि सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वानाः अबध्नन्पुरुषं पशुं॥
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः। तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये॥
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यं। पशून्तांश्चक्रे वायव्यानारण्यान्ग्राम्याश्च ये॥
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः ऋचः सामानि जज्ञिरे। छंदांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥
तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥
यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्। मुखं किमस्य कौ बाहू का उरू पादा उच्येते॥
ब्राह्मणोऽस्य मुखामासीद्बाहू राजन्य: कृत:। ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽजायत॥
चंद्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत। मुखादिंद्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत॥
नाभ्या आसीदंतरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत। पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्॥
वेदाहमेतम् पुरुषम् महान्तम् आदित्यवर्णम् तमसस्तु पारे। सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वा भिवदन्यदास्ते॥
धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार शक्रफ्प्रविद्वान् प्रतिशश्चतस्र। तमेव विद्वान् अमृत इह भवति नान्यत्पन्था अयनाय विद्यते॥
यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचंत यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवा:॥
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हे परम पुराणपुरुष, इस जीवन को स्वीकार करो। और मेरे पास कुछ भी नहीं है। जो कुछ भी है वह आपको समर्पित है। ॐ शांति शांति शांति ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ नवंबर २०२४
Monday, 18 November 2024
पश्चिमी (ईसाई) देशों के पहिनावे में महिलाओं को कम से कम वस्त्र क्यों पहिनाये जाते हैं, और पुरुषों को खूब अधिक?
पश्चिमी (ईसाई) देशों के पहिनावे में महिलाओं को कम से कम वस्त्र क्यों पहिनाये जाते हैं, और पुरुषों को खूब अधिक? .
मैंने कई पश्चिमी (ईसाई) देशों में खूब भ्रमण किया है, अतः उन की मानसिकता को खूब अच्छी तरह से समझता हूँ। कई पादरियों से और प्रोटेस्टेंट सिस्टरों से मेरी मित्रता भी थी, और उनसे खूब संवाद भी हुआ है।
पश्चिमी देशों की संस्कृति में महिलाओं का कभी भी सम्मान नहीं था, उन्हें सिर्फ उपभोग की वस्तु समझा जाता रहा है। अब भी महिलाओं का विशेष सम्मान नहीं है।
कम से कम शब्दों में लिखे गई इतनी सी बात ही बहुत है। अधिक और लिखने की आवश्यकता नहीं है।
१८ नवंबर २०२२
ठेके से सारे अंतिम संस्कार -- .
ठेके से सारे अंतिम संस्कार --
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आजकल परिवार के सदस्यों में मनमुटाव, संबंधियों व मित्रों की कमी, बच्चों के विदेशों या दिसावरों में जाकर बसने, एकाँकी जीवन, आदि के समय में यदि कोई मर जाये तो अंतिम संस्कार करने के लिए आदमी नहीं मिलते। पहले पड़ोसी व गाँव के लोग आ जाते थे। आजकल कोई नहीं आना चाहता। ऐसे समय में अंतिम संस्कार ठेके पर करने के व्यवसाय आरंभ हो रहे हैं। कोई मर जाये तो उस ठेके वाली कंपनी की फीस जमा करा दो, कंपनी के आदमी आकर अंतिम संस्कार कर देंगे। पिंडदान और श्राद्ध भी On line आरंभ हो जाएँगे। मरने से पहले Advance booking भी कर सकेंगे अपने अंतिम संस्कार की ताकि स्वयं के मृत देह की दुर्गति न हो। अधिक समय नहीं लगेगा। अगले आठ-दस वर्षों में यह सामान्य बात हो जाएगी। आजकल लाश को कंधा देने वाले भी नहीं मिलते। उसके लिए तो शव वाहिनियों का प्रचलन लगभग सभी नगरों में हो चुका है।
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अपने जीवित रहते रहते ही अपना स्वयं का पिंडदान और श्राद्ध कर जाओ। आजकल की नई पीढ़ी से यह आशा मत रखो कि वे आपका पिंडदान या श्राद्ध करेंगे।
१८ नवंबर २०२२
🌹🌹🌹🌹🌹 महादेव महादेव महादेव 🌹🌹🌹🌹🌹 ---
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शिव का अर्थ है -- कल्याणकारी। विराट अनंतता और विस्तार की अनुभूति - 'शिव' की अनुभूति है।
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कृपा शंकर
१८ नवंबर २०२२
मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है -- "कर्ताभाव से मुक्त होकर परमात्मा को एकमात्र कर्ता बनाना" --
मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है -- "कर्ताभाव से मुक्त होकर परमात्मा को एकमात्र कर्ता बनाना" ---
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हम भगवान के एक उपकरण मात्र हैं। निज जीवन में हम परमात्मा को पूर्ण रूप से व्यक्त करें, उन्हें ही एकमात्र कर्ता बनाएँ और स्वयं एक निमित्त मात्र बन जाएँ। वे ही रण भूमि में हमें निमित्त बनाकर शत्रुओं का संहार कर रहे हैं, वे ही धर्म की पुनःस्थापना कर रहे हैं, वे ही सारे सद्गुण हैं, और वे ही स्वयं को इस विश्वरूप में और हमें व्यक्त कर रहे हैं। वे ही हमारे पैरों से चल रहे हैं, वे ही इन हाथों से सारे कार्य कर रहे हैं, इन नेत्रों से वे ही देख रहे है, इन कानों से वे ही सुन रहे हैं, इन नासिकाओं से वे ही सांस ले रहे हैं, और इस हृदय में वे ही धडक रहे हैं।
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भगवान कहते हैं --
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥११:३३॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- "इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो॥"
" Then gird up thy loins and conquer. Subdue thy foes and enjoy the kingdom in prosperity. I have already doomed them. Be thou my instrument, Arjuna!
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"योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥४:४१॥"
अर्थात् -- "जिसने योगद्वारा कर्मों का संन्यास किया है, ज्ञानद्वारा जिसके संशय नष्ट हो गये हैं, ऐसे आत्मवान् पुरुष को, हे धनंजय ! कर्म नहीं बांधते हैं॥
But the man who has renounced his action for meditation, who has cleft his doubt in twain by the sword of wisdom, who remains always enthroned in his Self, is not bound by his acts.
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"ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥५:३॥"
अर्थात् -- जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा, वह सदा संन्यासी ही समझने योग्य है; क्योंकि, हे महाबाहो ! द्वन्द्वों से रहित पुरुष सहज ही बन्धन मुक्त हो जाता है॥
He is a true ascetic who never desires or dislikes, who is uninfluenced by the opposites and is easily freed from bondage.
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"ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥५:१०॥"
अर्थात् -- जो पुरुष सब कर्म ब्रह्म में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर करता है, वह पुरुष कमल के पत्ते के सदृश पाप से लिप्त नहीं होता।।
He who dedicates his actions to the Spirit, without any personal attachment to them, he is no more tainted by sin than the water lily is wetted by water.
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"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१८:१७॥"
अर्थात् -- जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है॥
He who has no pride, and whose intellect is unalloyed by attachment, even though he kill these people, yet he does not kill them, and his act does not bind him.
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जो कर्म का कर्ता होता है वही फल का भोक्ता भी होता है। आत्मज्ञानी पुरुष का अहंकार अर्थात् जीवभाव ही समाप्त हो जाता है। तब उसकी बुद्धि किसी भी विषय में आसक्त नहीं हो सकती। वह पुरुष किसी को भी मार कर, न तो मारता है और न बँधता है। जब भगवान् श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि ज्ञानी पुरुष हत्या करके भी वास्तव में हत्या नहीं करता है, तब इसका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि सभी ज्ञानी पुरुष हत्या जैसे हीन कर्मों में प्रवृत्त होते हैं। इस वाक्य का अभिप्राय केवल इतना ही है कि कर्तृत्वाभिमान के अभाव में मनुष्य को किसी भी कर्म का बन्धन नहीं हो सकता।
ॐ तत्सत् ॥ ॐ ॐ ॐ ॥
१८ नवंबर २०२४
देवों और दानवों के मध्य देवासुर-संग्राम सृष्टि के अनादि काल से ही चल रहा है ----
देवों और दानवों के मध्य देवासुर-संग्राम सृष्टि के अनादि काल से ही चल रहा है। जब तक यह सृष्टि है तब तक यह चलता रहेगा। अंततः विजय उसी पक्ष की होगी जिस पक्ष में स्वयं भगवान हैं।
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इस समय इस पृथ्वी पर लगभग ८५% लोग तमोगुणी हैं, लगभग १०% लोग रजोगुणी हैं, और बड़ी कठिनाई से ५% लोग सतोगुणी होंगे। जहां तक अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति की बात है -- इस पृथ्वी पर दो लाख में से बड़ी कठिनाई से एक व्यक्ति होगा जिसमें भगवान से परमप्रेम यानि भक्ति हो। बाकी लोग तो भक्ति के नाम पर भगवान से व्यापार ही करते हैं। भक्ति और समर्पण एक-दूसरे के पूरक हैं। इस पृथ्वी पर भक्ति और समर्पण के नाम पर इस समय तो भगवान के साथ व्यापार ही चल रहा है। आप भगवान के साथ व्यापार न कर के भक्ति और समर्पण करें।
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हमारी भक्ति अनन्य-अव्यभिचारिणी हो। प्रातः काल में सोकर हम नहीं उठते, भगवान स्वयं हमारे माध्यम से सोकर उठते हैं। सब शंकाओं से निवृत होकर ध्यान के आसन पर ध्यानमुद्रा में बैठ जाइए। सर्वप्रथम ओंकार रूप में भगवान श्रीगणेश का ध्यान उत्तरा-सुषुम्ना (आज्ञाचक्र और सहस्त्रारचक्र के मध्य) में कीजिये। भगवान श्रीगणेश बड़ी कृपा कर के मूलाधारचक्र से उठकर उत्तरा-सुषुम्ना में ओंकार रूप में बिराजमान हमारे लिये हो जाते हैं। पञ्चप्राण उनके गण है जिनके वे ओंकार रूप में ईश हैं, इसलिए वे गणेश हैं। पंचप्राणों के पाँच सौम्य और पाँच उग्र रूप -- दस-महाविद्याएँ हैं। ओंकार रूप में गणेश जी के ध्यान से सभी दसों महाविद्याओं का ध्यान हो जाता है।
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यदि आपका उपनयन-संस्कार (जनेऊ) हो चुका है तो आप गायत्री या सावित्री मंत्र के अधिकारी हैं, अन्यथा नहीं। गायत्री मंत्र में तीन व्याहृतियाँ और सावित्री मंत्र में सात होती हैं। यदि आप गुरु द्वारा अधिकृत हैं तो सावित्री मंत्र का मानसिक जप सुषुम्ना के चक्रों में भी कर सकते हैं।
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यदि आप ने श्रीविद्या (या किसी भी अन्य महाविद्या) में दीक्षा ले रखी है तो उसके मंत्रों का मानसिक जप यथासंभव अधिकाधिक शरणागत भाव से कीजिये।
अन्यथा भागवत मंत्र या राम नाम का मानसिक जप आज्ञाचक्र में शरणागत भाव से अधिकाधिक करें। ये निरापद हैं, इनका मानसिक जप सप्ताह में सातों दिन, और प्रत्येक दिन चौबीस घंटे भी आप कर सकते हैं। यदि आप गुरु द्वारा अधिकृत हैं तभी सुषुम्ना के षड़चक्रों में भागवत मंत्र का जप करें, अन्यथा नहीं।
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गुरुकृपा से अंततः धीरे धीरे आप अपनी अपनी चेतना को सहस्त्रार के मार्ग से इस शरीर से बाहर परमात्मा की अनंतता में भी ले जा सकेंगे, और उससे परे परमशिव में भी स्थित हो सकेंगे। यदि आप की चेतना इस भौतिक शरीर से बाहर है तो बीच बीच में यह भाव कीजिये कि "मैं यह शरीर-महाराज नहीं, परमात्मा की अनंतता से भी परे परमशिव हूँ।" जब तक आपके प्रारब्ध में जीवन है तब तक भौतिक मृत्यु नहीं हो सकती। आप अपने आप ही इस देह में लौट आयेंगे। यह भौतिक शरीर तो इस लोकयात्रा के लिये भगवान द्वारा दिया हुआ एक वाहन है। जब यह रुग्ण हो जाएगा तो दूसरा मिल जायेगा। हम यह शरीर नहीं, एक शाश्वत आत्मा हैं। आप हर समय भागवत चेतना में परमशिव भाव में रहिये।
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ऊपर जो कुछ भी मैंने लिखा है, उसको लिखने में यदि कोई दोष या पाप लगा है तो वह मुझे स्वीकार्य है। उसके लिये कोई भी दण्ड पाने, या नर्क-कुंड में जाने को भी मैं इसी समय तैयार हूँ। इस क्षण तो मैं पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म की चेतना से परे शिवभाव यानि भागवत-चेतना में हूँ। कोई पाप या पुण्य मुझे छू भी नहीं सकता।
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इस शरीर में इस समय तो मैं किनारे पर बैठा हूँ, अतः किसी के लिये मुझे समय नहीं है। भगवती से उधार मांगे हुए समय में यह जीवन जी रहा हूँ। इसका मूल्य भी मुझे भगवती को चुकाना पड़ेगा। सारा अवशिष्ट जीवन भगवती को समर्पित है।
ॐ तत्सत्। ॐ तत्सत्। ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ नवंबर २०२४
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