Monday, 2 October 2017

जगन्माता .....

जगन्माता .....
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भारत में परमात्मा को पिता के रूप में और माता के रूप में भी माना जाता है| माँ में पिता की अपेक्षा प्रेम अति अधिक होता है| पिता का रूप विवेक प्रधान है तो माँ का रूप भाव प्रधान है| माँ की आराधना मुख्यतः राधा, सीता, उमा, दुर्गा, व दश महाविद्याओं के रूप में की जाती हैं|
यहाँ इस लेख में मैं दश महाविद्याओं में प्रथम महाविद्या काली के बारे में अति अति अति लघु चर्चा करूँगा|
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जिसको सूर्य, चन्द्र और तारागण भी प्रकाशित नहीं कर सकते, अति भयंकर रूप से कड़कड़ाती हुई तीब्र चमकती हुई बिजली की रोशनी भी नहीं, फिर अग्नि की तो बात ही क्या है? ये सब तो उसी के तेज से ही प्रकाशमान हैं| जिस माँ के प्रकाश से समस्त नक्षत्रमंडल और ब्रह्मांड प्रकाशित हैं, उस माँ की महिमा के बारे में मुझ जैसे किसी अकिंचन का कुछ भी लिखना, सूर्य को दीपक दिखाने का प्रयास मात्र सा है, जिसके लिए यह अकिंचन क्षमा याचना करता है| पता नहीं जिनकी देह से समस्त सृष्टि प्रकाशित है, उनका नाम "काली" क्यों रख दिया?
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सृष्टि की रचना के पीछे जो आद्यशक्ति है, जो स्वयं अदृश्य रहकर अपने लीला विलास से समस्त सृष्टि का संचालन करती हैं, समस्त अस्तित्व जो कभी था, है, और आगे भी होगा वह शक्ति माँ काली ही है| सृष्टि, स्थिति और संहार उनकी अभिव्यक्ति मात्र है| यह संहार नकारात्मक नहीं है, यह वैसे ही है जैसे एक बीज स्वयं अपना अस्तित्व खोकर एक वृक्ष को जन्म देता है| सृष्टि में कुछ भी नष्ट नहीं होता है, मात्र रूपांतरित होता है| यह रूपांतरण ही माँ का विवेक, सौन्दर्य और करुणा है| माँ प्रेम और करुणामयी है|
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माँ के वास्तविक सौन्दर्य को तो गहन ध्यान में तुरीय चेतना में ही अनुभूत किया जा सकता है| उसकी साधना जिस साकार विग्रह रूप में की जाती है वह प्रतीकात्मक ही है|
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माँ के विग्रह में चार हाथ है| अपने दो दायें हाथों में से एक से माँ सृष्टि का निर्माण कर रही है और एक से अपने भक्तों को आशीर्वाद दे रही है| माँ के दो बाएँ हाथों में से एक में कटार है, और एक में कटा हुआ नरमुंड है जो संहार और स्थिति के प्रतीक है| ये प्रकृति के द्वंद्व और द्वैत का बोध कराते हैं|
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माँ के गले में पचास नरमुंडों कि माला है जो वर्णमाला के पचास अक्षर हैं| यह उनके ज्ञान और विवेक के प्रतीक हैं|
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माँ के लहराते हुए काले बाल माया के प्रतीक हैं| माँ के विग्रह में उनकी देह का रंग काला है क्योंकि यह प्रकाशहीन प्रकाश और अन्धकारविहीन अन्धकार का प्रतीक हैं, जो उनका स्वाभाविक काला रंग है| किसी भी रंग का ना होना काला होना है जिसमें कोई विविधता नहीं है|
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माँ की दिगंबरता दशों दिशाओं और अनंतता की प्रतीक है|
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उनकी कमर में मनुष्य के हाथ बंधे हुए हैं वे मनुष्य कि अंतहीन वासनाओं और अंतहीन जन्मों के प्रतीक हैं|
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माँ के तीन आँखें हैं जो सूर्य चन्द्र और अग्नि यानि भूत भविष्य और वर्तमान की प्रतीक हैं|
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माँ के नग्न स्तन समस्त सृष्टि का पालन करते हैं|
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उनकी लाल जिह्वा रजोगुण की प्रतीक है जो सफ़ेद दाँतों यानि सतोगुण से नियंत्रित हैं|
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उनकी लीला में एक पैर लेटे हुए भगवान शिव के वक्षस्थल को छू रहा है जो दिखाता है कि माँ अपने प्रकृति रूप में स्वतंत्र है पर शिव यानि पुरुष को छूते ही नियंत्रित हो जाती है|
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माँ का रूप डरावना है क्योंकि वह किसी भी बुराई से समझौता नहीं करती, पर उसकी हँसी करुणा की प्रतीक है|
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माँ इतनी करुणामयी है कि उनके प्रेमसिन्धु में हमारी हिमालय जैसी भूलें भी कंकड़ पत्थर से अधिक नहीं हो सकतीं| माँ से जब हम उनके चरणों में आश्रय माँगते हैं वे अपने हृदय में ही स्थान दे देती हैं| माँ कि यह करुणा और अनुकम्पा सब भक्तों पर सदा बनी रहती है|
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जब तक हम उनके आश्रय में हैं तब तक जीवित हैं, उनके आश्रय से परे जो कुछ भी है वह मृत्यु है| उनके प्रेम के अतिरिक्त हमें अन्य कुछ भी नहीं चाहिए|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

Sunday, 1 October 2017

बिना पैंदे के लोटे की तरह हम न बनें .....

बिना पैंदे के लोटे की तरह हम न बनें .....
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बिना पैंदे के लोटे की तरह हम न बनें जिसे कोई भी चाहे जैसी दिशा में ही गुड़ा दे यानि झुका दे ... प्राचीन भारत में बालकों को उपदेश दिया जाता था ... "अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्तृतं भव"| यानि चट्टान की तरह अडिग और शक्तिशाली बन (समुद्र में खड़ी चट्टान पर सागर की प्रचंड लहरें बड़े वेग से टक्कर मारती हैं, पर चट्टान पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता|), परशु की तरह तीक्ष्ण बन (परशु पर कोई गिरे वह कट जाए और परशु जिस पर गिरे वह भी कट जाए), स्वर्ण की तरह पवित्र बन (जिसे कोई अपवित्र न कर सके)|
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पता नहीं भारत में क्लीव कायरता कहाँ से आ गयी? सत्य को समझने का हम प्रयास नहीं करते| स्वयं को झूठे आदर्शों और झूठे नारों, व दूसरे क्या सोचेंगे इस तरह के भ्रामक विचारों से बाँध रखा है|
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सत्य ही नारायण है, सत्य ही परमात्मा है और सत्य ही सबसे बड़ा गुण है|
दूसरों के कन्धों पर रख कर बन्दूक न चलाएँ| अपनी कमी को दूर करें, दूसरों को दोष न दें|

ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
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पुनश्च: -- 
महासागरों में विशाल जलयान (Ocean going ships) चलते हैं वे कभी छोटी-मोटी लहरों से विचलित होकर अपनी दिशा या मार्ग (Course) नहीं छोड़ते| जीवन में कैसी भी परिस्थिति हो, हमें विचलित नहीं होना चाहिए| हम स्वयं की और परमात्मा की दृष्टी में क्या हैं, महत्त्व सिर्फ इसी का है| हमारा लक्ष्य परमात्मा है, उसको पाने के मार्ग पर हम चलते रहें, कभी विचलित न हों|
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बिना पेंदे के मिर्जापुरी लोटे की तरह हम न बनें जिसे कोई किधर भी लुढ़का दे| हम चट्टान की तरह दृढ़ बनें| महासागरों में अकेली खड़ी चट्टानों पर लहरें कितना भयानक आघात करती हैं, पर चट्टान कभी नहीं विचलित होती| वैसे ही हम बनें| हम परशु की तरह तीक्ष्ण भी बनें| कोई हम पर आघात करे तो वह स्वयं ही कट जाए| चाकू खरबूजे पर गिरे या खरबूजा चाकू पर गिरे, कटना खरबूजे को ही है| हमारे में स्वर्ण की सी पवित्रता भी हो| किसी के प्रति कोई दुर्भावना हमारे हृदय में न हो| १ अक्तूबर २०१७

Saturday, 30 September 2017

मेरी दृष्टी में भारत की सभी समस्याएँ और उन सब का समाधान :---

मेरी दृष्टी में भारत की सभी समस्याएँ और उन सब का समाधान :---
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भारत की एकमात्र समस्या राष्ट्रीय चरित्र की है | यह कोई गहरी समस्या नहीं है | इसका समाधान भी कोई जटिल नहीं है | इसके अतिरिक्त भारत की अन्य कोई समस्या नहीं है | जब राष्ट्रीय चरित्र जागृत होगा तो अन्य सब समस्याएँ तिरोहित हो जायेंगी |
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इसका समाधान बाहर नहीं बल्कि प्रत्येक भारतीय के भीतर है | इसे जानने के लिए सबसे पहिले प्रखर राष्ट्रवाद को जगाना होगा | यदि मैं यह कहूँ कि भारत की सभी समस्याओं के समाधान के लिए सबसे पहली आवश्यकता 'हिन्दू राष्ट्रवाद' है तो मैं गलत नहीं हूँ | यहाँ हिंदुत्व से मेरा अभिप्राय एक ऊर्ध्वमुखी चेतना से है | हिंदुत्व एक ऊर्ध्वमुखी वैचारिक चेतना है जो मनुष्य को देवत्व की ओर अग्रसर करती है | ऐसे लोगों की भूमि ही 'भारतवर्ष' है |
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भारतीयों के स्वाभिमान को जगाने की सबसे पहली आवश्यकता है | भारत का वर्तमान इतिहास तो भारत के शत्रुओं का लिखा हुआ है | भारत के सही इतिहास की जानकारी सबको देना सबसे पहली सीढ़ी है | अनेक संस्थाएँ इस कार्य में लगी हुई हैं | भारत का सही इतिहास सबको पढ़ाया जाए तो भारतीयों में एक निज गौरव और स्वाभिमान की भावना जागृत होगी | जब प्रत्येक भारतीय में स्वाभिमान जागृत होगा तभी उनका सर्वश्रेष्ठ बाहर आयेगा |
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विश्व के जितने भी देशों ने प्रगति की है उसके पीछे मूल कारण उनका राष्ट्रवाद था | अन्य देशों का राष्ट्रवाद उनके पड़ोसियों के लिए घातक रहा है पर भारत का राष्ट्रवाद समस्त सृष्टि के लिए कल्याणकारी होगा क्योंकि भारतीय दर्शन सबके कल्याण की कामना करता है और सर्वस्व में वासुदेव के दर्शन कराता है |
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भारत का भविष्य भारत के प्रखर राष्ट्रवाद में है, पूरी पृथ्वी का भविष्य भारत के भविष्य पर निर्भर है, और पूरी सृष्टि का भविष्य पृथ्वी के भविष्य पर निर्भर है क्योंकि इस पृथ्वी पर भारत में ही परमात्मा की अभिव्यक्ति सर्वाधिक हुई है | अगर भारत का अभ्युदय नहीं हुआ तो इस विश्व का सम्पूर्ण विनाश निश्चित है | सिर्फ और सिर्फ हिंदुत्व ही इस विनाश से रक्षा कर सकता है | यहाँ मैं यह भी कहना चाहूँगा की भारतवर्ष कोई भूखंड नहीं है यह हमारी साक्षात् माता है | भारतवर्ष ही सनातन धर्म है जिस पर सारी सृष्टि टिकी हुई है और सनातन धर्म ही भारतवर्ष है | जो भी संस्थाएँ इस दिशा में जुटी हुई हैं वे सब सही कार्य कर रही हैं | ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
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कृपा शंकर
३० सितम्बर २०१३

एक महान आदर्श गृहस्थ योगी .......

एक महान आदर्श गृहस्थ योगी .......
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पुराण पुरुष योगिराज श्री श्री पं.श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय का जन्म सन ३० सितम्बर १८२८ ई. को कृष्णनगर (बंगाल) के समीप धुरनी ग्राम में हुआ था| इनके परम शिवभक्त पिताजी वाराणसी में आकर बस गए थे| श्यामाचरण ने वाराणसी के सरकारी संस्कृत कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की| संस्कृत के अतिरिक्त अंग्रेजी, बंगला, उर्दू और फारसी भाषाएं सीखी| पं.नागभट्ट नाम के एक प्रसिद्ध शास्त्रज्ञ महाराष्ट्रीय पंडित से इन्होनें वेद, उपनिषद और अन्य शास्त्रों व धर्मग्रंथों का अध्ययन किया|
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पं.देवनारायण सान्याल वाचस्पति की पुत्री काशीमणी से इनका १८ वर्ष की उम्र में विवाह हुआ| २३ साल की उम्र में इन्होने सरकारी नौकरी कर ली| उस समय सरकारी वेतन अत्यल्प होता था अतः घर खर्च पूरा करने के लिये ये नेपाल नरेश के वाराणसी में अध्ययनरत पुत्र को गृहशिक्षा देने लगे| तत्पश्चात काशीनरेश के पुत्र और अन्य कई श्रीमंत लोगों के पुत्र भी इनसे गृहशिक्षा लेने लगे|
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हिमालय में रानीखेत के समीप द्रोणगिरी पर्वत की तलहटी में इनको गुरुलाभ हुआ| इनके गुरू हिमालय के अमर संत महावतार बाबाजी थे जो आज भी सशरीर जीवित हैं और अपने दर्शन उच्चतम विकसित आत्माओं को देते हैं| गुरू ने इनको आदर्श गृहस्थ के रूप में रहने का आदेश दिया और ये गृहस्थी में ही रहकर संसार का कार्य करते हुए कठोर साधना करने लगे|
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जैसे फूलों की सुगंध छिपी नहीं रह सकती वैसे ही इनकी प्रखर तेजस्विता छिपी नहीं रह सकी और अनेक मुमुक्षुगण इनके पास आने लगे| ये अपने गृहस्थ शिष्यों को गृहस्थाश्रम में ही रहकर साधना करने का आदेश देते थे क्योंकि गृहस्थाश्रम पर ही अन्य आश्रम निर्भर हैं| इनके शिष्यों में अनेक प्रसिद्ध सन्यासी भी थे जैसे स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरी, स्वामी केशवानंद ब्रह्मचारी, स्वामी प्रणवानंद गिरी, स्वामी केवलानंद, स्वामी विशुद्धानंद सरस्वती, स्वामी बालानंद ब्रह्मचारी आदि|
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कश्मीर नरेश, काशी नरेश और बर्दवान नरेश भी इनके शिष्य थे| इसके अतिरिक्त उस समय के अनेक प्रसिद्ध व्यक्ति जो कालांतर में प्रसिद्ध योगी भी हुए इनके शिष्य थे जैसे पं.पंचानन भट्टाचार्य, पं.भूपेन्द्रनाथ सान्याल, पं.काशीनाथ शास्त्री, पं.नगेन्द्रनाथ भादुड़ी, पं.प्रसाद दास गोस्वामी, रामगोपाल मजूमदार आदि| सामान्य लोगों के लिये भी इनके द्वार खुले रहते थे| वाराणसी में वृंदाभगत नाम के इनके एक डाकिये शिष्य ने कठोर साधना द्वारा योग की परम सिद्धियाँ प्राप्त की थीं|
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लाहिड़ी महाशय ने न तो कभी किसी संस्था की स्थापना की, न कोई आश्रम बनवाया, न कभी कोई सार्वजनिक प्रवचन दिया और न कभी किसी से कुछ रुपया पैसा माँग कर लिया| अपने घर की बैठक में ही पद्मासन में बैठ कर शाम्भवी मुद्रा में साधनारत रहते थे और अपना सारा खर्च अपनी अत्यल्प पेंशन और बच्चों को गृहशिक्षा देकर पूरा करते थे|
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ये गुरूदक्षिणा में मिले सारे रुपयों को अपने किसी भी निजी काम में न लेकर हिमालय के साधुओं की सेवा में उनकी आवश्यकता पूर्ति हेतु भिजवा दिया करते थे| इनके घर में शिवपूजा और गीतापाठ नित्य होता था| शिष्यों के लिये नित्य गीतापाठ अनिवार्य था| अपना सारा रुपया पैसा ये अपनी पत्नी को दे दिया करते और अपने पास कुछ भी नहीं रखते थे| अपनी डायरी बंगला भाषा में नित्य लिखते थे| शिष्यों को दिए प्रवचनों को इनके एक शिष्य पं.भूपेन्द्रनाथ सान्याल बंगला भाषा में लिपिबद्ध कर लेते थे| उनका सिर्फ वह ही साहित्य उपलब्ध है|
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सन २६ सितम्बर १८९५ ई. को इन्होने कई घंटों तक अपने शिष्यों को गीता के कई गूढ़ श्लोकों की व्याख्या की और पद्मासन में ध्यानस्थ होकर सचेतन देहत्याग किया| इनका अंतिम संस्कार एक गृहस्थ का ही हुआ| शरीर छोड़ने के दूसरे दिन तीन विभिन्न स्थानों पर एक ही समय में इन्होने अपने तीन शिष्यों को सशरीर दर्शन दिए और अपने प्रयाण की सूचना दी| इनके देहावसान के ९० वर्ष बाद इनके पोते ने इनकी डायरियों के आधार पर इनकी जीवनी लिखी| इसके अतिरिक्त स्वामी सत्यानन्द गिरी ने भी बंगला भाषा में इनकी जीवनी लिखी थी| इनके कुछ साहित्य का तो हिंदी, अंग्रेजी और तेलुगु भाषाओँ में अनुवाद हुआ है, बाकी बंगला भाषा में ही है|
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अंग्रेजी तिथि के अनुसार आज उनकी १८९वीं जयंती पर ऐसे महान आदर्श गृहस्थ योगी को कोटि कोटि नमन !
ॐ ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं, द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् |
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं, भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ||
ॐ ॐ ॐ ||
 आश्विन शु.१०, वि.सं.२०७४
३० सितम्बर २०१७
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पुनश्चः :----
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हरेक गृहस्थ व्यक्ति का एक सामान्य प्रश्न कि घर-गृहस्थी का, कमाने खाने का झंझट ---- और इन सब के बाद कैसे साधना करें ? श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय ने अपने जीवन से इस प्रश्न का उत्तर दिया| एक अति अल्प वेतन वाली नौकरी करते हुए, घर पर बच्चों को गृह शिक्षा देते हुए प्राप्त हुए कुछ रुपयों से घर का खर्चा चलाया| कभी किसी से कुछ नहीं लिया| काशी, बर्दवान और कश्मीर नरेश उनके शिष्य थे जिनसे वे कुछ भी ले सकते थे, पर कभी कुछ नहीं लिया| गुरुदक्षिणा में प्राप्त रुपये भी हिमालय में तपस्यारत साधुओं की सेवा में भिजवा देते थे| सामाजिक कार्यों में संलग्न रहते थे पर एक क्षण भी नष्ट नहीं करते थे| समय मिलते ही पद्मासन में बैठकर ध्यानस्थ हो जाते थे| नींद की आवश्यकता उनकी देह को नहीं थी| पूरी रात उनकी बैठक में पूरे भारत से खिंचे चले आये साधक और भक्त भरे रहते थे| एक आदर्श गृहस्थ योगी का जीवन उन्होंने जीया जिसने हज़ारो लोगों को प्रेरणा दी|
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परमहंस योगानंद ने अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक "योगी कथामृत" के एक पूरे अध्याय में उनका जीवन चरित्र लिखा है| श्री अशोक कुमार चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित "पूराण पुरुष" नामक पुस्तक में भी उनकी प्रामाणिक जीवनी और उपदेश उपलब्ध हैं| उनके श्री चरणों में कोटि कोटि प्रणाम| उनकी कृपा सदा बनी रहे|
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मुकुंद लाल घोष का जन्म इनके आशीर्वाद से ही हुआ था| मुकुंद लाल घोष ही कालान्तर में परमहंस योगानंद के नाम से विश्व प्रसिद्ध हुए |

सभी हिन्दुओं के लिए एक सर्वमान्य मूलभूत साधना पद्धति क्या हो सकती है ? ....

सभी हिन्दुओं के लिए एक सर्वमान्य मूलभूत साधना पद्धति क्या हो सकती है ?
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मेरे विचार से .... (१) सूर्य नमस्कार व्यायाम, (२) अनुलोम-विलोम प्राणायाम, (३) गायत्री मन्त्र का जप, और (४) ओंकार पर ध्यान, ...... ये सर्वमान्य हो सकते हैं. इन पर कोई विवाद नहीं है.
जैसे एक सामान्य नागरिक संहिता की बात कही जाती है, वैसे ही सामान्य मूलभूत साधना पद्धति भी सभी हिन्दुओं की होनी चाहिए.
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भारत में जितने भी मत-मतान्तरों और पंथों का जन्म हुआ है, उनमें ये तथ्य सर्वमान्य हैं .....
(१) आत्मा की शाश्वतता, (२) पुनर्जन्म, और (३) कर्म फलों का सिद्धांत |
इनकी तरह सभी भारतीय साधना पद्धतियों में भी अनेक समानताएँ हैं जिन पर बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार विमर्श कर के हमें समान बिन्दुओं को निर्धारित कर एक सर्वमान्य मूलभूत साधना पद्धति का भी निर्णय करना चाहिए| यह कार्य सभी धर्माचार्य ही मिलकर कर सकते हैं|
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कुछ सामान बिंदु हैं जिनका कोई विरोध नहीं है, जैसे .....
(१) हठयोग के आसन, प्राणायाम आदि |
(२) जप, कीर्तन और ध्यान |
जिस तरह एक सामान्य नागरिक संहिता की बात कही जाती है, उसी तरह एक सामान्य मूलभूत साधना पद्धति भी सभी हिन्दुओं की होनी ही चाहिए |

ॐ ॐ ॐ !!

Tuesday, 26 September 2017

सृष्टिकर्ता के बनाए नियम अपरिवर्तनीय हैं ......

सृष्टिकर्ता के बनाए नियम अपरिवर्तनीय हैं ......
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मनुष्य द्वारा बनाए गए नियम परिवर्तित हो सकते हैं, पर परमात्मा द्वारा बनाए गए नियम सदा अपरिवर्तनीय हैं| जैसे सत्य बोलना, परोपकार करना आदि पहले पुण्य थे तो आज भी पुण्य हैं| झूठ बोलना, चोरी करना, हिंसा करना पाप था तो आज भी पाप है| परमात्मा के बनाए हुए नियम अटल हैं, और पूरी प्रकृति उनका पालन कर रही है|
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हम ने जन्म लिया था परमात्मा की प्राप्ति के लिए, पर कुबुद्धि से कुतर्क कर के स्वयं को तो भटका ही रहे हैं, अहंकारवश औरों को भी भटका रहे हैं| हम जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त होने का उपाय न करने के लिए तरह तरह के बहाने बना रहे हैं| सही शिक्षा जो हमें आत्मज्ञान की और प्रवृत करती है, उसको हमने साम्प्रदायिक और पुराने जमाने की बेकार की बात बताकर हीन मान लिया है|
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हम जहाँ भी हैं, वहीं से परमात्मा की ओर उन्मुख हो जाएँ निश्चित रूप से मार्गदर्शन मिल सकता है| परमात्मा की ओर उन्मुख तो होना ही पडेगा, आज नहीं तो फिर किसी अन्य जन्म में| अभी सुविधाजनक नहीं है तो अगले जन्मों की प्रतीक्षा करते रहिये| शुभ कामनाएँ| 

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ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ ||
२७ सितम्बर २०१७

हे मृत्यु, तेरा दंश कहाँ है ? हे मृत्यु, तेरी विजय कहाँ है ?......

हे मृत्यु, तेरा दंश कहाँ है ? हे मृत्यु, तेरी विजय कहाँ है ?......
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योगिराज श्री श्री श्याचरण लाहिड़ी महाशय (30 सितम्बर 1828 – 26 सितम्बर 1895) की आज १२२ वीं पुण्यतिथि है| मैं उन्हीं की क्रियायोग मार्ग की परम्परा में दीक्षित हूँ, अतः निम्न पंक्तियाँ उन्हें प्रणाम निवेदित करता हुआ उन की पुण्य स्मृति में लिख रहा हूँ .....
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हे मृत्यु, तेरी विजय कहाँ है ? हे मृत्यु, तेरा दंश कहाँ है ? जीवन और मृत्यु दोनों ही प्रकाश और अन्धकार के खेल हैं| कभी प्रकाश हावी हो जाता है और कभी अन्धकार, पर विजय सदा प्रकाश की ही होती है यद्यपि अन्धकार के बिना प्रकाश का कोई महत्त्व नहीं है| सृष्टि द्वंद्वात्मक यानि दो विपरीत गुणों से बनी है| जीवन और मृत्यु भी दो विपरीत गुण हैं, पर मृत्यु एक मिथ्या भ्रम मात्र है, और जीवन है वास्तविकता| जीवात्मा कभी मरती नहीं है, सिर्फ अपना चोला बदलती है, अतः विजय सदा जीवन की ही है, मृत्यु की नहीं|
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भगवान श्रीकृष्ण का वचन है ....
"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृहणाति नरोऽपराणि |
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही" ||
जिस प्रकार मनुष्य फटे हुए जीर्ण वस्त्र उतार कर नए वस्त्र धारण कर लेता है, वैसे ही यह देही जीवात्मा पुराने शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर धारण कर लेती है|
(गीता में आस्था रखने वालों को समाधियों, मक़बरों और कब्रों की पूजा नहीं करनी चाहिए क्योंकि दिवंगत आत्मा तो तुरंत दूसरा शरीर धारण कर लेती है| महापुरुष तो परमात्मा के साथ सर्वव्यापी हैं)
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जीवात्मा सदा शाश्वत है| भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ...
"नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः | न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारूतः" ||
जीवात्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, पानी गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकती"|
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भगवान श्रीकृष्ण ने ही कहा है ....
"न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः |
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे"||
जीवात्मा अनादि व अनन्त है| यह न कभी पैदा होता है और न मरता है| यह कभी होकर नहीं रहता और फिर कभी नहीं होगा, ऐसा भी नहीं है| यह (अज) अजन्मा अर्थात् अनादि, नित्य और शाश्वत सनातन है|
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शरीर के मरने वा मारे जाने पर भी जीवात्मा मरती नहीं है| बाइबिल के अनुसार भी ...
{1 Corinthians 15:54-55New International Version (NIV)}
54 "When the perishable has been clothed with the imperishable, and the mortal with immortality, then the saying that is written will come true: “Death has been swallowed up in victory.”[a]
55 “Where, O death, is your victory?
Where, O death, is your sting?”[b]
Footnotes:
1 Corinthians 15:54 Isaiah 25:8
1 Corinthians 15:55 Hosea 13:14
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श्री श्री लाहिड़ी महाशय अपनी देहत्याग के दूसरे दिन प्रातः दस बजे दूरस्थ अपने तीन शिष्यों के समक्ष एक साथ एक ही समय में अपनी रूपांतरित देह में यह बताने को साकार प्रकट हुए कि उन्होंने अपनी उस भौतिक देह को त्याग दिया है, और उन्हें उनके दर्शनार्थ काशी आने की शीघ्रता नहीं है| उनके साथ उन्होंने और भी बातें की| समय समय पर उन्होंने अपने अनेक शिष्यों के समक्ष प्रकट होकर उन्हें साकार दर्शन दिए हैं| विस्तृत वर्णन उनकी जीवनियों में उपलब्ध है|
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सचेतन देहत्याग के पूर्व उन्होंने कई घंटों तक गीता के श्लोकों की व्याख्या की और अचानक कहा कि "मैं अब घर जा रहा हूँ"| यह कह कर वे अपने आसन से उठ खड़े हुए, तीन बार परिक्रमा की और उत्तराभिमुख हो कर पद्मासन में बैठ गए और ध्यानस्थ होकर अपनी नश्वर देह को सचेतन रूप से त्याग दिया| पावन गंगा के तट पर मणिकर्णिका घाट पर गृहस्थोचित विधि से उनका दाह संस्कार किया गया| वे मनुष्य देह में साक्षात शिव थे|
ऐसे महान गृहस्थ योगी को नमन करते हुए मैं इस लेख का समापन करता हूँ|
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ॐ नमः शिवाय ! ॐ शिव ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
आश्विन शुक्ल ६, विक्रम संवत २०७४.
२६ सितम्बर २०१७