Friday, 14 November 2025

कुछ यक्ष प्रश्न जिन पर कृपा कर के कुछ विचार करो .......

 कुछ यक्ष प्रश्न जिन पर कृपा कर के कुछ विचार करो .......

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{AA} हमारी संवेधानिक व्यवस्था में प्रयुक्त कुछ शब्द जो आधिकारिक रूप से परिभाषित नहीं है| ये आधिकारिक रूप से परिभाषित होने चाहिएँ .....
(१) "धर्मनिरपेक्षता" .
(२) "साम्प्रदायिकता" .
(३) "अल्पसंख्यक" .
(४) "पिछड़ा" .
(5) अति पिछड़ा" .
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{BB} अल्पसंख्यक कौन है? भारत में यदि मजहब के आधार पर अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक होते हैं तो "यहूदी" मजहब के अनुयायी वास्तव में असली अल्पसंख्यक हैं| भारत में यहूदियों की संख्या एक हज़ार से भी कम है|
भारत में पारसी मजहब के अनुयायी भी एक लाख से कम हैं|
(१) भारत में यहूदी और पारसी मतानुयायिओं को "अल्पसंख्यक क्यों नहीं माना जाता ?
(२) जो नास्तिक हैं वे भी धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक की श्रेणी में आते हैं| नास्तिकों को अल्पसंख्यक क्यों नहीं माना जाता?
(३) जो किन्नर यानि हिंजड़े हैं उनका भी अपना अलग ही मज़हब होता है| धर्म के आधार पर वे अल्पसंख्यक क्यों नहीं हैं?
(४) और भी अनेक नगण्य मजहबों के लोग भारत में रहते हैं| क्या वे अल्पसंख्यक नहीं हैं?
(५) भारत में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की अवधारणा वास्तव में क्या एक पाखण्ड और धोखा नहीं है?
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धन्यवाद|
१५ नवम्बर २०१५

भगवान बाँके-बिहारी ---

 भगवान बाँके-बिहारी ---

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भगवान श्रीकृष्ण की हाथ में बांसुरी बजाते हुए, दाहिने पैर पर भार डालकर बायाँ पैर आगे टिका कर, देह को तीन स्थानों से मोड़ कर खड़े होने की जो मुद्रा है वह त्रिभंग मुद्रा है। ऐसी मुद्रा में भगवान जैसे खड़े हैं, उन्हें "बाँके-बिहारी" कहते हैं। वृंदावन में मुख्य मंदिर ही भगवान बाँके-बिहारी का है।
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यह मुद्रा -- योग साधना द्वारा ब्रह्मग्रंथि (आज्ञाचक्र), विष्णुग्रंथि (अनाहतचक्र) और रूद्रग्रंथि (मूलाधारचक्र) -- इन तीनों अज्ञान ग्रंथियों के भेदन का प्रतीक है, जो कुंडलिनी-जागरण और आत्म-ज्ञान की प्राप्ति के लिए आवश्यक है।
श्रीमद्भागवत (१/२/२१) और मुन्डकोपनिषद (२/२/८) में इसकी चर्चा है।
"भिद्यते हृदयग्रंथिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥" (मुन्डकोपनिषद : २/२/८)
विष्णु ग्रंथि का भेदन होने से सब संशय दूर हो जाते हैं।
दुर्गापूजा में असुर वध के माध्यम से उसी हृदय ग्रंथि भेद की क्रिया को ही रूपक द्वारा प्रदर्शित किया गया है।
इसी प्रकार रूद्रग्रंथि और ब्रह्मग्रन्थी भेदन की महिमा शास्त्रों में भरी पडी है। यह अत्यंत दुष्कर कार्य है, इससे पशुवृत्ति पर नियंत्रण होता है। ज्ञानसंकलिनी तंत्र के अनुसार ऐसा साधक ऊर्ध्वरेता बनता है।
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यह विधि एक गुरु प्रदत्त विद्या है जो गुरु द्वारा ही शिष्य को प्रदान की जा सकती है। इसे गोपनीय इसलिए रखा गया है क्योंकि इसकी साधना करने से सूक्ष्म शक्तियों का जागरण होता है जो पलटवार कर के साधक को विक्षिप्त भी बना सकती हैं। यम-नियमों का पालन इसमें आवश्यक है, अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि होने की संभावना अधिक है।
आप सब के ह्रदय में स्थित भगवान वासुदेव को नमन !!
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ नवंबर २०२४

Thursday, 13 November 2025

गुजरात राज्य की समृद्धि और शांति का रहस्य क्या श्रीविद्या की साधना है?

गुजरात राज्य की समृद्धि और शांति का रहस्य क्या श्रीविद्या की साधना है?
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जहाँ तक मैं जानता हूँ, पूरे भारत में श्रीविद्या और क्रियायोग के सबसे अधिक साधक गुजरात में हैं। गुजरात एक गुप्त तपोभूमि और आध्यात्मिक उन्नति का क्षेत्र है। गिरनार पर्वत के आसपास का क्षेत्र, और नर्मदा का तट बहुत अधिक जागृत है। मन में एक प्रश्न जागृत हुआ है कि क्या गुजरात की समृद्धि और शांति के पीछे श्रीविद्या और क्रियायोग की साधना है? पूरे भारत में भगवान की सबसे अधिक भक्ति भी मैं गुजराती लोगों में ही देखता हूँ।
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पुनश्च: (बाद में जोड़ा हुआ) :--- श्रीविद्या कोई रुपया-पैसा कमाने की विद्या नहीं है। आचार्य शंकर जैसे महापुरुष, स्वामी करपात्री जैसे धर्म-सम्राट, व लगभग सभी विरक्त दंडी स्वामी जिसकी उपासना करते हों, क्या वह धन कमाने या आर्थिक समृद्धि की विद्या हो सकती है? अगस्त्य ऋषि और उनकी पत्नी लोपामुद्रा -- श्रीविद्या के उपासक थे। कालखंड में यह विद्या लुप्त हो गई थी जिसे योगियों ने पुनर्जीवित किया और आचार्य शंकर को इसमें दीक्षित किया। आचार्य शंकर ने इस पर "सौन्दर्य लहरी" नामक ग्रन्थ लिखा है।
अंग्रेजों ने भारतीयों को नीचा दिखाने के लिए भारत का गलत इतिहास लिखवाया। नवीनतम गणनाओं के अनुसार आचार्य शंकर का जन्म जीसस क्राइस्ट से ५०८ वर्ष पूर्व हुआ था। उनका देहांत ४७४ BC में हुआ था। गुरु गोरखनाथ का जन्म उनसे भी पूर्व हुआ था।
श्रीविद्या कुंडलिनी महाशक्ति के जागरण, सूक्ष्मदेह के मेरुदंदस्थ सभी चक्रों के भेदन, और परमशिव से उनके मिलन की विद्या है। कुंडलिनी महाशक्ति और परमशिव के मिलन को ही योग कहते हैं। श्रीविद्या -- भगवती राजराजेश्वरी श्रीललिता महात्रिपुरसुंदरी -- प्राण-तत्व के रूप में स्वयं कुंडलिनी महाशक्ति हैं। परमशिव के साथ उनका संयोग ही योग है।

१३ नवम्बर २०२३ 

Tuesday, 11 November 2025

परमात्मा के प्रेम में सब इच्छाओं की तृप्ति .....

 परमात्मा के प्रेम में सब इच्छाओं की तृप्ति .....

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भगवान की यह प्रतिज्ञा है ..... "अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमां गतिम् |"
अपने भक्त का यदि वे मेरा स्मरण न कर सकें तो मैं स्वयं ही उनका स्मरण करता हूँ और उन्हे परम गति प्राप्त करा देता हूँ|
निश्चय कर संकल्प सहित अपने आप को परमात्मा के हाथों में सौंप दो| जहाँ हम विफल हो जाएँगे, वहाँ वे हाथ थाम लेंगे| अब और क्या चाहिए?
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उनके प्रति हृदय में जब परम प्रेम जागृत होता है तब सब इच्छाएँ तृप्त हो जाती हैं| भगवान की प्राप्ति के लिए ऐसी छटपटाहट और पीड़ा होनी चाहिए जैसे किसी ने एक परात में जलते हुए कोयले भर कर सिर पर रख दिए हों, और हमें उस अग्नि की दाहकता से मुक्ति पानी हो| ऐसा परम प्रेम हमें परमात्मा की कृपा द्वारा ही प्राप्त हो सकता है|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
11 November 2017

Wednesday, 5 November 2025

भगवान "है" ..... इस "है" शब्द में ही सब कुछ है ---

 भगवान "है" ..... इस "है" शब्द में ही सब कुछ है|

यही "हंसः" होकर हंस-गायत्री अजपा-जप हो जाता है, यही "सोहं" है, यही और भी गहरा होकर परमात्मा का वाचक "ॐ" हो जाता है| इस "है" शब्द को कभी नहीं भूलें| भगवान निरंतर हर समय हमारे साथ एक है, कहीं कोई पृथकता नहीं है| भगवान है, यहीं है, सर्वत्र है, इसी समय है, सर्वदा है, वह ही वह है, और कुछ भी नहीं है, सिर्फ भगवान ही है|

यह "है" ही सोम है| कुंडलिनी महाशक्ति जागृत होकर सुषुम्ना में ऊर्ध्वगामी भी इस हSSSS शब्द के साथ ही होती है| और भी बहुत कुछ है जो अनुभूतिजन्य है, उसे शब्दों में व्यक्त करना बड़ा कठिन है| भगवान है, यह सार की बात है| इस "है" शब्द को कभी न भूलें|

ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
५ नवंबर २०१९
. पुनश्च: ---
भगवान "हैं", यहीं "हैं", सर्वत्र "हैं", इसी समय "हैं", और सर्वदा "हैं"| जब वे हैं, तो सब कुछ है| उनकी इस उपस्थिति ने तृप्त, संतुष्ट और आनंदित कर दिया है| वे ही वे बने रहें, और कुछ भी नहीं| सारी चेतना उनकी उपस्थिति से आलोकित है| जब वे हैं, तो सब कुछ है| मैं उन के साथ एक हूँ| कहीं कोई भेद नहीं है| मैं उनकी पूर्णता हूँ| मैं उनकी सर्वव्यापकता हूँ| मैं यह देह नहीं, मैं परमशिव पारब्रह्म हूँ|
शिवोहम् शिवोहम् अहं ब्रह्मास्मि ! अयमात्मा ब्रह्म ! ॐ ॐ ॐ !!
५ नवंबर २०१९

जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो ...

 जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो ...

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फेसबुक आदि सामाजिक मंचों पर आने का मेरा कोई उद्देश्य विशेष नहीं है| भगवान के प्रति हृदय में कूट कूट कर भरा हुआ प्रेम, व्यक्त होने के लिए स्वतः ही मुझे इन मंचों पर आने को बाध्य कर देता है| मेरी कोई निजी कामना, आकांक्षा या अभिलाषा नहीं है, सिर्फ हृदय में एक तड़प है परमात्मा को व्यक्त करने की| उसके लिए पता नहीं कहाँ-कहाँ किन-किन अज्ञात लोकों में और भी अनेक जन्म लेने पड़ेंगे| पूर्वजन्मों के कर्म अधिक अच्छे नहीं थे, इसीलिए व्यक्तित्व में अनेक कमियों के साथ प्रतिकूलताओं में यह जन्म हुआ| भगवान से प्रार्थना है कि आगे जो भी जन्म मिलें उनमें जन्म से ही वैराग्य और भक्ति हो, व अनुकूल वातावरण मिले|
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जो भी हो, मुझे अब कुछ भी शिकायत, आलोचना या निंदा करने को नहीं है| इस भौतिक देह से जुड़े रहने के लिए कोई न कोई तो त्रिगुणाधीन वासना रहती ही है, अन्यथा यह शरीर उसी समय छूट जाता है|
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स्वधर्मानुष्ठान में रत रहने के लिए गीता में भगवान हमें त्रिगुणातीत होने का आदेश देते हैं ...
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन| निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्||२:४५||"
विवेक-बुद्धि से रहित कामपरायण पुरुषों के लिए वेद त्रैगुण्यविषयक हैं, परंतु हे अर्जुन, तूँ असंसारी, निष्कामी, निर्द्वन्द्व, और नित्य सत्त्वस्थ हो|
नित्य सत्वस्थ का अर्थ है ... सदा सत्त्वगुण के आश्रित रहना|
निर्द्वंद्व का अर्थ है ... सुख-दुःख के परस्पर विरोधी युग्मों से रहित होना|
निर्योगक्षेम का अर्थ है ... (अप्राप्त वस्तु को प्राप्त करनेका नाम योग है और प्राप्त वस्तु के रक्षण का नाम क्षेम है) योगक्षेमको न चाहनेवाला|
आत्मवान् का अर्थ है आत्म-विषयों में प्रमादरहित रहना|
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इस जीवन को भगवान ही जी रहे हैं, मैं अकिंचन तो उन के एक निमित्तमात्र उपकरण से अधिक कुछ भी नहीं हूँ| जीवन एक सतत् प्रक्रिया है| कोई मृत्यु नहीं होती| यह शरीर बेकार हो जाने पर या कर्मफलानुसार शांत हो जाता है, और कोई नई देह किसी अन्य परिवेश में मिल जाती है| जब भगवान को समर्पित हो ही गए हैं, तो किसी भी तरह की कोई आकांक्षा, कामना या इच्छा भी नहीं रहनी चाहिए| जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो| इति||
ॐ तत्सत् !! भगवान की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब महान निजात्मगण को नमन !!
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कृपा शंकर
झुंझुनूं (राजस्थान)
५ नवंबर २०२०
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पुनश्च: भगवान ही हमारा उद्धार कर सकते हैं| हमारे में कोई सामर्थ्य नहीं है| एक अबोध बालक जब मल-मूत्र रूपी विष्ठा में पड़ा होता है तब माँ ही उसे स्वच्छ कर सकती है| अपने आप तो वह उज्ज्वल नहीं हो सकता| यह सांसारिकता भी किसी विष्ठा से कम नहीं है| भगवान ही हमारे माता-पिता हैं, उनके सिवाय हमारा अन्य कोई नहीं है|

परमात्मा की सबसे बड़ी कृपा --- .

 परमात्मा की सबसे बड़ी कृपा ---

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परमात्मा की सबसे बड़ी कृपा हमारे ऊपर यह है कि उन्होंने स्वयं को पाने का मार्ग हमें बता दिया है। यदि फिर भी हम परमात्मा को प्राप्त नहीं करते तो हमारे से बड़ा अभागा और कोई नहीं है। सारे उपनिषदों को देख लीजिए, और श्रीमद्भगवद्गीता को देख लीजिए, उनमें यही बात बार बार समझाई गई है।
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जो परमात्मा के मार्ग के पथिक हैं, मैं उनके साथ एक हूँ। आप मुझे परमात्मा में अपने साथ एक पाओगे। परमात्मा की प्राप्ति ही सबसे बड़ी सेवा है जो हम समष्टि के लिए कर सकते हैं। यह हमारा प्रथम, अंतिम और एकमात्र कर्तव्य है। आपने निज जीवन में परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया है तो आप इस पृथ्वी पर चलते-फिरते देवता हो। जहाँ भी आपके पैर पड़ते हैं, वह भूमि पवित्र हो जाती है। जिस पर आपकी दृष्टि पड़ती है, या जिसकी भी दृष्टि आप पर पड़ती है, वह निहाल हो जाता है। देवता और पितृगण आपको देखकर प्रसन्न होकर नृत्य करने लगते हैं। आपकी उपस्थिति ही इस सृष्टि के लिए वरदान हो जाती है।
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मैं कोई बड़ी बड़ी बातें नहीं कर रहा। यह वास्तविकता है। अपने दिन का आरंभ भगवान के ध्यान से करें, और दिवस का समापन भी भगवान के ध्यान से करें। हर समय उन्हें अपनी स्मृति में रखें। शास्त्रों के प्रमाण में अनेक बार दे चुका हूँ। बार बार उन्हें उद्धृत करना ठीक नहीं होगा। भगवान को अपने जीवन का कर्ता, भोक्ता और जीवन का केंद्र बिन्दु बनाएँ।
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सभी को मंगलमय शुभ कामनाएँ और नमन !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
५ नवंबर २०२३