मैं इस समय किनारे पर बैठा हुआ, आने वाले समय के लिए पूरी तरह तैयार हूँ। स्वयं को छोड़कर किसी भी अन्य पर कोई भरोसा नहीं रहा है। मेरी नौका के एकमात्र कर्णधार वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण हैं, वे स्वयं ही यह नौका हैं, और वे ही यह "मैं" बन गए हैं। जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, वह भी वे ही हैं। अन्य सब मिथ्या है।
Tuesday, 4 November 2025
मेरी नौका के एकमात्र कर्णधार वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण हैं, वे स्वयं ही यह नौका हैं, और वे ही यह "मैं" बन गए हैं ---
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"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥" (गीता)
अर्थात् -- बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि 'यह सब वासुदेव है' ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है; ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है॥
"अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥८:५॥"
अर्थात् -- और जो कोई पुरुष अन्तकाल में मुझे ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं॥
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥८:१३॥"
अर्थात् -- जो पुरुष ओऽम् इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है॥
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
अर्थात् -- हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥
"पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥८:२२॥"
अर्थात् -- हे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है॥
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"ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणत: क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
"ॐ नमो ब्रह्मण्य देवाय गोब्राह्मण हिताय च।
जगत् हिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
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"हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छाँह।
एक पुरुष, भीगे नयनों से, देख रहा था प्रलय प्रवाह॥" (कामायनी)
(उस पुरुष की तरह मैं भी एक साक्षी की तरह इस संसार का अवलोकन कर चुका हूँ जो किसी प्रलय से कम नहीं है)
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हरि: ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
३ नवंबर २०२५
७ नवंबर १९१७ से पेत्रोग्राद (अब सेंट पीटर्सबर्ग ) में आरंभ हुई बोल्शेविक क्रांति को ७ नवंबर २०२५ को १०८ वर्ष हो जायेंगे ---
७ नवंबर १९१७ से पेत्रोग्राद (अब सेंट पीटर्सबर्ग ) में आरंभ हुई बोल्शेविक क्रांति को ७ नवंबर २०२५ को १०८ वर्ष हो जायेंगे। यह विश्व की एक अत्यधिक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसके पश्चात मार्क्सवादी (साम्यवादी) शासनों की स्थापना का क्रम आरंभ हुआ। ५८ वर्ष पूर्व 7 नवंबर १९६७ को इस क्रांति की ५०वीं वर्षगांठ पर मैं रूस में मनाए जा रहे उत्सवों का साक्षी था।
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एक समय था जब मैं मार्क्सवाद से बहुत अधिक प्रभावित था। लेकिन अब बात दूसरी है। मैं इसे सर्वहारा की क्रांति ही नहीं मानता। इस ने विश्व में असत्य का अंधकार ही अंधकार बहुत अधिक फैलाया। अब निष्पक्ष दृष्टि से सोचता हूँ तो यह वोल्गा नदी में खड़े क्रूजर युद्धपोत 'अवरोरा' से आरंभ हुआ तत्कालीन परिस्थितियों में एक सैनिक विद्रोह था, जिसे जर्मनी की सहायता से लेनिन ने रूस में आकर बोल्शेविक क्रांति का रूप दे दिया। रूस का तत्कालीन शासक ज़ार निकोलस रोमानोव एक अक्षम और बहुत कमजोर भोला-भाला शासक था। उसके समय भ्रष्टाचार अपने चरम पर था। वह रूस की सेना के तोपखाने में एक कर्नल रह चुका था। शासक की योग्यता उसमें नहीं थी। अगर वह सक्षम होता तो बात दूसरी ही होती। उस समय रूस का पूरा शासक वर्ग ही भ्रष्ट था। मार्क्सवादी बोल्शेविक क्रांति के बारे में कुछ भी टिप्पणी करने से पूर्व तत्कालीन विकट परिस्थितियों को समझना आवश्यक है। मेरे विचार से वह एक त्रासदी थी, कोई क्रांति नहीं।
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जो भी हुआ, मनुष्यता को उस अनुभव से निकलना था। इसी लिए मनुष्य रचित ये सारे वाद आये। इससे अधिक मैं नहीं लिखना चाहता।
कृपा शंकर
४ नवंबर २०२५
हृदय में परमात्मा से प्रेम के बिना हम सब एक नाक कटी हुई सुन्दर नारी की तरह हैं --- .
हृदय में परमात्मा से प्रेम के बिना हम सब एक नाक कटी हुई सुन्दर नारी की तरह हैं ---
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मैं अपने विचारों पर दृढ़ हूँ। जो मेरे विचारों से सहमत नहीं हैं, वे मेरे मित्र-संकुल का त्याग कर सकते हैं। यह मेरे ऊपर उनका एक बहुत बड़ा उपकार होगा। मैं सिर्फ उन्हीं का साथ चाहता हूँ, जिनके हृदय में कूट कूट कर परमात्मा के प्रति अहैतुकी परमप्रेम भरा पड़ा हो, जो ईश्वर को उपलब्ध होना चाहते हों, और जिनके हृदय में भारतवर्ष व सनातन धर्म के प्रति पूर्ण प्रेम हो।
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मुट्ठी भर संकल्पवान लोग जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ़ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं। मोक्ष की हमें व्यक्तिगत रूप से कोई आवश्यकता नहीं है। आत्मा तो नित्य मुक्त है, बंधन केवल भ्रम मात्र हैं। जब धर्म और राष्ट्र की अस्मिता पर मर्मान्तक प्रहार हो रहे हैं, तब व्यक्तिगत मोक्ष और कल्याण की कामना धर्म नहीं हो सकती।
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सब ओर से निराश होकर बड़ी कठिनाई से हम परमात्मा के सम्मुख आ पाये हैं। इसे शरणागति मानकर उन्हें हमारा समर्पण स्वीकार करना ही होगा। कुछ करने की ऊर्जा भी नहीं रही है। अब तो स्वयं परमात्मा को हमारे हृदय-मंदिर में पधार कर अपना स्थायी डेरा डालना होगा। सारी प्रार्थनाएँ हम भूल गये हैं। अब कोई साधना नहीं होती। हम तो उनके उपकरण मात्र हैं, जिसे वे ही संभाल सकते हैं। हमारे वश में कुछ भी नहीं है। हृदय में परमात्मा से प्रेम के बिना हम सब एक नाक कटी हुई सुन्दर नारी की तरह हैं।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ नवंबर २०२५
Monday, 3 November 2025
हे राम, आपके बिना हम नाक कटी हुई सुन्दर नारी की तरह हैं ......
हे राम, आपके बिना हम नाक कटी हुई सुन्दर नारी की तरह हैं ......
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"बुद्धि बडी चतुराई बडी सुख सुन्दरता तन सों लिपटी है |
मान बडो धन धाम बडो यश कीरति हूँ जग में प्रगटी है ||
झूमत द्वार मतंग अनेक सुरेशहुँ ते कछु नाहिं घटी है |
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सब ओर से निराश होकर बड़ी कठिनाई से आप के सम्मुख तो हम आ गये हैं, अब इसे शरणागति मानकर हमारा समर्पण स्वीकार करो| अब कुछ भी साधन होता ही नहीं है| कुछ करने की ऊर्जा भी नहीं रही है| अब तो आप स्वयं हमारे ह्रदय मंदिर में पधार कर यहीं अपना स्थायी डेरा डाल दें| सारी प्रार्थनाएँ हम भूल गए हैं| अब कोई साधना नहीं होती| हम तो आपके उपकरण मात्र हैं, जिसे आप ही संभालो| हमारे वश में कुछ नहीं है|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
४ नवंबर २०१६
हमारा विचारपूर्वक किया हुआ दृढ़ संकल्प ----
हमारा विचारपूर्वक किया हुआ दृढ़ संकल्प ----
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मुट्ठी भर संकल्पवान लोग जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ़ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं| मोक्ष की हमें व्यक्तिगत रूप से कोई आवश्यकता नहीं है| आत्मा तो नित्य मुक्त है, बंधन केवल भ्रम मात्र हैं| जब धर्म और राष्ट्र की अस्मिता पर मर्मान्तक प्रहार हो रहे हैं तब व्यक्तिगत मोक्ष और कल्याण की कामना धर्म नहीं हो सकती| एक दृढ़ संकल्पवान व्यक्ति का संकल्प पूरे विश्व को बदल सकता है| हमारा दृढ़ संकल्प भी भारत के अतीत के गौरव और सम्पूर्ण विश्व में सनातन हिन्दू धर्म को पुनर्प्रतिष्ठित कर सकता है| भारत माँ अपने पूर्ण वैभव के साथ पुनश्चः अखण्डता के सिंहासन पर निश्चित रूप से बिराजमान होगी| भारत के घर घर में वेदमंत्रों की ध्वनियाँ गूंजेगीं| पूरा भारत पुनः अखंड हिन्दू राष्ट्र होगा| एक प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति भारतवर्ष का अभ्युदय करेगी| कहीं भी कोई असत्य और अन्धकार नहीं होगा| राम राज्य फिर से स्थापित होगा| वह दिन देखने को हम जीवित रहें या ना रहें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता| अनेक बार जन्म लेना पड़े तो भी यह कार्य संपादित होते हुए ही हम देखेंगे| इसमें मुझे कोई भी संदेह नहीं है| अब आवश्यकता है सिर्फ अपने सब के विचारपूर्वक किये हुए सतत संकल्प और प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण की|
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यह कार्य हम स्वयं के लिए नहीं अपितु भगवान के लिए कर रहे हैं| मोक्ष की हमें व्यक्तिगत रूप से कोई आवश्यकता नहीं है| ज्ञान की गति के साथ साथ हमें भारत की आत्मा का भी विस्तार करना होगा| यह परिवर्तन बाहर से नहीं भीतर से करना होगा| भारत की सभी समस्याओं का निदान हमारे भीतर है| हमें स्वयं परमात्मा की उपलब्धि कर के, उस उपलब्धि के द्वारा बाहर के विश्व को एक नए साँचे में ढाल सकते हैं| सर्वप्रथम हमें स्वयं को परमात्मा के प्रति पूर्णतः समर्पित होना होगा| फिर हमारा किया हुआ हर संकल्प पूरा होगा| तब प्रकृति की हरेक शक्ति हमारा सहयोग करने को बाध्य होगी| जिस प्रकार एक इंजन अपने ड्राइवर के हाथों में सब कुछ सौंप देता है, एक विमान अपने पायलट के हाथों में सब कुछ सौंप देता है वैसे ही हमें अपनी सम्पूर्ण सत्ता परमात्मा के हाथों में सौंप देनी चाहिए| अपने लिए कुछ भी बचाकर नहीं रखना चाहिये, जिससे परमात्मा हमारे माध्यम से कार्य कर सकें| उन्हें अपने भीतर प्रवाहित होने दें| सारे अवरोध नष्ट कर दें|
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जो लोग भगवान से कुछ माँगते हैं, भगवान उन्हें वो ही चीज देते हैं जिसे वे माँगते हैं| परन्तु जो लोग अपने आप को दे देते हैं और कुछ भी नहीं माँगते, उन्हें वे अपना सब कुछ दे देते हैं, उस व्यक्ति का हर संकल्प पूरा होता है| सारी सृष्टि का भविष्य इस पृथ्वी पर निर्भर है, इस पृथ्वी का भविष्य भारतवर्ष पर निर्भर है, और भारतवर्ष का भविष्य सनातन हिन्दू धर्म पर निर्भर है, सनातन हिन्दू धर्म का भविष्य हम सब के संकल्प पर निर्भर है| और भी स्पष्ट शब्दों में .... हमारे ऊपर ही पूरी सृष्टि का भविष्य निर्भर है| धर्मविहीन राष्ट्र और समाज से इस सृष्टि का ही विनाश निश्चित है| परमात्मा की सबसे अधिक अभिव्यक्ति भारतवर्ष में ही हुई है| भारत से सनातन हिन्दू धर्म नष्ट हुआ तो इस विश्व का विनाश भी निश्चित है| वर्त्तमान अन्धकार का युग समाप्त हो चुका है| बाकि बचा खुचा अन्धकार भी शीघ्र दूर हो जाएगा|
अतीत के कालखंडों में अनेक बार इस प्रकार का अन्धकार छाया है पर विजय सदा सत्य की ही रही है|
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परमात्मा के एक संकल्प से यह सृष्टि बनी है| हम भी एक शाश्वत आत्मा, परमात्मा के एक दिव्य अमृत पुत्र हैं| जो कुछ भी परमात्मा का है वह हमारा ही है| हम कोई भिखारी नहीं हैं| परमात्मा को पाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है| हम उन के अमृतपुत्र हैं| जब परमात्मा के एक संकल्प से इस विराट सृष्टि का उद्भव और स्थिति है तो हमारा दिव्य संकल्प भी भारतवर्ष का अभ्युदय कर सकता है, क्योंकि हम स्वयं परमात्मा के अमृतपुत्र हैं| जो भगवान् का है वह हमारा ही है| हमारे विशुद्ध अस्तित्व और प्रभु में कोई भेद नहीं है| हम स्वयं ही परमात्मा हैं जिनके संकल्प से धर्म और राष्ट्र का उत्कर्ष हो रहा है| हमारा संकल्प ही परमात्मा का संकल्प है|
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वर्तमान में जब धर्म और राष्ट्र के अस्तित्व पर मर्मान्तक प्रहार हो रहे है तब व्यक्तिगत कामना और व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु साधना उचित नहीं है| जो साधना एक व्यक्ति अपने मोक्ष के लिए करता है वो ही साधना यदि वो धर्म और राष्ट्र के अभ्युदय के लिए करे तो निश्चित रूप से उसका भी कल्याण होगा| धर्म उसी की रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करता है| हमारा सर्वोपरि कर्त्तव्य है धर्म और राष्ट्र की रक्षा| हम धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म भी हमारी रक्षा करेगा| धर्म की रक्षा हम सब का का सर्वोपरि कर्तव्य है
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एक छोटा सा संकल्प रूपी योगदान हम कर सकते हैं| जब भी समय मिले शांत होकर बैठिये| दृष्टि भ्रूमध्य में स्थिर कीजिये| अपनी चेतना को सम्पूर्ण भारतवर्ष से जोड़ दीजिये| यह भाव कीजिये कि हम यह देह नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष हैं| एक दिव्य अनंत प्रकाश की कल्पना कीजिये जो हमारा अपना ही प्रकाश है| हम स्वयं ही वह प्रकाश हैं| वह प्रकाश ही सम्पूर्ण भारतवर्ष है| उस प्रकाश को और भी गहन से गहनतम बनाइये| अब यह भाव रखिये कि हमारी हर सांस के साथ वह प्रकाश और भी अधिक तीब्र और गहन होकर सम्पूर्ण विश्व, ब्रह्माण्ड और सृष्टि को आलोकित कर रहा है| भारतवर्ष में कहीं भी कोई असत्य और अन्धकार नहीं है| यह भारतवर्ष का ही आलोक है जो सम्पूर्ण सृष्टि को ज्योतिर्मय बना रहा है| इस भावना को दृढ़ से दृढ़ बनाइये| नित्य इसकी साधना कीजिये| पृष्ठभूमि में ओंकार का जाप भी करते रहिये| धीरे धीरे स्पष्ट रूप से वह प्रकाश भी दिखने लगेगा और ओंकार की ध्वनी भी सुनने लगेगी| सदा यह भाव रखें कि हम ही सम्पूर्ण भारतवर्ष हैं और निरंतर ज्योतिर्मय हो रहे हैं| कहीं भी कोई असत्य और अन्धकार नहीं है| हमारी रक्षा होगी, भगवान हमारे साथ हैं|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ !!
११ अप्रेल २०१३
Sunday, 2 November 2025
हमारा संकल्प शिव संकल्प हो। सतत शुभ कामनाएँ ---
हमारा संकल्प शिव संकल्प हो| सतत शुभ कामनाएँ ------------
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जो भी राष्ट्रभक्त और धर्मप्रेमी हैं, जिन्हें परमात्मा से प्रेम है, उन्हें इस दीपावली से मात्र अपने व्यक्तिगत जीवन के ही नहीं अपितु अनन्त अन्धकार और असत्य के तामस से घिरे सम्पूर्ण अखंड आध्यात्मिक सनातन हिन्दू राष्ट्र 'भारतवर्ष' के अभ्युदय और उत्कर्ष के लिए ही अपनी साधना करनी चाहिए|
एक छोटा सा संकल्प रूपी योगदान आप कर सकते हैं| जब भी समय मिले शांत होकर बैठिये| दृष्टि भ्रूमध्य में स्थिर कीजिये| अपनी चेतना को सम्पूर्ण भारतवर्ष से जोड़ दीजिये| यह भाव कीजिये कि आप यह देह नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष हैं| एक दिव्य अनंत प्रकाश की कल्पना कीजिये जो आपका अपना ही प्रकाश है|आप स्वयं ही वह प्रकाश हैं| वह प्रकाश ही सम्पूर्ण भारतवर्ष है| उस प्रकाश को और भी गहन से गहनतम बनाइये| अब यह भाव रखिये कि आपकी हर श्वास के साथ वह प्रकाश और भी अधिक तीब्र और गहन हो रहा है और सम्पूर्ण विश्व, ब्रह्माण्ड और सृष्टि को आलोकित कर रहा है| आप में यानि भारतवर्ष में कहीं भी कोई असत्य और अन्धकार नहीं है| यह भारतवर्ष का ही आलोक है जो सम्पूर्ण सृष्टि को ज्योतिर्मय बना रहा है| इस भावना को दृढ़ से दृढ़ बनाइये| नित्य इसकी साधना कीजिये|
पृष्ठभूमि में ओंकार का जाप भी करते रहिये| आपको धीरे धीरे स्पष्ट रूप से प्रकाश भी दिखने लगेगा और ओंकार की ध्वनी भी सुनने लगेगी|
सदा यह भाव रखें की आप ही सम्पूर्ण भारत हैं|
परमात्मा के एक संकल्प से यह सृष्टि बनी है| आप भी एक शाश्वत आत्मा हैं| आप भी परमात्मा के एक दिव्य अमृत पुत्र हैं| जो कुछ भी परमात्मा का है वह आपका है| आप कोई भिखारी नहीं हैं| परमात्मा को पाना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है|
जब परमात्मा के एक संकल्प से इस विराट सृष्टि का उद्भव और स्थिति है तो आपका संकल्प भी भारतवर्ष का अभ्युदय कर सकता है क्योंकि आप स्वयं परमात्मा के अमृतपुत्र हैं| जो भगवान् का है वह आप का भी है| आपके विशुद्ध अस्तित्व और प्रभु में कोई भेद नहीं है| आप स्वयं ही परमात्मा हैं जिसके संकल्प से धर्म और राष्ट्र का उत्कर्ष हो रहा है| आपका संकल्प ही परमात्मा का संकल्प है| प्रकृति की प्रत्येक शक्ति आपका सहयोग करने को बाध्य है|
वर्त्तमान में इस समय जब धर्म और राष्ट्र के अस्तित्व पर मर्मान्तक प्रहार हो रहे है तब व्यक्तिगत कामना और व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु साधना उचित नहीं है|
आप धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म भी आप की रक्षा करेगा| धर्म की रक्षा आप का सर्वोपरि कर्तव्य है| ॐ तत्सत्|
ओम् आ ब्रम्हन्ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतां
आस्मिन्राष्ट्रे राजन्य इषव्य
शूरो महारथो जायतां
दोग्ध्री धेनुर्वोढाअनंवानाशुः सप्तिः
पुरंधिर्योषा जिष्णू रथेष्ठाः
सभेयो युवाअस्य यजमानस्य वीरो जायतां|
निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु
फलिन्यो न औषधयः पच्यन्तां
योगक्षेमो नः कल्पताम ||"
(इस राष्ट्र में ब्रह्मतेजयुक्त ब्राह्मण उत्पन्न हों| धनुर्धर, शूर और बाण आदि का उपयोग करने वाले कुशल क्षत्रिय पैदा होयें| अधिक दूध देने वाली गायें होवें| अधिक बोझ ढो सकें ऐसे बैल होवें| ऐसे घोड़े होवें जिनकी गति देखकर पवन भी शर्मा जावे| राष्ट्र को धारण करने वाली बुद्धिमान तथा रूपशील स्त्रियां पैदा होवें, विजय संपन्न करने वाले महारथी होवें|
समय समय पर योग्य वारिस हो, वनस्पति वृक्ष और उत्तम फल हों| हमारा योगक्षेम सुखमय बने|)
०२ नवम्बर २०१३
Saturday, 1 November 2025
हम भगवान के साथ एक हैं, उन से पृथक नहीं ---
हम भगवान के साथ एक हैं, उन से पृथक नहीं ---
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"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि यह सब वासुदेव है ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है।
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सब नामरूपों से परे भगवान वासुदेव ही सर्वस्व हैं। जो अपने पूर्ण ह्रदय से भगवान से प्रेम करते हैं, जो निरंतर भगवान का स्मरण करते हैं, ऐसे सभी महात्माओं को मैं नमन करता हूँ। सारे उपदेश और सारी बड़ी बड़ी दार्शनिक बातें बेकार हैं यदि परमात्मा से प्रेम न हो तो। परमात्मा से प्रेम ही सारे सद्गुणों को अपनी ओर खींचता है। राष्ट्रभक्ति भी उसी में हो सकती है जिस के हृदय में परमात्मा से प्रेम हो। जो परमात्मा को प्रेम नहीं कर सकता, वह किसी को भी प्रेम नहीं कर सकता। ऐसा व्यक्ति इस धरा पर भार ही है।
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भगवान की भक्ति, भगवान से कुछ लेने के लिए नहीं, उन्हें अपना पृथकत्व का मायावी बोध बापस लौटाने के लिए होती है। हम उन सच्चिदानंद भगवान के अंश हैं, वे स्वयं ही हमारे हैं, और हम उनके हैं, अतः जो कुछ भी भगवान का है, वह हम स्वयं हैं। हम उनके साथ एक हैं, उन से पृथक नहीं।
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ नवंबर २०२१
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