Sunday, 14 January 2018

अभ्यासयोगयुक्त अनन्यगामी चित्तद्वारा दिव्य परम पुरुष का हम चिंतन करें ....

सभी मित्रों से एक प्रश्न .....
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जब अच्छे कर्मों का फल मिलता है तब तो हम कहते हैं कि भगवान की कृपा से ऐसा हुआ| पर जब बुरे कर्मों का फल मिलता है तब हम इसे भगवान की कृपा क्यों नहीं मानते ? तब हम इसे अपना दुर्भाग्य क्यों मानते हैं?
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उपरोक्त प्रश्न का उत्तर मेरी बुद्धि से तो यही हो सकता है कि हमारी बुद्धि और मन दोनों ही परमात्मा को अर्पित नहीं हैं, तभी ऐसा विचार मन में आया| यदि हम अपने मन और बुद्धि दोनों को ही परमात्मा को समर्पित कर दें तब ऐसा प्रश्न ही नहीं उठेगा| भगवान को प्रिय भी वही व्यक्ति है जिसने अपना मन और बुद्धि दोनों ही भगवान को अर्पित कर दिए हैं|
भगवान कहते हैं ....
"सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः |
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ||१२.१४||
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इससे पहले भगवान कह चुके हैं ........
"यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः |
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते" ||६.२२||
परमात्मा को प्राप्त करके योगस्थ व्यक्ति परमानंद को प्राप्त होकर इससे अधिक अन्य कोई सुख नहीं मानता हुआ भारी से भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता है|
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हम परमात्मा को प्राप्त नहीं हुए इसी लिए दुःखों से विचलित हैं| अन्यथा दुःख और सुख दोनों ही भगवान के प्रसाद हैं| अभ्यास द्वारा हम ऐसी आनंदमय स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं जो सुख और दुःख दोनों से परे है|
भगवान कहते हैं .....
"अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना |
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्" ||८.८||
इसका अति गहन अर्थ जो मुझे समझ में आया है वह है ......
"अभ्यासयोगयुक्त अनन्यगामी चित्तद्वारा दिव्य परम पुरुष का हम चिंतन करें"|
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Note: ---
विजातीय प्रतीतियों के व्यवधानसे रहित प्रतीतिकी आवृत्तिका नाम अभ्यास है|
वह अभ्यास ही योग है|
जहाँ अन्य कोई नहीं है, वहाँ मैं अनन्य हूँ|
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"उस अभ्यासरूप योगसे युक्त चित्त द्वारा परमात्मा का आश्रय लेकर, विषयान्तर में न जाकर, गुरु महाराज के उपदेशानुसार कूटस्थ सूर्यमण्डल में जो अनन्य दिव्य परम पुरुष हैं, उन्हीं का अखण्डवृत्ति द्वारा निरंतर ध्यान करते हुए हम उन्हीं को प्राप्त हों| अन्य कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं है| यही परमात्मा की प्राप्ति है|"
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मुझे तो मेरे गुरु महाराज का यही आदेश और उपदेश है| बाकी सब इसी का विस्तार है| सब विभूतियाँ परमात्मा की हैं, हमारी नहीं| हम परमात्मा को उपलब्ध हों| इधर उधर फालतू की गपशप में समय नष्ट न कर सदा भगवान का स्मरण करें| दुःख और सुख आयेंगे और चले भी जायेंगे, पर हम उन से विचलित न हों| भगवान में आस्था रखें| वे सदा हमारी रक्षा कर रहे हैं|

ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ जनवरी २०१८

कुछ विचार ....

कुछ विचार ....
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हम इसी क्षण से यह सोचना छोड़ दें कि कौन हमारे बारे में क्या सोच रहा है| ध्यान सिर्फ इसी बात का सदा रहे कि स्वयं जगन्माता यानी माँ भगवती हमारे बारे में क्या सोचेंगी| भगवान माता भी है और पिता भी| माँ का रूप अधिक ममता और प्रेममय होता है| भगवान के मातृरूप पर ध्यान अधिक फलदायी होता है|
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जितना अधिक हम भगवान का ध्यान करते हैं, उतना ही अधिक हम स्वयं का ही नहीं, पूरी समष्टि का उपकार करते हैं| यही सबसे बड़ी सेवा है जो हम कर सकते हैं|
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जब हम परमात्मा की चेतना में होते हैं तब हमारे से हर कार्य शुभ ही शुभ होता है|
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जिस के हृदय में परमात्मा के प्रति कूट कूट कर प्रेम भरा पड़ा है वह संसार में सबसे अधिक सुन्दर व्यक्ति है, चाहे उस की भौतिक शक्ल-सूरत कैसी भी हो|
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भगवान से हमें उनके प्रेम के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं माँगना चाहिए| प्रेम ही मिल गया तो सब कुछ मिल गया|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ जनवरी २०१८

Thursday, 11 January 2018

मेरी कन्या का विवाह ....

मेरी कन्या का विवाह ....
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मेरी एक कन्या है जो बहुत ही अच्छे कुल की व सतोगुण के सर्वश्रेष्ठ संस्कारों से संपन्न है| अब वह विवाह के योग्य हो गयी है, और बिना विवाह के नहीं रह सकती| उसके लिए वर भी उस के अनुरूप अति गुणवान चाहिए| वह वर कौन हो सकता है? मेरी कन्या को संसारी पदार्थों से विरक्ति हो चुकी है| संसारी सुख के भोगों में उसकी रूचि नहीं रही है| पर उसका विवाह तो मुझे करना ही पड़ेगा|
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पूरी सृष्टि में उस के अनुरूप वर एक ही है, जिसका कोई विकल्प नहीं है| अतः उसी वर के साथ उसका पाणिग्रहण करना ही पड़ेगा| बहुत अच्छी कन्या है तो वर स्वीकार क्यों नहीं करेंगे? स्वीकार तो उन्हें करना ही पड़ेगा| मेरी कन्या भी तो उसी वर के लिए तड़प रही है| उसे और कुछ भी नहीं चाहिए|
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वह कन्या और कोई नहीं मेरी अपनी निज "बुद्धि" है| और वे वर और कोई नहीं स्वयं साक्षात् सच्चिदानंद भगवान "परमशिव" हैं|
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सारे कर्मों का अंतिम फल आत्म-साक्षात्कार करने की इच्छा का उत्पन्न होना है| आत्म-साक्षात्कार ही उस कन्या का विवाह है जिसका समय लगभग आ चुका है|
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ॐ नमो नारायण ! ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ !!
११ जनवरी २०१८

हम इस संसार में जो कार्य कर रहे हैं वह कैसे करें ?

हम इस संसार में जो कार्य कर रहे हैं वह कैसे करें ? 

इस बारे में भगवान श्रीकृष्ण का निर्देश है .....
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च |
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्" ||८.७||
आचार्य शंकर की व्याख्या ....
तस्मात् सर्वेषु कालेषु माम् अनुस्मर यथाशास्त्रम् | युध्य च युद्धं च स्वधर्मं कुरु | मयि वासुदेवे अर्पिते मनोबुद्धी यस्य तव स त्वं मयि अर्पितमनोबुद्धिः सन् मामेव यथास्मृतम् एष्यसि आगमिष्यसि असंशयः न संशयः अत्र विद्यते || किञ्च --,
स्वामी रामसुखदास जी द्वारा किया गया भावार्थ .....
इसलिये तू सब समयमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर | मेरेमें मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू निःसन्देह मेरेको ही प्राप्त होगा |
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जैसा मुझे समझ में आया है वह यह है कि स्वाभाविक रूप से स्वधर्मरूपी जो भी कार्य इस संसार में भगवान ने हमें सौंपा है, भगवान का निरंतर चिंतन करते हुए भगवान की प्रसन्नता के लिए हमें वह कार्य करते रहना चाहिए| यह भी एक युद्ध है| इस भावना की निरंतरता भी हमें भगवान को प्राप्त करा देगी|
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अब यह हर व्यक्ति के ऊपर निर्भर है कि वह अपने विवेक से इसे कैसे समझता है| सभी को शुभ कामनाएँ और नमन !
ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
११ जनवरी २०१८

शराब के अत्यधिक सेवन के पीछे सरकारी प्रोत्साहन है ......

शराब के अत्यधिक सेवन के पीछे सरकारी प्रोत्साहन है ......
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भारत में अंग्रेजों के आने से पूर्व मद्यपान बहुत ही कम लोग करते थे| यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि अंग्रेजों ने ही इसे अत्यधिक लोकप्रिय बनाया| अंग्रेजों के आने से पूर्व नशा करने वाले या तो भांग खाते थे या गांजा पीते थे जो इतनी हानि नहीं करते थे| भांग-गांजे के पौधे जंगली पौधे होते हैं जो हर कहीं उग सकते हैं, जिन से सरकार को कोई कर यानि टैक्स नहीं मिलता था, सिर्फ इसी लिए अंग्रेजी सरकार ने इन पर प्रतिबन्ध लगा दिया| चूंकि शराब पर चालीस प्रतिशत से अधिक कर लगता था जिस से सरकारी खजाने में खूब वृद्धि होती थी इसलिए अंग्रेजी सरकार ने शराब पीने को खूब प्रोत्साहन दिया| अंग्रेजों के जाने पश्चात भी भारत सरकार ने वही नीति बनाए रखी| अब भी राज्य सरकारें अपनी राजस्व वृद्धि के लिए शराब को जन सुलभ बनाकर उस के प्रयोग को अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहित करती हैं| 
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मैं किसी भी तरह के नशे के विरुद्ध हूँ पर यहाँ ऐतिहासिक सत्य को बताना आवश्यक है| अमेरिका में जब गुलामी की प्रथा थी उस समय काले नीग्रो गुलाम लोगों के पास शराब खरीदने को पैसे नहीं होते थे, अतः वे भांग उगा कर भांग का ही नशा करते थे| अमेरिका में उस समय भांग बहुत लोकप्रिय थी और वहाँ की सरकार इसके उत्पादन को खूब प्रोत्साहन देती थी| भाँग गांजे के जंगली पौधों की प्रचुर उपलब्धता के कारण लोग शराब खरीदने के लिए अपने पैसे बर्बाद नहीं करते थे, अपनी पत्नियों को नहीं पीटते थे, और किसी का कोई नुकसान नहीं करते थे| पर सरकार को इसमें कोई टेक्स नहीं मिलता था| बाद में शराब बनाने वाली कंपनियों के दबाव में आकर आर्थिक कारणों से वहाँ की सरकारों ने भंग-गांजे के सेवन पर प्रतिबंध लगा दिया और शराब की खुली बिक्री की छूट दे दी|
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भारत में साधू संत अति प्राचीन काल से भांग गांजे का सेवन औषधि के रूप में करते आ रहे हैं| भांग-गांजे से अधिक हानि तो तम्बाकू से होती है| तम्बाकू खाकर लाखों लोग मरे हैं पर भांग या गांजा पीकर पूरे विश्व के इतिहास में आज तक एक भी व्यक्ति नहीं मरा है| सीमित मात्रा में नियमित भांग खाने वालों ने बहुत लम्बी उम्र पाई है| पर तम्बाकू और शराब की बिक्री टैक्स के रूप में सरकारी खजाने को भरती हैं, अतः सरकारें इन पर प्रतिबन्ध नहीं लगातीं, चाहे कितनी भी हानि जनता को होती रहे|
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हम हर बात में पश्चिम की नकल करते हैं, और पश्चिम की नक़ल कर के ही शराबखोरी को प्रोत्साहन दे रहे हैं| प्राचीन भारत के राजा बड़े गर्व से कहते थे कि उनके राज्य में कोई चोर नहीं है और कोई शराब नहीं पीता|
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अब बताता हूँ कि भारत में अंग्रेजी शराब का आगमन कैसे हुआ| भारत में आरम्भ में समुद्री मार्ग से जितने भी अंग्रेज़ आये वे सब समुद्री लुटेरे डाकू थे| एक पुर्तगाली जहाज को लूट कर उन्हें भारत आने का समुद्री नक्शा मिला जिसके आधार पर वे भारत में आ सके| अन्यथा वे लोग पहले तो भूमध्य सागर में बड़ी नौकाओं से सीरिया आते, जहाँ से पूर्वी तुर्की से आ रही युफ्रेतेस (Euphrates) या ताईग्रिस (Tigris) नदी के मार्ग से इराक़ होते हुए फारस की खाड़ी में शत-अल-अरब तक आते, जहाँ से फिर बड़ी नौका से फारस की खाड़ी और अरब सागर को पार कर भारत आते| इस मार्ग से आने वाले आधे से अधिक लोग तो रास्ते में ही बीमार होकर मर जाते थे, जो बचते थे उन्हें पुर्तगाली समुद्री लुटेरे लूट लेते थे| फिर उन्होंने इराक से ऊंटों पर बैठकर भारत आना आरम्भ किया पर इसमें भी अधिकाँश लोग रास्ते में ही बीमार होकर मरने लगे तो इस मार्ग का प्रयोग बंद कर दिया|
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जहाँ तक प्रमाण उपलब्ध हैं, भारत में सबसे पहले John Mildenhall नाम का एक अँगरेज़ आया था जिसने अकबर बादशाह से मिल कर उसे यूरोप से लाई हुई शराब और फिरंगी गुलाम युवतियाँ भेंट कर भारत में व्यापार करने की अनुमती ली| कुछ समय बाद वह आगरा में ही मर गया| William Hawkins नाम का एक समुद्री लुटेरा डाकू समुद्री मार्ग से सबसे पहले सूरत बंदरगाह पर आया| जहां से उसने कुछ भाड़े के अंगरक्षक सिपाही लिए और सूरत से घोड़ों पर बैठकर मुगल बादशाह जहाँगीर से मिलने आगरा आया और मुग़ल बादशाहों की कमजोरी फिरंगी गुलाम लड़कियाँ और खूब शराब भेंट कर भारत में व्यापार करने की अनुमति ली| फिर यूरोप से बहुत शराब भारत आने लगी| अँगरेज़ लोग मुग़ल बादशाहों से रियायत लेने के लिए उन्हें खूब शराब और फिरंगी गुलाम लड़कियाँ भेंट दिया करते थे| जब मुग़ल बादशाह अंग्रेजी शराब पीने लगे तो राजे रजवाड़ों को भी उसका चस्का लगने लगा|
गोवा में पुर्तगालियों ने बलात् खूब शराब पीने की आदत जन सामान्य में डाली और लोगों में नशे की आदत डालकर पाँच सौ वर्षों तक गोवा में राज्य किया|
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अब और तो क्या कर सकता हूँ, भगवान से प्रार्थना ही कर सकता हूँ कि भारत में एक दिन ऐसा अवश्य आये जब कोई शराबी और चोर नहीं हो|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर 
११ जनवरी २०१८

परमप्रेम ही सच्चिदानंद का द्वार है .....

परमप्रेम ही सच्चिदानंद का द्वार है .....
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परमात्मा के प्रति परमप्रेम के अतिरिक्त अन्य कोई आदर्श, कर्तव्य, आचार-विचार या नियम नहीं है| जिसने उस प्रेम को पा लिया, उसके लिए आचरण के कोई नियम नहीं, कोई अनुशासन नहीं है क्योंकि उसने परम अनुशासन को पा लिया है| वह सब अनुशासनों और नियमों से ऊपर है|
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यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह), नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान) आदि सभी गुण उसमें स्वतः ही आ जाते हैं| ये गुण उसके पीछे पीछे चलते हैं, वह इनके पीछे नहीं चलता| प्रभु के प्रति परमप्रेम अपने आप में सबसे बड़ी साधना, साधन और साध्य है| यही मार्ग है और यही लक्ष्य है|
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फिर धीरे धीरे साधक का स्थान स्वयं परमात्मा ले लेते हैं| वे ही स्वयं को उसके माध्यम से व्यक्त करते हैं| यहाँ भक्त और भगवान एक हो जाते हैं| उनमें कोई भेद नहीं रहता| जब शब्दातीत ज्ञान अनुभूत होना आरम्भ हो जाता है, तब शब्दों में रूचि नहीं रहती|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ जनवरी २०१८

मैं और मेरे प्रभु एक हैं, कहीं कोई भेद नहीं है .....

मैं और मेरे प्रभु एक हैं, कहीं कोई भेद नहीं है .....
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मुझे कहीं भी इधर उधर खोजने, किसी के पीछे पीछे भागने, किसी से कुछ भी माँगने या कोई अपेक्षा या कामना आदि करने से प्रभु ने अपनी परम कृपा कर के अब मुक्त कर दिया है|
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सारी खोज का अंत हो गया है| अब खोजने के लिए और कुछ भी नहीं बचा है| सिर्फ आत्मतत्व में गहराई से स्थित होना है, जिसे प्रभु स्वयं कर रहे हैं| कोई संशय या कोई शंका नहीं है| जहाँ मैं हूँ, वहीं मेरे प्रभु है, मेरे साथ एक हैं|
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जिसे मैं खोज रहा था वह तो मेरा स्वयं का अस्तित्व था जो सदा मेरे साथ एक है| सारे प्रश्न और सारे उत्तर अब असंगत हो गए हैं|
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हे परमप्रिय प्रभु, सिर्फ तुम हो, सिर्फ तुम हो और बस तुम ही तुम हो, और कोई नहीं है| तुम और मैं सदा एक हैं| मैं तुम्हारी पूर्णता हूँ|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
१० जनवरी २०१८