हमारी आध्यात्मिक साधना का एकमात्र उद्देश्य -- धर्म की संस्थापना है, अन्य कुछ भी नहीं। ईश्वर भी अवतार लेते हैं तो धर्म की संस्थापना के लिए ही लेते हैं। हम शाश्वत आत्मा हैं, जिसका स्वधर्म -- निज जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति है। उसी के लिए हम साधना करते हैं। परमात्मा तो हमें सदा से ही प्राप्त हैं, लेकिन माया का एक आवरण हमें परमात्मा का बोध नहीं होने देता। जब उस आवरण को हटाने का प्रयास करते हैं तो कोई न कोई विक्षेप सामने आ जाता है। इस आवरण और विक्षेप से मुक्त हुए बिना परमात्मा का बोध नहीं होता। माया के इस आवरण और विक्षेप को हटाना ही ईश्वर की प्राप्ति है। निज जीवन में यही धर्म की संस्थापना है। अवतृत होकर ईश्वर इस कार्य को एक विराट स्तर पर करते हैं। यहाँ मैं गीता के पाँच श्लोक उद्धृत कर रहा हूँ, जो हरिःकृपा से इस विषय को समझाने के लिए पर्याप्त हैं ---
Friday, 29 August 2025
हमारी आध्यात्मिक साधना का एकमात्र उद्देश्य -- धर्म की संस्थापना है, अन्य कुछ भी नहीं।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्।।4.7।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4.8।।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।4.9।।
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः।।4.10।।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।4.11।।
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हरिःकृपा / गुरुकृपा से जैसा समझ में आया वैसा ही लिख दिया। सब पर हरिःकृपा हो। ॐ तत्सत् ॥
कृपा शंकर
२५ अगस्त २०२५
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