Friday, 29 August 2025

परमात्मा से अनुराग ---

 परमात्मा से अनुराग ---

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जैसे जैसे इस भौतिक शरीर की आयु बढ़ती जा रही है, उसी अनुपात में परमात्मा के प्रति अनुराग (परमप्रेम) भी निरंतर बढ़ता जा रहा है। किसी भी तरह की कोई आकांक्षा नहीं रही है। केवल एक अभीप्सा है, जिसमें ही तृप्ति, संतुष्टि और आनंद है।
यह सृष्टि उन पुराण-पुरुष परमात्मा की है, जिनकी प्रकृति अपने नियमों के अनुसार इसे चला रही है। उनके नियमों को न जानना हमारी भूल है।
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दो दिन पूर्व स्वयं भगवान ने ही ध्यान में मुझे बताया था कि हमारी आध्यात्मिक साधना का एकमात्र उद्देश्य धर्म की संस्थापना है। भगवान भी अवतार केवल धर्म की संस्थापना के लिए ही लेते हैं, अन्य किसी उद्देश्य के लिए नहीं। "संस्थापना" और "स्थापना" इन दोनों शब्दों के अर्थों में अत्यधिक अंतर है। भगवान तो हमें सदा से ही प्राप्त हैं, उनकी प्राप्ति के लिए कोई साधना नहीं करनी पड़ती। भगवान की माया के आवरण और विक्षेप -- हमारे और भगवान के मध्य में एक धुएं की एक पतली दीवार के रूप में हैं। उस आवरण और विक्षेप को हटाना ही भगवत्-प्राप्ति यानि परमात्मा का साक्षात्कार है।
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ये आवरण और विक्षेप हटते हैं -- परमात्मा के प्रति परम अनुराग (प्रेम), अभीप्सा और ध्यान-साधना से। "भक्ति" कोई करने की चीज नहीं है, यह एक अवस्था है जो हमें स्वयं में जागृत करनी पड़ती है। भक्ति से ही ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न होते हैं। भक्ति "माता" है तो "ज्ञान" और "वैराग्य" उसके पुत्र हैं।
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हम एक शाश्वत आत्मा हैं जिसका स्वधर्म परमात्मा को पूर्ण समर्पण -- यानि परमात्मा की स्वयं में पूर्ण अभिव्यक्ति है। अन्य कोई दूसरा स्वधर्म नहीं है।
.श्रीमद्भगवद्गीता से मेरे सारे संशयों का निवारण हुआ है। अतः गीतापाठ, शिवपूजा और परमात्मा की (पुरुषोत्तम या परमशिव के रूप में) ध्यान-साधना ---- ये ही मेरी उपासना हैं। अन्य सब कुछ मैंने भुला दिया है। अन्य विषयों पर मैं अब चर्चा ही नहीं करता।
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गीता में निर्भीकता, वीतरागता, स्थितप्रज्ञता, ब्राह्मी-स्थिति, निस्त्रेगुण्यता, साधना, अनन्य-अव्यभिचारिणी भक्ति, और पूर्ण समर्पण --- ये मुझे निरंतर परम आकर्षित करते हैं। गीता में भक्ति और ज्ञान के उपदेश उनके लिये हैं जिनमें सतोगुण प्रधान हैं। कर्मयोग उनके लिए हैं जिन में रजोगुण प्रधान है। जिन में तमोगुण प्रधान है, वे गीता को नहीं समझ सकते। उनमें पात्रता नहीं है।
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अंत में धर्म के बारे में दो शब्द कहना चाहता हूँ। धर्म वह है जो धारण किया जाता है। उसके दस लक्षण मनुस्मृति में दिये हुए हैं। उसकी सर्वमान्य परिभाषा कणाद ऋषि के वैशेषिक सूत्रों में दी हुई है। याज्ञवल्क्य आदि ऋषियों ने उपनिषदों में, और महाभारत में अनेक महापुरुषों द्वारा अनेक बार इसकी विस्तृत व्याख्या की गयी है।
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त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥" (गीता)
( आप आदिदेव और पुराण (सनातन) पुरुष हैं। आप इस जगत् के परम आश्रय, ज्ञाता, ज्ञेय, (जानने योग्य) और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप आपसे ही यह विश्व व्याप्त है॥
Thou art the Primal God, the Ancient, the Supreme Abode of this universe, the Knower, the Knowledge and the Final Home. Thou fillest everything. Thy form is infinite.
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२६ अगस्त २०२५
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पुनश्च: --- हमारे मूलाधारचक्र के त्रिभुज में एक शिवलिंग है, वहीं पर गणपति गणेश हैं, और कुंडलिनी महाशक्ति भी वहीं पर सुप्त हैं। हमारा निवास इस सृष्टि की अनंतता से भी परे परमशिव में है। वहाँ से हमें हमारी सूक्ष्म देह की सुषुम्ना नाड़ी की ब्राह्मी-उपनाड़ी (ब्रह्मनाड़ी) के माध्यम से एक विशिष्ट विधि से बार बार अवतरित होकर उस शिवलिंग को नमन करना पड़ता है। तत्पश्चात उसी मार्ग से ऊर्ध्वगमन होता है। ब्रहमनिष्ठ श्रौत्रीय सद्गुरु के मार्गदर्शन में ही यह साधना होती है। कुंडलिनी महाशक्ति का परमशिव से मिलन ही योग-साधना है। यह योग और तंत्र की उच्चतम साधना है। यह गोपनीय साधना है, यदि यह प्राप्त हो जाये, और इसे आप करते रहें। आपका जीवन कृतार्थ और कृतकृत्य हो जाएगा।

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