मेरा शत्रु कहीं बाहर नहीं, मेरे भीतर ही बैठा है। मुझे मेरी सब कमियों का पता है, लेकिन उनके समक्ष मैं असहाय हूँ। भगवान से मैंने प्रार्थना की तो भगवान ने कहा कि अपने सब शत्रु मुझे सौंप दो, लेकिन उनसे पहले स्वयं को (यानि अपने को) मुझे (यानि भगवान को) अर्पित करना होगा। स्वयं को अर्पित करने में बाधक है मेरा लोभ और अहंकार, यानि कुछ होने का और खोने का भाव।
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मेरी चेतना और प्रज्ञा दोनों ही परमात्मा को समर्पित ही नहीं, परमात्मा में स्थित है। इस जीवन का बहुत थोड़ा सा भाग बाकी बचा है, यानि इस दीपक में बहुत कम ईंधन बाकी बचा है। अब उसकी चिंता नहीं है। सारी चेतना, प्रज्ञा और सारा अस्तित्व, परमात्मा को समर्पित है। मेरी कोई मृत्यु नहीं है, मैं शाश्वत हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ अगस्त २०२५
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पुनश्च: --- जैसे एक सुपात्र शिष्य की रक्षा गुरु-परंपरा करती है, वैसे ही भगवान को अपना अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) सौंप देने वाले भक्त की रक्षा का दायित्व भगवान स्वयं लेते हैं ...
"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥"
अर्थात् हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है| तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता ||
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