तारक मन्त्र "राम" और प्रणवाक्षर "ॐ" दोनों एक ही हैं .....
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जिस प्रकार एक विशाल वृक्ष के बीज में उसकी शाखाएँ, पत्तियाँ और जड़ें निहित हैं वैसे ही एक अकेले "राम" नाम के भीतर यह समस्त सृष्टि समाहित है|
"राम" शब्द के भीतर ही "ॐ" मन्त्र भी निहित है| जैसे "ॐ" मंत्र का ध्यान और मनन करने से इस सृष्टि में कुछ भी दुःस्प्राप्य नहीं है और मोक्ष की प्राप्ति होती है वैसे ही परम सिद्ध तारक मन्त्र "राम" भी सर्वस्व और मोक्ष प्रदान करता है
सब गुरुओं के गुरु भगवान शिव हैं| वे स्वयं इस तारक मन्त्र की दीक्षा देते हैं|
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संस्कृत व्याकरण के अनुसार "ॐ" और :"राम" दोनों एक हैं|
राम = र् + आ + म् + अ |
= र् + अ + अ + म् + अ ||
हरेक स्वरवर्ण पुल्लिंग होने के कारण स्वतंत्र होता है, और हर व्यंजनवर्ण स्त्रीलिंग होने के कारण परतंत्र होता है| पाणिनी व्याकरण के "आद्यन्त विपर्यश्च" सूत्र के अनुसार अगर किसी शब्द के "र" वर्ण के सामने तथा वर्ण के पीछे "अ" आता है तो उसका "अ" वर्ण "उ" में बदल जाता है| विश्लेषण करने पर "राम" शब्द का अ सामने आता है|
अ + र् + अ + अ + म् |
इसलिए अ + र् + अ = उ |
अ + उ + ओ |
ओ + म् = ओम् या ॐ ||
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इसिलिय्र राम तारकमन्त्र है और हर दृष्टी से महामन्त्र है| भगवान शिव स्वयं इसका ध्यान करते हैं|
ॐ ॐ ॐ राम् ||
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जिस प्रकार एक विशाल वृक्ष के बीज में उसकी शाखाएँ, पत्तियाँ और जड़ें निहित हैं वैसे ही एक अकेले "राम" नाम के भीतर यह समस्त सृष्टि समाहित है|
"राम" शब्द के भीतर ही "ॐ" मन्त्र भी निहित है| जैसे "ॐ" मंत्र का ध्यान और मनन करने से इस सृष्टि में कुछ भी दुःस्प्राप्य नहीं है और मोक्ष की प्राप्ति होती है वैसे ही परम सिद्ध तारक मन्त्र "राम" भी सर्वस्व और मोक्ष प्रदान करता है
सब गुरुओं के गुरु भगवान शिव हैं| वे स्वयं इस तारक मन्त्र की दीक्षा देते हैं|
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संस्कृत व्याकरण के अनुसार "ॐ" और :"राम" दोनों एक हैं|
राम = र् + आ + म् + अ |
= र् + अ + अ + म् + अ ||
हरेक स्वरवर्ण पुल्लिंग होने के कारण स्वतंत्र होता है, और हर व्यंजनवर्ण स्त्रीलिंग होने के कारण परतंत्र होता है| पाणिनी व्याकरण के "आद्यन्त विपर्यश्च" सूत्र के अनुसार अगर किसी शब्द के "र" वर्ण के सामने तथा वर्ण के पीछे "अ" आता है तो उसका "अ" वर्ण "उ" में बदल जाता है| विश्लेषण करने पर "राम" शब्द का अ सामने आता है|
अ + र् + अ + अ + म् |
इसलिए अ + र् + अ = उ |
अ + उ + ओ |
ओ + म् = ओम् या ॐ ||
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इसिलिय्र राम तारकमन्त्र है और हर दृष्टी से महामन्त्र है| भगवान शिव स्वयं इसका ध्यान करते हैं|
ॐ ॐ ॐ राम् ||
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साभार : एक परम संत की परम कृपा से, जिनके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम |
साभार : एक परम संत की परम कृपा से, जिनके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम |
जो शिव हैं वही राम हैं, और जो राम हैं वही शिव हैं| जिस प्रकार से राम शिवमय है, उसी प्रकार से शिव भी राममय हैं| अन्नपूर्णा माता जानकी, राम भक्त को उसके कर्मपाशों से मुक्त करती हैं और स्वयं भगवान शिव उसे तारक मन्त्र "राम" प्रदान करते हैं|
ReplyDeleteअगर शिवकृपा न हो तो राम नाम के रहस्य को नहीं जाना जा सकता| इसी तरह रामकृपा न हो तो शिव तत्व की गहराई और भेदों को नहीं समझा जा सकता|
हमारा जीवन शिवकृपा से परम मंगलमय हो| हमें उनकी सत्ता में कोई भेद नहीं दिखाई दे|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
हर हर महादेव.....बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥
ReplyDeleteबिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥
मैं श्री रघुनाथजी के नाम 'राम' की वंदना करता हूँ, जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात् 'र' 'आ' और 'म' रूप से बीज है। वह 'राम' नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है। वह वेदों का प्राण है, निर्गुण, उपमारहित और गुणों का भंडार है॥
बीज अक्षर र अ म की व्याख्या
श्रीरामनाम में जो रेफ,रेफ का अकार,दीर्घाकार,हल मकार और मकार का अकार - ये पञ्च पदार्थ हैं। इनके बिना एक भी मंत्र,ऋचा व सूत्र नहीं बनते हैं वेदों में,व्याकरणों में जितने भी वर्ण,स्वर,शब्द हैं वे सब 'राम' नाम से ही उत्पन्न होते हैं। श्री रामनाम के अतिरिक्त जितने भी नाम परमेश्वर के हैं वे सभी राम नाम की तरह ही सामान रूप से फलदायी हैं परन्तु वे सब गुणक्रियात्मक हैं अथार्त वे सब गुण दर्शित करने वाले नाम हैं। महारामायण में शिव जी कहते हैं की समस्त नामों के वर्ण रामनाममय हैं अथार्त रामशब्दजन्य हैं,अतएव रमु क्रीडा 'राम' शब्द सब नामों का ईश्वर है। भगवान् के सभी नाम सच्चिदानंदस्वरुप हैं तथापि 'राम' नाम में ढेरों विशेषता है ये कुछ विशिष्ट है। श्रीराम नाम के तीनो पदों र,अ,म में सच्चिदानंद का अभिप्राय स्पष्ट झलकता है अन्य भगवन्नामों में किसी में सत और चित मुख्य है आनंद गौण है किसी में सत और आनंद मुख्य है चित गौण है और किसी में चित आनंद मुख्य है सत गौण है। श्रीराम नाम के तीनो पदों में सत चित आनंद तीनो समाहित हैं अथार्त रकार चित का अकार सत का और मकार आनंद का वाचक है इस प्रकार 'राम' नाम सच्चिदानन्दमय है। श्रीरामनाम को अग्नि सूर्य और चन्द्रमा का हेतु कहकर यह जनाया गया है की इन तीनो के कारण श्रीरामनाम हैं और ये तीनो कार्य हैं।
राम नाम के तीनो अक्षरों (र,अ,म) क्रमशः इन तीनो के बीज अक्षर हैं।
'र' अग्निबीज है जैसे अग्नि शुभाशुभ कर्मों को जलाकर समाप्त कर देता है,वस्तु के मॉल तथा दोषों को जलाके शुद्ध कर देता है वैसे ही र के उच्चारण से व्यक्ति के शुभाशुभ कर्म नष्ट होते हैं जिसका फल स्वर्ग नरक का अभाव है साथ ही ये हमारे मन के मल-विषयवासनाओं का नाश कर देता है जिससे स्वस्वरूप (जीव का स्वरुप आत्मा है) का आभास होने लगता है यहाँ कार्य से कारण में विशेषता दिखायी है।
अग्नि से जो कार्य नहीं हो सकता वह उसके बीज से हो जाता है। 'अ' भानुबीज है वेदशास्त्रों का प्रकाशक है जैसे सूर्य अन्धकार को दूर करता है वैसे ही अ से मोह,दंभादी जो अविद्धातम है,उसका नाश होता है व ज्ञान का प्रकाश होता है।
'म' चंद्रबीज है,अमृत से परिपूर्ण है। जैसे चन्द्रमा शरदातप हरता है,शीतलता देता है वैसे ही 'म' से भक्ति उत्पन्न होती है त्रिताप दूर होते हैं।
इस तरह से 'र' 'अ' और 'म' क्रमशः ज्ञान वैराग्य व भक्ति के उत्पादक हैं।