Friday, 27 March 2026

मेरा चंचल मन बार बार मुझे परमात्मा से दूर ले जाता है। यह मेरा परम धर्म है कि मैं इसे पुनश्च: परमात्मा में स्थित करूँ ---

मेरा चंचल मन बार बार मुझे परमात्मा से दूर ले जाता है। यह मेरा परम धर्म है कि मैं इसे पुनश्च: परमात्मा में स्थित करूँ ---
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आप सब से करबद्ध प्रार्थना है कि इस जीवन में मैंने परमात्मा के अतिरिक्त जो कुछ भी अन्य कहा है उसे विस्मृत कर दें, और स्वयं को परमात्मा में ही स्थित करें। अब इसी समय से मेरा सदा यही प्रयास रहेगा कि परमात्मा से पृथक कोई अन्य विचार मेरे मन में आये ही नहीं। जो बीत गया, सो बीत गया; भविष्य में मेरा चिंतन केवल परमात्मा का ही होगा।
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥"
अर्थात् -- जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन है वहीं पर श्री, विजय, विभूति और ध्रुव नीति है, ऐसा मेरा मत है॥
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भगवान कहते हैं --
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥९:३०॥"
अर्थात् -- यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है॥
"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥"
अर्थात् -- हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता॥
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥९:३४॥"
अर्थात् -- (तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
"ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥१८:५४॥"
अर्थात् -- ब्रह्मभूत (जो साधक ब्रह्म बन गया है), प्रसन्न मन वाला पुरुष न इच्छा करता है और न शोक, समस्त भूतों के प्रति सम होकर वह मेरी परा भक्ति को प्राप्त करता है॥
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात् -- मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥१८:६५॥"
अर्थात् -- तुम मच्चित, मद्भक्त और मेरे पूजक (मद्याजी) बनो और मुझे नमस्कार करो; (इस प्रकार) तुम मुझे ही प्राप्त होगे; यह मैं तुम्हे सत्य वचन देता हूँ,(क्योंकि) तुम मेरे प्रिय हो॥
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
अर्थात् -- सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो॥
"य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिम् मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥१८:६८॥"
अर्थात् -- जो पुरुष मुझसे परम प्रेम (परा भक्ति) करके इस परम गुह्य ज्ञान का उपदेश मेरे भक्तों को देता है, वह नि:सन्देह मुझे ही प्राप्त होता है॥
"न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिंमेप्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥१८:६९॥"
अर्थात् -- उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है और इस भूमण्डलपर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर होगा भी नहीं।
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आप सब में मैं परमात्मा को नमन करता हूँ। एकमात्र अस्तित्व केवल परमात्मा का है। अन्य कुछ भी नहीं है। ॐ तत् सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
२५ मार्च २०२६

यह लेख उनके लिए है जो भगवान की भक्ति तो करना चाहते हैं, लेकिन साहस नहीं जुटा पा रहे ---

 यह लेख उनके लिए है जो भगवान की भक्ति तो करना चाहते हैं, लेकिन साहस नहीं जुटा पा रहे ---

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वे भगवान श्रीराम का नित्य नियमित नामजप और ध्यान करें। आध्यात्मिक साधना के मार्ग में सबसे बड़ी कमजोरी --- हमारे में साहस का अभाव है, जरा जरा सी विपरीतताओं से हम घबरा जाते हैं। अन्य कोई समस्या नहीं है। साहस के अभाव में हम कोई निर्णय नहीं ले पाते। निर्भीक बनने के लिए हमें भगवान श्रीराम या श्रीकृष्ण का ध्यान करना चाहिए। स्वयं निमित्त मात्र होकर उन्हें जीवन का कर्ता बनायें।
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अंधकार में रहते रहते हमें अंधेरे में रहने की बहुत बुरी आदत पड़ गई है। हमें पता है कि हमारी सब समस्याओं का निदान परमात्मा के प्रकाश यानि भगवत्-प्राप्ति (आत्म-साक्षात्कार) में है। लेकिन हम साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। अन्य कोई समस्या नहीं है। साहस का अभाव ही हमारी एकमात्र समस्या है। सिर्फ हमारी ही नहीं, सभी की यही एकमात्र समस्या है।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ मार्च २०२६

मेरे लिए कर्मयोग, ज्ञानयोग व भक्तियोग क्या हैं?

मेरे लिए निष्काम भाव से की गई ईश्वर की साधना कर्मयोग है। साधना के पश्चात ईश्वर से एकत्व की अनुभूतियाँ ज्ञानयोग है। ईश्वर से परमप्रेम, और अभीप्सा की अग्नि में समस्त आकांक्षाओं/कामनाओं की आहुति भक्तियोग है।
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भक्ति और सेवा के मार्ग में श्रीहनुमान जी से बड़ा अन्य कोई भक्त या सेवक, भगवान का नहीं है। वे स्वयं प्रत्यक्ष देवता हैं। सफलता उनके पीछे पीछे चलती है। उन्होंने कभी कोई विफलता नहीं देखी। असत्य और अंधकार की कोई आसुरी शक्ति, उनके समक्ष नहीं टिक सकती। उनसे अधिक शक्तिशाली और ज्ञानी अन्य कोई नहीं है।
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
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आध्यात्मिक उन्नति के लिए हमारी दृष्टि -- समष्टि-दृष्टि हो, न कि व्यक्तिगत। परमात्मा की सर्वव्यापकता और पूर्णता पर हमारा ध्यान और समर्पण होगा तभी हमारी आध्यात्मिक उन्नति होगी। एक साधक के लिए उन्नति का आधार और मापदंड उसका ब्रह्मज्ञान हो, न कि कुछ अन्य।
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जो बीत गया सो बीत गया, जो हो गया सो हो गया। भूतकाल को तो बदल नहीं सकते, अभी जब से होश आया है, तब इसी समय से परमात्मा की चेतना में रहें। हमारा कार्य परमात्मा में पूर्ण समर्पण है। यह शरीर रहे या न रहे, इसका कोई महत्व नहीं है। महत्व इस बात का है कि निज जीवन में परमात्मा का अवतरण हो।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ मार्च २०२६

हमारे सभी तरह के सभी संशयों का निवारण कैसे हो? ---

 हमारे सभी तरह के सभी संशयों का निवारण कैसे हो? ---

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ईश्वर ने चाहा तो हमें आज इस लेख में सबके-सब तरह के संशयों का निवारण हो जाएगा। यदि फिर भी कोई संशय रहता है तो उसका निवारण गुरुरूप में स्वयं जगत्-गुरु भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण, या दक्षिणामूर्ति रूप में भगवान शिव ही कर सकते हैं। हमें सब तरह की कामनाओं, किन्तु-परन्तुओं, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म से ऊपर उठकर, व कर्ताभाव से मुक्त होकर, परमात्मा को समर्पित होना ही पड़ेगा। हृदय में (यहाँ हृदय का अर्थ हमारे भावों और विचारों से है, न कि भौतिक हृदय से) किसी भी तरह की कोई आकांक्षा न होकर केवल परमात्मा को समर्पित होने की अभीप्सा हो।
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उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता, भागवत पुराण, व रामचरितमानस जैसे ग्रन्थों का स्वाध्याय समय समय पर करते रहना चाहिए। इससे प्रेरणा मिलती रहती है और अभीप्सा की अग्नि प्रज्ज्वलित रहती है। भौतिक शरीर की क्षमता व मनोबल को बनाए रखने के लिए हठयोग भी आवश्यक है। ध्यान -- अनन्य भाव से ज्योतिर्मय ब्रह्म का करें। अजपा-जप और नादश्रवण — ये दोनों जपयोग के अंतर्गत ही आते हैं। हमारा चाल-चलन, और आचरण पवित्रतम हो, और हमारी भक्ति अव्यभिचारिणी हो। जितने समय तक हम स्वाध्याय करते हैं, उससे कई गुणा अधिक समय तक हमें नाद-श्रवण सहित ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करना चाहिए।
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यदि अब भी किसी भी तरह का कोई संशय हो तो उसका निवारण किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय (जिन्हें श्रुतियों का ज्ञान हो) आचार्य से करें क्योंकि यह श्रुति भगवती का आदेश है। ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करते करते साधक को परमशिव व पुरुषोत्तम की अनुभूति व उन का बोध भी उनकी परम कृपा से हो जायेगा।
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यह लेख परिचयात्मक भी है और मार्गदर्शक भी। इससे अधिक लिखने में इस समय असमर्थ हूँ। आपको मेरे हृदय का पूर्ण प्रेम अर्पित है। आपका जीवन कृतार्थ हो, व आप कृतकृत्य हों। ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
२७ मार्च २०२६

Thursday, 26 March 2026

सत्साहित्य पढ़ने से भक्ति जागृत होती है .... .

 सत्साहित्य पढ़ने से भक्ति जागृत होती है ....

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यह मेरा सौभाग्य था कि किशोरावस्था से ही मुझे पढ़ने के लिए प्रचूर मात्रा में बहुत अच्छा साहित्य मिला जिनमें महापुरुषों की जीवनियाँ, उनके लेख, और तत्कालीन हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कृतियाँ थीं| पढ़ने का शौक भी बहुत अधिक था जिसे पूरा करने केलिए बहुत अच्छा वातावरण मिला| उस जमाने में बहुत अच्छी पत्रिकाओं का प्रकाशन हिंदी भाषा में होता था जैसे ... "साप्ताहिक हिन्दुस्तान", "धर्मयुग", "कादम्बिनी", "नवनीत" आदि| बाल साहित्य भी खूब अच्छा मिलता था और बालकों के लिए भी अनेक ज्ञानवर्धक व रोचक पत्रिकाएँ छपती थीं, जैसे "बालभारती", "चंदामामा" आदि, जिनमें से कइयों के तो अब नाम भी याद नहीं हैं| पूरी महाभारत और रामायण तो घर पर ही किशोरावस्था में पढ़ ली थीं| बहुत अच्छे पुस्तकालय थे और लोगों को पढने का शौक भी बहुत था| अब तो लगता है कि वह ज़माना ही दूसरा था| आजकल के विद्यार्थियों पर तो ट्यूशन और कोचिंग का इतना अधिक भार है कि वे पाठ्यक्रम से बाहर का कुछ पढ़ने की सोच ही नहीं सकते| पहले हिंदी के समाचार पत्रों में भी बड़े अच्छे अच्छे ज्ञानवर्धक लेख आते थे जो अब नहीं आते|
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मेरे पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ा सम्पूर्ण विवेकानंद साहित्य का जो मैनें १५-१६ वर्ष की आयु में ही पूरा पढ़ लिया था| फिर रमण महर्षि का सारा साहित्य पढ़ा| संघ का और संघ से सम्बंधित सारा उपलब्ध राष्ट्रवादी साहित्य पढ़ा| हिंदी में ओशो की जितनी भी पुस्तकें मिलीं, सारी पढ़ डालीं| संत साहित्य और आर्य समाज का साहित्य भी खूब पढ़ा| स्वामी रामतीर्थ के वेदान्त पर सारे उपलब्ध लेख पढ़े| परमहंस योगानंद का साहित्य भी पूरा पढ़ा| अनेक साहित्यिक रचनाएँ भी पढ़ीं जब तक मन पूरी तरह नहीं भर गया| सिर्फ वही नहीं पढ़ा जिसे समझने की क्षमता नहीं थी| इस अध्ययन से सबसे बड़ा लाभ तो यह हुआ कि भगवान की भक्ति जागृत हुई जिसे मैं जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानता हूँ| भगवान की कृपा से जीवन में बड़े अच्छे अच्छे लोग मिले|
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अब और पढने की क्षमता नहीं है अतः पढ़ना छोड़ दिया है| बचा हुआ शेष जो जीवन है उसे गीता के स्वाध्याय और ध्यान साधना में ही बिताने की प्रेरणा मिल रही है| अंत समय में चेतना पूरी तरह परमात्मा में हो इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं चाहिए| भगवान ही जिससे मिलाना चाहे उससे मिला दे, पर चलाकर अब मेरी किसी से भी मिलने की इच्छा नहीं है| कभी कभी कुछ आश्रमों में एकांत लाभ के लिए चला जाता हूँ, पर सामाजिकता या पर्यटन के नाते कहीं भी नहीं जाता| किसी भी विषय पर अब किसी से भी कोई चर्चा या वाद-विवाद नहीं करता| किसी भी तरह की कोई शंका या संदेह नहीं है| भगवान् ने सारी जिज्ञासाओं की पूर्ती कर दी है|
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परमात्मा के प्रति प्रेम बना रहे, और इस जीवन का यह अंतिम समय भी परमात्मा के प्रेम में ही बीत जाए, यही प्रार्थना है| अंत समय में कोई कष्ट नहीं होगा सचेतन रूप से ही प्राण छूटेंगे, इतनी तो मेरी आस्था और विश्वास है|
सभी को मेरी शुभ कामनाएँ और नमन ! सब पर परमात्मा की परम कृपा बनी रहे|
ॐ ॐ ॐ !!
२६ मार्च २०१८

Wednesday, 25 March 2026

सत्संग ---

 सत्संग ---

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भगवान का निरंतर मानसिक स्मरण ही सबसे अच्छा सत्संग है। अपने इष्ट देवी/देवता को हर समय अपनी स्मृति में रखो, उन्हें सर्वत्र, व सब में उन्हीं को देख​ते हुए मानसिक रूप से उनका नाम-जप करते रहो। भगवान का स्मरण करते हुए धर्मग्रंथों का स्वाध्याय भी बहुत अच्छा सत्संग है। अच्छे विरक्त तपस्वी महात्माओं का आजकल सत्संग मिलना बहुत दुर्लभ है। इसलिए सबसे अच्छा सत्संग तो भगवान के साथ ही है। भगवान स्वयं ही एकमात्र सत्य, यानि सत्य-नारायण हैं। भगवान का जो भी नाम-रूप हमें पसंद है, उसको सदा अपने चित्त में रखो। इससे अच्छा सत्संग कोई दूसरा नहीं है।
वासनाएँ बहुत अधिक शक्तिशाली हैं, जिनसे हम नहीं लड़ सकते। वासनाओं का प्रतिकार हम निरंतर सत्संग से ही कर सकते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥६:२९॥"
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् --
योगयुक्त अन्त:करण वाला और सर्वत्र समदर्शी योगी आत्मा को सब भूतों में और भूतमात्र को आत्मा में देखता है॥
जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
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यह एक ऐसा विषय है जिस पर कितना भी लिखते रहो, लेखनी रुक नहीं सकती। अतः यहीं पर लेखनी को विराम दे रहा हूँ। भगवान का संग ही सबसे अच्छा सत्संग है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२५ मार्च २०२४

Sunday, 22 March 2026

प्रार्थना ---

 प्रार्थना ---

"भारत एक सत्यनिष्ठ सनातन-धर्मपरायण परम शक्तिशाली आध्यात्मिक राष्ट्र अपने द्वीगुणित परम वैभव को प्राप्त कर अखंडता के सिंहासन पर बिराजमान हो। इस राष्ट्र में कहीं किंचित मात्र भी असत्य का अंधकार न रहे। ॐ ॐ ॐ !!"
उपरोक्त संकल्प के साथ हम शक्ति आराधना कर रहे हैं। "हमारी गति जगन्माता (परमात्मा का मातृरूप) हैं। हम परमब्रह्म परमात्मा में प्रतिष्ठित हों। नववर्ष मंगलमय हो। ॐ ॐ ॐ !!"