Friday, 23 January 2026

मुझ अकिंचन को अपना आशीर्वाद देते रहिये। मैं आप सब का सेवक मात्र हूँ ---

 साधना के मार्ग पर हमारा प्रथम लक्ष्य है -- सच्चिदानंद ब्रह्म परमात्मा से परमप्रेम और उन्हें पूर्ण समर्पण। उस अवस्था में हम शनैः शनैः राग-द्वेष और अहंकार से मुक्त होकर वीतराग होने लगते हैं। वीतराग व्यक्ति ही जीवनमुक्त है। उस पर कोई बंधन नहीं है। वीतराग व्यक्ति ही स्थितप्रज्ञ हो सकता है, जिसकी प्रज्ञा निरंतर परमात्मा में स्थित है। समर्पित होकर परमात्मा का अधिकाधिक ध्यान करें और उन्हें निरंतर अपनी स्मृति में रखें। इसके अतिरिक्त भी यदि अन्य कोई मार्ग है तो मुझे उसका पता नहीं है।

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मुझ अकिंचन को अपना आशीर्वाद देते रहिये। मैं आप सब का सेवक मात्र हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
६ जनवरी २०२६

निकट भविष्य में भारत से असत्य और अंधकार की शक्तियों का पराभव होगा, व सत्य-सनातन-धर्म की सम्पूर्ण विश्व में पुनः प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा।

 मुझे एक आतंरिक आश्वासन प्राप्त है कि निकट भविष्य में भारत से असत्य और अंधकार की शक्तियों का पराभव होगा, व सत्य-सनातन-धर्म की सम्पूर्ण विश्व में पुनः प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा।

जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस की सिद्धि होती है, व जिसके दस लक्षण मनुस्मृति में बताये गए हैं, वह सत्य-सनातन-धर्म है। रात्रि में सोने से पूर्व, और प्रातः उठते ही कुछ देर भगवान का भजन, कीर्तन व ध्यान करें। पूरे दिन भगवान को अपनी स्मृति में रखें और निज जीवन का केंद्र-बिन्दु बनायें। हम निमित्त मात्र होकर भगवान के उपकरण बनेंगे तो धर्म हमारी रक्षा करेगा। निज जीवन में भगवद्-प्राप्ति यानि आत्म-साक्षात्कार हमारा बड़े से बड़ा धर्म है। भगवान को निरंतर अपनी स्मृति में रखें, कभी भूलें नहीं। हरिः ॐ तत्सत् ॥ ॐ ॐ ॐ ॥
कृपा शंकर
६ जनवरी २०२६

सभी प्रसन्न हों और निरंतर सदा परमात्मा की चेतना ब्राह्मीस्थिति में रहें ---

 सभी प्रसन्न हों और निरंतर सदा परमात्मा की चेतना ब्राह्मीस्थिति में रहें। परमात्मा से पृथक हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। यह शरीर रहे या न रहे, इसका महत्व नहीं है। महत्व एक ही बात का है कि हमारे अस्तित्व के केंद्र बिन्दु केवल कूटस्थ ब्रह्म हों। गीता में भगवान कहते हैं --

"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२:७२॥"
अर्थात् - हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है॥
ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१० जनवरी २०२६

- (१) भगवान के मोक्षदायी शाश्वत वचन। (२) भगवान का ध्यान किस रूप में करना चाहिये। (३) भगवान का नाम क्या है?

 मुझे आदेश प्राप्त हुआ है कि मैं निम्न तीन विषयों पर सत्संग करूँ। आप इसे निज बुद्धि और विवेक के प्रकाश में समझ्न सकते हैं। मंत्रों के अर्थ और व्याख्या नहीं लिख रहा हूँ, अन्यथा लेख बहुत अधिक लंबा हो जाता, जिसे कोई नहीं पढ़ता। अतः मंत्रों के अर्थ और भाष्यों का अनुसंधान आप स्वयं करें।

विषय :--- (१) भगवान के मोक्षदायी शाश्वत वचन।
(२) भगवान का ध्यान किस रूप में करना चाहिये।
(३) भगवान का नाम क्या है?
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(१) सारे वचन भगवान के ही हैं। लेकिन इस समय निम्न लिखने की ही प्रेरणा मिल रही है। जो इसे समझ कर इसका अनुस्मरण करेगा वह कृतकृत्य हो जाएगा। ये भगवान के शाश्वत वचन है --
"कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥८:९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥८:१०॥"
"सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥८:१२॥"
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥८:१३॥"
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
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(२) हम जीवन में क्या चाहते हैं? हमारे मनुष्य जीवन का उच्चतम लक्ष्य है -- "भगवत्-प्राप्ति"। अंत समय में वही याद रहता है जिसे करते करते पूरा जीवन व्यतीत होता है। अतः भगवान का ध्यान निरंतर हमारी स्मृति में रहना चाहिये।
आरंभ में ध्यान में मुझे भगवान श्रीकृष्ण के ज्योतिर्मय विग्रह के दर्शन बंद आँखों के अंधकार के पीछे भ्रूमध्य में होते थे, जिसमें वे शांभवी-मुद्रा में ध्यानस्थ रहते थे। अब उनके दर्शन ऊर्ध्वमूल कूटस्थ में पुरुषोत्तम के अवर्णनीय रूप में होते हैं।
पुरुषोत्तम का ध्यान करते करते ही यह जीवन व्यतीत हो जाये, यही एकमात्र लौकिक कामना है। भगवान ने स्वयं को पुरुषोत्तम बताया है, और मुझे तो उनका आदेश है कि मैं उनका ध्यान पुरुषोत्तम के रूप में ही करूँ। तंत्र के परमशिव भी वे ही हैं।
"यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१५:१८॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥१५:१९॥"
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(३) "ॐ तत् सत्" -- परमात्मा यानि ब्रह्म के तीन नाम हैं, जिनका प्रयोग सृष्टि के आरंभ में ब्राह्मणों, वेदों और यज्ञों की रचना के लिए किया गया था। ये नाम जप, तप और दान जैसी क्रियाओं में आने वाली कमियों को पूरा करते हैं। वेदान्त में ब्रह्मज्ञानियों द्वारा भी यह माना गया है।
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥१७:२३॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥१७:२४॥"
"तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभि:॥१७:२५॥"
"सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥१७:२६॥"
"यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥१७:२७॥"
"अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥१७:२८॥"
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उपरोक्त मंत्रों की विस्तृत व्याख्या करने में तो एक पूरी पुस्तक ही बन जाती, अतः अति संक्षिप्त रूप से लिखा है। उपरोक्त मंत्रों के अर्थों का स्वाध्याय और मनन आप स्वयं करें। आप सभी निजात्माओं को नमन। आपका जीवन कृतार्थ होगा, व आप कृतकृत्य होंगे।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जनवरी २०२६

भ्रूमध्य में गहन ध्यान -- त्रिवेणी संगम में स्नान है। हमारी चेतना जहां है, वहीं परमात्मा हैं, वहीं सारे तीर्थ हैं, और सारे संत-महात्मा वहीं हैं।

 भ्रूमध्य में गहन ध्यान -- त्रिवेणी संगम में स्नान है। हमारी चेतना जहां है, वहीं परमात्मा हैं, वहीं सारे तीर्थ हैं, और सारे संत-महात्मा वहीं हैं।

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अपनी चेतना को भ्रूमध्य में और उससे ऊपर रखना त्रिवेणी संगम में स्नान करना है। आने-जाने वाली हर सांस के प्रति सजग रहें, और निज चेतना का निरंतर विस्तार करते रहें। गीता में बताई गयी ब्राह्मीस्थिति यानि कूटस्थ-चैतन्य में हम अनंत, सर्वव्यापक, असम्बद्ध, अलिप्त व शाश्वत हैं। हमारे हृदय की हर धड़कन, हर आती जाती साँस, -- परमात्मा की कृपा है। हमारा अस्तित्व ही परमात्मा है।
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रात्रि को सोने से पूर्व भगवान का ध्यान कर के निश्चिन्त होकर जगन्माता की गोद में सो जाएँ। दिन का प्रारम्भ परमात्मा के प्रेम रूप पर ध्यान से करें। पूरे दिन परमात्मा की स्मृति रखें। यदि भूल जाएँ तो याद आते ही पुनश्चः स्मरण करते रहें। एक दिन पायेंगे कि भवसागर तो कभी का पीछे निकल गया, कुछ पता ही नहीं चला। गीता में भगवान कहते हैं --
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥९:३४॥"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥१८:६५॥"
अर्थात् - "(तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥९:३४॥"
"तुम मच्चित, मद्भक्त और मेरे पूजक (मद्याजी) बनो और मुझे नमस्कार करो; (इस प्रकार) तुम मुझे ही प्राप्त होगे; यह मैं तुम्हे सत्य वचन देता हूँ,(क्योंकि) तुम मेरे प्रिय हो॥१८:६५॥"
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अभीप्सा, परमप्रेम और समर्पण -- यही वेदान्त है, यही ज्ञान है, यही भक्ति है, और यही सत्य-सनातन-धर्म है। बाकी सब इन्हीं का विस्तार है। सर्वत्र भगवान वासुदेव हैं। वे ही सर्वस्व हैं। कहीं कोई पृथकता नहीं है। अन्य कुछ है ही नहीं।
ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१४ जनवरी २०२६

क्या यह देश केवल आरक्षित वर्ग का ही है ?

 क्या यह देश केवल आरक्षित वर्ग का ही है? क्या अनारक्षित वर्ग को आत्म-सम्मान से जीने का अधिकार नहीं है? क्या भारत में कभी समान-नागरिक-संहिता लागू होगी?

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वर्ग-संघर्ष अपने पीछे एक विनाशलीला छोड़ जाता है। विश्व में जहाँ भी वर्ग-संघर्ष हुआ है उसमें लाभ केवल शासकों को ही हुआ है। भारत में शासकों ने "अन्य पिछड़ा वर्ग" नाम से एक वर्ग को बलात् उत्पन्न कर उसे तथाकथित अगड़ा वर्ग के विरुद्ध खड़ा कर दिया है। उनके अनुसार यह देश सनातन धर्म को गर्व से मानने वाले ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों का नहीं है, केवल तथाकथित दलितों, अन्य पिछड़ा वर्गों, और अल्पसंख्यकों का ही है।
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इसी तरह उत्तर और दक्षिण भारतीयों, मराठी और गैर-मराठी भाषियों, बंगालियों और गैर-बंगालियों के मध्य भी वर्ग-संघर्ष उत्पन्न किया जा रहा है। यह देश सरकारों द्वारा आरक्षित घोषित किए गए लोगों का ही देश नहीं है, अनारक्षित लोगों का भी है, उनके भी कुछ राजनीतिक अधिकार हैं, जिनसे उन्हें वंचित करने का प्रयास किया जा रहा है।
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साम्यवाद व समाजवाद जैसी व्यवस्थाओं का जन्म वर्ग-संघर्ष से ही होता है। इन व्यवस्थाओं का अंत भी समय के साथ हो जाता है। भारत के संविधान में सेकुलर और समाजवादी शब्द जोड़े गए हैं, जिन का अब कोई औचित्य नहीं है। भारत में आरक्षण तो लगता है तब तक रहेगा जब तक यह लोकतन्त्र है। इस लोकतन्त्र की समाप्ति ही आरक्षण की समाप्ती होगी। वर्णाश्रम धर्म की स्थापना निश्चित रूप से एक दिन बापस होगी। तब तक यह कुव्यवस्था बनी रहेगी।
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पुनश्च : --- भारत के ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य मतदाताओं को अब अन्य राजनीतिक विकल्प देखना चाहिये। भाजपा के अलावा अन्य कोई राष्ट्रभक्त राजनीतिक दल हो तो उसे ही अपना मत (Vote) देना चाहिये। जो राष्ट्रभक्त लोग समान-नागरिक-संहिता की अपेक्षा कर रहे थे, उन्हें बड़ी निराशा हुई है।
१७ जनवरी २०२६

परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ व सर्वोच्च अनुभूति ऊर्ध्वमूल कूटस्थ सूर्यमण्डल में परमशिव पुरुषोत्तम के ध्यान में होती है ---

गहरे ध्यान में सहस्त्रारचक्र से ऊपर का भाग खुल जाता है, और हमारी चेतना इस भौतिक देह में न रहकर भगवान की ज्योतिर्मय विराट अनंतता के साथ एक हो जाती है। उस अनंतता में जितना भी ऊपर उठ सकते हो, उतना ऊपर उठ जाओ। जहां भी आपकी चेतना है, वहाँ से लाखों करोड़ किलोमीटर ऊपर उठ जाओ। और भी ऊपर उठो, उठते रहो, उठते रहो, उठते रहो जब तक चरम सीमा तक न पहुँच जाओ। जब अधिकतम की सीमा आ जायेगी, वहाँ आपको एक परम ज्योतिर्मय मण्डल में एक पंचकोणीय नक्षत्र के दर्शन होंगे। उस नक्षत्र का भी भेदन करना पड़ता है। उस ज्योतिर्मय सूर्यमण्डल में समर्पित होकर भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान कीजिये। हम उनके साथ एक हैं। उनसे पृथक हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। उनके साथ एकाकार होना ही ब्राह्मी-स्थिति है, यही कूटस्थ-चैतन्य है। पृथकता के बोध अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को भगवान पुरुषोत्तम में विलीन कर दें। ज्योतिषांज्योति हम स्वयं हैं। गीता में भगवान कहते हैं --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥ (श्रीमद्भगवद्गीता)
श्रुति भगवती कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम्
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ (कठोपनिषद २-२-१५)
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गीता के पुरुषोत्तम-योग का कभी कभी स्वाध्याय करें, और सूर्यमण्डल में नित्य पुरुषोत्तम का दीर्घ व गहनतम ध्यान करें। सबसे बड़ी शक्ति जो हमें भगवान की ओर ले जा सकती है, वह है -- "परमप्रेम" यानि "अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति।" तब सारा मार्गदर्शन स्वयं भगवान ही करते हैं। वह परमप्रेम सब में जागृत हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ जनवरी २०२६