Friday, 31 October 2025

भगवान से हमें पृथक किसने किया है?

 भगवान की भक्ति, भगवान से कुछ लेने के लिए नहीं, उन्हें अपना पृथकत्व का मायावी बोध बापस लौटाने के लिए होती है| हम उन सच्चिदानंद भगवान के अंश हैं, वे स्वयं ही हमारे हैं और हम उनके हैं, अतः जो कुछ भी भगवान का ही, वह हम स्वयं हैं| हम उनके साथ एक हैं, उन से पृथक नहीं|

.
प्रश्न : भगवान से हमें पृथक किसने किया है?
उत्तर : हमारे राग-द्वेष और अहंकार ने| और भी स्पष्ट शब्दों में हमारा सत्यनिष्ठा का अभाव, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, और लोभ हमें भगवान से दूर करते हैं| हमारा थोड़ा सा भी लोभ, बड़े-बड़े कालनेमि/ठगों को हमारी ओर आकर्षित करता है| जो भी व्यक्ति हमें थोड़ा सा भी प्रलोभन देता है, चाहे वह आर्थिक या धार्मिक प्रलोभन हो, वह शैतान है, उस से दूर रहें|
.
जो वास्तव में भगवान का भक्त है, वह भगवान के सिवाय और कुछ भी नहीं चाहता| जो हमारे में भगवान के प्रति प्रेम जागृत करे, जो हमें सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे, वही संत-महात्मा है, उसी का संग करें| अन्य सब विष यानि जहर मिले हुए शहद की तरह हैं| किसी भी तरह के शब्द जाल से बचें| हमारा प्रेम यानि भक्ति सच्ची होगी तो भगवान हमारी रक्षा करेंगे| सभी का कल्याण हो|
.
हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ नवंबर २०२०

शांभवी मुद्रा --- एक स्वभाविक मुद्रा है जो ध्यान करते-करते धीरे धीरे स्वतः ही होने लगती है ---

 शांभवी मुद्रा --- एक स्वभाविक मुद्रा है जो ध्यान करते-करते धीरे धीरे स्वतः ही होने लगती है। अगर पद्मासन और खेचरी का अभ्यास है तो शांभवी मुद्रा बहुत ही शीघ्र सिद्ध हो जाती है, अन्यथा थोड़ा समय लगता है। सारे उन्नत योगी शाम्भवी मुद्रा में ही ध्यानस्थ रहते हैं। सुखासन अथवा पद्मासन में बैठकर मेरुदंड को उन्नत रखते हुए साधक शिवनेत्र होकर अर्धोन्मीलित नेत्रों से भ्रूमध्य पर दृष्टी स्थिर रखता है। धीरे धीरे पूर्ण खेचरी या अर्ध-खेचरी भी स्वतः ही लग जाती है|

.
आध्यात्मिक रूप से खेचरी का अर्थ है --- चेतना का सम्पूर्ण आकाश में विचरण, यानि चेतना का इस भौतिक देह में न होकर पूरी अनंतता में होना है। भौतिक रूप से खेचरी का अर्थ है -- जिह्वा को उलट कर तालू के भीतर भीतर प्रवेश कराकर ऊपर की ओर रखना। गहरी समाधि के लिए यह आवश्यक है। जो पूर्ण खेचरी नहीं कर सकते वे अर्धखेचरी कर सकते हैं जीभ को ऊपर पीछे की ओर मोडकर तालू से सटाकर रखते हुए।
.
अर्धोन्मीलित नेत्रों को भ्रूमध्य में स्थिर रखकर साधक पहिले तो भ्रूमध्य में एक प्रकाश की कल्पना करता है और यह भाव करता है कि वह प्रकाश सम्पूर्ण ब्रह्मांड में फ़ैल गया है| फिर संहार बीज और सृष्टि बीज --- 'हं" 'सः' के साथ गुरु प्रदत्त विधि के साथ अजपा-जप करता है और उस सर्वव्यापक ज्योति के साथ स्वयं को एकाकार करता है। समय आने पर गुरुकृपा से विद्युत् की चमक के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होती है। उस ब्रह्मज्योति पर ध्यान करते करते प्रणव की ध्वनि सुनने लगती है तब साधक उसी में लय हो जाता है। सहत्रार की अनुभूति होने लगती है और बड़े दिव्य अनुभव होते हैं। पर साधक उन अनुभवों पर ध्यान न देकर पूर्ण भक्ति के साथ ज्योति ओर नाद रूप में परमात्मा में ही अपने अहं को विलय कर देता है। तब सारी प्राण चेतना आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य स्थिर हो जाती है। यही शाम्भवी मुद्रा की पूर्ण सिद्धि है।
.
नमः शिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
१ नवंबर २०२१ -- (संशोधित व पुनर्प्रेषित लेख)
.
पुनश्च: --- शांभवी मुद्रा के बारे में आगे की और भी कई बाते हैं, जो मैंने जानबूझ कर नहीं लिखी हैं क्योंकि उन्हें सिर्फ साधक ही समझ सकते हैं।

Thursday, 30 October 2025

सात व्याह्रतियों के साथ गायत्री मन्त्र और प्राणायाम ......

 सात व्याह्रतियों के साथ गायत्री मन्त्र और प्राणायाम ......

(गायत्री साधना की यौगिक व तांत्रिक विधि)
-----------------------------------------------
(निम्न प्रस्तुति मेरे अनेक साधू-संतों, योगियों व विद्वानों के साथ हुए व्यक्तिगत सत्संगों से प्राप्त ज्ञान, साधना के निजी अनुभवों और स्वाध्याय पर आधारित है| यह प्रस्तुति मात्र गंभीर योग साधकों के लिए ही है|)
पूर्व में मैनें भागवत मन्त्र पर एक चर्चा की थी जिसे मेरी ही निजात्मा आप सब मनीषियों ने बहुत सराहा जिनके प्रेम से मैं अभिभूत हूँ| भागवत मन्त्र योगियों का सर्वाधिक प्रिय मन्त्र है जिसकी उपादेयता सभी को है|
आज मैं प्रभु प्रेरणा से सप्त व्याह्रति युक्त त्रिपदा गायत्री मन्त्र पर एक चर्चा करने का दु:साहस कर रहा हूँ| कहीं चूक भी जाऊँ तो आप सब मुझे क्षमा भी कर ही देंगे क्योंकि आप सब मेरी ही निजात्मा हैं और मेरे ह्रदय का सम्पूर्ण अहैतुकी प्रेम आप सब को समर्पित है|
भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं को 'गायत्री छन्दसामहम्' अर्थात छंदों में गायत्री कहा है|
गायत्री मन्त्र को ही सावित्री मन्त्र भी कहते है| महाभारत में भी सावित्री (गायत्री) मंत्र की महिमा कई स्थानों पर गाई गयी है।
भीष्म पितामह युद्ध के समय जब शरशय्या पर पड़े होते हैं तो उस समय अन्तिम उपदेश के रूप में युधिष्ठिर आदि को गायत्री उपासना की प्रेरणा देते हैं। भीष्म पितामह का यह उपदेश महाभारत के अनुशासन पर्व के अध्याय 150 में दिया गया है|
युधिष्ठिर पितामह से प्रश्न करते हैं ..... हे पितामह महाप्रज्ञ सर्व शास्त्र विशारद, किम् जप्यं जपतों नित्यं भवेद्धर्म फलं महत ॥ प्रस्थानों वा प्रवेशे वा प्रवृत्ते वाणी कर्मणि ।। देवें व श्राद्धकाले वा किं जप्यं कर्म साधनम ॥ शान्तिकं पौष्टिक रक्षा शत्रुघ्न भय नाशनम् ।। जप्यं यद् ब्रह्मसमितं तद्भवान् वक्तुमर्हति ॥
भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा --- यान पात्रे च याने च प्रवासे राजवेश्यति ।। परां सिद्धिमाप्नोति सावित्री ह्युत्तमां पठन ॥ न च राजभय तेषां न पिशाचान्न राक्षसान् ।। नाग्न्यम्वुपवन व्यालाद्भयं तस्योपजायते ॥ चतुर्णामपि वर्णानामाश्रमस्य विशेषतः ।। करोति सततं शान्ति सावित्री मुत्तमा पठन् ॥
नार्ग्दिहति काष्ठानि सावित्री यम पठ्यते ।। न तम वालोम्रियते न च तिष्ठन्ति पन्नगाः ॥ न तेषां विद्यते दुःख गच्छन्ति परमां गतिम् ।। ये शृण्वन्ति महद्ब्रह्म सावित्री गुण कीर्तनम ॥ गवां मन्ये तु पठतो गावोऽस्य बहु वत्सलाः ।। प्रस्थाने वा प्रवासे वा सर्वावस्थां गतः पठेत ॥
''जो व्यक्ति सावित्री (गायत्री) का जप करते हैं उनको धन, पात्र, गृह सभी भौतिक वस्तुएँ प्राप्त होती हैं ।। उनको राजा, दुष्ट, राक्षस, अग्नि, जल, वायु और सर्प किसी से भय नहीं लगता ।। जो लोग इस उत्तम मन्त्र गायत्री का जप करते हैं, वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्ण एवं चारों आश्रमों में सफल रहते हैं ।।
जिस स्थान पर सावित्री का पाठ किया जाता है, उस स्थान में अग्नि काष्ठों को हानि नहीं पहुँचाती है, बच्चों की आकस्मिक मृत्यु नहीं होती, न ही वहाँ अपङ्ग रहते हैं ।।
जो लोग सावित्री के गुणों से भरे वेद को ग्रहण करते हैं उन्हें किसी प्रकार का कष्ट एवं क्लेश नहीं होता है तथा जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करते हैं ।।
गौवों के बीच सावित्री का पाठ करने से गौवों का दूध अधिक पौष्टिक होता है ।। घर हो अथवा बाहर, चलते फिरते सदा ही गायत्री का जप किया करें ।
भीष्म पितामह कहते हैं कि सावित्री- गायत्री से बढ़कर कोई जप नहीं है|
गायत्री का दूसरा नाम सावित्री सविता की शक्ति ब्रह्मशक्ति होने के कारण ही रखा गया है।
गायत्री का सविता होने के संदर्भ में कुछ उक्तियाँ इस प्रकार हैं— सवितुश्चाधिदेवो या मन्त्राधिष्ठातृदेवता। सावित्री ह्यपि वेदाना सावित्री तेन कीर्तिता। -देवी भागवत
इस सावित्री मन्त्र का देवता सविता- (सूर्य) है। वेद मंत्रों की अधिष्ठात्री देवी वही है। इसी से उसे सावित्री कहते हैं।
यो देवः सवितास्माकं धियो धर्मादिगोचरः। प्रेरयेत् तस्य यद् भर्गः तं वरेण्यमुषास्महे।।
‘जो सविता देव हमारी बुद्धि को धर्म में प्रेरित करता है उसके श्रेष्ठ भर्ग (तेज) की हम उपासना करते हैं।
सर्व लोकप्रसवनात् सविता स तु कीर्त्यते। यतस्तद् देवता देवी सावित्रीत्युच्यते ततः।।-अमरकोश
‘‘वे सूर्य भगवान समस्त जगत को जन्म देते हैं इसलिए ‘सविता’ कहे जाते हैं। गायत्री मन्त्र के देवता ‘सविता’ हैं इसलिए उसकी दैवी-शक्ति को ‘सावित्री’ कहते हैं।’’
मनोवै सविता। प्राणधियः। -शतपथ 3/6/1/13
प्राण एव सविता, विद्युतरेव सविता। -शतपथ 7/7/9
सूर्य ही तेज कहा जाता है।
ब्रह्म तेज और सविता एक ही हैं। गायत्री को तेजस्विनी कहा गया है। सविता तेज का प्रतीक है। अस्तु सविता का तेज और गायत्री के भर्ग को एक ही समझा जाना चाहिए।
गायत्री मन्त्र के देवता सविता हैं और उनकी भर्गः ज्योति का ध्यान करते हैं जो आज्ञा चक्र से ऊपर सहस्त्रार में या उससे भी ऊपर दिखाई देती है|
गुरु कृपा से ही परा सुषुम्ना का द्वार खुलता है जो मूलाधार से आज्ञा चक्र तक है|
उससे भी आगे उत्तरा सुषुम्ना जो आज्ञाचक्र से सहस्त्रार तक है, में प्रवेश तो गुरु की अति विशेष कृपा से ही हो पाता है|
वहाँ जो ज्योति दिखाई देती है वही सविता देव की भर्गः ज्योति है जिसका ध्यान किया जाता है और जिसकी आराधना होती है| इसका क्रम इस प्रकार मेरुदंड व मस्तिष्क के सूक्ष्म चक्रों पर मानसिक जाप करते हुए है ---
ॐ भू: ------ मूलाधार चक्र,
ॐ भुवः ---- स्वाधिष्ठान चक्र,
ॐ स्वः ----- मणिपुर चक्र,
ॐ महः ---- अनाहत चक्र,
ॐ जनः -- -- विशुद्धि चक्र,
ॐ तपः ------ आज्ञा चक्र,
ॐ सत्यम् --- सहस्त्रार ||
फिर आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य में विराट सर्वव्यापी श्वेत भर्ग: ज्योति का ध्यान किया जाता है और चित्त जब स्थिर हो जाता है तब फिर प्रार्थना की जाती है ----
"ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं| ॐ भर्गोदेवस्य धीमहि| ॐ धियो योन: प्रचोदयात||"
यह त्रिपदा गायत्री है| इसमें चौबीस अक्षर हैं|
यह एक जप है| जप से पूर्व संकल्प करना पड़ता है कि आप कितने जप करेंगे| जितनों का संकल्प लिया है उतने तो करने ही पड़ेंगे|
फिर उस ज्योति का ध्यान करते रहो और ॐ के साथ साथ ईश्वर की सर्वव्यापकता में मानसिक अजपा-जप करते रहो| ईश्वर की सर्वव्यापकता आप स्वयं ही हैं|
(पूरी विधि किसी शक्तिपात संपन्न सद्गुरु से सीखनी चाहिए)
समापन -- 'ॐ आपो ज्योति रसोsमृतं ब्रह्मभूर्भुवःस्वरोम्' से कर के लम्बे समय तक बैठे रहो अपने आसन पर और सर्वस्व के कल्याण की कामना करो| प्रभु को अपना सम्पूर्ण परम प्रेम अर्पित करो और आप स्वयं ही वह परम प्रेम बन जाओ|
मुझे एक संत ने बताया था कि ऋग्वेद में एक मंत्र है जिस में "गायत्री" शब्द आता है और उस मन्त्र के दर्शन बिश्वामित्र से बहुत पूर्व शव्याश्व्य ऋषि को हुए थे|
प्रचलित गायत्री मन्त्र के दृष्टा विश्वामित्र ऋषि थे| इस के चौबीस अक्षर हैं और तीन पद हैं| अतः यह त्रिपदा चौबीस अक्षरी गायत्री मन्त्र कहलाता है| बाद में अन्य महान ऋषियों ने गायत्री मंत्र से पहले "भू", भुवः, और "स्वः" ये तीन व्याह्रतियाँ भी जोड़ दीं| अतः पूरा मन्त्र अपने प्रचलित वर्त्तमान स्वरुप में आ गया|
यह सप्त व्याह्रातियुक्त गायत्री साधना की विधि बहुत अधिक शक्तिशाली है और प्रभावी है|
ॐ तत्सत्| ॐ नमः शिवाय|
३१ अक्तुबर २०१३

अमानित्व, अदम्भित्व, व सत्यनिष्ठा बहुत बड़े गुण हैं, जो भगवान को प्रिय हैं ---

 अमानित्व, अदम्भित्व, व सत्यनिष्ठा बहुत बड़े गुण हैं, जो भगवान को प्रिय हैं|

हमारे विचारों व व्यवहार में कोई कुटिलता न हो| सारे कार्य ईश्वर प्रदत्त निज विवेक के प्रकाश में करें| अच्छी तरह सोच-समझ कर ही कुछ बोलें| कम से कम शब्दों का प्रयोग करें| अपना मार्गदर्शन अपने हृदय में बिराजमान परमात्मा से ही लें| उनसे बड़ा हितैषी और मित्र अन्य कोई नहीं है| झूठ-कपट से बचें| भगवान ही एकमात्र वरणीय हैं| उनको पाने की अभीप्सा, स्मृति व परमप्रेम निरंतर बना रहे| अन्य कुछ भी नहीं चाहिए|
ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
३१ अक्तूबर २०१९

पूर्वाञ्चल (पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार) के सभी श्रद्धालुओं को कार्तिक शुक्ल षष्ठी को आने वाले छठ पर्व पर अभिनन्दन, नमन और शुभ कामनाएँ --------

 पूर्वाञ्चल (पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार) के सभी श्रद्धालुओं को कार्तिक शुक्ल षष्ठी को आने वाले छठ पर्व पर अभिनन्दन, नमन और शुभ कामनाएँ --------

पूर्वांचल के लोगों के लिए छठ बड़े से बड़ा त्यौहार है| यह पर्व चार चरणों में मनाया जाता है| इस पर्व पर कुंआरी और विधवा महिलाएं व्रत नहीं रखती (१) प्रथम चरण में व्रती महिलाएं उपवास रखती है,यह उपवास का पहला दिन होता है| (२) द्वितीय चरण में व्रती महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं| यह दूसरा दिन होता है| (३) तृतीय चरण में अस्त होते हुए सूर्य को नदी या तालाब के किनारे अर्घ्य दिया जाता है| यह तीसरा दिन होता है| (४) चतुर्थ चरण में प्रातः उगते हुए सूर्य को अर्घ्य, हवन के साथ दिया जाता है| यह चौथा दिन होता है| यह सभी व्रतों में कठिन व्रत माना जाता है| परिवार के सभी सदस्य व्रती महिला के सामने खड़े होकर अर्घ्य देते हैं| इस व्रत में पुत्र एवं पति के कल्याण की कामना की जाती है.पुत्र प्राप्ति के लिए भी यह व्रत किया जाता है| भगवान भुवन भास्कर आदित्य सब का कल्याण करें| ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
३१ अक्तूबर २०१९

मानित्व (स्वयं में श्रेष्ठता का भाव), और दम्भित्व (झूठा दिखावटीपन) - ये दोनों पतन के मार्ग हैं ---

 मानित्व (स्वयं में श्रेष्ठता का भाव), और दम्भित्व (झूठा दिखावटीपन) - ये दोनों पतन के मार्ग हैं। "मैं कुछ हूँ" -- का भाव निश्चित रूप से पतन के गर्त में धकेल देगा।

.
यह शरीर एक मोटर साइकिल मात्र है जो हमें लोकयात्रा के लिए मिली हुई है। इसकी देखभाल भी आवश्यक है, लेकिन हम यह मोटर साइकिल नहीं हैं।
सारा ब्रह्मांड हमारा शरीर है, और हमारे माध्यम से भगवान स्वयं को व्यक्त कर रहे हैं। अपनी पृष्ठभूमि में निरंतर अपने इष्टदेव को रखिये। वे ही कर्ता हैं, हम तो निमित्त मात्र हैं।
विश्व का घटनाक्रम इस समय अकल्पनीय गति से परिवर्तित हो रहा है। कुछ भी कभी भी हो सकता है। अपने स्वधर्म को न भूलें, उसका पालन करते रहें, व परमात्मा की चेतना में रहें। फिर चाहे पूरा ब्रह्मांड टूट कर बिखर जाये, हमारा कोई अहित नहीं होगा।
.
गीता के १३वें अध्याय का आज के दिन एक बार अर्थ को समझते हुए पाठ अवश्य कीजिये। बहुत अधिक लाभ होगा जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।
.
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
३१ अक्तूबर २०२१

३१ अक्टूबर को पश्चिमी ईसाई देशों में मनाये जाने वाला Halloween का त्यौहार ---

 ३१ अक्टूबर को पश्चिमी ईसाई देशों में मनाये जाने वाला Halloween का त्यौहार यदि भारत में भी अंग्रेजों के कुछ मानस पुत्र मनाते हैं तो यह एक फूहड़ता के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है| यह अंधविश्वास की पराकाष्ठा है| यह भूतों को भगाने का त्यौहार है| कुछ लोग भूतों के से कपड़े पहिनते हैं और कुछ लोग उनसे भी अधिक डरावने कपड़े पहिन कर भूतों को डरा कर भगाते हैं| ऐसी कुरीतियों से मन में गलत संस्कार पड़ते हैं| अब तो इस कुत्सित त्योहार पर होने वाली सेक्स पार्टियों ने घोर यौन-पतन और मनोरोग का रूप ले लिया है।

.
गोवा में एक बार अपने कुछ रोमन कैथोलिक मित्रों से बात कर रहा था तो उन्होंने बताया कि वे लोग रात में भोर होने तक घर से बाहर तब तक नहीं निकलते जब तक कि चर्च की घंटियाँ नहीं बजतीं। उनके अनुसार आधी रात के बाद से सडकों पर उन हिन्दुओं के भूत घूमते हैं जिन की पुर्तगालियों ने ह्त्या की थी। वे भूत प्रातः चर्च की घंटी की आवाज़ सुनकर भाग जाते हैं।
.
पश्चिमी जगत में और भारतीय अंग्रेजों के मानसपुत्रों में जितना ढोंग और अंधविश्वास है, उसके सामने तो सही भारतीयों में कुछ है ही नहीं।
३१ अक्तूबर २०२१