Tuesday, 21 October 2025

मैं कहाँ हूँ?

 मैं कहाँ हूँ?

मुझे सदा भगवान के चरण-कमलों में ही लीन पाओगे। मेरा निवास निरंतर वहीं है। कभी कभी भटक जाता हूँ, लेकिन घूम फिर कर वहीं लौट आता हूँ। हम वहीं हैं, जहां हमारा मन है। मन को सदा परमात्मा में रखें व निरंतर उनकी चेतना में रहें। भगवान कहते हैं --
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥६:२४॥"
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥६:२५॥"
"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् -- संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं का सर्वथा त्याग कर के और मन से ही इन्द्रिय-समूह को सभी ओर से हटाकर, धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा संसार से धीरे-धीरे उपराम हो जाय और परमात्मस्वरूप में मन-(बुद्धि-) को सम्यक् प्रकारसे स्थापन करके फिर कुछ भी चिन्तन न करे। यह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ-जहाँ विचरण करता है, वहाँ-वहाँ से हटाकर इसको एक परमात्मामें ही लगाये। जो सबमें मुझे देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता॥
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उपरोक्त -- भगवान का आदेश है, जिसका पालन करना हमारा परमधर्म है। वायुपुराण में भगवान का आश्वासन है कि यदि किसी विशेष परिस्थिति में उनका भक्त उन्हें भूल जाये तो भगवान ही उसे याद कर लेते हैं।
हे प्रभु, मुझे सदा अपने चरण-कमलों में और अपने हृदय में रखो। मेरी कोई अन्य गति नहीं है। ॐ ॐ ॐ !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२२ अक्तूबर २०२५

शुभ काम में देरी नहीं, जो कल करना है सो आज करो, और जो आज करना है वह अभी करो ...

शुभ काम में देरी नहीं, जो कल करना है सो आज करो, और जो आज करना है वह अभी करो ...

सर्वाधिक शुभ कार्य है ..... भक्तिपूर्वक परमात्मा का ध्यान, जिसे आगे पर ना टालें| भगवान की अपार कृपा बरस रही है| भगवान अपनी परम कृपा लूटा रहे हैं| दोनों हाथों से खूब लूट लो, अन्यथा बाद में पछताना होगा| कोई कहता है कि हमारा समय नहीं आया है, उनका समय कभी नहीं आएगा| किसी ने पूछा कि संसार में उलझे हुए हैं, भगवान के लिए फुर्सत कैसे निकालें? उनके लिए हमारा उत्तर है ... जब हम साइकिल चलाते हैं तब पैडल भी मारते हैं, हेंडल भी पकड़ते हैं, ब्रेक पर अंगुली भी रखते है, सामने भी देखते हैं, और यह भी याद रखते हैं कि कहाँ जाना है| इतने सारे काम एक साथ करने पड़ते हैं| अन्यथा हम साइकिल नहीं चला पाएंगे| वैसे ही यह संसार भी चल रहा है| संसार में इस देह रूपी मोटर साइकिल को भी चलाओ पर याद रखो कि जाना कहाँ है| २१ अक्तूबर २०२०
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Friday, 17 October 2025

(1) सदा हृदय की ही सुननी चाहिए, मन की नहीं . (2) हृदय कहाँ है ?

(1) मनुष्य का मन और उसका हृदय कभी एक नहीं हो सकते| मन पर पूर्ण नियंत्रण हो जाए तो बात दूसरी है| मन गणना करता है, हित-अहित की सोचता है और झूठ भी बोलता है, जब कि हृदय सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म का बोध कराता है और कभी झूठ नहीं बोलता| हृदय में सदा परमात्मा का निवास होता है, सारे अच्छे विचार और प्रेरणाएँ वहीं से आती हैं| मन एक झरने सा उच्छशृंखल है, हृदय शांत सरोवर है| हृदय को अभिलाष है ..... सच्चे प्रेम की, कर्त्तव्य की, धर्म की, सम्मान की, पर मन इच्छुक है हर क्षण शरीर के सुख का| अतः हमें सदा हृदय की ही सुननी चाहिए, मन की नहीं| हृदय की भाषा मन के शब्दों और भावनाओं के परे है|
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(2) हृदय कहाँ है ? .....
जो योग मार्ग के साधक हैं उनके चैतन्य में हृदय का केंद्र भौतिक हृदय न रहकर, आज्ञाचक्र व सहस्त्रार के मध्य हो जाता है| वे प्रयासपूर्वक अपनी चेतना को आज्ञाचक्र से ऊपर ही रखते हैं जो कुछ समय पश्चात स्वभाविक हो जाता है| उसी क्षेत्र में उन्हें नाद यानि प्रणव की ध्वनी सुनाई देती है, और ज्योति का प्राकट्य भी वहीँ होता है जो कूटस्थ में प्रतिबिम्बित होती है|
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ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर १७ अक्तूबर २०१६

१७ अक्तूबर २०१६ 

Monday, 13 October 2025

भारत में अगर चीनी सामान इतना अधिक बिकता है तो इसके लिए भारत के उद्योगपति जिम्मेदार हैं ---

 भारत में अगर चीनी सामान इतना अधिक बिकता है तो इसके लिए भारत के उद्योगपति जिम्मेदार हैं|

भारत के उद्योगपति कई आवश्यक सामानों का उत्पादन नहीं करते और चीन से आयात कर के उनका विक्रय करते हैं| उत्पादन के लिए कारखाने लगाने पड़ते हैं, मजदूरों को नौकरी देनी पड़ती है, हिसाब-किताब करना पड़ता है जिसके लिए और लोगों को नौकरी देनी पड़ती है, आदि आदि| इलेक्ट्रॉनिक्स व कम्प्यूटरों के स्पेयर पार्ट्स लिए हम पूरी तरह चीन पर निर्भर हैं|
जापानी कम्पनियाँ जापान में मजदूरी मंहगी होने के कारण अपने उत्पादनों की असेंबली चीन में करवाती है|
भारत के भी कई उद्योगपति अपना उत्पादन चीन में करवाते हैं|
अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के कारण हम किसी देश के उत्पादनों पर पूर्ण प्रतिबन्ध नहीं लगा सकते|
भारत के उद्योगपति बहुत अधिक मुनाफाखोर हैं| जो चीनी सामान पचास रुपये में मिल जाता है उसके भारत में उत्पादन में वे पाँचसौ रुपये बसूलेंगे|
तकनीक बहुत तेजी से बदलती है, पुराने कारखानों का नवीनीकरण करना पड़ता है, इतना धैर्य भारत के उद्योगपतियों में नहीं है| वे चीन से बना बनाया सामान आयात करने में अधिक विश्वास करते हैं|
भारत में मजदूर भी आसानी से नहीं मिलते| यहाँ रुपया तो सब चाहते हैं पर काम कोई नहीं करना चाहता|
ऐसे कई कारण और सरकारी नीतियाँ आदि सब जिम्मेदार हैं, चीनी सामान पर निर्भरता के लिए|
हाँ हम छोटे-मोटे सामान जैसे दीये, सजावटी लाइट्स, खिलौने, कपडे, छतरी, और बने बनाए मोबाइल सेट आदि का बहिष्कार कर सकते हैं|
पूरी तरह का बहिष्कार संभव नहीं है|
१४ अक्तुबर २०१६

हादी-कादी विद्या

लेखक : श्री नरेन्द्रभाई पाण्ड्या (राजकोट)। Dated १४ अक्तूबर २०१४ . श्री विद्या का सार श्री सुक्त है ।
श्री सुक्त का सार हादी और कादी विद्या है।
कादी विद्या अगत्स्य मुनिको दी गयी और उससे सुख की प्राप्ति होती है।
हादी विद्या अगत्स्य मुनिकी पत्नी लोपामुद्रा को दी गई जिससे आत्मोन्नति होती है।
कहा जाता है कि हादी और कादी दोनों की शक्तियां गायत्री से तीन तीन गुना ज्यादा है।
कादी मंत्र :- क ए ई ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं ।
हादी मंत्र:- ह स क ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं ।
जब दोनों को साथ में जोड़ दे तो हादी कादी दोनों के लाभ मिलते हैं और कई गुना ज्यादा और जल्दी भी यानी सुख और आत्मोन्नति एक साथ!!
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अन्तमें "श्रीं "जोड़ने से उसकी शक्ति और भी बढ़ जाती है।ये मंत्र ऐसा होता है :-
" ॐ क ए ई ल ह्रीं, ह स क ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं श्रीं ॐ।
Above Mantra in English
"Aum ka ae ee la hrim,
ha sa ka la hrim,
ha sa ka ha la hrim,
sa ka la hrim sri aum."
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जब गुरु पुष्य या रवि पुष्य नक्षत्र के साथ अमृत सिद्धि योग होता है उस दिन ज्यादा से ज्यादा लोग इस मंत्र का लाभ उठाये ये मेरी मनोकामना, प्रार्थना है। आप खुद प्रभाव देख सकेंगे।
ज्यादा से ज्यादा और जल्दी से जल्दी शेयर करें।

Sunday, 12 October 2025

(१) कोई गृहस्थ व्यक्ति जो अपने बाल बच्चों, सगे सम्बन्धियों व मित्रों के साथ रहता है, क्या सत्य यानि ईश्वर का साक्षात्कार कर सकता है ? (2) क्या कोई अपने सहयोगी को उसी प्रकार लेकर चल सकता है जिस प्रकार पृथ्वी चन्द्रमा को लेकर सूर्य की परिक्रमा करती है ?

 विभिन्न देहों में मेरे ही प्रियतम निजात्मन,

मैंने कुछ दिन पूर्व मात्र चर्चा हेतु मंचस्थ मनीषियों और विद्वानों से प्रश्न किया था कि .....
(१) कोई गृहस्थ व्यक्ति जो अपने बाल बच्चों, सगे सम्बन्धियों व मित्रों के साथ रहता है, क्या सत्य यानि ईश्वर का साक्षात्कार कर सकता है ?
(2) क्या कोई अपने सहयोगी को उसी प्रकार लेकर चल सकता है जिस प्रकार पृथ्वी चन्द्रमा को लेकर सूर्य की परिक्रमा करती है ?
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मेरी दृष्टी में ये अति गहन प्रश्न हैं पर उनका उत्तर मेरे दृष्टिकोण से बड़ा ही सरल है जिसे मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ .....
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विवाह हानिकारक नहीं होता है| पर उसमें नाम रूप में आसक्ति आ जाए कि मैं यह शरीर हूँ, मेरा साथी भी शरीर है, तब दुर्बलता आ जाती है और इस से अपकार ही होता है| वैवाहिक संबंधों में शारीरिक सुख की अनुभूति से ऊपर उठना होगा| सुख और आनंद किसी के शरीर में नहीं हैं| भौतिक देहों में सुख ढूँढने वाला व्यक्ति ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता|
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यह अपने अपने दृष्टिकोण पर निर्भर करता है कि हमारा वैवाहिक जीवन कैसा हो| इसमें सुकरात के, संत तुकाराम व संत नामदेव आदि के उदाहरण विस्तार भय से यहाँ नहीं दे रहा|
हम ईश्वर की ओर अपने स्वयं की बजाय अनेक आत्माओं को भी साथ लेकर चल सकते हैं| ये सारे के सारे आत्मन हमारे ही हैं| परमात्मा के साथ तादात्म्य स्थापित करने से पूर्व हम अपनी चेतना में अपनी पत्नी, बच्चों और आत्मजों के साथ एकता स्थापित करें| यदि हम उनके साथ अभेदता स्थापित नहीं कर सकते तो सर्वस्व (परमात्मा) के साथ भी अपनी अभेदता स्थापित नहीं कर सकते|
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क्रिया और प्रतिक्रया समान और विपरीत होती है| यदि मैं आपको प्यार करता हूँ तो आप भी मुझसे प्यार करेंगे| जिनके साथ आप एकात्म होंगे तो वे भी आपके साथ एकात्म होंगे ही| आप उनमें परमात्मा के दर्शन करेंगे तो वे भी आप में परमात्मा के दर्शन करने को बाध्य हैं|
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पत्नी को पत्नी के रूप में त्याग दीजिये, आत्मजों को आत्मजों के रूप में त्याग दीजिये, और मित्रों को मित्र के रूप में देखना त्याग दीजिये| उनमें आप परमात्मा का साक्षात्कार कीजिये| स्वार्थमय और व्यक्तिगत संबंधों को त्याग दीजिये और सभी में ईश्वर को देखिये| आप की साधना उनकी भी साधना है| आप का ध्यान उन का भी ध्यान है| आप उन्हें ईश्वर के रूप में स्वीकार कीजिये|
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और भी सरल शब्दों में सार की बात यह है की पत्नी को अपने पति में परमात्मा के दर्शन करने चाहियें, और पति को अपनी पत्नी में अन्नपूर्णा जगन्माता के| उन्हें एक दुसरे को वैसा ही प्यार करना चाहिए जैसा वे परमात्मा को करते हैं| और एक दुसरे का प्यार भी परमात्मा के रूप में ही स्वीकार करना चाहिए| वैसा ही अन्य आत्मजों व मित्रों के साथ होना चाहिए| इस तरह आप अपने जीवित प्रिय जनों का ही नहीं बल्कि दिवंगत प्रियात्माओं का भी उद्धार कर सकते हो| अपने प्रेम को सर्वव्यापी बनाइए, उसे सीमित मत कीजिये|
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आप में उपरोक्त भाव होगा तो आप के यहाँ महापुरुषों का जन्म होगा|
यही एकमात्र मार्ग है जिस से आप अपने बाल बच्चों, सगे सम्बन्धियों व मित्रों के साथ ईश्वर का साक्षात्कार कर सकते है, अपने सहयोगी को भी उसी प्रकार लेकर चल सकते है जिस प्रकार पृथ्वी चन्द्रमा को लेकर सूर्य की परिक्रमा करती है|
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मैं कोई अधिक पढ़ा लिखा विद्वान् नहीं हूँ, न ही मेरा भाषा पर अधिकार है और न ही मेरी कोई लिखने की योग्यता है| अपने भावों को जितना अच्छा व्यक्त कर सकता था किया है|
ईश्वर की प्रेरणा से ही यह लिख पाया हूँ| कोई भी यदि इन भावों को और भी अधिक सुन्दरता से कर सकता है और करना चाहे तो वह स्वतंत्र है|
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आप सब विभिन्न देहों में मेरी ही निजात्मा हैं, मैं आप सब को प्रेम करता हूँ और सब में मेरे प्रभु का दर्शन करता हूँ| आप सब को प्रणाम|
ॐ तत्सत् |
कृपा शंकर
१३ अक्टूबर २०१३

Saturday, 11 October 2025

भगवत्-प्राप्ति ही हमारा एकमात्र स्वधर्म है, अन्य सब परधर्म हैं ---

 भगवत्-प्राप्ति ही हमारा एकमात्र स्वधर्म है, अन्य सब परधर्म हैं ---

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हम शाश्वत आत्मा है, यह नश्वर देह नहीं। हम न तो यह शरीर (भौतिक, सूक्ष्म और कारण) हैं, न ही उससे जुड़ी हुई इंद्रियाँ (कर्मेन्द्रियाँ व ज्ञानेंद्रियाँ) व उनकी तन्मात्राएँ हैं, और न ही हम अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) हैं। हमारा एकमात्र धर्म है -- परमात्मा की प्राप्ति। आत्मा का अन्य कोई धर्म नहीं है। यह भगवत्-प्राप्ति ही हमारा स्वधर्म है। हम अपने जीवन भर अंत समय तक स्वधर्म का ही पालन करें, और स्वधर्म में रहते हुये ही अंत समय में इस भौतिक देह का त्याग करें। भय, दुख और अशांति में जीने से अच्छा है कि निर्भयता, शांति व प्रसन्नता रूपी "आत्म-धर्म" में रहते हुये ही अंत समय में शरीर छोड़ें। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३:३५॥"
अर्थात् -- सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है; स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है॥
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हमारा राग-द्वेष, लोभ और अहंकार हमारी बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है, और हम शास्त्रों के अर्थ का अनर्थ करने लगते हैं। हमारी भ्रष्ट बुद्धि परधर्म को भी धर्म मान लेती है। परधर्म निश्चित रूप से नर्क की प्राप्ति कराता है। गीता साक्षात भगवान की वाणी है, अतः इस में कोई शंका न हो। यह श्रद्धा-विश्वास का विषय है। जिस विषयका हमें पता नहीं है, उसका पता शास्त्र से ही लगता है। शास्त्र ही कहता है कि जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी रक्षा धर्म करता है -- 'धर्मो रक्षति रक्षितः' (मनुस्मृति)। जो धर्म का पालन करता है, उसके कल्याण का भार धर्म पर और धर्म के उपदेष्टा भगवान्, वेदों, शास्त्रों, ऋषियों-मुनियों आदि पर होता है; तथा उन्हीं की शक्ति से उसका कल्याण होता है।​ जैसे धर्म का पालन करने के लिये भगवान्, वेद, शास्त्रों, ऋषि-मुनियों और संत-महात्माओं की आज्ञा है, इसलिये धर्म-पालन करते हुए मरने पर उन की शक्ति से ही कल्याण होता है। भगवान कहते हैं --
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥२:४०॥"
अर्थात् - इस में क्रमनाश और प्रत्यवाय दोष नहीं है। इस धर्म (योग) का अल्प अभ्यास भी महान् भय से रक्षण करता है॥
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उपरोक्त श्लोक की व्याख्या में अनेक महान भाष्यकारों ने अपनी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा का उपयोग किया है। भगवान की ओर चलोगे तो उनकी परम कृपा होगी। तभी हम इसका सही अर्थ समझ पाएंगे। सार की बात यह है कि भगवत्-प्राप्ति ही हमारा स्वधर्म है , और उसका पालन ही इस संसार के महाभय से हमारी रक्षा करता है।
सभी महान आत्माओं और महापुरुषों का नमन !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ अक्तूबर २०२३