Friday, 27 December 2024

सुखी कौन ? .....

 सुखी कौन ? .....

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जो प्रभु से सब के कल्याण की प्रार्थना करता है, जो सब को सुखी और निरामय देखना चाहता है, सिर्फ वही सुखी है| प्रभु की सब संतानें यदि सुखी हों तभी हम सुखी हो सकते हैं, अन्यथा नहीं|
सुखी होना एक मानसिक अवस्था है, कोई उपलब्धि नहीं| सुखी होना एक यात्रा है, गंतव्य नहीं| सुखी होना वर्तमान में है, भविष्य में नहीं| सुखी होना एक निर्णय है, परिस्थिती नहीं| सुखी होना स्वयं में स्थित होना है, दिखावे में नहीं|
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संसार को हम स्वयं को बदल कर और स्वयं के दृढ़ संकल्प से ही बदल सकते हैं, अन्यथा नहीं| किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखें और स्वयं का सर्वश्रेष्ठ करें|
सब से बड़ा कार्य जो कोई मेरी दृष्टी में कर सकता है वह है कि हम निरंतर प्रभु को प्रेम करें और उन्हीं को समर्पित होने की निरंतर साधना करें| इससे सब का कल्याण होगा|
सभी को शुभ कामनाएँ और सप्रेम नमन ! ॐ ॐ ॐ ||
२७ दिसंबर २०१५

फेसबुक और उससे प्राप्त संतुष्टि ....

 फेसबुक और उससे प्राप्त संतुष्टि ....

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मैं फेसबुक पर जिस उद्देश्य से आया था उस उद्देश्य को प्राप्त करने में पूर्ण रूप से सफल रहा हूँ और मुझे इस मंच से पूर्ण संतुष्टि है| मेरे अंतस में एक सुप्त कामना थी स्वयं को व्यक्त करने की, जो पूर्णरूपेण सफल रही है| इसके अतिरिक्त फेसबुक पर मुझे देश-विदेश के बड़े अद्भुत और ऐसे ऐसे आश्चर्यजनक मित्र मिले हैं जिनकी मैं अन्यथा कल्पना भी नहीं कर सकता था|
यह तो तब है जब कि मैं किसी भी तरह की chatting नहीं करता| फेसबुक को भी अब कम समय दे रहा हूँ और अन्य किसी भी social site पर नहीं हूँ| whatsapp आदि पर जाने की भी कोई कामना नहीं है|
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मैं अपने सभी मित्रों को नमन करता हुआ किसी का नाम विशेष तो नहीं लूँगा पर संकेत अवश्य करूंगा| मुझे मेरी रूचि के देश-विदेश के अनेक आध्यात्मिक मित्र मिले जिनसे बहुत अधिक प्रेरणा मिली है| अनेक शास्त्रज्ञ विद्वानों से परिचय और घनिष्ठता हुई जिनसे अन्यथा मिलना संभव ही नहीं था| उनसे विचार विमर्श और चर्चा कर के पूर्ण संतुष्टि मिली| मुझे उनसे बहुत अधिक बौद्धिक और मानसिक सहायता भी मिली जिसे मैं उपलब्धि मानता हूँ| बौद्धिक धरातल पर कई शंकाएं थीं वे भी दूर हुईं|
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सबसे बड़ी सफलता तो यह मिली कि फेसबुक मेरे लिए अब एक सत्संग का माध्यम बन गया है| बड़ा अच्छा सत्संग हो रहा है|
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आप सब में हृदयस्थ प्रभु को प्रणाम | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
२७ दिसंबर २०१५

'कर्मन की गति न्यारी' ---

 'कर्मन की गति न्यारी' ---

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मनुष्य देह में ग्यारह छिद्र हैं जिनसे जीवात्मा का मृत्यु के समय शरीर से निकास होता है --- दो आँख, दो कान, दो नाक, एक पायु, एक उपस्थ, एक नाभि, एक मुख और एक मूर्धा|
यह मूर्धा वाला मार्ग अति सूक्ष्म है और पुण्यात्माओं के लिए ही है| इसमें जीवात्मा ब्रह्मरंध्र से निकलती है और उसकी सदगति होती है|
नर्कगामी जीव पायु यानि गुदामार्ग से बाहर निकलता है| उसकी बड़ी दुर्गति होती है|
कामुक व्यक्ति मुत्रेंद्रियों से निकलता है और निकृष्ट योनियों में जाता है|
नाभि से निकलने वाला प्रेत बनता है|
भोजन लोलूप व्यक्ति मुँह से निकलता है, गंध प्रेमी नाक से, संगीत प्रेमी कान से,
और तपस्वी व्यक्ति आँख से निकलता है|
अंत समय में जहाँ जिसकी चेतना है वह उसी मार्ग से निकलता है और सब की अपनी अपनी गतियाँ हैं|
जो ब्राह्मण संकल्प कर के और दक्षिणा लेकर भी यज्ञादि अनुष्ठान विधिपूर्वक नहीं करते/कराते वे ब्रह्मराक्षस बनते हैं|
मद्य, मांस और परस्त्री का भोग करने वाला ब्राह्मण ब्रह्मपिशाच बनता है|
इस तरह कर्मों के अनुसार अनेक गतियाँ हैं| कर्मों का फल सभी को मिलता है, कोई इससे बच नहीं सकता|
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गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि अंतकाल में भ्रूमध्य में ओंकार का स्मरण करो, निज चेतना को कूटस्थ में रखो आदि| अनेक महात्मा कहते हैं मूर्धा में ओंकार का निरंतर जप करो| योगी लोग कहते हैं कि आज्ञाचक्र के प्रति सजग रहो और ब्रह्मरंध्र में ओंकार का जप करो| इन सब के पीछे कारण हैं|
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हमारा हर विचार एक कर्म है जो हमारे खाते में जुड़ जाता है| हम जो कुछ भी हैं, वह अपने प्रारब्ध कर्मों से हैं, और भविष्य में जो कुछ भी बनेंगे, वह अपने संचित कर्मों से बनेंगे| मृत्यु के समय मनुष्य के सारे कर्म उसके सामने आ जाते हैं, और उसके अगले जन्म की भूमिका बन जाती है| अंत समय में जैसी मति होती है वैसी ही गति होती है| कर्मों की गति बड़ी विचित्र होती है|
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सबसे बुद्धिमानी का कार्य है परमात्मा से परम प्रेम, निरंतर स्मरण का अभ्यास और ध्यान|
सूरदास जी का एक प्रसिद्ध भजन है ---
"ऊधौ, कर्मन की गति न्यारी।
सब नदियाँ जल भरि-भरि रहियाँ सागर केहि बिध खारी॥
उज्ज्वल पंख दिये बगुला को कोयल केहि गुन कारी॥
सुन्दर नयन मृगा को दीन्हे बन-बन फिरत उजारी॥
मूरख-मूरख राजे कीन्हे पंडित फिरत भिखारी॥
सूर श्याम मिलने की आसा छिन-छिन बीतत भारी॥"
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सभी को शुभ कामनाएँ | ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ दिसंबर २०२०

एक ही तड़प है मन में -- भगवान के निष्ठावान ज्ञानी भक्तों के दर्शन हों, परमात्मा में निजात्मा का विलय पूर्ण हो ---

 एक ही तड़प है मन में -- भगवान के निष्ठावान ज्ञानी भक्तों के दर्शन हों। परमात्मा में निजात्मा का विलय पूर्ण हो।

ईशावास्योपनिषद के पश्चात केनोपनिषद के आरंभ में ही अटक गया हूँ। आगे बढ़ने का और मन ही नहीं करता। भगवान में ही स्थिति हो गयी है। भगवान की जो छवि मेरे समक्ष आई है, वह अति मनभावन है। उसी में समर्पित होकर यह सारा जीवन कट जाए। और कुछ भी नहीं चाहिए।
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कोई मोक्ष नहीं, कोई मुक्ति नहीं, कोई ज्ञान नहीं, कुछ भी नहीं चाहिए। अब शब्दों का कोई महत्व नहीं रहा है। भगवान सब शब्दों से परे अवर्णनीय हैं। कुछ भी अब और पढ़ने की इच्छा नहीं है। उनकी इस अवर्णनीय छवि में ही मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व विलीन हो जाए। एक ही तड़प है मन में -- भगवान के निष्ठावान ज्ञानी भक्तों के दर्शन हों। परमात्मा में निजात्मा का विलय पूर्ण हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ दिसंबर २०२२

Thursday, 26 December 2024

उपनिषदों के स्वाध्याय में बड़ा आनंद है, पूरा ब्रह्मज्ञान है उनमें ---

उपनिषदों के स्वाध्याय में बड़ा आनंद है। पूरा ब्रह्मज्ञान है उनमें। लेकिन मुझ में भावुकता बहुत अधिक है, भक्ति की जरा-जरा सी बातों पर भावुक हो जाता हूँ। भावुकता में कभी ध्यानस्थ हो जाता हूँ, और कभी आँखों से आंसुओं की झड़ी लग जाती है। सब लोग पूछते हैं कि रो क्यों रहे हो? मेरा एक ही उत्तर होता है कि "बहुत तेज जुकाम लगी हुई है"। आजकल तो भक्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ समझ में भी नहीं आता, और अच्छा भी नहीं लगता। मेरा स्वभाव भक्ति-प्रधान है। अनेक ऐसे विषय हैं जो अभी समझ में आ रहे हैं।

दो प्रश्न हैं जिनका मैं अति संक्षिप्त में उत्तर देना चाहता हूँ।
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(प्रश्न १) मुझे भारत से प्रेम क्यों है ?
(उत्तर) भारत में ही हर काल-खंड में धर्म व परमात्मा की सर्वोत्तम व सर्वोच्च अभिव्यक्ति हुई है। ईश्वर के सभी अवतारों ने भारत में ही जन्म लिया है। भारत -- त्यागी तपस्वियों, संत महात्माओं, व विरक्त ज्ञानियों की भूमि रहा है। धर्म का प्रचार प्रसार व ज्ञान भारत से ही विश्व को हुआ है। परमात्मा से अहेतुकी परम प्रेम (सम्पूर्ण भक्ति), व अनन्य भक्ति की अवधारणा -- विश्व को भारत की ही देन है।
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(प्रश्न २) मुझे परमात्मा से प्रेम क्यों है?
(उत्तर) इसका कोई उत्तर नहीं है। यह जन्मजात है। भगवान से भक्ति (परमप्रेम) मेरा स्वभाव है। यह परमात्मा की मुझ पर विशेष कृपा है।
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(प्रश्न ३) मुझे सनातन-धर्म से प्रेम क्यों है?
(उत्तर) सनातन धर्म ही एकमात्र धर्म है जो हमें परमात्मा की प्राप्ति ही नहीं, उनके साथ एक कर भी सकता है। धर्म के दस लक्षण हैं, जिन को धारण करने से अभ्युदय (सर्वतोमुखी पूर्ण विकास) और निःश्रेयस (सब तरह के दुःखों और पीड़ाओं से मुक्ति) की सिद्धि होती है। यह धर्म सृष्टि के आदि काल से ही शाश्वत और सनातन है। लिखने को और भी बहुत कुछ है, लेकिन इस समय इतना ही पर्याप्त है।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ दिसंबर २०२२

Wednesday, 25 December 2024

दो अति महान व्यक्तित्व जिनकी तत्कालीन शासकों ने उनकी सत्यनिष्ठ विचारधारा के कारण सदा उपेक्षा ही की, और वे बिना किसी सरकारी मान्यता के Unsung Heros की तरह हमारे मध्य से चले गए ---

 दो अति महान व्यक्तित्व जिनकी तत्कालीन शासकों ने उनकी सत्यनिष्ठ विचारधारा के कारण सदा उपेक्षा ही की, और वे बिना किसी सरकारी मान्यता के Unsung Heros की तरह हमारे मध्य से चले गए ---

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(१) मेरी दृष्टि में इस शताब्दी में वैदिक परंपरा के महानतम दार्शनिक -- स्व.श्री रामस्वरूप अग्रवाल (१९२० - २६ दिसंबर १९९८) थे। उनसे बड़ा कोई दार्शनिक भारत में पिछली एक शताब्दी में कोई दूसरा नहीं हुआ। वे अपने नाम के साथ अग्रवाल नहीं लिखते थे, सिर्फ रामस्वरूप ही लिखते थे। उनका जन्म सं १९२९ में हरियाणा के सोनीपत में एक गर्ग गौत्रीय अग्रवाल परिवार में हुआ था। वे जीवन भर अविवाहित रहे। दिल्ली में उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया, लेकिन सारा जीवन धर्म, ज्ञान, और सामाजिक चिंतन में ही व्यतीत किया। वे एक बहुत ही उच्च स्तर के महान योगसाधक भी थे।
उनका निधन २६ दिसंबर १९९८ को हुआ। आज उनकी २४ वीं पुण्यतिथि पर उनको सादर नमन और श्रद्धांजलि।
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उनके प्रमुख शिष्य श्री सीताराम गोयल (१६ अक्टूबर १९२१ - ३ दिसंबर २००३) थे, जिन्हें मैं इस शताब्दी का महानतम इतिहासकार कहता हूँ। इनका जन्म भी हरियाणा में हुआ था। सन १९५१ से १९९८ तक श्री सीताराम गोयल ने ३० से अधिक पुस्तकें और सैंकड़ों लेख लिखे। बेल्जियन विद्वान कोएनराड एल्स्ट ने लिखा है कि गोयल की बातों का या उनकी पुस्तकों में दिए तथ्यों का आज तक कोई खंडन नहीं कर सका है।
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वर्तमान में भारतीयता के प्रति जो इतनी सजगता देखने में आ रही है, उसका श्रेय मैं श्री गोयल के लेखन को देता हूँ। वे एक महान कर्मयोगी थे। दिल्ली में उन्होंने "वॉयस ऑफ इंडिया" नाम के प्रकाशन की स्थापना की, जो अभी भी चल रहा है। उपरोक्त दोनों महान विभूतियों का साहित्य वहीं पर उपलब्ध है।
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श्री रामस्वरूप जी का पुण्य स्मरण स्वयं में एक पुण्य कर्म है। उन्हें शत शत नमन।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२६ दिसंबर २०२२

भगवान के भजन के लिए यह मौसम बहुत अच्छा है (बुढ़ापा सबसे खराब चीज है)

 भगवान के भजन के लिए यह मौसम बहुत अच्छा है (बुढ़ापा सबसे खराब चीज है)

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"दुनिया भी अजब सराय फानी देखी,
हर चीज यहां की आनी जानी देखी।
जो आके ना जाये वो बुढ़ापा देखा,
जो जा के ना आये वो जवानी देखी।।"
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पिछले दो दिनों से बड़ी भयंकर शीत-लहर चल रही है। बाहर बर्फीली हवाएँ चल रही हैं। पहाड़ों में बर्फ गिरती है तो भौगोलिक कारणों से उनकी शीत लहर सीधी इधर ही आती है।
Electric Room Heater का उपयोग शयन कक्ष में करना पड़ रहा है। इटली की हमारी एक सत्संगी बहिन ने एक बिजली से गरम होने वाली गद्दी भी भेज रखी है, जिसे बिस्तर की चद्दर के नीचे लगाते ही बिस्तर गरम हो जाता है। बुढ़ापे में सर्दी सहन नहीं होती। यह बुढ़ापा बहुत खराब चीज है।
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यमराज भी सर्दी के मौसम में ही बड़े-बूढ़ों पर अपनी परम कृपा करते हैं। अभी उनकी कृपा नहीं चाहिए। कुछ भजन-बंदगी-साधना-तपस्या तो की ही नहीं है, इसलिए यम महाराज का यहाँ क्या काम? जब भगवान के भजनों से हृदय तृप्त हो जाएगा, तब भगवान के संकेत मात्र से यह संसार छोड़ देंगे। यमराज महाराज इधर आने का कष्ट न उठायें। वैसे भी उनका यहाँ स्वागत नहीं है -- "चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥"
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर पाहि माम्।
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्ष माम्॥
रत्नसानुशरासनं रजताद्रिश्रृङ्गनिकेतनं
शिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युतानलसायकम् ।
क्षिप्रदग्धपुरत्रयं त्रिदशालयैरभिवन्दितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः।।"
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दिन-रात भगवान का चिंतन हो। अन्य कोई बात चेतना में न रहे। तब बाहर के मौसम से कोई अंतर नहीं पड़ेगा। भगवान का चिंतन करते करते ही उनकी चेतना में ब्रह्मरंध्र के मार्ग से सूर्यमंडल में एक दिन गमन हो जायेगा।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ दिसंबर २०२२