Friday, 29 November 2024

हे श्रीकृष्ण, हे गोविंद, हे नारायण, हे वासुदेव, तुम्हीं मेरे जीवन हो ---

 हे श्रीकृष्ण, हे गोविंद, हे नारायण, हे वासुदेव, तुम्हीं मेरे जीवन हो ---

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"ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥"
"वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात्। पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात्।
पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्। कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥"
"वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनं, देवकी परमानन्दं कृष्णम वन्दे जगतगुरुम्॥"
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भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के माध्यम से विश्व को जो संदेश दिया है, उससे लाखों करोड़ों व्यक्ति जन्म-मृत्यु के बंधनों से मुक्त हो चुके हैं। हमारे जीवन का लक्ष्य है आत्म-साक्षात्कार यानि भगवान पुरुषोत्तम जिन्हें हम परमब्रह्म, परमशिव, श्रीहरिः, व परमात्त्मा भी कहते हैं, के साथ साक्षात्कार/अभेद।
जो भी हमारे इस लक्ष्य में बाधक बने और हमारे अहंकार व लोभ को उद्दीप्त कर के हमें भटकाये, वह कभी हमारा मित्र नहीं हो सकता। हमें स्वयं को ही स्वयं का मित्र बनाना पड़ेगा क्योंकि हम स्वयं ही स्वयं के शत्रु भी हैं। भगवान कहते हैं --
"उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥६:५॥"
अर्थात् -- मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये और अपना अध:पतन नहीं करना चाहिये; क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा (मनुष्य स्वयं) ही आत्मा का (अपना) शत्रु है॥
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गीता में भगवान का एक बड़े से बड़ा आश्वासन है --
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥९:३०॥"
अर्थात् -- यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है॥
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एक बहुत बड़ी बात कही है भगवान ने --
"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१८:१७॥"
अर्थात् -- जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है।।
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इसी भाव में स्थित होकर हम अपने शत्रुओं का नाश करें। कोई पाप हमें छू भी नहीं सकता। भगवान कहते हैं --
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात् - मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥
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आज अभी इतना ही बहुत है। भगवान की वाणी पढ़कर और सुनकर मैं और मेरा जीवन धन्य हुआ। जिधर भी देखता हूँ, उधर ही मेरे उपास्य ही उपास्य देव है। सब ओर वे ही वे हैं। मन-मयूर प्रसन्न होकर नृत्य कर रहा है। हे सच्चिदानंद, आपकी जय हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३० नवंबर २०२२

हमारे अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) में भगवान स्वयं हैं ---

 हमारे अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) में भगवान स्वयं हैं। वे कभी हमसे दूर हो ही नहीं सकते। हमारा लोभ और अहंकार ही हमें भगवान से दूर करता है। अहंकार के भी दो रूप होते हैं। एक हमें भगवान से दूर करता है, दूसरा हमें भगवान से जोड़ता है।

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ईश्वर की कृपा सभी पर हर समय समान रूप से है। हमारे कर्म यानि हमारी सोच ही हमें ईश्वर से दूर करती है। हम यदि सोचते हैं कि भगवान दूर हैं, तो वास्तव में भगवान दूर होते हैं। जब हम सोचते हैं कि भगवान बिल्कुल पास में हैं, तो भगवान सचमुच ही हमारे पास होते हैं। कहने को तो बहुत सारी बातें विद्वान मनीषियों द्वारा लिखी हुई हैं, लेकिन जो स्वयं के अनुभव हैं, स्वयं की अनुभूतियाँ हैं वे ही सत्य होती हैं।
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मनुष्य की प्राकृतिक मृत्यु अपनी स्वयं की इच्छा से होती है, किन्हीं अन्य कारणों से नहीं। जब मनुष्य अपनी वृद्धावस्था, बीमारी, दरिद्रता, या कष्टों से दुखी होकर स्वयं से कहता है कि बस बहुत हो गया, अब और जीने की इच्छा नहीं है, तब वह अपनी मृत्यु को स्वयं निमंत्रण दे रहा होता है। उसी समय से उसकी मृत्यु की प्रक्रिया भी आरंभ हो जाती है। जब वह स्वयं को भगवान से जोड़कर सोचता है कि मृत्यु इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती तो वास्तव में मृत्यु उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती।
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जो हमारे हाथ में है वह ही विधि के हाथ में है। भगवान हमारे से पृथक नहीं, हमारे साथ एक हैं। भगवान वही सोचते हैं, जो हम सोचते हैं। हमारा लोभ और अहंकार ही हमें भगवान से दूर करता है, अन्यथा हम भगवान के साथ एक हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३० नवंबर २०२३

निज जीवन में पूर्णता को प्राप्त किए बिना तृप्ति और संतुष्टि नहीं मिलती। लेकिन पूर्णता को हम कैसे प्राप्त हों? ---

 "ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते।

पूर्णश्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥"
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(प्रश्न) : निज जीवन में पूर्णता को प्राप्त किए बिना तृप्ति और संतुष्टि नहीं मिलती। लेकिन पूर्णता को हम कैसे प्राप्त हों?
(उत्तर) : हमारी अंतर्रात्मा कहती है कि जिन का कभी जन्म भी नहीं हुआ, और मृत्यु भी नहीं हुई, उनके साथ जुड़ कर ही हम पूर्ण हो सकते हैं।
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(प्रश्न) : लेकिन वे हैं कौन?
(उत्तर) : जिनकी हमें हर समय अनुभूति होती है, वे परमब्रह्म परमशिव परमात्मा ही पूर्ण हो सकते हैं। उन को उपलब्ध होने के लिए ही हमने जन्म लिया है। जब तक उनमें हम समर्पित नहीं होते, तब तक यह अपूर्णता रहेगी॥
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(प्रश्न) : उन्हें हम समर्पित कैसे हों ?
(उत्तर) : एकमात्र मार्ग है -- परमप्रेम, पवित्रता और उन्हें पाने की एक गहन अभीप्सा। अन्य कोई मार्ग नहीं है। जब इस मार्ग पर चलते हैं, तब परमप्रेमवश वे निरंतर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२९/११/२०२४

Thursday, 28 November 2024

ईश्वर से कुछ मांगना क्या उनका अपमान नहीं है ---

ईश्वर से कुछ मांगना क्या उनका अपमान नहीं है? हम तो यहाँ उनका दिया हुआ सामान उनको बापस लौटाना चाहते हैं। उनका दिया हुआ सबसे बड़ा सामान है -- हमारा अन्तःकरण। यदि वे हमारा अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, और अहंकार) स्वीकार कर लें तो उसी क्षण हम उन्हें उपलब्ध हो जाते हैं। यह समर्पण का मार्ग ही सर्वश्रेष्ठ है। बाकी तो व्यापार है कि हम तुम्हारी यह साधना करेंगे, वह साधना करेंगे, और तुम हमें वह सामान दोगे।

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वे हमारे हृदय में बिराजमान हैं, क्या उन्हें पता नहीं है कि हमें क्या चाहिये? उन्हें सब पता है। वे बिना किसी शर्त के हमारा सिर्फ प्यार मांगते हैं, जो हम उन्हें देना नहीं चाहते। इस समय यह संसार अपने लोभ, लालच और अहंकार रूपी तमोगुण से चल रहा है। यहाँ तो स्वयं को गोपनीय रखो और चुपचाप उनसे प्रेम करो। अपने हृदय की बात कहना लोगों से दुश्मनी लेना है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ नवम्बर २०२४

साधु, सावधान !! भटक रहे हो, अभी भी समय है, स्वयं को सुधार लो, अन्यथा पछताना पड़ेगा ---

साधु, सावधान !! भटक रहे हो, अभी भी समय है, स्वयं को सुधार लो, अन्यथा पछताना पड़ेगा ---

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स्थितप्रज्ञता -- एक बहुत बड़ा गुण और आवश्यकता है जिसमें प्रज्ञा परमात्मा में निरंतर स्थिर रहती है। स्थितप्रज्ञता और ब्राह्मीस्थिति दोनों लगभग एक ही हैं। स्थितप्रज्ञता के लिए वीतरागता यानि राग-द्वेष और अहंकार से मुक्त होना आवश्यक है। गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने स्थितप्रज्ञता पर बहुत ज़ोर दिया है। नित्य नियमित ध्यान-साधना से एक साधक स्वतः ही वीतराग हो जाता है। वीतराग होना प्रथम उपलब्धि है। यदि हम अभी भी राग-द्वेष और अहंकार से ग्रस्त हैं, तो हमने आध्यात्मिक साधना के क्षेत्र में कोई प्रगति नहीं की है।
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(प्रश्न) : जब भगवान स्वयं ही कर्ता और भोक्ता हैं, और हम एक निमित्त मात्र हैं, तो एक निमित्त द्वारा यह ऊहापोह क्यों?
(उत्तर) : माया के बंधन और आकर्षण बड़े प्रबल हैं। भगवान हमारी रक्षा निश्चित रूप से करेंगे। अपनी चेतना अपने लक्ष्य कूटस्थ की ओर ही रखो, उसी का आश्रय लो, उसी के चैतन्य में रहो, और उसी को अपना सर्वस्व समर्पित कर दो। इधर-उधर अन्य कुछ भी मत देखो। उनमें बड़ी गहराई से स्थित होकर ही हम निमित्त बन सकते हैं।
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अतः साधू, सावधान !! भटको मत। निरंतर शिव भाव में रहो। इस मानवी चेतना से स्वयं को मुक्त कर लो। अन्यथा बाद में पछताना पड़ेगा॥
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ नवंबर २०२४

हमारा पीड़ित, दुःखी और बेचैन होना एक बहुत ही अच्छा और शुभ लक्षण है ---

 हमारा पीड़ित, दुःखी और बेचैन होना एक बहुत ही अच्छा और शुभ लक्षण है ---

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अपनी पीड़ा, दुःख और बेचैनी से मुक्त होने की कामना -- भगवान की भक्ति का आरंभ है। जीवन में जो भी अभाव हैं उनकी पूर्ति सिर्फ भगवान की उपस्थिति ही कर सकती है। "संतोष" और "आनंद" दोनों ही हमारे स्वभाव हैं जिनकी प्राप्ति "परम प्रेम" (भक्ति) से ही हो सकती है। हमारे दुःख, पीडाएं और बेचैनी ही हमें भगवान की ओर जाने को बाध्य करते हैं। अगर ये नहीं होंगे तो हमें भगवान कभी भी नहीं मिलेंगे। अतः दुनिया वालो, दुःखी ना हों। भगवान से खूब प्रेम करो, प्रेम करो और पूर्ण प्रेम करो। सारे दुःख दूर हो जाएंगे। हम को सब कुछ मिल जायेगा, स्वयं प्रेममय बन जाओ। अपना दुःख-सुख, अपयश-यश , हानि -लाभ, पाप-पुण्य, विफलता-सफलता, बुराई-अच्छाई, जीवन-मरण यहाँ तक कि अपना अस्तित्व भी सृष्टिकर्ता को बापस सौंप दो। आगे आनंद ही आनंद है।
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जिस नारकीय जीवन को तुम जी रहे हो, उस से तो अच्छा है कि अपने सारे अभाव, दुःख और पीड़ाएं -- बापस भगवान को सौंप दो। "प्रेम" ही भगवान का स्वभाव है। हम एक ही चीज भगवान को दे सकते हैं और वह है हमारा "प्रेम"। भगवान को प्रेम करने में कंजूसी क्यों?
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ नवंबर २०२२

Wednesday, 27 November 2024

आज की दुनियाँ में किसी भी व्यक्ति को बहुत सीधा-साधा और सत्य/धर्मनिष्ठ नहीं दिखना चाहिए ---

आज की दुनियाँ में किसी भी व्यक्ति को बहुत सीधा-साधा और सत्य/धर्मनिष्ठ नहीं दिखना चाहिए। भीतर से सीधे-साधे और सत्य/धर्मनिष्ठ रहो, लेकिन अपनी सत्य/धर्मनिष्ठा को छिपा कर रखो। बाहर से ऐसे रहो कि देखने वाला आपको एक बहुत खतरनाक और जहरीला इंसान समझे। आज की दुनियाँ और समाज ही ऐसे हैं। सीधे-साधे और धर्मनिष्ठ व्यक्ति को सबसे अधिक छला, ठगा और परेशान किया जाता है। सीधे वृक्ष और सीधे व्यक्ति पहले काटे जाते हैं। वर्तमान समाज में यदि जीवित रहना है तो दुष्ट और कुटिल होने का झूठा दिखावा करना ही होगा।

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हर कार्य बहुत अच्छी तरह सोच-समझ कर करो। यदि आप के पास धन है तो धार्मिक होने का दिखावा कर के ठग लोग ही आपके पास आप को छलने आएंगे। वे महिलाएं भी हो सकती हैं और पुरुष भी। उनको पहिचानो। विपरीत सेक्स से दूरी रखो और सावधान रहो। भगवान ने हमें विवेक दिया है, उसके प्रकाश में सारे कार्य करो। यह मैं बहुत जिम्मेदारी और अपने अनुभव से लिख रहा हूँ।
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जिन्होंने मेरे साथ छल और विश्वासघात किया है, उन्होने वह भगवान के साथ ही किया है। मेरे साथ जिन्होंने उपकार किया है, वह भी भगवान के साथ ही किया है। मेरे साथ बहुत अधिक छल हुआ है। मैं नहीं चाहता कि और भी कोई छला जाये।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२८ नवंबर २०२२