Monday, 25 April 2022

खेचरी मुद्रा ----

खेचरी मुद्रा ----

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ओ३म नमः शिवाय विष्णुरूपाय शिवरूपाय विष्णवे| शिवस्य हृदयं विष्णु: विष्णोश्च हृदयं शिव:||
ओ३म मुनीन्द्रगुह्यं परिपूर्णकामं कलानिधिं कल्मषनाश हेतुं |
परात्परं यत्परं पवित्रं नमामि शिवम् महतो महान्तम्||
नमामि शिवं महतो महान्तं| नमामि रामं महतो महान्तम्||
मैं पूर्व में अनेक आध्यात्मिक चर्चाएँ कर चुका हूँ| गुरु तत्व पर चर्चा के पश्चात अन्य किसी भी आध्यात्मिक विषय पर और चर्चा नहीं करूंगा| मेरे लिए उससे बड़ा कोई अन्य विषय नहीं है|
अब बापस साधनों की ओर लौटता हूँ|
हमारे महान पूर्वज भौतिक सूर्य की नहीं बल्कि स्थूल सूर्य की ओट में जो सूक्ष्म भर्गज्योति: है उसकी उपासना करते थे| उसी ज्योति के दर्शन ध्यान में कूटस्थ (आज्ञाचक्र और सहस्रार) में भी सर्वदा होते हैं|
इस लिए भी ध्यान साधना की जाती है|
ध्यान में सफलता के लिए हमें इन का होना आवश्यक है:-----
(1) भक्ति यानि परम प्रेम|
(2) परमात्मा को उपलब्ध होने की अभीप्सा|
(3) दुष्वृत्तियों का त्याग|
(4) शरणागति और समर्पण|
(5) आसन, मुद्रा और यौगिक क्रियाओं का ज्ञान|
(6) दृढ़ मनोबल और बलशाली स्वस्थ शरीर रुपी साधन|
खेचरी मुद्रा बहुत महत्वपूर्ण है जिसकी चर्चा हम क्रमशः करेंगे|
वेदों में 'खेचरी शब्द का कहीं उल्लेख नहीं है|
वेदिक ऋषियों ने इस प्रक्रिया का नाम दिया -- 'विश्वमित्'|
'खेचरी' का अर्थ है --- ख = आकाश, चर = विचरण| अर्थात आकाश यानि प्रकाशवान या ज्योतिर्मय ब्रह्म तत्व में विचरण| जो बह्म तत्व में विचरण करता है वही साधक खेचरी सिद्ध है| परमात्मा के प्रति परम प्रेम और शरणागति हो तो साधक परमात्मा को स्वतः उपलब्ध हो जाता है पर प्रगाढ़ ध्यानावस्था में देखा गया है की साधक की जीभ स्वतः उलट जाती है और खेचरी व शाम्भवी मुद्रा अनायास ही लग जाती है| ध्यान साधना में तीब्र प्रगति के लिए खेचरी मुद्रा का ज्ञान अति आवश्यक है|
दत्तात्रेय संहिता और शिव संहिता में खेचरी मुद्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है|
तीन-चार दिनों में हम नित्य इसकी चर्चा और पूरी सरल विधि और महिमा का वर्णन करेंगे|
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शिव संहिता में खेचरी की महिमा इस प्रकार है :-----
करोति रसनां योगी प्रविष्टाम् विपरीतगाम्|
लम्बिकोरर्ध्वेषु गर्तेषु धृत्वा ध्यानं भयापहम्||
एक योगी अपनी जिव्हा को विपरीतागामी करता है, अर्थात जीभ की तालुका में जीभ को बिठाकर ध्यान करने बैठता है, उसके हर प्रकार के कर्म बंधनों का भय दूर हो जाता है|
योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय खेचरी मुद्रा के लिए कुछ योगियों के सम्प्रदायों में प्रचलित छेदन, दोहन आदि पद्धतियों के सम्पूर्ण विरुद्ध थे| वे एक दूसरी ही पद्धति पर जोर देते थे जिसे 'तालब्य क्रिया' कहते हैं| इसमें मुंह बंद कर जीभ को ऊपर के दांतों व तालू से सटाते हुए जितना पीछे ले जा सकते हैं उतना पीछे ले जाते हैं| फिर मुंह खोलकर झटके के साथ जीभ को जितना बाहर फेंक सकते हैं उतना फेंक कर बाहर ही उसको जितना लंबा कर सकते हैं उतना करते हैं|
इस क्रिया को नियमित रूप से दिन में कई बार करने से कुछ महीनों पश्चात जिव्हा स्वतः लम्बी होने लगती है और गुरु कृपा से खेचरी मुद्रा स्वतः सिद्ध हो जाती है| योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी जी मजाक में इसे ठोकर क्रिया भी कहते थे|
लाहिड़ी महाशय ध्यान करते समय खेचरी मुद्रा पर बल देते थे| जो इसे नहीं कर सकते थे उन्हें भी वे ध्यान करते समय जीभ को ऊपर की ओर मोड़कर तालू से सटा कर बिना तनाव के जितना पीछे ले जा सकते हैं उतना पीछे ले जा कर रखने पर बल देते थे|
तालब्य क्रिया एक साधना है और खेचरी सिद्ध होना गुरु का प्रसाद है|
जब योगी को खेचरी मुद्रा सिद्ध हो जाती है तब उसकी गहन ध्यानावस्था में सहस्त्रार से एक रस का क्षरण होने लगता है| सहस्त्रार से टपकते उस रस को जिव्हा के अग्र भाग से पान करने से योगी दीर्घ काल तक समाधी में रह सकता है, उस काल में उसे किसी आहार की आवश्यकता नहीं पड़ती, स्वास्थ्य अच्छा रहता है और अतीन्द्रीय ज्ञान प्राप्त होने लगता है|
खेचरी मुद्रा की साधना की एक और वैदिक विधि है| पद्मासन में बैठकर जीभ को ऊपर की ओर मोड़कर ऋग्वेद के एक विशिष्ट मन्त्र का उच्चारण सटीक छंद के अनुसार करना पड़ता है| उस मन्त्र में वर्ण-विन्यास कुछ ऐसा होता है कि उसके सही उच्चारण से जो कम्पन होता है उस उच्चारण और कम्पन के नियमित अभ्यास से खेचरी मुद्रा स्वतः सिद्ध हो जाती है|
मुझे उस मन्त्र का ज्ञान नहीं है अतः उस पर चर्चा नहीं करूंगा|
भगवान् दत्तात्रेय के अनुसार----
अन्तःकपालविवरे जिव्हां व्यावृत्तः बंधयेत्|
भ्रूमध्ये दृष्टिरपोषा मुद्राभवति खेचरी||
अर्थात जिव्हा को पलटकर मस्तक-छिद्र के अभ्यंतर में पहुंचाकर भ्रूमध्य में दृष्टी को स्थापित करना खेचरी मुद्रा है|
यह तो भौतिक स्तर पर की जाने वाली साधना है जो ध्यान योग में तीब्र प्रगति के लिए आवश्यक है| पर आध्यात्मिक रूप से खेचरी सिद्ध वही है जो आकाश अर्थात ज्योतिर्मय ब्रह्म में विचरण करता है| साधना की आरंभिक अवस्था में साधक प्रणव ध्वनी का श्रवण और ब्रह्मज्योति का आभास तो पा लेता है पर वह अस्थायी होता है| उसमें स्थिति के लिए दीर्घ अभ्यास, भक्ति और समर्पण की आवश्यकता होती है|
भगवान दत्तात्रेय के अनुसार साधक यदि शिवनेत्र होकर यानि दोनों आँखों की पुतलियों को नासिका मूल (भ्रूमध्य के नीचे) के समीप लाकर, भ्रूमध्य में प्रणव यानि ॐ से लिपटी दिव्य ज्योतिर्मय सर्वव्यापी आत्मा का चिंतन करता है, उसके ध्यान में विद्युत् की आभा के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति प्रकट होती है| अगर ब्रह्मज्योति को ही प्रत्यक्ष कर लिया तो फिर साधना के लिए और क्या बाकी बचा रह जाता है|
कल से चल रही खेचरी मुद्रा पर चर्चा का आज समापन करता हूँ| योग साधक तो इसे सीखते ही हैं| जो साधक नहीं हैं उनकी भी रूचि जागृत हो इसके लिये यह चर्चा है|
कल कुछ सीमित मंचों पर महामुद्रा और योनिमुद्रा पर प्रस्तुति दूंगा| ॐ शिव|
२४ अप्रेल २०१३

Saturday, 23 April 2022

मेरे लिए 'कृपा' शब्द का अर्थ है -- कुछ करो और पाओ ---

 मेरे लिए 'कृपा' शब्द का अर्थ है -- कुछ करो और पाओ। बिना करे तो कुछ मिलेगा नहीं। ऐसा क्या करें जिस से इस जीवात्मा का कल्याण हो, और यह परमशिव को उपलब्ध हो?

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गुरु महाराज ने मार्ग दिखा दिया, सारे संदेह दूर कर दिये, परमशिव की अनुभूति भी करा दी, लेकिन बापस वहीं लाकर छोड़ दिया जहाँ से यात्रा आरंभ की थी। अब यह सारी यात्रा स्वयं को ही करनी होगी। भगवान ने कृपा कर के इस अकिंचन को एक निमित्त मात्र बना दिया है और कर्ता वे स्वयं बन गए हैं। यह भी गुरुकृपा से ही संभव हुआ है। देने के लिए मेरे पास प्रेम के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। सब कुछ तो उन्हीं का है। इस प्रेम पर भी उन्हीं का अधिकार है।
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सारे उपदेश, सारे सिद्धान्त और सारे नियम भूल चुका हूँ। मुझ अकिंचन को कुछ भी आता-जाता नहीं है। सामने कूटस्थ सूर्य मण्डल में साक्षात भगवान बैठे हुये हैं। पूर्ण एकाग्रता के साथ दृष्टि उन्हीं पर टिकी है। उन्हीं को देख रहा हूँ और उन्हीं को सुन रहा हूँ। यही मेरा कर्मयोग है, यही मेरा भक्तियोग है, यही मेरा ज्ञानयोग है, यही मेरा वेदपाठ है, और यही मेरा वेदान्त है। उन्हीं को देखते देखते और सुनते इस शरीर की आयु बीत जाए, और कुछ भी नहीं चाहिए।
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आगे से और कुछ लिखने की भी इच्छा अब नहीं रही है। जो लिखा गया सो लिखा गया। बस यही पर्याप्त है। हे गुरु महाराज, आपको नमन करता हूँ --
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च |
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||"
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ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२४ अप्रेल २०२२

अज़ान का उद्देश्य और अर्थ ---

यह मान्यता है कि सत्य को जानने, और अपनी सही जानकारी के लिए प्रत्येक हिन्दू को, अर्थ सहित अच्छी तरह समझ कर, जीवन में कम से कम एक बार, बाइबिल के old व सारे new Testaments, और कुरानशरीफ व अन्य सभी महत्वपूर्ण मज़हबों/पंथों के ग्रंथ अवश्य पढ़ने चाहियें। पढ़ कर उनकी तुलनात्मक विवेचना भी करनी चाहिए। तभी तो पता चलेगा कि इन में क्या लिखा है। कोई भी जानकारी प्रामाणिक होनी चाहिए, सुनी-सुनाई बातों से काम नहीं चलेगा। मैंने सभी का तुलनात्मक अध्ययन किया है।
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आज मैं मस्जिदों से दी जाने वाली अज़ान का उद्देश्य और अर्थ बता रहा हूँ| इस पर कोई भी प्रतिक्रिया अपने मन में ही रखें। मेरे फेसबुक पेज पर कोई नकारात्मक टिप्पणी न करें।
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रामदान (रमज़ान) का मुक़द्दस महीना चल रहा है (मंगलवार १३ अप्रेल २०२१ से बुधवार १२ मई २०२१)। मस्जिदों से अज़ान की बाँग दिन में पाँच बार ध्वनि-विस्तारक यंत्रों के माध्यम से बड़े जोर से दी जाती है। इस का अर्थ और उद्देश्य सभी को पता होना चाहिए। अज़ान इस तरह दी जाती है ---
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(१) अल्लाहु अकबर (चार बार)।
“अल्लाहु अकबर” का अर्थ होता है -- “अल्लाह महान है।"
(२) अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह (दो बार)।
“अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह” का अर्थ होता है “मैं गवाही देता हूँ; कोई उपास्य नहीं सिवाय अल्लाह के।”
(३) अशहदु अन्ना मुहमदन रसूल्लुल्लाह (दो बार)।
“अशहदु अन्ना मुहमदन रसूल्लुल्लाह” का अर्थ होता है “मैं गवाही देता हूँ; मुहम्मद साहब ही अल्लाह के रसूल (दूत) हैं।“
(४) हैया ‘अल-सलाह (दो बार)।
“हैया ‘अल-सलाह” का अर्थ होता है “आओ नमाज़ की तरफ़।“
(५) हैया ‘अलल फ़लाह (दो बार)।
“हैया ‘अलल फ़लाह” का अर्थ होता है “आओ सफ़लता की ओर।“
(६) अल्लाहु अकबर (दो बार)।
“अल्लाहु अकबर” का अर्थ होता है -- “अल्लाह महान है।"
(७) ला इलाहा इल्लल्लाह (एक बार)
“ला इलाहा इल्लल्लाह” का अर्थ होता है “कोई उपास्य नहीं सिवाय अल्लाह के।“
पुनश्च: --- सुबह की पहली नमाज़ में एक पंक्ति अधिक जोडते हैं शायद -- "अस्सलातु खैरूम मिनन्नउम्" अर्थात् - "सोने से अच्छा प्रार्थना करना है।" इसका मुझे ठीक से पता नहीं है।
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मेरा एकमात्र उद्देश्य किसी भी तथ्य को यथावत् बताना है, किसी की भी प्रशंसा या निंदा करना नहीं। धन्यवाद !! मेरे लिखने मे कोई भूल हुई है तो मनीषी लोग मुझे क्षमा करें।
२४ अप्रैल २०२१

शिव ही विष्णु हैं, और विष्णु ही शिव हैं ---

 "ॐ नमः शिवाय विष्णुरूपाय शिवरूपाय विष्णवे। शिवस्य हृदयं विष्णु: विष्णोश्च हृदयं शिव:॥"

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मनुष्य की बुद्धि जो ईश्वर की ऊंची से ऊंची परिकल्पना कर सकती है, वह शिव और विष्णु की है। तत्व रूप में दोनों एक हैं। शिव ही विष्णु हैं, और विष्णु ही शिव हैं। अतः हमें ध्यान शिव या विष्णु के विराट रूप का ही करना चाहिए। ध्यान में सफलता के लिए हमारे में इन बातों का होना आवश्यक है:---
(1) भक्ति यानि परम प्रेम।
(2) परमात्मा को उपलब्ध होने की अभीप्सा।
(3) दुष्वृत्तियों का त्याग।
(4) शरणागति और समर्पण।
(5) आसन, मुद्रा और यौगिक क्रियाओं का ज्ञान।
(6) दृढ़ मनोबल और बलशाली स्वस्थ शरीर रुपी साधन।
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ध्यान हमेशा परमात्मा के अनंत ज्योतिर्मय ब्रह्मरूप और नाद का होता है। हम बह्म-तत्व में विचरण और स्वयं का समर्पण करें, -- यही आध्यात्मिक साधना है। परमात्मा के प्रति परम प्रेम और शरणागति हो तो साधक परमात्मा को स्वतः ही उपलब्ध हो जाता है।
ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२४ अप्रेल २०२१

विद्वता का अहंकार -- हमारा सबसे बड़ा आंतरिक शत्रु है ---

 विद्वता का अहंकार -- हमारा सबसे बड़ा आंतरिक शत्रु है, जो हमारी शांति को छीन कर हमें निरंतर भटकाता है। इसे तुरंत भगवान को समर्पित कर देना चाहिये। गीता में भगवान हमें निष्काम, निःस्पृह, निर्मम, और निरहंकार होने का उपदेश देते हैं --

"विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति॥२:७१॥"
अर्थात् जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर स्पृहारहित, ममभाव रहित, और निरहंकार हुआ विचरण करता है, वह शान्ति को प्राप्त करता है॥
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अब प्रश्न यह उठता है कि-- निष्काम, निःस्पृह, निर्मम और निरहंकार कैसे हुआ जाये? ये तो विरक्त सन्यासी के ही सारे गुण हैं, जो यदि संकल्प मात्र से ही आ जायें तो सारे विश्व में ही शांति का साम्राज्य छा जाये। कामनाओं और भोगों को अशेषतः त्यागना एक अति-मानवीय कार्य है, जिसके लिए निरंतर सत्संग, ब्रहमनिष्ठ श्रौत्रीय सद्गुरु का मार्गदर्शन, कठोर नियमित आध्यात्मिक साधना, व दृढ़ मनोबल और बलशाली स्वस्थ शरीर रुपी साधन की आवश्यकता है।
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उपरोक्त सब होने पर भी एक बहुत बड़ी बाधा हमारा सूक्ष्म अहंकार है -- कुछ जानने का, कुछ होने का, व अपनी विद्वता और श्रेष्ठता का। इस सूक्ष्म अहंकार से मुक्त होने के लिए हमें अपनी अपरा और परा प्रकृति, दोनों को समझकर, इन दोनों से ऊपर उठना पड़ेगा। यहीं पर हमें मार्गदर्शन के लिए एक सद्गुरु की आवश्यकता है जो स्वयं ब्रहमनिष्ठ व श्रौत्रीय हो।
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जैसा मुझे समझ में आया है, उसके अनुसार हमारा जीवरूप -- परा प्रकृति है, और पञ्च-महाभूत व हमारा अंतःकरण -- अपरा प्रकृति है। इन दोनों से ही ऊपर उठना पड़ेगा। गीता में और रामचरितमानस के उत्तरकांड में इसे बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है, लेकिन फिर भी सद्गुरु आचार्य का मार्गदर्शन आवश्यक है।
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हम यह शरीर नहीं, एक शाश्वत आत्मा हैं, जिसका संबंध सिर्फ परमात्मा से है। हम अनन्य भक्ति द्वारा अपना अहं भाव त्याग कर परमात्मा से जुड़ें और गीता में बताई हुई ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त हों। अपने पाप-पुण्य और कर्मफल सब भगवान को बापस कर दें। हम पापी हों या पुण्यात्मा, अच्छे हों या बुरे, सदा परमात्मा के साथ एक हैं। पाप और पुण्य -- हमें छू भी नहीं सकते। हमारी कोई कामना, या ममता नहीं है, इस संसार में जो कुछ भी है, वह परमात्मा है, जिन से परे अन्य कुछ भी नहीं है। हम यह देह नहीं, सब गुणों से परे पारब्रह्म परमात्मा के साथ एक हैं।
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रामचरितमानस के उत्तर कांड में इसे समझाया गया है, जिसका स्वाध्याय स्वयं को ही करना होगा --
"सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी।।
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी।।
सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाई।।
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई।।
तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी।।
श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई।।
जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी।।
अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई।।
सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई।।
जप तप ब्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा।।
तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई।।
नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा।।
परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई।।
तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै।।
मुदिताँ मथैं बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी।।
तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता।।
जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ।
बुद्धि सिरावैं ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ।।
तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ।
चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ।।
तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि।
तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि।।
एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय।।
जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब।।
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अंत में यह याद रखें कि --
"सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥"
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आप सब महात्माओं को नमन !! आप सब महान आत्माएँ हैं, कोई सामान्य व्यक्ति नहीं। ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२४ अप्रेल २०२१

जिसका हम ध्यान करते हैं, वही हम बन जाते हैं ---

 जिसका हम ध्यान करते हैं, वही हम बन जाते हैं। परमात्मा हमें प्राप्त नहीं होते, बल्कि समर्पण के द्वारा हम स्वयं ही परमात्मा को प्राप्त होते हैं। कुछ पाने का लालच -- माया का एक बहुत बड़ा अस्त्र है। जीवन का सार कुछ होने में है, न कि कुछ पाने में। जब सब कुछ परमात्मा ही हैं, तो प्राप्त करने को बचा ही क्या है? आत्मा की एक अभीप्सा होती है, उसे परमात्मा का विरह एक क्षण के लिए भी स्वीकार्य नहीं है। इसी को परमप्रेम या भक्ति कहते हैं।

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कल रात्री के ध्यान में वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण ने एक बात तो स्पष्ट बता दी कि तुम्हारे जीवन में कुछ भी अच्छा नहीं है। हर कदम पर लाखों कमियाँ ही कमियाँ हैं। एक ही अच्छाई है कि तुम्हें मुझसे प्रेम है, और कुछ भी अच्छा नहीं है। इसी प्रेम ने तुम्हारी हर बुराई को ढक रखा है। जब भगवान स्वयं यह बात कह रहे हैं तो माननी ही पड़ेगी। अपनी हर बुराई और अच्छाई -- सब कुछ उन्हें बापस लौटा रहा हूँ। इस पाप की गठरी को कब तक ढोता रहूँगा?
अवशिष्ट जीवन उन्हीं के ध्यान, चिंतन, और स्मरण में बीत जाये, और कुछ भी नहीं चाहिए।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२३ अप्रेल २०२२

त्रिगुणातीत होना ही मुक्ति है ---

त्रिगुणातीत होना ही मुक्ति है ---
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राम-राज्य तभी स्थापित हो सकता है जब रावण का संहार हो चुका हो। लेकिन समस्या तो यह है कि महिषासुर, हिरण्यकशिपु, रावण और कंस आदि ये सब अमर हैं। ये कभी मरते ही नहीं हैं। मरने का नाटक करते हैं, और घूम-फिर कर बापस लौट आते हैं, और यह सारी सृष्टि इन्हीं से चल रही है। इनके बिना सृष्टि नहीं चल सकती। सारी सृष्टि तीन गुणों से ही चल रही है।
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण हमें त्रिगुणातीत होने को कहते हैं। यह त्रिगुणातीत होना ही मुक्ति है। ऐसी जीवनमुक्त आत्माओं के लोक अलग ही होते हैं। पृथ्वी पर बड़े सौभाग्य से ऐसे महात्माओं के दर्शन होते हैं। इस सृष्टि में कुछ भी निःशुल्क नहीं है। हर चीज की कीमत चुकानी पड़ती है। आध्यात्म में भगवान की प्राप्ति भी तभी होती है जब हम उन्हें अपना पूर्ण प्रेम (Total and unconditional love) बिना किसी शर्त के देते हैं।
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सबसे अच्छा तो यही है कि हम अपना सब कुछ भगवान को अर्पित कर दें। कुछ भी अपने पास बचा कर न रखें। हमारे पास अपना है ही क्या? सब कुछ तो भगवान का है। सिर्फ प्रेम ही हमारा अपना है जिसे भगवान मांगते हैं। अब आगे आप समझदार हैं। अपने विवेक के प्रकाश में जो भी करना चाहते हैं, वह करें।
मंगलमय शुभ कामनाएँ और नमन !! ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२३ अप्रेल २०२२
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राम-राज्य तभी स्थापित हो सकता है जब रावण का संहार हो चुका हो। लेकिन समस्या तो यह है कि महिषासुर, हिरण्यकशिपु, रावण और कंस आदि ये सब अमर हैं। ये कभी मरते ही नहीं हैं। मरने का नाटक करते हैं, और घूम-फिर कर बापस लौट आते हैं, और यह सारी सृष्टि इन्हीं से चल रही है। इनके बिना सृष्टि नहीं चल सकती। सारी सृष्टि तीन गुणों से ही चल रही है।
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण हमें त्रिगुणातीत होने को कहते हैं। यह त्रिगुणातीत होना ही मुक्ति है। ऐसी जीवनमुक्त आत्माओं के लोक अलग ही होते हैं। पृथ्वी पर बड़े सौभाग्य से ऐसे महात्माओं के दर्शन होते हैं। इस सृष्टि में कुछ भी निःशुल्क नहीं है। हर चीज की कीमत चुकानी पड़ती है। आध्यात्म में भगवान की प्राप्ति भी तभी होती है जब हम उन्हें अपना पूर्ण प्रेम (Total and unconditional love) बिना किसी शर्त के देते हैं।
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सबसे अच्छा तो यही है कि हम अपना सब कुछ भगवान को अर्पित कर दें। कुछ भी अपने पास बचा कर न रखें। हमारे पास अपना है ही क्या? सब कुछ तो भगवान का है। सिर्फ प्रेम ही हमारा अपना है जिसे भगवान मांगते हैं। अब आगे आप समझदार हैं। अपने विवेक के प्रकाश में जो भी करना चाहते हैं, वह करें।
मंगलमय शुभ कामनाएँ और नमन !! ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२३ अप्रेल २०२२