भगवान के सारे रूप एक उन्हीं के हैं। भगवान स्वयं ही पद्मासन में बैठे हैं, और स्वयं ही स्वयं का ध्यान कर रहे हैं; उनके सिवाय कोई अन्य है ही नहीं। भगवती के विभिन्न रूपों में जिनकी आराधना हम करते हैं, वे सारे रूप भी उन्हीं के हैं। वे ही ज्योतिर्मय ब्रह्म हैं, वे ही परमशिव हैं, वे ही विष्णु और वे ही नारायण हैं।
Monday, 28 February 2022
मेरे वश में कुछ भी नहीं है, जो करना है, वह आप स्वयं ही करो ---
हे प्रभु, मेरी भक्ति, अभीप्सा, और समर्पण में पूर्णता दो ---
जब तक अत्यधिक आवश्यक न हो तब तक अब कहीं भी आना-जाना, और किसी से भी मिलना-जुलना लगभग बंद ही कर रहा हूँ। जीवन में अब परमात्मा के साथ ही निरंतर सत्संग चल रहा है जो मेरे लिए पर्याप्त है। अन्य किसी के संग की अब कोई आवश्यकता नहीं रही है। इस शरीर के जन्म से पूर्व सिर्फ परमात्मा ही मेरे साथ थे, और इस नश्वर देह की मृत्यु के बाद भी सिर्फ परमात्मा ही निरंतर मेरे साथ सदा रहेंगे। उनका साथ शाश्वत है। उनका सत्संग पर्याप्त है। वे ही माता-पिता, भाई-बहिन, सभी संबंधियों और शत्रु-मित्रों के रूप में आये। जीवन में माता-पिता, भाई-बहिनों, सभी संबंधियों, और मित्रों आदि से जो भी प्रेम मिला वह परमात्मा का ही प्रेम था जो उनके माध्यम से व्यक्त हुआ। जहाँ भक्ति और सत्यनिष्ठा होती है, वहाँ परमात्मा का प्रेम निश्चित रूप से मिलता है। जीवन में विवेक के बिना कष्ट ही कष्ट हैं। बिना सत्संग के विवेक नहीं हो सकता। सत्संग भी राम की कृपा से ही होता है। अब तो सिर्फ आप ही के सत्संग पर आश्रित हूँ। और कुछ नहीं चाहिये।
जिन को निर्विकल्प समाधि (कैवल्य) की उपलब्धि हो गई है, वे सशरीर ब्रह्मस्वरूप हैं ---
जिन को निर्विकल्प समाधि (कैवल्य) की उपलब्धि हो गई है, वे सशरीर ब्रह्मस्वरूप हैं। निर्विकल्प समाधि में यदि इस शरीर की मृत्यु हो जाये तो उस दिव्यात्मा का जन्म हिरण्यलोकों में होता है, जहाँ किसी भी तरह के अज्ञान का अंधकार नहीं होता।
मेरी बात अधिकांश लोगों को बुरी लगती होगी, लेकिन यह परम सत्य है कि भगवान ही हमारे प्रथम, अंतिम और एकमात्र सम्बन्धी हैं ---
मेरी बात अधिकांश लोगों को बुरी लगती होगी, लेकिन यह परम सत्य है कि भगवान ही हमारे प्रथम, अंतिम और एकमात्र सम्बन्धी हैं ---
अंतस्थ परमात्मा को विस्मृत कर देना - आत्महत्या और ब्रह्महत्या का पाप है ---
अंतस्थ परमात्मा को विस्मृत कर देना - आत्महत्या और ब्रह्महत्या का पाप है ---
हे हरिः, तुम कितने सुंदर हो !! मैं तेरा निरंतर हूँ, और निरंतर तेरा ही रहूँगा ---
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अपनी साधना/उपासना स्वयं करो, किसी से कोई अपेक्षा मत रखो। दूसरों के पीछे-पीछे भागने से कुछ नहीं मिलेगा। जो मिलेगा वह स्वयं में अंतस्थ परमात्मा से ही मिलेगा। किसी पर कटाक्ष, व्यंग्य या निंदा आदि करने से स्वयं की ही हानि होती है।
सारी सृष्टि ही ब्रह्ममय है, सदा शिवभाव में स्थित रहो ---
सारी सृष्टि ही ब्रह्ममय है, सदा शिवभाव में स्थित रहो ---