Thursday, 24 February 2022

भगवान को भूलना ब्रह्महत्या का पाप है ---

 भगवान को भूलना ब्रह्महत्या का पाप है ---

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ब्रह्महत्या को सबसे बड़ा पाप माना गया है| ब्रह्महत्या के दो अर्थ हैं -- एक तो अपने अन्तस्थ परमात्मा को विस्मृत कर देना, और दूसरा है किसी ब्रह्मनिष्ठ महात्मा की ह्त्या कर देना| श्रुति भगवती कहती है कि अपने आत्मस्वरूप को विस्मृत कर देना, उसका हनन यानि ह्त्या है| हमारे कूटस्थ ह्रदय में सच्चिदानन्द ब्रह्म यानि स्वयं परमात्मा बैठे हुए हैं| उनको भूलना, उनकी हत्या करना है|
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हम संसार की हर वस्तु की ओर ध्यान देते हैं लेकिन परमात्मा की ओर नहीं| हम कहते हैं कि हमारा यह कर्तव्य बाकी है और वह कर्तव्य बाकी है पर सबसे बड़े कर्तव्य को भूल जाते हैं कि हमें ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना है| जो लोग कहते हैं कि हमारा समय अभी तक नहीं आया है, उनका समय कभी आयेगा भी नहीं|
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सांसारिक उपलब्धियों को ही हम अपनी महत्वाकांक्षा, लक्ष्य और दायित्व बना लेते हैं| पारिवारिक, सामाजिक व सामुदायिक सेवा कार्य हमें करने चाहियें क्योंकि इनसे पुण्य मिलता है, पर इनसे आत्म-साक्षात्कार नहीं होता|
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आजकल गुरु बनने और गुरु बनाने का भी खूब प्रचलन हो रहा है| गुरु पद पर हर कोई आसीन नहीं हो सकता| एक ब्रह्मनिष्ठ, श्रौत्रीय और परमात्मा को उपलब्ध हुआ महात्मा ही गुरु हो सकता है, जिसे अपने गुरु द्वारा अधिकार मिला हुआ हो|
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हमारे माता पिता परमात्मा के अवतार हैं, उनका पूर्ण सम्मान होना चाहिए| प्रातः और सायं विधिवत साधना, और निरंतर प्रभु का स्मरण करें| गीता के कम से कम पाँच श्लोकों का नित्य पाठ करें| कुसंग का सर्वदा त्याग करें| सब प्रकार के नशे का त्याग, और सात्विक भोजन करें| जो इतना ही कर लेंगे, उन्हें भगवान की प्राप्ति हो जाएगी|
सभी को शुभ कामनाएँ और नमन! ॐ तत्सत्!
कृपा शंकर
२५ फरवरी २०२१

हम परमात्मा को अपने ऊर्ध्वस्थ मूल (कूटस्थ) में ढूंढें ---

 हम परमात्मा को अपने ऊर्ध्वस्थ मूल (कूटस्थ) में ढूंढें ---

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हम प्रत्यक्ष परमात्मा की उपासना करें, न कि उनकी अभिव्यक्तियों या प्रतीकों की| भगवान गीता में कहते हैं ---.
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् | छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ||१५:१||"
श्री भगवान् ने कहा -- (ज्ञानी पुरुष इस संसार वृक्ष को) ऊर्ध्वमूल और अध:शाखा वाला अश्वत्थ और अव्यय कहते हैं; जिसके पर्ण छन्द अर्थात् वेद हैं, ऐसे (संसार वृक्ष) को जो जानता है, वह वेदवित् है||
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यह श्लोक हमें कठोपनिषद् में वर्णित अश्वत्थ वृक्ष का स्मरण कराता है| कठोपनिषद में यमराज ने ब्रह्म की उपमा पीपल के उस वृक्ष से की है, जो इस ब्रह्माण्ड के मध्य उलटा लटका हुआ है, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं, और शाखाएँ नीचे की ओर लटकी हुई हैं| यह सृष्टि का सनातन वृक्ष है जो विशुद्ध, अविनाशी और निर्विकल्प ब्रह्म का ही रूप है|
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कठोपनिषद् के द्वितीय अध्याय की तृतीय वल्ली का प्रथम मन्त्र कहता है ---
"ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाखः एषोऽश्वत्थः सनातनः | तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते |
तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन || एतद् वै तत् ||१||"
अर्थात् ऊपर की ओर मूलवाला और नीचे की ओर शाखावाला यह सनातन अश्वत्थ वृक्ष है| वह ही विशुद्ध तत्व है वह (ही) ब्रह्म है| समस्त लोक उसके आश्रित हैं, कोई भी उसका उल्लघंन नही कर सकता| यही तो वह है (जिसे तुम जानना चाहते हो)|
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अश्वत्थ शब्द में श्व का अर्थ आगामी कल है, त्थ का अर्थ है स्थित रहने वाला| अतः अश्वत्थ का अर्थ होगा --- वह जो कल अर्थात् अगले क्षण पूर्ववत् स्थित नहीं रहने वाला है| अश्वत्थ शब्द से इस सम्पूर्ण अनित्य और परिवर्तनशील दृश्यमान जगत् की ओर संकेत किया गया है| इस श्लोक में कहा गया है कि इस अश्वत्थ का मूल ऊर्ध्व में अर्थात् ऊपर है|
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इस संसार वृक्ष का मूल ऊर्ध्व कहा गया है जो सच्चिदानन्द ब्रह्म है| वृक्ष को आधार तथा पोषण अपने ही मूल से ही प्राप्त होता है| इसी प्रकार हमें भी हमारा भरण-पोषण सच्चिदानंद ब्रह्म से ही प्राप्त होता है| हमें हमारे ऊर्ध्वमूल को पाने का ही निरंतर प्रयास करना चाहिए, यही हमारा सर्वोपरी कर्तव्य है| यही सबसे बड़ी सेवा है जो हम दूसरों के लिए कर सकते हैं| जो इस जीवन वृक्ष के रहस्य को समझ लेता है वही वेदवित है|
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हमारा ऊर्ध्वमूल कूटस्थ है| ध्यान साधना द्वारा कूटस्थ में ही हमें परमात्मा का अनुसंधान करना होगा| इसकी विधि उपनिषदों में व गीता में दी हुई है,पर कोई समझाने वाला सिद्ध आचार्य चाहिए जो श्रौत्रीय और ब्रह्मनिष्ठ भी हो| जिस दिन हमारे में पात्रता होगी उस दिन भगवान स्वयं ही आचार्य गुरु के रूप में आ जायेंगे| अतः हर कार्य, हर सोच परमात्मा की कृपा हेतु ही करनी चाहिए|
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परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब निजात्मगण को नमन !
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! श्रीगुरवे नमः ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ फरवरी २०२१
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पुनश्च: :--- शिवनेत्र होकर भ्रूमध्य में सर्वव्यापी पारब्रह्म परमात्मा का ध्यान करते-करते वहाँ एक ब्रह्मज्योति का प्राकट्य होता है| जब वह ज्योति प्रकट होती है तब उसके साथ-साथ अनाहत नाद का श्रवण भी होने लगता है| उस अनंत सर्वव्यापी विराट ज्योतिर्मय अक्षर ब्रह्म को ही योग साधना में कूटस्थ ब्रह्म कहते हैं| उस सर्वव्यापी कूटस्थ का ध्यान ही प्रत्यक्ष परमात्मा का ध्यान है|

Wednesday, 23 February 2022

क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं? अब तो जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो!

 क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं? अब तो जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो!

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जिस जीवन को मैंने जीया है, उसे दुबारा तो जीना असंभव है| जो समय चला गया, वह लौट कर बापस नहीं आ सकता| उस जीवन में पता नहीं कितनी कमियाँ व भूलें थीं, कितने अवसादों के और कितने उन्मादों के क्षण थे! विपरीततायें ही अधिक, और अनुकूलतायें नगण्य थीं|
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जिस समाज में मेरा जन्म हुआ, वह अपने अस्तित्व को बचाने, यानि अपनी आजीविका के अर्जन के लिए ही संघर्ष कर रहा था| समाज अभावग्रस्त था और समाज में तमोगुण का अंधकार अधिक था| उस तमस से बाहर निकलने और आध्यात्मिक व भौतिक दरिद्रता दूर करने के लिए मुझे बहुत ही अधिक संघर्ष करना पड़ा| भगवान ने भी मुझ अकिंचन पर कुछ अधिक ही कृपा की|
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मेरी आस्था तो यही कहती है कि जो कुछ भी हम हैं, और जिन भी अच्छे-बुरे अनुभवों से हम गुजरते हैं, वे हमारे पूर्व जन्मों के कर्मफल हैं| इनमें किसी अन्य का कोई दोष नहीं है| अब तो सारी बुराइयाँ/अच्छाइयाँ दोष/गुण, बुरा/भला सब कुछ परमात्मा को समर्पित कर दिया है| अब परमात्मा के बोध में ही स्वतन्त्रता अनुभूत करता हूँ| परमात्मा का विस्मरण ही मेरे लिए परतंत्रता है| कोई इच्छा/आकांक्षा अब नहीं है, सिर्फ एक ही तड़प/अभीप्सा है कि अब से जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो|
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जीवन शाश्वत है, मृत्यु मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती, सिर्फ यह शरीर छीन सकती है, जो मैं परमात्मा को अर्पित कर चुका हूँ| मेरे साथ तब तक कुछ भी नहीं हो सकता, कोई मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता, जब तक स्वयं परमात्मा की स्वीकृति न हो|
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समस्या एक ही है कि --- "The spirit indeed is willing, but the flesh is weak". अर्थात् आत्मा में तो परमात्मा को पाने की तड़प है, लेकिन यह अंतःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) बहुत अधिक कमजोर है| और कोई समस्या नहीं है| यह समस्या भी भगवान को अर्पित है|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ फरवरी २०२१

परमात्मा से 'प्रेम' एक स्थिति है, कोई क्रिया नहीं, यह हो जाता है, किया नहीं जाता ---

 परमात्मा से 'प्रेम' एक स्थिति है, कोई क्रिया नहीं, यह हो जाता है, किया नहीं जाता ---

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परमात्मा से परमप्रेम -- आत्मसाक्षात्कार का द्वार है| यह सबसे बड़ी सेवा है, जो हम समष्टि के लिए कर सकते हैं| यह उन की परमकृपा है जो हमारा परमकल्याण कर रही है| उन में तन्मयता हमारा जीवन है| उन से प्रेम के विचार ही हमारी तीर्थयात्रा हैं| उन से प्रेम ही सबसे बड़ा तीर्थ है| हम अपना हर कर्म उन की प्रसन्नता के लिए, निमित्त मात्र होकर उन्हें ही कर्ता बनाकर करें|
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गीता में भगवान दो बार कहते हैं -- "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु"--
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः||९:३४||"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे||१८:६५||
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हम भगवान की चेतना में प्रेममय होकर उनके विवेक के प्रकाश में अपना कर्मयोग करते रहें| किसी से घृणा नहीं करें| घृणा करने वाला व्यक्ति, आसुरी शक्तियों का शिकार हो जाता है| अब मन उन के प्रेम में मग्न हो गया है, और कुछ भी लिखना असंभव है|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !! 🌹🙏🕉🕉🕉🙏🌹
कृपा शंकर
२३ फरवरी २०२१

जहाँ भक्ति और सत्यनिष्ठा होगी, वहाँ परमात्मा की कृपा निश्चित रूप से होगी ----

 जहाँ भक्ति और सत्यनिष्ठा होगी, वहाँ परमात्मा की कृपा निश्चित रूप से होगी :---

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जीवन में विवेक के बिना कष्ट ही कष्ट हैं| बिना सत्संग के विवेक नहीं हो सकता| और सत्संग भी राम यानि परमात्मा की कृपा हुये बिना नहीं मिलता| संत तुलसीदास जी ने लिखा है -- "बिन सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई|"
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सत्संग का अर्थ है -- सत्य के साथ सङ्ग| सत्य क्या है? सिर्फ परमात्मा ही सत्य है| भौतिक शास्त्र की दृष्टि से यह भौतिक जगत मिथ्या है| भौतिक जगत हमारे सामूहिक विचारों का ही व्यक्त रूप है| मूल रूप से यह अनेक ऊर्जाखंडों, और उनसे निर्मित अणु-परमाणुओं, का ही निरंतर परिवर्तनशील घनीभूत प्रवाह है| जिनके संकल्प और विचार से इस अनंत विराट जगत की रचना हुई है, वे ही परमात्मा हैं| उन्हीं का सङ्ग -- "सत्संग" है| जो परमात्मा का स्मरण करवा दें, यानि जिनके सङ्ग से परमात्मा की चेतना जागृत हो जाये, वे ही "संत" हैं, अन्यथा वे सामान्य सांसारिक प्राणी हैं|
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अब प्रश्न यह है कि परमात्मा की कृपा कैसे हो? जिन्हें सचमुच ही यह जानने की जिज्ञासा है वे रामायण, महाभारत, भागवत आदि ग्रन्थों का स्वाध्याय करें, और भक्तिभाव को विकसित कर, परमात्मा से उनकी कृपा के लिए प्रार्थना करें| जहाँ भक्ति और सत्यनिष्ठा होगी, वहाँ परमात्मा की कृपा निश्चित रूप से होगी|
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रामायण में हनुमान जी भगवान श्रीराम को कहते हैं -- "कह हनुमंत विपत्ति प्रभु सोई, जब तब सुमिरन भजन न होई|"
मैं अपने जीवन के पूरे अनुभव के साथ कह सकता हूँ कि भगवान का विस्मरण और उनसे दूरी ही हमारे सब दुःखों का कारण है| भगवान को भूलने से बड़ी पीड़ा, कष्ट, और वेदना, कोई दूसरी नहीं है|
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भगवान ने मुझसे देश-विदेश में खूब भ्रमण करवाया है| अनेक नास्तिक म्लेच्छ देशों में भी भगवान ने मुझसे भ्रमण और निवास करवाया है| वहाँ के निवासियों की मानसिक यंत्रणा को मैंने साक्षात अनुभूत किया है| अतः यह बात मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ कि भगवान से वियोग ही सबसे बड़ी विपत्ति और संकट है| भगवान के स्मरण से बड़ा सुख कोई दूसरा नहीं है|
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भगवान का निरंतर स्मरण ही सत्संग है, और उनका विस्मरण ही कुसंग व सबसे बड़ी विपत्ति है| भगवान की निरंतर कृपा सब पर बनी रहे| ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ फरवरी २०२१

Tuesday, 22 February 2022

आजकल हो रही आत्महत्याओं की घटनाओं को रोका जा सकता है ---

 आजकल हो रही आत्महत्याओं की घटनाओं को रोका जा सकता है ---

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अवसादग्रस्त व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक सहारे की आवश्यकता है। आत्म-हत्या किसी समस्या का समाधान नहीं है। इससे दुःखों से मुक्ति नहीं मिलती, अपितु और भी अति भयावह अंधकारमय लोकों में जाकर उसे बहुत अधिक दुःख भोगने पड़ते हैं। अधिकांशतः आत्महत्या का प्रयास करने के मुख्य कारण --
(१) पति-पत्नी के मध्य में मनमुटाव, (२) सास-बहू के मध्य का मनमुटाव, और (३) आर्थिक तंगी है। आर्थिक तंगी और सूदखोरों से परेशान होकर भी बहुत लोग परिवार सहित आत्महत्या कर लेते हैं। आत्महत्या से पहिले व्यक्ति अवसादग्रस्त होता है। उस समय उसे बड़े मनोवैज्ञानिक सहारे की आवश्यकता होती है| यदि उसकी बात को बड़े ध्यान से सुना जाये और थोड़ी सहानुभूति दिखाई जाये तो वह अवसाद से बाहर आ सकता है।
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आजकल विवाह की संस्था विफल होती जा रही है| समाज भी बच्चों में कोई अच्छे संस्कार नहीं देता| सिर्फ अधिक से अधिक रूपये कमाने की ही सीख दी जाती है। पति को कमाने वाली पत्नी चाहिए, और पत्नि को कमाने वाला पति| जहाँ वे एक-दूसरे की अपेक्षाओं को पूरा नहीं करते, वहीं कलह शुरू हो जाती है| हरेक जिले के पारिवारिक न्यायालयों में देख लीजिए, मुकदमों की भीड़ लगी हुई है| पति-पत्नि के पारिवारिक झगड़ों में लाभ सिर्फ उनके वकीलों को ही होता है, और किसी को नहीं| समाज में महिलाओं को अच्छे संस्कार दिये बिना महिला-सशक्तिकरण के नाम पर बहुत अधिक अधिकार दे दिये गए हैं| जरा-जरा सी बात पर वे अपने पतियों व ससुराल वालों का जीवन नर्क बना देती हैं| इसलिए परिवार टूट रहे हैं, और विवाह की संस्था विफल हो रही है|
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अवसादग्रस्त व्यक्ति की हम क्या सहायता कर सकते हैं :---
शांत रहें, उसकी बात सुनें, और उसकी भावनाओं को समझें| उसे कोई उसकी बात सुनने वाला चाहिए, जिस पर वह विश्वास कर सके, और जो उसका ध्यान रख सके| कभी उसको अकेले में मत रहने दें, उस पर कोई भाषणबाजी न करें और ऐसे प्रश्न न पूछें जो उसको अप्रिय लगते हों| उसे किसी बहुत अच्छे मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक के पास ले जाकर उसका उपचार करवाएँ| उसमें किसी भी तरह की हीन-भावना न आने दें|
कृपा शंकर
२२ फरवरी २०२१

Monday, 21 February 2022

भगवान की भक्ति कौन कर सकता है? ---

भगवान की भक्ति कौन कर सकता है? ---
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भगवान की भक्ति वही कर सकता है जिसने अपने पूर्व जन्मों में कुछ पुण्य किये हों या जिस पर भगवान की कृपा हो। मेरी यह अपेक्षा पूर्णतः गलत थी कि सब लोग भगवान की भक्ति करें, या भगवान का ध्यान करें। वास्तव में भगवान स्वयं ही स्वयं की भक्ति करते हैं। जिस पर भगवान की कृपा होती है, वही उनका माध्यम यानि निमित्त बनकर उनकी भक्ति कर सकता है।
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भगवान अपनी अनुभूति मातृरूप में भी करवाते हैं, और पितृरूप में भी। माँ अधिक करुणामयी होती है। मैं दूसरों के बारे में तो कुछ कह नहीं सकता, लेकिन स्वयं के बारे में ही कुछ कहना चाहता हूँ। मेरा प्रत्यक्ष अनुभव है कि भगवती स्वयं ही मुझे निमित्त बनाकर मेरे माध्यम से परमशिव की उपासना कर रही हैं। मैं तो उनका एक उपकरण मात्र हूँ। भगवती की अनुभूति मुझे सूक्ष्म देह में घनीभूत प्राण-तत्व के रूप में, और परमशिव की अनुभूति इस भौतिक देह से बाहर सूक्ष्म जगत की अनंतता से भी परे एक अवर्णनीय श्वेत परम ज्योतिर्मय ब्रह्म रूप में होती है। भगवती इस सूक्ष्म देह के मेरुदंड की ब्रह्मनाड़ी में विचरण करते हुए ब्रह्मरंध्र से बाहर निकलकर अनंताकाशों से भी परे जाकर परमशिव को नमन कर लौट आती हैं। उनकी उपस्थिती से ही यह जीव चैतन्य है। भगवान को अपने हृदय का पूर्ण प्रेम दें। कृपा करना उनका स्वभाव है, वे अवश्य ही कृपा करेंगे।
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हे भगवती, आप के अनुग्रह से ही यह अकिंचन जीव चैतन्य है। आप ही मेरी एकमात्र गति हैं। आप के प्रेम पर मेरा जन्मसिद्ध पूर्ण अधिकार है। आप परमशिव के साथ एक होकर मुझे भी उनके साथ एक कर दीजिये। आप मेरी माता हैं, मुझे स्वयं से पृथक नहीं कर सकतीं। मैं आपके साथ एक हूँ, और एक ही रहूँगा। मैं सदा परमशिव की चेतना में रहूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० फरवरी २०२२