Saturday, 4 December 2021

आसन्न परिस्थितियाँ बड़ी विकट हैं, देश एक बहुत बड़े संकट से निकल रहा है ---

आसन्न परिस्थितियाँ बड़ी विकट हैं, देश एक बहुत बड़े संकट से निकल रहा है --- (Dated 5 December 2020)

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भारत एक ज्वालामुखी पर बैठा है जो कभी भी फट सकता है| मैं जो लिख रहा हूँ वह कोई नकारात्मक बात नहीं, एक आपत्काल की पूर्व सूचना है| आगे आने वाले सात-आठ महीने हमारे लिए अच्छे नहीं हैं| अपनी स्वयं की व भारत की रक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना करें|
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शाहीनबाग का धरना और दिल्ली के दंगे, भारत को तोड़ने के लिए थे जो भगवान की कृपा से सफल नहीं हुए| फिर जैविक अस्त्र कोरोना वायरस के चीन द्वारा किए गए प्रयोग ने देश का बुरा हाल कर दिया| लद्दाख में चीन सफल नहीं हुआ, अन्यथा उसकी योजना बड़ी भयंकर थीे| अब पाकिस्तान के साथ मिल कर वह भारत पर कभी भी आक्रमण कर सकता है|
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पहले चीन, पाकिस्तान व भारत के भीतर/बाहर की कुछ भारतद्रोही शक्तियाँ भारत में अराजकता फैलायेंगी| दिल्ली में किसान आंदोलन के नाम से चल रहा आंदोलन, भारत को दंगों व गृह-युद्ध की आग में झौंकने की तैयारी है| दुर्भाग्य से हमारे लोगों के व्यक्तिगत हित, राष्ट्रहित से बड़े हो गए हैं| पाकिस्तान में सैंकड़ों आतंकवादी भारत पर आक्रमण के लिए तैयार बैठे हैं| हजारों आतंकी वहाँ तैयार किए जा रहे हैं|
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कोरोना महामारी -- चीन द्वारा जैविक युद्ध का एक प्रयोग था| अब उस से भी अति भयंकर जीवाणू चीन ने बना लिए हैं, जिनका प्रयोग वह भारत के विरुद्ध कर सकता है|
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पूरी तरह सचेत रहिए और अपने संसाधनों को बचा कर रखें| अपना खर्चा कम करें, स्वस्थ रहें व अपनी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाएँ| किसी भी तरह के आपत्काल के लिए तैयार रहें| देश की रक्षा के लिए हो सकता है हमें हर आपत्कालीन उपाय युद्ध-स्तर पर करने पड़ें|
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अब मैं हर तरह के आध्यात्मिक लेख लिखना कुछ समय के लिए बंद कर रहा हूँ| राष्ट्र की रक्षा अधिक महत्वपूर्ण है| आने वाली विकट परिस्थितियों का सामना करने को हम तैयार रहें| भारत माता की जय|
५ दिसंबर २०२०

हमारी उपासना तेलधारा की तरह अखंड हो ---

 हमारी उपासना तेलधारा की तरह अखंड हो ---

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भक्ति के बिना तो कोई उपासना हो ही नहीं सकती| भक्ति से ही ज्ञान और वैराग्य का प्राकट्य होता है| भक्ति सूत्रों के अनुसार हमारी भक्ति वैसी ही हो, जैसी बृज की गोपिकाओं की थी (यथा व्रजगोपिकानाम्)| मेरे लिए तो भक्ति के सबसे बड़े आदर्श --- श्रीहनुमान जी और श्रीराधा जी हैं| रामचरितमानस व भागवत जैसे ग्रंथ भक्ति की ही महिमा गाते हैं| शांडिल्य व नारद भक्ति-सूत्रों में भक्ति को बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है| हमारी चेतना में भगवान की निरंतर उपस्थिती बनी रहे, और हमारा अन्तःकरण भगवान को समर्पित हो, यही उपासना का उद्देश्य है| भगवान हमारे से हमारा प्रेम ही माँगते हैं| प्रेम के अतिरिक्त हमारे पास है ही क्या? सब कुछ तो उन्हीं का दिया हुआ है| प्रकृति में कुछ भी निःशुल्क नहीं है| हर चीज की कीमत चुकानी पड़ती है| भगवान की प्राप्ति के लिए अपना परमप्रेम व अपना अन्तःकरण तो भगवान को समर्पित करना ही होगा| भगवान कहते हैं ---
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः||९:३४||"
""मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे||१८:६५||"
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज| अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः||१८:६६||"
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हमारी उपासना "तेलधारा" के समान अखंड होनी चाहिए| तेल को एक पात्र से जब दूसरे में डालते हैं तब उसकी धार अखंड रहती है, बीच बीच में टूटती नहीं है, वैसी ही हमारी उपासना होनी चाहिए| योग साधकों के लिए आज्ञाचक्र ही उन का आध्यात्मिक-हृदय होता है| आज्ञाचक्र के एकदम सामने भ्रूमध्य होता है, जहाँ गुरु की आज्ञा से ध्यान करते हैं| वहाँ ध्यान करते करते गुरुकृपा से एक न एक दिन एक दिव्य ज्योति के दर्शन होने लगते हैं और अनाहत नाद की ध्वनि सुनाई देने लगती है| वह दिव्य ज्योति ही कूटस्थ है, और उसमें निरंतर स्थिति कूटस्थ-चैतन्य है| भगवान कहते हैं ---
"ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते| सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्||१२:३||"
"संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः| ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः||१२:४||"
भावार्थ :-- जो भक्त अक्षर ,अनिर्देश्य, अव्यक्त, सर्वगत, अचिन्त्य, कूटस्थ, अचल और ध्रुव की उपासना करते हैं, इन्द्रिय समुदाय को सम्यक् प्रकार से नियमित करके, सर्वत्र समभाव वाले, भूतमात्र के हित में रत वे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं||
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आचार्य शंकर ने अपने भाष्य में 'उपासना' को 'तैलधारा' के समान बताया है| उपासना का शाब्दिक अर्थ है --- समीप बैठना| हमें अपनी चेतना में सदा भगवान के समक्ष ही बैठना चाहिए| शंकर भाष्य के अनुसार --- "उपास्य वस्तु को शास्त्रोक्त विधि से बुद्धि का विषय बनाकर, उसके समीप पहुँचकर, तैलधारा के सदृश समान वृत्तियों के प्रवाह से दीर्घकाल तक उसमें स्थिर रहने को उपासना कहते हैं|"
यहाँ उन्होंने "तैलधारा" शब्द का प्रयोग किया है जो अति महत्वपूर्ण है|
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तैलधारा के सदृश समानवृत्तियों का प्रवाह क्या हो सकता है? पहले इस पर विचार करना होगा| योगियों के अनुसार ध्यान साधना में जब प्रणव यानि अनाहत नाद की ध्वनी सुनाई देती है तब वह तैलधारा के सदृश अखंड होती है| प्रयोग के लिए एक बर्तन में तेल लेकर उसे दुसरे बर्तन में डालिए| जिस तरह बिना खंडित हुए उसकी धार गिरती है, वैसे ही अनाहत नाद यानि प्रणव की ध्वनी सुनाई देती है| प्रणव को परमात्मा का वाचक यानि प्रतीक कहा गया है| यह प्रणव ही कूटस्थ अक्षर ब्रह्म है|
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समानवृत्ति का अर्थ जो मुझे समझ में आता है, वह --- श्वास-प्रश्वास और वासनाओं की चेतना से ऊपर उठना है| चित्त स्वयं को श्वास-प्रश्वास और वासनाओं के रूप में व्यक्त करता है| अतः समानवृत्ति शब्द का यही अर्थ हो सकता है|
मेरी सीमित अल्प बुद्धि के अनुसार "उपासना" का अर्थ --- हर प्रकार की चेतना से ऊपर उठकर ओंकार यानि अनाहत नाद की ध्वनी को सुनते हुए उसी में लय हो जाना है| मेरी दृष्टी में यह ओंकार ही गुरु रूप ब्रह्म है|
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उपासना का उद्देश्य उपास्य के साथ एकाकार होना है| व्यवहारिक रूप से किस व्यक्ति में कौन सा गुण प्रधान है, उस से वैसी ही उपासना होगी| मनुष्य जैसा चिंतन करता है वैसी ही उपासना करता है| तमोगुण की प्रधानता अधिक होने पर मनुष्य परस्त्री/परपुरुष व पराये धन की उपासना करता है जो उसके और भी अधिक पतन का कारण बनती है| चिंतन चाहे परमात्मा का हो या परस्त्री/पुरुष या पराये धन का, होता तो उपासना ही है| रजोगुण प्रधान व्यक्ति सांसारिक उपलब्धियों की उपासना करता है| सतोगुण प्रधान व्यक्ति परमात्मा के विभिन्न रूपों की उपासना करता है|
अंततः हमें इन तीनों गुणों से भी ऊपर उठना पड़ता है| भगवान हमें निःस्त्रेगुण्य, नित्यसत्वस्थ, निर्योगक्षेम और आत्मवान होने का आदेश देते हैं ---
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन| निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्||२:४५||"
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नारद भक्तिसूत्रों के अनुसार उपासक को सर्वदा सत्संग करना चाहिए और किसी भी परिस्थिति में कुसंग का त्याग करना चाहिए क्योंकि संगति का असर पड़े बिना रहता नहीं है| मनुष्य जैसे व्यक्ति का चिंतन करता है वैसा ही बन जाता है| महापुरुषों का संग दुर्लभ, अगम्य तथा अमोध है (महत्सङ्गस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च), लेकिन किसी भी परिस्थिति में हमें कुसंग का त्याग करना चाहिए (दुस्सङ्गः सर्वथैव त्याज्यः)| ( कुसंग) काम, क्रोध, मोह, स्मृतिभ्रंश, बुद्धिनाश एवा सर्वनाश का कारण है (कामक्रोधमोहस्मृतिभ्रंशबुद्धिनाशकारणत्वात्)|
जो पतनोन्मुख है, और जो गलत लोगों का संग करता है, उसका साथ छोड़ देना चाहिए, चाहे वह स्वयं का गुरु ही क्यों ना हो| कुसंग सर्वदा त्याज्य है|
योगसूत्रों में एक सूत्र आता है --- "वीतराग विषयं वा चित्तः", इस पर गंभीरता से विचार करें| किसी वीतराग व्यक्ति का निरंतर चिंतन हमारे चित्त को भी वीतराग (राग-द्वेष-अहंकार से परे) बना देता है|
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नर्क की अग्नि से भी भयावह वासना की अग्नि है| इस से बच कर ही रहना चाहिए| इसकी कल्पना भी नर्क की अग्नि में गिरा देती है| अज्ञानग्रंथि का भेदन कर अपने परम शिवत्व को व्यक्त करना ही उपासना का लक्ष्य है| जब ह्रदय में परमप्रेम उदित होता है तब भगवान किसी गुरु के माध्यम से मार्गदर्शन देते हैं| हमें भगवान को ही इस देहरूपी नौका का कर्णधार बनाना चाहिए| गीता और सारे उपनिषद ओंकार की महिमा से भरे पड़े हैं| अतः कूटस्थ अक्षरब्रह्म का ध्यान में तैलधारा के सदृश निरंतर श्रवण, और कूटस्थ ब्रह्मज्योति का निरंतर दर्शन ही उपासना है| यह कूटस्थ ही गुरुरूप ब्रह्म है, और यह कूटस्थ ही हम स्वयं हैं|
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मैंने जो लिखा है उस में कुछ गलत हो तो मनीषीगण मुझे क्षमा करें| मेरी अति अल्प और अति सीमित बुद्धि इतना ही काम करती है, इस से अधिक नहीं|
भगवान की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति, आप सब को नमन !!
ॐ गुरुभ्यो नमः ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ दिसंबर २०२०
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पुनश्च: :---
नारद भक्तिसूत्रों के अनुसार कौन तरता व तारता है? ---
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(१) कस्तरति कस्तरति मायाम् यः सङ्गं त्यजति यो महानुभाव् सेवते निर्ममो भवति |
कौन तरता है कौन तरता है, माया से? जो सब संगों का त्याग करता है, जो महापुरुषों की सेवा करता है, जो ममता रहित होता है|
(२) यो विविक्तस्थानं सेवते यो लोकबन्धमुनमूनयति निस्त्रैगुण्यो भवति योगक्षेमं त्यजति|
जो निर्जन स्थान का सेवन करता है, लौकिक बन्धनों को तोड़ देता है, तीनों गुणों से पार हो जाता है तथा जो योग-क्षेम का त्याग कर देता है|
(जो प्राप्त न हो उसकी प्राप्ती को योग, और जो प्राप्त हो उसके संरक्षण को क्षेम कहा जाता है).
(३) यः कर्मफलं त्यजति कर्माणि सन्नयस्स्यति ततो निर्द्वन्द्वो भवति|
जो कर्म फल का त्याग करता है, (वह) कर्मों का भी त्याग कर देता है, तथा निर्द्वन्द्व हो जाता है|
(४) यो वेदानपि सन्नयस्यति केवलमविच्छिन्नानुरागं लभते|
जो वेदों का भी त्याग कर देता है, केवल तथा अविच्छिन्न अनुराग ही रह जाता है|
(५) स तरति स तरति स लोकांस्तारयति|
वह तरता है, वह तरता है, वह इस लोक को भी तारता है|

४ दिसंबर २०२०

Wednesday, 1 December 2021

ध्यान के लिए आवश्यक है कि दोनों नासिका छिद्रों से साँसें चल रही हो ---

 जिस समय दोनों नासिका छिद्रों से साँसें चल रही हों, उसी समय साँसें सहज और लयबद्ध होती हैं, तभी मन स्थिर हो सकता है, और तभी ध्यान साधना हो सकती है| बंद नाक होने से ध्यान नहीं हो सकता| यदि साँसें एक ही नासिका छिद्र से चल रही हो, तब भी ध्यान नहीं हो सकता| ध्यान के लिए यह आवश्यक है कि दोनों नासिकाओं से साँस चल रही हो| इसी के लिए ध्यान से पूर्व अनुलोम-विलोम प्राणायाम करते हैं| हठयोग में अनेक क्रियाएँ हैं जिनकी सहायता से नासिका के दोनों छिद्रों को खुला रखा जा सकता है| यदि कोई मेडिकल समस्या हो ... जैसे DNS की या Allergy की, तो उसका किसी अच्छे ENT सर्जन से शल्य चिकित्सा द्वारा उपचार करवाएँ|

ॐ तत्सत् !!

२ दिसंबर २०२१

भगवान के किस रूप का ध्यान करें? ---

 

भगवान के किस रूप का ध्यान करें?
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गीता के अध्याय ११ "विश्वरूप दर्शन योग" में दिये भगवान के "पुराण-पुरुष" "ज्योतिर्मय रूप" का ध्यान अनन्य भक्तिभाव से करें| भगवान कहते हैं ---
"दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता| यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः||११/१२"
यदि आकाश में एक हजार सूर्य एक साथ उदय हो तो उनसे उत्पन्न होने वाला वह प्रकाश भी उस सर्वव्यापी परमेश्वर के प्रकाश की शायद ही समानता कर सके|
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मेरा मानना है कि परमात्मा का वह विराट प्रकाशरूप ही ज्योतिर्मय ब्रह्म है, वही परमशिव है, वही परमेश्वर है| उसी का हम अनन्य भक्ति-भाव से ध्यान करें| भगवान कहते हैं ---
"भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन| ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप||११:५४||"
"मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः| निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव||११:५५||"
भावार्थ : हे परन्तप अर्जुन! केवल अनन्य भक्ति के द्वारा ही मेरा साक्षात दर्शन किया जा सकता है, वास्तविक स्वरूप को जाना जा सकता है और इसी विधि से मुझमें प्रवेश भी पाया जा सकता है|
हे पाण्डुपुत्र! जो मनुष्य केवल मेरी शरण होकर मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करता है, मेरी भक्ति में स्थित रहता है, सभी कामनाओं से मुक्त रहता है और समस्त प्राणियों से मैत्रीभाव रखता है, वह मनुष्य निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त करता है||
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गीता में एक अन्य स्थान पर भी भगवान अनन्य भक्ति का आदेश देते हैं ---
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी| विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि||१३:११||"
अर्थात् अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि||
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गीता के ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन द्वारा भगवान से की गई प्रार्थना :---
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स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घा: ॥ (३६)
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्‌ गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्‌ ॥ (३७)
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌ ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥ (३८)
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्क: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ (३९)
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वंसर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ (४०)
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदंमया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ (४१)
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षंतत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्‌ ॥ (४२)
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्‌ ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्योलोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ (४३
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायंप्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्‌ ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्‌ ॥ (४४)
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गीता के कई श्लोकों के कूट अर्थ हैं, जिन्हें भगवान की कृपा से ही समझा जा सकता है| वे बुद्धि की समझने की शक्ति से परे हैं, अतः उन को समझाने का प्रयास निरर्थक है| भगवान की परम कृपा सभी सत्यनिष्ठ प्रेमियों पर बनी रहे|
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मुझे बहुत अच्छी तरह से पता है कि मेरे इस शरीर रूपी दीपक में अब अधिक ईंधन नहीं बचा है| अतः अब सब तरह की अन्य गतिविधियों को छोड़कर अपना यथासंभव अधिकाधिक समय भगवान के ध्यान और भक्ति में ही बीते, इसकी प्रार्थना पुराण-पुरुष भगवान वासुदेव से करता हूँ| मैं नहीं चाहता कि कोई मुझे याद करे| याद ही करना है तो निरंतर सदा भगवान को ही करें|
मेरा अगला जन्म किसी ज्योतिर्मय हिरण्य लोक में होगा| इसका आभास कभी कभी होता है|
भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण को पुनश्च: कोटि-कोटि नमन !!
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ दिसंबर २०२०

Sunday, 28 November 2021

"साधना" का और "साधक" होने का भाव एक मिथ्या भ्रम ही है ---

 "साधना" का और "साधक" होने का भाव एक मिथ्या भ्रम ही है .....

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सारी साधना तो महाकाली (जगन्माता) ही कर के श्रीकृष्ण (परमात्मा) को अर्पित करती हैं| मेरा साधना करने का और साधक होने का सारा भाव एक मिथ्या (झूठा) भ्रम था, और अभी भी है| कूटस्थ चैतन्य में केवल भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण ही पद्मासन में समाधिष्ठ दृष्टिगत होते हैं, अन्य सब उन्हीं का विस्तार है| उन के सिवाय अन्य कोई है ही नहीं| वे ही आकाश-तत्व से परे ... परमशिव हैं| सारी साधना तो भगवती महाकाली स्वयं प्राण-तत्व कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में कर रही हैं| साधक होने का मुझे एक झूठा भ्रम है| मैं कोई साधक नहीं हूँ, एक अकिंचन निमित्त साक्षी मात्र हूँ|
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भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार .....
"योगी" कौन है, और "सन्यासी" कौन है ? अपना उद्धार और पतन कौन करेगा ? अपना मित्र और शत्रु कौन है ? .....
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भगवान कहते हैं .....
"अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः | स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ||६:१||"
श्रीभगवान् ने कहा -- जो पुरुष कर्मफल पर आश्रित न होकर कर्तव्य कर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है, न कि वह जिसने केवल अग्नि का और क्रियायों का त्याग किया है||
आचार्य शंकर के अनुसार अनाश्रित वह है जो कर्मफलों की तृष्णा से रहित है| वह संन्यासी भी है और योगी भी है| संन्यास नाम त्याग का है, और चित्त के समाधान का नाम योग है|
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भगवान कहते हैं .....
"उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् | आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ||६:५||"
अर्थात् मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये और अपना अध: पतन नहीं करना चाहिये; क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा (मनुष्य स्वयं) ही आत्मा का (अपना) शत्रु है ||
आचार्य शंकर के अनुसार जब मनुष्य योगारूढ़ हो जाता है तब वह अनर्थों के समूह इस संसार समुद्र से स्वयं अपना उद्धार कर लेता है| इसलिये संसार सागर में डूबे पड़े हुए अपने आप को उस संसार समुद्र से आत्मबल के द्वारा ऊँचा उठा लेना चाहिये, अर्थात् योगारूढ़ अवस्थाको प्राप्त कर लेना चाहिये| अपना अधःपतन नहीं करना चाहिये, अर्थात् अपने आत्मा को नीचे नहीं गिरने देना चाहिये| क्योंकि यह आप ही अपना बन्धु है| दूसरा कोई ( ऐसा ) बन्धु नहीं है जो संसार से मुक्त करने वाला हो| प्रेमादि भाव बन्धन के स्थान होनेके कारण सांसारिक बन्धु भी (वास्तव में ) मोक्षमार्ग का तो विरोधी ही होता है| इसलिये निश्चयपूर्वक यह कहना ठीक ही है कि आप ही अपना बन्धु है, तथा आप ही अपना शत्रु है| जो कोई दूसरा अनिष्ट करनेवाला बाह्य शत्रु है वह भी अपना ही बनाया हुआ होता है, इसलिये आप ही अपना शत्रु है इस प्रकार केवल अपने को ही शत्रु बतलाना भी ठीक ही है|
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कार्य की पूर्ति और अपूर्ति में, फल की प्राप्ति और अप्राप्ति में, अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति में, निन्दा और स्तुति में, आदर और निरादर में, ----- राग-द्वेष, हर्ष-शोक व सुख-दुःख का न होना ----- ही ज्ञान है, और यही ज्ञानी के लक्षण है| यह समत्व ही गीता का सार है, जैसा मुझे अपनी अल्प और अति सीमित बुद्धि से समझ में आया है|
ॐ तत्सत् !! ॐ श्रीपरमात्मने नमः !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ नवंबर २०२०

भोजन एक यज्ञ है जिसमें हर आहुति भगवान को दी जाती है ---

भोजन एक यज्ञ है जिसमें हर आहुति भगवान को दी जाती है। भोजन करने या जल पीने से पूर्व -- कुछ क्षणों तक उसे निहारें, और मानसिक रूप से भगवान को अर्पित करें। उनका सेवन बड़े प्रेम से धीरे-धीरे इस भाव से करें कि हमारे माध्यम से स्वयं भगवान ही इसे ग्रहण कर रहे हैं, और पूरी सृष्टि का इस से पालन-पोषण हो रहा है। गीता में भगवान कहते हैं --

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥१५:१४॥"
अर्थात् -- "मैं ही समस्त प्राणियों के देह में स्थित वैश्वानर अग्निरूप होकर प्राण और अपान से युक्त चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ॥"
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गीता में भगवान ने भोजन को एक ब्रह्मकर्म बताया है --
"ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥४:२४॥"
अर्थात् -- "अर्पण (अर्थात् अर्पण करने का साधन श्रुवा) ब्रह्म है और हवि (शाकल्य अथवा हवन करने योग्य द्रव्य) भी ब्रह्म है; ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा जो हवन किया गया है, वह भी ब्रह्म ही है। इस प्रकार ब्रह्मरूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष का गन्तव्य भी ब्रह्म ही है॥"
२७ नवंबर २०२१

भगवत्-प्राप्ति ही -- सत्य-सनातन-धर्म है ---

 भगवत्-प्राप्ति ही -- सत्य-सनातन-धर्म है ---

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इस सारी सृष्टि में, और सृष्टि से परे, जो कुछ भी है, वे भगवान स्वयं हैं। उनके संकल्प से ही 'ऊर्जा' और 'प्राण' की उत्पत्ति हुई। सारा भौतिक जगत -- अनंत ऊर्जा-खंडों (Energy blocks) के पृथक-पृथक विभिन्न आवृतियों (Frequencies) पर स्पंदन (Vibrations) से निर्मित है। सारा आकाश -- ऊर्जा और प्राण का ही अनंत विस्तार है।
प्राण-तत्व ने सारे प्राणियों में जीवन को व्यक्त किया है। इस प्राण और ऊर्जा के पीछे ज्ञात और अज्ञात जो कुछ भी है, वे स्वयं भगवान हैं। यह सृष्टि निरंतर गतिशील एक तीव्र अनंत प्रवाह है। कहीं कुछ भी स्थिर नहीं है, निरंतर परिवर्तन हो रहा है।
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भारत के मनीषियों ने प्रकृति के सारे रहस्यों को अनावृत किया है, और उन्हें जानने का मार्ग भी दिखाया है। भक्ति और समर्पण के द्वारा हम स्वयं को भगवान के साथ जोड़ कर उन्हें उपलब्ध हो सकते हैं। श्रुतियों (वेद-उपनिषदों) व श्रीमद्भगवद्गीता जैसे ग्रन्थों में सारा मार्गदर्शन है। आवश्यकता है सत्य को जानने की एक तीव्र अभीप्सा और परमप्रेम की। भगवान ही एकमात्र सत्य हैं।
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यह भगवत्-प्राप्ति ही -- सत्य-सनातन-धर्म है। यही हमारा स्वधर्म है। इस स्वधर्म के लिए हमारे हृदय में एक प्रचंड अग्नि जलती रहेगी तो उसकी वेदना को शांत करने के लिए भगवान को प्रत्यक्षतः आना ही पड़ेगा। उनका निरंतर अनुस्मरण करते हुये अपना सम्पूर्ण अस्तित्व भगवान को समर्पित करना ही स्वधर्मरूप युद्ध है। इसी में सार है। भगवान ने गीता में आदेश दिया है --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् -- इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो। मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥"
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इस स्वधर्म में ही हमारे इस भौतिक शरीर का निधन होना चाहिए। गीता में यह भगवान का कथन है --
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३:३५॥"
अर्थात् -- सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है; स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है॥
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इस धर्म का थोड़ा सा आचरण भी महान भय से हमारी रक्षा करता है --
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥२:४०॥"
अर्थात् -- इसमें क्रमनाश और प्रत्यवाय दोष नहीं है। इस धर्म (योग) का अल्प अभ्यास भी महान् भय से रक्षण करता है॥
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ नवंबर २०२१