Wednesday, 20 October 2021

भगवान हैं, इसी समय स्थायी रूप से मेरे हृदय में हैं, और मैं भी उन्हीं के हृदय में हूँ ---

 

भगवान हैं, इसी समय स्थायी रूप से मेरे हृदय में हैं,
और मैं भी उन्हीं के हृदय में हूँ ---
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पता नहीं क्यों आज इसी समय मेरे दिमाग में अनेक उलझनें और बहुत सारे प्रश्न उठ रहे हैं। सारी उलझनें और सारे प्रश्न भगवान को बापस लौटा दिये हैं। न तो उनके उत्तर जानने की इच्छा है, और न उन्हें समझने की। मेरे सारे प्रश्नों का और सारी उलझनों व समस्याओं का एक ही उत्तर है -- "भगवान हैं"। यह शब्द मेरी सब आध्यात्मिक समस्याओं का समाधान है। भगवान हैं, इसी समय हैं, सर्वदा हैं, यहीं पर हैं, सर्वत्र हैं, वे मेरे हृदय में और मैं उनके हृदय में नित्य निरंतर बिराजमान हूँ। नारायण नारायण नारायण नारायण !!
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जब से उन से प्रेम हुआ है, सारे नियम टूट गए हैं। यह जीवन समस्याओं की एक लम्बी शृंखला है, भागकर जाएँ तो जाएँ कहाँ? लेकिन जब से सब समस्याएँ सृष्टिकर्ता को बापस सौंप दी है, जीवन में सुख शांति है। अब तो सारे सिद्धान्त, मत-मतान्तर, परम्पराएँ, और सम्प्रदाय, -- जिनका संकेत परमात्मा की ओर है, वे मेरे ही हैं। मेरा एकमात्र संबंध परमात्मा से है।
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भगवान का कितना सुंदर आश्वासन है --
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥
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मेरे जैसे अकिंचन से अकिंचन सामान्य व्यक्ति को जब भगवान अपने हृदय में बैठा सकते हैं, तब आप तो सब बहुत बड़े-बड़े अति प्रतिष्ठित और सम्माननीय लोग हो। आपको तो प्राथमिकता मिलेगी। भगवान कहते हैं --
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि स॥९:३०॥"
अर्थात यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है॥
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उन्हें छोड़ कर कहाँ जाऊँ? उन्होने तो वाल्मिकी रामायण में आश्वासन दिया है --
"सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥"
अर्थात् - 'जो एक बार भी मेरी शरण में आकर 'मैं तुम्हारा हूँ' ऐसा कहकर रक्षा की याचना करता है, उसे मैं सम्पूर्ण प्राणियों से अभय कर देता हूँ – यह मेरा व्रत है।
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वराह पुराण में भगवान् श्रीहरिः कहते हैं --
"वातादि दोषेण मद्भक्तों मां न च स्मरेत्। अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमां गतिम्॥"
अर्थात् -- यदि वातादि दोष के कारण मृत्यु के समय मेरा भक्त मेरा स्मरण नहीं कर पाता, तो मैं उसका स्मरण कर उसे परम गति प्रदान करवाता हूँ॥
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मेरे में इतनी सामर्थ्य भी नहीं है है कि इस शरीर के अंत समय में भगवान का स्मरण कर सकूँ। भगवान स्वयं ही मेरा स्मरण करेंगे। यह देह तो चिता पर भस्म हो जाएगी, पर वे मुझे निरंतर अपने हृदय में रखेंगे।
"वायुरनिलममृतमथेदं भस्मांतं शरीरम्‌।
ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर॥"
(ईशावास्योपनिषद मंत्र १७)
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गीता में कितना स्पष्ट आश्वासन है उनका ---
"मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥१२:८॥"
अर्थात् - "तुम अपने मन और बुद्धि को मुझमें ही स्थिर करो, तदुपरान्त तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संशय नहीं है॥"
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हे प्रभु, आप ने इतनी सारी बड़ी बड़ी बातें मेरे जैसे अशिक्षित अनपढ़ अकिंचन के माध्यम से कह दीं। आप की जय हो॥ ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२० अक्तूबर २०२१

शरद पूर्णिमा पर आप सब का अभिनंदन !! ---

 

शरद पूर्णिमा पर आप सब का अभिनंदन !!
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ऐसी मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात्री को आठ-नौ वर्ष की आयु के बालक भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचा था। इस के पश्चात तो अध्ययन के लिए उन्हें गुरुकुल भेज दिया गया था।
 
पहले प्रायः सभी हिन्दू मंदिरों में उत्सव मनाया जाता था, भजन-कीर्तन होते थे, और खीर का प्रसाद बाँटा जाता था। शरदपूर्णिमा की चांदनी रात में रखी खीर का ठाकुर जी के भोग लगाकर प्रसाद रूप में सभी ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा का चांद सम्पूर्ण १६ कलाओं से युक्त होकर रात भर अमृत की वर्षा करता है। ऐसी भी मान्यता है कि माँ लक्ष्मी इस रात्रि में भ्रमण करती हैं और उन्हें जागरण व आराधना करता हुआ कोई मिलता है तो उस पर अपनी अपार कृपा की वर्षा करती हैं। भारत के कुछ भागों में शरद पूर्णिमा पर हनुमान जी की विशेष आराधना भी होती है। 
 
इस अवसर पर भगवान से मेरी प्रार्थना है कि --
सत्य-सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण हो। भारत में छाए असत्य का अंधकार दूर हो। विश्व में धर्मनिष्ठों पर हो रहे अत्याचार बंद हों। गोमाता के बध पर पूर्ण प्रतिबंध हो। भारत एक सत्य-धर्मनिष्ठ अखंड राष्ट्र बने, जहाँ की राजनीति सत्य पर आधारित हो। कैलाश-मानसरोवर तो शीध्रातिशीघ्र भारत का भाग हो।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२० अक्तूबर २०२१

याद रखो कि जाना कहाँ है ---

याद रखो कि जाना कहाँ है ---
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जो कल करना है सो आज करो, और जो आज करना है वह अभी करो। शुभ काम में देरी ना करो। सर्वाधिक शुभ कार्य है -- भक्तिपूर्वक परमात्मा का ध्यान, जिसे आगे पर ना टालें। जो कहते हैं कि अभी हमारा समय नहीं आया है, उनका समय कभी नहीं आएगा।
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जो कहते हैं कि संसार में उलझे हुए हैं, भगवान के लिए फुर्सत कैसे निकालें? उनके लिए हमारा उत्तर है --
जब हम साइकिल चलाते हैं तब पैडल भी मारते हैं, हेंडल भी पकड़ते हैं, ब्रेक पर अंगुली भी रखते है, सामने भी देखते हैं, और यह भी याद रखते हैं कि कहाँ जाना है। इतने सारे काम एक साथ करने पड़ते हैं, अन्यथा साइकिल नहीं चला पाएंगे। संसार में इस देह रूपी साइकिल को भी चलाओ, लेकिन याद रखो कि जाना कहाँ है।
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हमारा लक्ष्य परमात्मा है। किसी भी तरह का लोभ, अहंकार व कामना हृदय में न हो, सिर्फ प्रभु को पाने की अभीप्सा हो। "एक साधे सब सधैं, सब साधे सब खोय"।
सारे सांसारिक संबंधों के पीछे स्वार्थ या अहंकार छिपा हुआ है। बेशर्त (Unconditional) प्रेम सम्बन्ध सिर्फ परमात्मा से ही संभव है।
ॐ तत्सत् !!
२१ अक्तूबर २०२१

हमारा चरित्र, श्वेत कमल की भाँति इतना उज्जवल हो, जिसमें कोई धब्बा ना हो ---

 

हमारा चरित्र, श्वेत कमल की भाँति इतना उज्जवल हो, जिसमें कोई धब्बा ना हो। हमारे आदर्श और हमारा चिंतन उच्चतम हो। यह तभी संभव है जब हम भगवान के प्रति समर्पित हों। जिस क्षण हमें भगवान की याद आती है, वह क्षण बहुत अधिक शुभ होता है। उस क्षण कोई देश-काल या शौच-अशौच का बंधन नहीं होता। भगवान से एक क्षण का वियोग भी मृत्यु-तुल्य है। भगवान के लिये एक बेचैनी, तड़प और घनीभूत प्यास बनाए रखें।
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कीटक नाम का एक साधारण सा कीड़ा भँवरे से डर कर कमल के फूल में छिप जाता है| भँवरे का ध्यान करते करते वह स्वयं भी भँवरा बन जाता है। वैसे ही हम भी निरंतर भगवान का ध्यान करते करते उन के साथ एक हो जाते हैं।
भगवान की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब को नमन !!
कृपा शंकर
१८ अक्तूबर २०२०

महत्व सिर्फ भक्ति का है ---

भगवान सब सिद्धांतों, मत-मतान्तरों, परम्पराओं, सम्प्रदायों, मज़हबों और रिलीजनों से परे है| उन्हें हम किसी मज़हब से बांध नहीं सकते| भगवान साकार भी हैंऔर निराकार भी| सारे आकार उन्हीं के हैं| महत्व सिर्फ भक्ति यानि परम प्रेम का है| जिससे भी हमारी भक्ति बढ़े वह सही है, और जिससे हमारी भक्ति घटे वह गलत है|

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देशकाल (स्थान व समय) के प्रभाव से कोई बच नहीं सकता| आत्म-तत्व को हर कोई समझ नहीं सकता| जिन को इसका आभास मात्र भी है, वे बड़े भाग्यशाली हैं| निज जीवन में वे इसे व्यक्त करने का प्रयास करते रहें| स्वयं परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कोई भी इस दिशा में हमारी न तो किसी तरह की सहायता करेगा, और न ही समर्थन करेगा| परमात्मा को समर्पित होकर इस दिशा में निरंतर गतिशील रहें| परमात्मा को प्राप्त करने का अर्थ है .... परमात्मा को समर्पण| इसमें कुछ प्राप्त नहीं होता, क्योंकि प्राप्त होने योग्य कुछ भी नहीं है| हम स्वयं ही समर्पित होकर अपने लक्ष्य के साथ एक हो जाते हैं, वैसे ही जैसे जल की एक बूंद महासागर में समर्पित होकर स्वयं ही महासागर बन जाती है| अंत में हम पायेंगे कि जिसे हम प्राप्त करना चाहते हैं, जिसे हम खोज रहे हैं, वह तो हम स्वयं ही हैं| यही परमात्मा की प्राप्ति है|
कृपा शंकर
२० अक्टूबर २०२०

भगवान का साथ ही शाश्वत है ---

हम भगवान के पीछे-पीछे नहीं भागते, वे ही हमारे साथ-साथ, पीछे-पीछे और आगे-आगे चलते हैं| हमारे में इतनी शक्ति नहीं है कि उन की दुस्तर माया को पार कर सकें, अतः हम जहाँ भी हैं, वहाँ भगवान स्वयं ही चले आते हैं| जैसे एक पिता अपने पुत्र के बिना नहीं रह सकता वैसे ही भगवान भी हमारे बिना नहीं रह सकते| वे निरंतर हमारा ध्यान रखते हैं| इस जीवन को हम नहीं, वे ही जी रहे हैं| दुःख मे, सुख में, सदा वे हमारे साथ हैं| जब भी उन्हें हाथ थमाते हैं, वे हाथ पकड़ते है|

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गीता में उनके वचन हैं ...
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते| तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्||९:२२||"
अर्थात अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ||
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"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि| अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि||१८:५८||"
अर्थात मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे||
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"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्| साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः||९:३०||"
अर्थात यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है||
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मेरे में इतनी सामर्थ्य भी नहीं है है कि इस शरीर के अंत समय में भगवान का स्मरण कर सकूँ| भगवान स्वयं ही मेरा स्मरण करेंगे| यह देह तो चिता पर भस्म हो जाएगी, पर वे मुझे निरंतर अपने हृदय में रखेंगे|
"वायुरनिलममृतमथेदं भस्मांतं शरीरम्‌| ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर||" (ईशावास्योपनिषद मंत्र १७)
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उनके चरणों में आश्रय माँगा था, पर उन्होंने तो अपने हृदय में ही दे दिया है| अब उनको छोड़कर कोई स्थान भी नहीं बचा है| अब कहीं भी नहीं जाना है| उनका साथ ही शाश्वत है|
ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० अक्टूबर २०२०

Monday, 18 October 2021

क्या में मुक्त हूँ? ---

क्या में मुक्त हूँ? इसका उत्तर अपने अंतर्मन में झांक कर बहुत अच्छी तरह से सोच-विचार कर दे रहा हूँ -- नहीं, बिल्कुल नहीं।

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अपनी एक कमी का मुझे पता है, जो इस जन्म में दूर नहीं हो सकती। उसके लिए मुझे कम से कम एक और जन्म लेना ही पड़ेगा। इस जीवन में किसी भी तरह की अन्य कोई कमी नहीं थी। भगवान के प्रति भक्ति भी खूब थी, शास्त्रों के अध्ययन, विद्वता और ज्ञान में भी कोई कमी नहीं थी। जीवन में अनेक दिव्य अनुभव हुए। अनेक देशों का भ्रमण किया, इस पृथ्वी की परिक्रमा भी की, अनेक तरह के लोगों से मिला, प्रकृति के सौम्य और विकराल रूपों के दर्शन भी अनेक बार किये।
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भगवान से सदा प्रेरणा मिलती थी कि विरक्त होकर एकांत में रहूँ, और सारा जीवन आध्यात्मिक साधना में व्यतीत करूँ। लेकिन इसके लिए आवश्यक साहस का सदा अभाव रहा। विरक्त होने का साहस नहीं जुटा पाया। पूर्व जन्मों में इतने अच्छे कर्म भी नहीं किये थे कि इस जन्म में पूर्णता मिले।
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किसी को दोष नहीं दे रहा, स्वयं के संचित कर्म ही इतने अच्छे नहीं थे। लेकिन अब एक आंतरिक आश्वासन है कि जब भी पुनर्जन्म होगा तो हर जीवन में जन्म से ही पूर्ण भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और परमात्मा की अभिव्यक्ति होगी। अब कोई इच्छा नहीं रही है। एकांत में भगवान मुझे अपनी उपासना में ही लगाए रखें। किसी भी तरह की किसी कामना का जन्म ही न हो। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
९ अक्तूबर २०२१