Monday, 11 March 2019

हम परमात्मा की उपासना करें, न कि उनकी अभिव्यक्तियों या प्रतीकों की .....

हम परमात्मा की उपासना करें, न कि उनकी अभिव्यक्तियों या प्रतीकों की .....
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(जिस विषय पर लिखने का मैं साहस कर रहा हूँ, उस पर बिना गुरुकृपा के कुछ भी लिखना असंभव है. मुझ अकिंचन पर गुरुकृपा फलीभूत हो.)
यह परमात्मा का प्रेम ही है जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष हर रूप में व्यक्त हो रहा है| हमारी इस देह के जन्म से पूर्व जो प्रेम हमारे माता-पिता में था, वह परमात्मा का ही प्रेम था| गर्भस्थ शिशु के प्रति माँ का प्रेम भी परमात्मा का ही प्रेम था| जन्म के पश्चात माता-पिता व सभी सम्बंधियों व मित्रों का प्रेम भी परमात्मा का ही प्रेम था जो उनके माध्यम से व्यक्त हुआ और हो रहा है| सारे प्रेम का स्त्रोत परमात्मा ही हैं| परमात्मा स्वयं ही अनिर्वचनीय परमप्रेम और उस से उत्पन्न परम आनंद है|
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हमारे इस जीवन के सूत्रधार भी परमात्मा ही हैं| वे ही इस हृदय में धड़क रहे हैं, इन फेफड़ों से सांस ले रहे हैं, इन आँखों से देख रहे हैं, इन कानों से सुन रहे हैं, इन पैरों से चल रहे हैं और इन हाथों से काम कर रहे हैं| हमारा सारा अंतःकरण भी उन्हीं के द्वारा संचालित हो रहा है| पर उन्होंने हमें स्वयं से दूर जाने की छूट भी दी है| उन्होंने प्रकृति का निर्माण किया और उसके नियम बनाए| प्रकृति अपने नियमों के अनुसार चलती है, किसी के साथ भेदभाव नहीं करती| कर्मफलों के सिद्धांतानुसार दुःखों व सुखों के लिए हम स्वयं ही उत्तरदायी हैं जो प्रकृति के नियमानुसार है| प्रकृति के नियमों को न जानना हमारी अज्ञानता है| हमारे ज्ञान के स्त्रोत भी वे परमात्मा ही हैं| उनको पाने के मार्ग का नाम है "परम प्रेम"|
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इन पंक्तियों को लिखने का मेरा उद्देश्य यह कहना है कि हम उन्हें अपने ऊर्ध्वस्थ मूल में ढूंढें| इसे मैं अपनी सीमित व अल्प बुद्धि से यथासंभव समझाने का प्रयास करूंगा| यदि न समझा सका तो आप यही मानिए कि उसकी क्षमता मुझ में नहीं है| पर मुझे मेरे अंतर में कणमात्र भी संशय नहीं है|
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भगवान गीता में कहते हैं.....
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्| छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्||१५:१||
यह श्लोक हमें कठोपनिषद् में वर्णित अश्वत्थ वृक्ष का स्मरण कराता है| यदि परमात्मा ही एकमात्र सत्य है तो यह परिछिन्न जगत कैसे उत्पन्न हुआ? उत्पन्न होने के पश्चात् कौन इसका धारण और पोषण करता है? सृष्टिकर्ता अनन्त ईश्वर और सृष्ट जगत् के मध्य वस्तुतः क्या संबंध है?
अश्वत्थ शब्द में श्व का अर्थ आगामी कल है, त्थ का अर्थ है स्थित रहने वाला| अतः अश्वत्थ का अर्थ होगा ..... वह जो कल अर्थात् अगले क्षण पूर्ववत् स्थित नहीं रहने वाला है| अश्वत्थ शब्द से इस सम्पूर्ण अनित्य और परिवर्तनशील दृश्यमान जगत् की ओर इंगित किया गया है| इस श्लोक में कहा गया है कि इस अश्वत्थ का मूल ऊर्ध्व में अर्थात् ऊपर है|
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आचार्य शंकर के अनुसार संसार को वृक्ष कहने का कारण यह है कि उसको काटा जा सकता है "व्रश्चनात् वृक्ष"| वैराग्य के द्वारा हम अपने उन समस्त दुखों को समाप्त कर सकते हैं जो इस संसार में हमें अनुभव होते हैं| जो संसारवृक्ष परमात्मा से अंकुरित होकर व्यक्त हुआ प्रतीत होता है, उसे हम अपना ध्यान परमात्मा में केन्द्रित कर के काट सकते हैं|
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इस संसार वृक्ष का मूल ऊर्ध्व कहा गया है जो सच्चिदानन्द ब्रह्म है| वृक्ष को आधार तथा पोषण अपने ही मूल से ही प्राप्त होता है| इसी प्रकार हमें भी हमारा भरण-पोषण सच्चिदानंद ब्रह्म से ही प्राप्त होता है| हमें हमारे ऊर्ध्वमूल को पाने का ही निरंतर प्रयास करना चाहिए, यही हमारा सर्वोपरी कर्तव्य है| यही सबसे बड़ी सेवा है जो हम दूसरों के लिए कर सकते हैं| जो इस जीवन वृक्ष के रहस्य को समझ लेता है वही वेदवित है|
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हमारा ऊर्ध्वमूल कूटस्थ है| ध्यान साधना द्वारा कूटस्थ में ही हमें परमात्मा का अनुसंधान करना होगा| इसकी विधि उपनिषदों में व गीता में दी हुई है,पर कोई समझाने वाला सिद्ध आचार्य चाहिए जो श्रौत्रीय और ब्रह्मनिष्ठ भी हो| जिस दिन हमारे में पात्रता होगी उस दिन भगवान स्वयं ही आचार्य गुरु के रूप में आ जायेंगे| अतः हर कार्य, हर सोच परमात्मा की कृपा हेतु ही करनी चाहिए|
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परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब निजात्मगण को नमन !
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! श्रीगुरवे नमः ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ फरवरी २०१९

हम सच्चिदानन्द की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति हैं .....

हम सच्चिदानन्द की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति हैं .....
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हम सच्चिदानंद की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति और उन्हीं के साथ एक हैं| कहीं कोई भेद नहीं है| वे ही हमारे शाश्वत साथी हैं, जन्म से पूर्व भी वे ही हमारे साथ थे और मृत्यु के पश्चात भी वे ही हमारे साथ रहेंगे| कोई माने या न माने इससे कोई फर्क नहीं पड़ता,पर इस परम सत्य को कोई झुठला नहीं सकता कि भगवान ही हमारे प्रथम, अंतिम और एकमात्र सम्बन्धी हैं| वे ही परम शिव हैं, वे ही विष्णु हैं और वे ही सर्वस्व हैं| उनकी अनुभूति में बने रहना ही परम तीर्थ है| उनके प्रति आकर्षण और उनमें तन्मय हो जाना ही सच्चा प्रकाश है| इस देह को धारण भी उन्होंने ही कर रखा है| उनकी चेतना में बने रहना और पूर्ण रूपेण समर्पित होकर उनके साथ एकाकार होना ही जीवन का लक्ष्य है| यही साधना है और यही जीवन की सार्थकता है|
वे कहते हैं .....
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते | वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ||७:१९||"
अर्थात् बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि यह सब वासुदेव है ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है।।
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जब अग्नि के समक्ष होते हैं तब तपन की अनुभूति अवश्य होती है| ऐसे ही जब भगवान के सम्मुख होते हैं तब अनायास ही उनके अनुग्रह की अनुभूति होती है| इस लिए हमें निरंतर उनके स्मरण व उनकी चेतना के प्रकाश में रहना चाहिए|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ श्रीगुरवे नमः ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ फरवरी २०१९

विद्वान कौन है ? ....

विद्वान कौन है ?
प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति विजानन्विद्वान्भवते नातिवादी |
आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ||मुण्डकोपनिषद, ३.१.४ ||
..... प्राण तत्व, जो सब भूतों/प्राणियों में प्रकाशित है, को जानने वाला ही विद्वान् है, न कि बहुत अधिक बात करने वाला| वह आत्मक्रीड़ारत और आत्मरति यानि आत्मा में ही रमण करने वाला क्रियावान ब्र्ह्मविदों में वरिष्ठ यानि श्रेष्ठ है|
(भक्तिसुत्रों में आत्मा में रमण करने वाले को आत्माराम कहा गया है ... "यज्ज्ञात्वा मत्तो-भवति, स्तब्धो भवति, आत्मारामो भवति")
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श्वेतकेतु की कथा महाभारत के आदिपर्व में भी आती है| ये अपने समय के सबसे बड़े समाज सुधारक थे जिन्होनें कई नई व्यवस्थाएं दीं जो आज भी हिन्दू समाज में प्रचलित हैं| छान्दोग्य उपनिषद्‍ (अध्याय ६, खंड १३) में परमात्मा या परब्रह्म की व्यापकता को लेकर ऋषि उद्दालक (अरुणपुत्र आरुणि) एवं उनके पुत्र श्वेतकेतु के बीच एक संवाद का उल्लेख मिलता है|
छान्दोग्योपनिषद् की एक कथा है ..... धोम्य ऋषि के शिष्य आरुणी उद्दालक का पुत्र श्वेतकेतु गुरुकुल से शिक्षा प्राप्त करके अपने घर आया| उसमें गुरुकुल में सीखी हुई विद्याओं का अहंकार था, उसके पिता उसके अहंकार को देखकर समझ गए उसने वेदों के मर्म को नहीं समझा है, केवल शाब्दिक शिक्षाओं का बोझा ढोकर ही आया है|
पूरी कथा बहुत लम्बी है अतः संक्षेप में ही समापन कर रहा हूँ| उन्होंने उसे तत त्वं असि = तत्वमसि ब्रह्मज्ञान का उपदेश देकर समझाया कि शब्दों के ज्ञान से कोई विद्वान नहीं बनता| उसके लिए आत्म-तत्व को जानना बड़ा आवश्यक है|
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इस की विधि उपनिषदों में और गीता में भी दी हुई है| पर किसी श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सिद्ध आचार्य का मार्गदर्शन आवश्यक है जो परमात्मा की परम कृपा से ही प्राप्त होता है| गीता के अनुसार समत्व में स्थिति ही ज्ञान है, और ज्ञानी भी वही है जिसने समत्व को प्राप्त कर लिया है| बहुत सारी डिग्रियों को प्राप्त कर के कोई ज्ञानी नहीं हो सकता| उपनिषदों के अनुसार विद्वान् भी वही है जो आत्म-तत्व में रमण करता है|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ श्रीगुरवे नमः ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२३ फरवरी २०१९

शरणागति ही एकमात्र मार्ग बचा है, अन्य कोई मार्ग अब नहीं है .....

शरणागति ही एकमात्र मार्ग बचा है, अन्य कोई मार्ग अब नहीं है .....
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यह एक आध्यात्मिक रहस्य है कि परमात्मा की प्राप्ति के लिए हम जो भी साधना करते हैं, उसका सिर्फ एक चौथाई भाग यानि २५% ही हमें करना पड़ता है, एक चौथाई भाग यानि २५% हमारे गुरु महाराज स्वयं हमारे साथ साथ करते हैं, और बाकी का ५०% स्वयं परमात्मा करते हैं| पर हमारा जो २५% भाग है उसका शत-प्रतिशत तो हमें करना ही पड़ता है| उसमें कोई माफी नहीं है| इतनी बड़ी छूट गुरु महाराज की कृपा से भगवान ने करुणावश होकर हमें दी है| शरणागत होकर हमें उनको इस आध्यात्मिक मार्ग पर कर्ता बनाना ही होगा|
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भगवान कहते हैं....
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज| अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः||१८:६६||

अर्थात् सब धर्मोंको छोड़कर यानी सब कर्मों का सन्यास करके, मुझ एक की ही शरण में आ, अर्थात् परमात्मा से भिन्न कुछ है ही नहीं, ऐसा निश्चय कर| इस प्रकार निश्चय वाले को मैं अपना स्वरूप प्रत्यक्ष करा के समस्त धर्माधर्मबन्धनरूप पापोंसे मुक्त कर दूँगा| यह भगवान का वचन है|
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इस से पूर्व भी जो भगवान ने कहा है वह भी नित्य विचारणीय है ....
"तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत | तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ||१८:६२||"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ||१८:६५||"
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हमारा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है| जो भी हैं वे मेरे परम-प्रिय परम-प्राण हैं|
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ श्री गुरवे नमः ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ फरवरी २०१९

आत्म-तत्व की चेतना का कम होना बड़ा पीडादायक हो रहा है .....

आत्म-तत्व की चेतना का कम होना बड़ा पीडादायक हो रहा है .....
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आत्म तत्व की चेतना का कम होना सारी आध्यात्मिक प्रगति को अवरुद्ध कर देता है| इसका एकमात्र कारण मन की चंचलता है| मन पर नियंत्रण प्राण-तत्व ही कर सकता है| प्राणों की चंचलता को कम कर के ही हम मन पर नियंत्रण कर सकते हैं| प्राण-तत्व .... ध्यान-साधना, अजपा-जप और क्रिया-योग से ही समझ और नियंत्रण में आता है| यह बुद्धि का विषय नहीं है|
थोड़ा सा भी सांसारिक मोह, हमारे पतन का कारण बन जाता है| बस यही तो हमारी कमी है| हे गुरु-रूप परमशिव परब्रह्म, आपकी पूर्ण कृपा हम सब पर फलीभूत हो| संसार से मोह नहीं छूटने के कारण ही आगे का मार्ग अवरुद्ध हो रहा है| यह मेरी ही नहीं सभी की पीड़ा है| निरंतर अभ्यास और वैराग्य ही हमें मुक्त कर सकते हैं| गीता में भगवान कहते हैं.....
"असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌ | अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ||६:३५||
भगवान स्वयं ही ..... एकमात्र साधन सभी सांसारिक कामनाओं के त्याग (वैराग्य) और निरन्तर अभ्यास को बता रहे हैं|
इतनी सी बात समझ में आ रही है यह भी गुरु-कृपा ही है| हे गुरु-रूप परमशिव, हमारे समर्पण में पूर्णता हो| अन्य कुछ भी पाने की कामना का जन्म ही न हो| आप हमारी हर सांस, प्राण-प्रवाह और चेतना में निरंतर रहें|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! श्री गुरवे नमः ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ फरवरी २०१९

मुक्ति की सोचें, बंधनों की नहीं .....

मुक्ति की सोचें, बंधनों की नहीं .....
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सनातन धर्म हमें सिखाता है कि हम अपने अंतःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, और अहंकार) पर नियंत्रण करें और हर तरह की कामनाओं व वासनाओं से मुक्त हों| हर कामना व वासना एक बंधन है| स्वर्ग की कामना भी एक अधोगामी बंधन है| दूसरों को दुःख देना एक महापाप है| यदि हम स्वयं के सुख के लिए दूसरों को दुखी या पीड़ित करते हैं हैं तो निश्चित रूप से नर्कगामी पथ पर चल रहे हैं|
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हमने कभी पूर्ण हृदय से भगवान को चाहा ही नहीं| यदि पूर्ण हृदय से चाहते तो भगवान अब तक अवश्य मिल जाते| भगवान ने गीता में स्पष्ट कहा है कि कौन किस विधि से उन्हें प्रात कर सकता है| वह विधि है ..... अनन्य योग और अव्यभिचारिणी भक्ति| काश ! उसकी पात्रता हमारे में भी होती|
"मयि चानन्ययोगेन भक्ितरव्यभिचारिणी | विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि||१३:११||"
"इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः| मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते||१३:१९||"


ॐ तत्सत् !
२२ फरवरी २०१९

"निष्काम साधना" और "सेवा" ये ही हमारे साधन हैं .....

"निष्काम साधना" और "सेवा" ये ही हमारे साधन हैं .....
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जैसे जैसे परिपक्वता बढ़ती है वैसे वैसे ही हमारी सोच और हमारे विचार भी बदलते रहते हैं| कोई आवश्यक नहीं है कि सभी के विचार मिलें, पर समान विचारों के लोगों का साथ जीवन को आसान बना देता है| "साधना" और "सेवा" इन दोनों की अवधारणा भी अपनी अपनी सोच के अनुसार अलग अलग ही होती है| मैं अपने विचार किसी पर नहीं थोपता और न ही किसी को उसके विचार मुझ पर थोपने देता हूँ| जिन लोगों से मेरा स्वभाव और मेरे विचार मिलते हैं, सहज रूप से उनके साथ आत्मीयता हो ही जाती है| वैसे मेरी सद्भावना सभी के प्रति है क्योंकि एक स्तर पर मेरे सिवाय कोई अन्य है ही नहीं| सामाजिकता के नाते भी कई लोगों से मेरा मिलना होता रहता है जिसे मैं टाल नहीं सकता| पर मेरा लक्ष्य भी आध्यात्मिक है और सेवा की अवधारणा भी आध्यात्मिक है| जीवन से मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ| किसी से कोई शिकायत नहीं है| धर्म और राष्ट्र के प्रति भी मेरी अवधारणा स्पष्ट है| किसी भी तरह का कोई संशय नहीं है|
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सभी को मेरी शुभ कामनाएँ और नमन ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ फरवरी २०१९