Friday, 7 December 2018

भारत का मौसम सर्वश्रेष्ठ है ......

भारत का मौसम सर्वश्रेष्ठ है ......
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पूरी पृथ्वी पर भारत का मौसम सर्वश्रेष्ठ है| यहाँ वर्ष में अधिकतम दो या तीन बार समुद्री चक्रवात आते हैं, जिनकी भी गहनता अधिक नहीं होती| इनके प्रभाव से तटीय क्षेत्रों में खूब वर्षा होती है|
अगर हम उन विकराल समुद्री तूफानों से तुलना करें जो उत्तरी प्रशांत के पश्चिमी भाग में 180° व 100°E.की देशान्तर रेखाओं के मध्य में फिलिपीन्स सागर में उत्पन्न होते हैं तो भारत के चक्रवात उनके सामने कुछ भी नहीं हैं|
वहाँ अभी सर्दियों में एक के बाद एक महा भयावह तूफानों की श्रृंखला जन्म लेना प्रारम्भ कर देगी| ये फिलिपीन के लुज़ॉन द्वीप के पूर्वी भाग से टकराते हुए ताइवान के पास से जापान की ओर बढ़ जाते हैं| कभी तो ये जापान से टकराते हैं और कभी जापान के पास से अमेरिका के अल्युशियन द्वीप समूह की ओर बढ़ जाते हैं| इनके केंद्र के आसपास कोई जहाज आ जाए तो उसका डूबना निश्चित है| पूरा उत्तरी प्रशांत महासागर छोटे मोटे अनेक तूफानों से भर जाता है| सबसे खराब मौसम तो जापान का है|
प्रकृति ने हमें पृथ्वी पर सबसे अच्छा मौसम दिया है|
धन्य है भारत माँ | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
७ दिसंबर २०१६

हमें सिर्फ और सिर्फ परमात्मा चाहिए, उससे कम कुछ भी अन्य नहीं .....

हमें सिर्फ और सिर्फ परमात्मा चाहिए, उससे कम कुछ भी अन्य नहीं .....
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परमात्मा से कम कुछ भी हमें स्वीकार्य नहीं है| हमें न तो उसकी विभूतियों से कोई मतलब है, न उसके ऐश्वर्य से, और न उसकी किसी महिमा से|
न तो हमें कोई गुरु चाहिए और न कोई शिष्य|
कोई भी और कुछ भी अन्य नहीं चाहिए| किसी भी तरह का कोई सिद्धांत और मत भी नहीं चाहिए|
परमात्मा से अन्य कुछ भी कामना का होना सबसे बड़ा धोखा है, अतः हमें सिर्फ परमात्मा ही चाहिए, अन्य कुछ भी नहीं|
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किसी भी तरह की निरर्थक टीका-टिप्पणी वालों से कोई मतलब हमें नहीं है, और न ही आत्म-घोषित ज्ञानियों से|
यह संसार है, जिसमें तरह तरह के लोग मिलते हैं, जो एक नदी-नाव का संयोग मात्र है, उससे अधिक कुछ भी नहीं|
भूख-प्यास, सुख-दुःख, शीत-उष्ण, हानि-लाभ, मान-अपमान और जीवन-मरण ---- ये सब इस सृष्टि के भाग हैं जिनसे कोई नहीं बच सकता| इनसे हमें प्रभावित भी नहीं होना चाहिए| ये सब सिर्फ शरीर और मन को ही प्रभावित करते हैं| देह और मन की चेतना से ऊपर उठने के सिवा कोई अन्य विकल्प हमारे पास नहीं है|
चारों ओर छाए अविद्या के साम्राज्य से हमें बचना है और सिर्फ परमात्मा के सिवाय अन्य किसी भी ओर नहीं देखना है|
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नित्य आध्यात्म में ही स्थित रहें, यही हमारा परम कर्तव्य है| स्वयं साक्षात् परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं, कुछ भी हमें नहीं चाहिए| यह शरीर रहे या न रहे इसका भी कोई महत्व नहीं है| बिना परमात्मा के यह शरीर भी इस पृथ्वी पर एक भार ही है|
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ॐ तत्सत् | ॐ शिव ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
७ दिसंबर २०१६

अंडमान का हेवलॉक द्वीप .....

अंडमान का हेवलॉक द्वीप .....
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आज वहाँ आये एक समुद्री चक्रवात के कारण इस द्वीप का नाम बार बार आ रहा है| इस द्वीप पर दो-तीन बार जाने का अवसर मिल चुका है| वहाँ कई बंगाली हिन्दू शरणार्थी परिवार भी बसे हुए हैं जिनमें से एक दो परिवारों से मेरा परिचय भी था| यहाँ के कुछ द्वीपों के अंग्रेजों द्वारा रखे हुए नामों पर मुझे आपत्ति है, विशेषकर नील, हेवलॉक और रोज़ जैसे कुछ द्वीपों के नाम पर| ये नाम उन अँगरेज़ सेना नायकों के नाम हैं जिन्होनें भारत के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम को निर्दयता से कुचला, करोड़ों भारतीयों का नरसंहार किया और झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई की ह्त्या की|
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हेवलॉक द्वीप का नाम अँगरेज़ General Sir Henry Havelock के नाम पर रखा गया है जिनके नेतृत्व में अँगरेज़ सेना ने झाँसी की रानी को भागने को बाध्य किया और उनकी ह्त्या की|
ऐसे ही रोज द्वीप का नाम अँगरेज़ Field Marshal Hugh Henry Rose के नाम पर रखा गया है जो १८५७ के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम को कुचलने के जिम्मेदार थे|
ऐसे ही नील द्वीप का नाम भी अँगरेज़ सेनाधिकारी General James George Smith Neill के नाम पर रखा गया है जिसने लाखों भारतीयों की निर्मम हत्याएँ की|
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और भी ऐसे कई उदाहरण हैं| भारत को स्वतंत्र हुए इतने वर्ष बीत गए पर अभी भी गुलामी के निशान इन द्वीपों के नाम यथावत हैं| नेताजी सुभाष बोस ने अंडमान-निकोबार का नाम बदलकर स्वराज-शहीद द्वीप समूह कर दिया था पर भारत सरकार ने अंग्रेजों के दिए हुए नाम ही यथावत रखे|
कम से कम अब तो हमें ये नाम बदलने चाहिएँ|
जय जननी, जय भारत | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
७ दिसंबर २०१६
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प्रख्यात वैदिक विद्वान् श्री अरुण उपाध्याय द्वारा टिप्पणी :---
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अण्डमान निकोबार द्वीप तो मूल पौराणिक नामों के अपभ्रंश हैं। ब्रह्म पुराण के अनुसार राजा इन्द्रद्युम्न ने जगन्नाथ की पूजा जल प्रलय के बाद पुनः आरम्भ कराई थी। उनके नाम पर गंगा सागर (जिसमें गंगा नदी मिलती है) में इन्द्रद्युम्न द्वीप था जिसका अण्डमान हो गया है। दक्षिण के दो बडे द्वीप कुबेर के जुड़वां पुत्रों नर-कूबर के नाम पर था। कुबेर मुख्यतः लंका के राजा थे जिस पर बाद में रावण ने कब्जा कर लिया था। यह द्वीप समूह लंका के अधीन था।
अंग्रेज राक्षसों ने 1857 के विद्रोह का बदला लेने के लिए व्यापक नर संहार किया था जो विश्व इतिहास में सबसे बडा था। कुल एक करोड से अधिक निर्दोष लोगों की हत्या कर उनके शवों को पेड से लटकाया गया था। दो मास के भीतर इतना बडा नर संहार विश्व इतिहास में नहीं हुआ है। बिहार में कुंवर सिंह के क्षेत्र में आरा और गंगा नदी के बीच मेरे गांव पैगा-बसन्तपुर में 3500 लोगों की हत्या अंग्रेज सेनापति नील ने की थी। 26 अप्रैल 1858 को नेपाली सेना की मदद से यह हुआ। बनारस के निकट गहमर गांव में 5500 व्यक्तियों की हत्या हुई। शाहाबाद तथा इलाहाबाद जिलों में अंग्रेजी शासन के रेकॉर्ड के अनुसार 20-20 लाख लोगों की हत्या इन सम्मानित अंग्रेजों ने की थी। ह्यूरोज ने कानपुर की 3 लाख आबादी के 90% लोगों की हत्या कर उसे पूरा श्मशान बना दिया था। इतने घृणित तथा इतिहास के सबसे क्रूर लोगों के सम्मान में इन द्वीपों का नाम रखने से अधिक लज्जा जनक कुछ नहीं हो सकता।

Sunday, 2 December 2018

हमारा कार्य सिर्फ प्रकाश का विस्तार करना है .....

हमारा कार्य सिर्फ प्रकाश का विस्तार करना है, अँधकार का नहीं .....
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अन्धेरा पूरी तरह कभी दूर नहीं हो सकता| अन्धेरे का अस्तित्व बना रहेगा, चाहे वह भीतर का हो या बाहर का| एक भक्त ने भगवान से प्रार्थना की कि चारों और छाये इस अज्ञान के अन्धकार को दूर करें| भगवान ने उत्तर दिया कि सृष्टि के आरम्भ से ही अन्धकार का महत्व है, यह सृष्टि अन्धकार और प्रकाश के द्वैत का ही एक खेल है| भक्तों का कार्य परमात्मा के प्रकाश का विस्तार करना है| अन्धकार के बिना यह सृष्टि नहीं चल सकती|
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हम अपनी चेतना में परमात्मा के प्रकाश (ब्रह्मज्योति) का ही ध्यान करें| किसी तरह की हीन भावना न लायें| अपनी चेतना में प्रकाश का विस्तार करेंगे तो निज जीवन में अन्धकार स्वतः ही दूर होगा | जीवन के अन्धकार की स्मृतियों को विस्मृत कर दें| परमात्मा की निरंतर उपस्थिति का सतत अभ्यास करें |
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परमात्मा का प्रकाश ही हमारी दिशा है| दिशाहीन होना ही हमारी दुर्गति का कारण है| महासागर में जलयान, आकाश में वायुयान और अरण्य में कोई पथिक अपनी दिशा से भटक जाए तो उसका विनाश निश्चित है| वैसे ही दिशाहीन समाज, राष्ट्र और व्यक्ति का विनाश निश्चित है| हम सदा परमात्मा की ओर उन्मुख रहें तो कोई हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
०१ दिसंबर २०१८

संसार में हम अपने कर्मफलों को भोगने के लिए आये हैं .....

इस संसार में हम अपने कर्मफलों को भोगने के लिए आये हैं, साथ साथ नए कर्मों की सृष्टि भी कर रहे हैं| पूर्वजन्मों में मुक्ति के उपाय नहीं किये इसलिए यह जन्म मिला| अपनी कमियों के लिए किसी अन्य पर दोषारोपण न करें| हम जो कुछ भी हैं और जैसी भी परिस्थिति में हैं वह हमारे प्रारब्ध कर्मों का फल यानि भोग है, इसमें किसी अन्य का कोई दोष नहीं है| ये प्रारब्ध कर्म तो भोगने ही पड़ेंगे, इन्हें टाल नहीं सकते| हाँ, भक्ति से पीड़ा कम अवश्य हो जाती है, पर टलती नहीं है| प्रकृति अपना कार्य पूरी ईमानदारी से अपने नियमानुसार करती है जिसमें कोई भेदभाव नहीं है| नियमों को हम नहीं समझते तो इसमें दोष अपना ही है, प्रकृति का नहीं|
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अपने असंतोष और अप्रसन्नता के लिए हम यदि ....
(१) अपने माँ-बाप को दोष देते हैं तो हम गलत हैं| कई लोग कहते हैं कि हम गलत माँ-बाप के घर या गलत परिवार/समाज में पैदा हो गए, इसलिए जीवन में प्रगति नहीं कर पाए|
(२) कई लोग स्वयं को परिस्थितियों का शिकार बताते हैं और कहते हैं गलत परिस्थितियों के कारण जीवन में जो मिलना चाहिए था वह नहीं मिला| यह सोच गलत है|
(३) कई लोग अपनी विफलताओं के लिए दूसरों को दोष देते हैं, यह भी गलत है|
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अपने कर्मफलों को प्रेम से, आनन्द से और भक्ति से भगवान का नाम लेते हुए काटें और अपनी सोच बदल कर अच्छे कर्म करें| हमारी सोच और विचार ही हमारे कर्म हैं| सभी को शुभ कामनाएँ और नमन !
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
१ दिसंबर २०१८

सम्राट का बेटा .....

(ओशो की बताई हुई यह कहानी बड़ी शानदार है अवश्य पढ़ें, इसके पीछे एक सत्य भी छिपा है).
“सम्राट का बेटा”
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एक सम्राट का बेटा बिगड़ गया। गलत संग–साथ में पड़ गया। बाप नाराज़ हो गया। बाप ने सिर्फ़ धमकी के लिए कहा कि, “तुझे निकाल बाहर कर दूँगा... या तो अपने को ठीक कर ले या मेरा महल छोड़ दे।” सोचा नहीं था बाप ने कि लड़का महल छोड़ देगा। छोटा ही लड़का था। लेकिन लड़के ने महल छोड़ दिया। बाप का ही तो बेटा था, सम्राट का बेटा था, ज़िद्दी था। फिर तो बाप ने बहुत खोजा, उसका कुछ पता न चले। वर्षों बीत गए। बाप बूढ़ा... रोते–रोते उसकी आँखें धुँधिया गईं। एक ही बेटा था। उसका ही ये सारा साम्राज्य था। पछताता था बहुत कि मैंने किस दुर्दिन में, किस दुर्भाग्य के क्षण में ये वचन बोल दिया कि तुझे निकाल बाहर कर दूँगा!

ऐसे कोई बीस साल बीत गए और एक दिन उसने देखा कि महल के सामने एक भिखारी खड़ा है। और बाप एकदम पहचान गया। उसकी आँखों में जैसे फिर से ज्योति आ गई। ये तो उसका ही बेटा है। लेकिन बीस साल! बेटा तो बिलकुल भूल चुका कि वो सम्राट का बेटा है। बीस साल का भिखमंगापन किसको न भुला देगा! बीस साल द्वार–द्वार, गाँव-गाँव, रोटी के टुकड़े माँगता फिरा।

बीस साल का भिखमंगापन पर्त-पर्त जमता गया, भूल ही गई ये बात कि कभी मैं सम्राट था। किसको याद रहेगी! भुलानी भी पड़ती है, नहीं तो भिखमंगापन बड़ा कठिन हो जाएगा, भारी हो जाएगा। सम्राट होके भीख माँगना बहुत कठिन हो जाएगा। जगह–जगह दुतकारे जाना; कुत्‍ते की तरह लोग व्यवहार करें; द्वार-द्वार कहा जाए, आगे हट जाओ... भीतर का सम्राट होगा तो वो तलवार निकाल लेगा। तो भीतर के सम्राट को तो धुँधला करना ही पड़ा था, उसे भूल ही जाना पड़ा था। यही उचित था, यही व्यवहारिक था कि ये बात भूल जाओ।

और कैसे याद रखोगे? जब चौबीस घण्टे याद एक ही बात की दिलवाई जा रही हो चारों तरफ़ से कि भिखमंगे हो, लफंगे हो, आवारा हो, चोर हो, बेईमान हो... कोई द्वार पर टिकने नहीं देता, कोई वृक्ष के नीचे बैठने नहीं देता, कोई ठहरने नहीं देता... लो रोटी, आगे बढ़ जाओ... मुश्किल से रोटी मिलती है। टूटा-फूटा पात्र! फटे–पुराने वस्‍त्र! नये वस्‍त्र भी बीस वर्षो में नहीं ख़रीद पाया। दुर्गन्ध से भरा हुआ शरीर। भूल ही गए वे दिन... सुगन्ध के, महल के, शान के, सुविधा के, गौरव-गरिमा के। वे सब भूल गए। बीस साल की धूल इतनी जम गई दर्पण पर कि अब दर्पण में कोई प्रतिबिंब नहीं बने।

तो बेटे को तो कुछ पता नहीं, वो तो ऐसे ही भीख माँगता हुआ इस गाँव में भी आ गया है, जैसे और गावों में गया था। ये भी और गाँवों जैसा गाँव है। लेकिन बाप ने देखा खिड़की से ये तो उसका बेटा है। नाक-नक़्श सब पहचान में आता है। धूल कितनी ही जम गई हो, बाप की आँखों को धोखा नहीं दिया जा सका। बेटा भूल जाए, बाप नहीं भूल पाता है। मूल स्रोत नहीं भूल पाता है। उदगम नहीं भूल पाता है। उसने अपने वज़ीर को बुलाया कि, “क्या करूँ?” वज़ीर ने कहा, “ज़रा सम्हल के काम करना। अगर एकदम से कहा तो ये बात इतनी बड़ी हो जाएगी कि इसे भरोसा नहीं आएगा। ये बिलकुल भूल गया है, नहीं तो इस द्वार पे आता ही नहीं। इसे याद नहीं है। ये भीख माँगने खड़ा है। थोड़े सोच-समझ के क़दम उठाना। अगर एकदम से कहा कि तू मेरा बेटा है, तो ये भरोसा नहीं करेगा, ये तुम पर संदेह करेगा। थोड़े धीरे–धीरे क़दम, क्रमश:।

तो बाप ने पूछा, “क्या किया जाए?” उसने कहा, “ऐसा करो कि उसे बुलाओ।” उसे बुलाने की कोशिश की तो वो भागने लगा। उसे महल के भीतर बुलाया तो वो महल के बाहर भागने लगा। नौकर उसके पीछे दौड़ाए तो उसने कहा कि, “ना भाई, मुझे भीतर नहीं जाना। मैं ग़रीब आदमी, मुझे छोड़ो। मैं ग़लती हो गई कि महल में आ गया, राजा के दरबार में आ गया। मैं तो भीख माँगता हूँ। मुझे भीतर जाने की कोई ज़रूरत नहीं।”

वो तो बहुत डरा, सज़ा मिले कि कारागृह में डाल दिया जाए कि पता नहीं क्या अड़चन आ जाए! लेकिन नौकरों ने समझाया कि, “मालिक तुम्हें नौकरी देना चाहता है, उसे दया आ गई है।” तो वो आया। लेकिन वो महल के भीतर क़दम न रखता था। वो महल के बाहर ही झाड़ू-बुहारी लगाने का उसे काम दे दिया गया। फिर धीरे- धीरे जब वो झाड़ू-बुहारी लगाने लगा और महल से थोड़ा परिचित होने लगा, और थोड़ी पदोन्नति की गई, फिर और थोड़ी पदोन्नति की गई। फिर वो महल के भीतर भी आने लगा। फिर उसके कपड़े भी बदलवाए गए। फिर उसको नहलवाया भी गया। और वो धीरे –धीरे राज़ी होने लगा। ऐसे बढ़ते–बढ़ते वर्षों में उसे वज़ीर के पद पर लाया गया। और जब वो वज़ीर के पद पर आ गया तब सम्राट ने एक दिन बुलाके उसने कहा कि, “तू मेरा बेटा है।”

तब वो राज़ी हो गया। तब उसे भरोसा आ गया। इतनी सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ी। ये बात पहले दिन ही कही जा सकती थी।

तुमसे मैं कहता हूँ, तुम परमात्मा हो। तुम्हें भरोसा नहीं आता। तुम कहते हो कि सिद्धान्त की बात होगी... मगर मैं और परमात्मा! मैं तुमसे रोज़ कहता हूँ, तुम्हें भरोसा नहीं आता। इसलिए तुमसे कहता हूँ... ध्यान करो, भक्‍ति करो। चलो झाड़ा-बुहारी से शुरू करो। ऐसे तो अभी हो सकती है बात, मगर तुम राज़ी नहीं। ऐसे तो एक क्षण खोने की ज़रूरत नहीं है, ऐसे तो क्रमिक विकास की कोई आवश्कता नहीं है। एक छलांग में हो सकती है। मगर तुम्हें भरोसा नहीं आता, तो मैं कहता हूँ चलो झाड़ू-बुहारी लगाओ। फिर धीरे–धीरे पदोन्नति होगी। फिर धीरे–धीरे, धीरे–धीरे बढ़ना। फिर एक दिन जब आख़िरी घड़ी आ जाएगी, वज़ीर की जगह आ जाओगे, जब समाधि की थोड़ी सी झलक पास आने लगेगी, ध्यान की स्फुरणा होने लगेगी, तब यही बात एक क्षण में तुम स्वीकार कर लोगे। तब इस बात में श्रद्धा आ जाएगी।

- ओशो (अजहुँ चेत गँवार)

नमस्तुभ्यं नमो मह्यं तुभ्यं मह्यं नमोनमः .....

नमस्तुभ्यं नमो मह्यं तुभ्यं मह्यं नमोनमः, अहं त्वं त्वमहं सर्वं जगदेतच्चराचरम्  |
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उपरोक्त श्लोक बड़ा ही विलक्षण श्लोक है| यह श्लोक स्कन्दपुराण के दूसरे खण्ड (वैष्णवखण्ड, पुरुषोत्तमजगन्नाथमाहात्म्य) के सताइसवें अध्याय का पंद्रहवाँ श्लोक है| इस से कुछ कुछ मिलता जुलता एक श्लोक विष्णु पुराण में भी देखा है| जब दृष्टा, दृश्य और दृष्टी .... सभी परमात्ममय हो जाते हैं तभी ऐसे भावों की सृष्टि होती है| यहाँ वेदान्त की भी पराकाष्ठा है| यह बड़ी ही दिव्य स्तुति है|
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ब्रह्माजी यहाँ भगवान विष्णु की स्तुति कर रहे हैं| विष्णु के साथ साथ स्वयं को भी नमन कर रहे हैं, और यह भी कह रहे है कि जो आप हैं वह ही मैं हूँ, अतः दोनों को नमन| इस तरह की ऐसे भावों की एक ही स्तुति मैनें देखी है|यह बहुत सरल संस्कृत भाषा में है पर इसके भावार्थ का मैं अनुवाद करने में असमर्थ हूँ| यदि समझ में न आये तो किसी संस्कृत के विद्वान् से इसका अर्थ समझ लीजिये|
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|| ब्रह्मोवाच ||
नमस्तुभ्यं नमो मह्यं तुभ्यं मह्यं नमोनमः |
अहं त्वं त्वमहं सर्वं जगदेतच्चराचरम् ||१५||
महदादि जगत्सर्वं मायाविलसितं तव |
अध्यस्तं त्वयि विश्वात्मंस्त्वयैव परिणामितम् ||१६||
यदेतदखिलाभासं तत्त्वदज्ञानसंभवम् |
ज्ञाते त्वयि विलीयेत रज्जुसर्पादिबोधवत् ||१७||
अनिर्वक्तव्यमेवेदं सत्त्वात्सत्त्वविवेकतः |
अद्वितीय जगद्भास स्वप्रकाश नमोऽस्तु ते ||१८||
विषयानंदमखिलं सहजानंदरूपिणः |
अंशं तवोपजीवंति येन जीवंति जंतवः ||१९||
निष्प्रपंच निराकार निर्विकार निराश्रय |
स्थूलसूक्ष्माणुमहिमन्स्थौल्यसूक्ष्मविवर्जित ||२०||
गुणातीत गुणाधार त्रिगुणात्मन्नमोऽस्तु ते |
त्वन्मायया मोहितोऽहं सृष्टिमात्रपरायणः ||२१||
अद्यापि न लभे शर्म अंतर्य्यामिन्नमोस्तु ते |
त्वन्नाभिपंकजाज्जातो नित्यं तत्रैव संस्तुवन् ||२२||
नातिक्रमितुमीशोऽस्मि मायां ते कोऽन्य ईश्वरः |
अहं यथांडमध्येऽस्मिन्रचितः सृष्टिकर्मणि ||२३||
तथानुलोमकलिता ब्रह्मांडे ब्रह्मकोटयः |
सार्द्धत्रिकोटिसंख्यानां विरिंचीनामपि प्रभो ||२४||
नैकोऽपि तत्त्वतो वेत्ति यथाहं त्वत्पुरः स्थितः |
नमोचिंत्यमहिम्ने ते चिद्रूपाय नमोनमः ||२५||
नमो देवाधिदेवाय देवदेवाय ते नमः |
दिव्यादिव्यस्वरूपाय दिव्यरूपाय ते नमः ||२६||
जरामृत्युविहीनाय मृत्युरूपाय ते नमः |
ज्वलदग्निस्वरूपाय मृत्योरपि च मृत्यवे ||२७||
प्रपन्नमृत्युनाशाय सहजानंदरूपिणे |
भक्तिप्रियाय जगतां मात्रे पित्रे नमो नमः ||२८||
प्रणतार्तिविनाशाय नित्योद्योगिन्नमोऽस्तु ते |
नमोनमस्ते दीनानां कृपासहजसिंधवे ||२९||
पराय पररूपाय परंपाराय ते नमः |
अपारपारभूताय ब्रह्मरूपाय ते नमः ||स्कन्दपुराण:२:२:२७:३०||
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ॐ परमात्मने नमः ||


३० नवम्बर २०१८