Thursday, 2 August 2018

गुरु चरणों का ध्यान :----

गुरु चरणों का ध्यान :----
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जैसे जैसे गुरु पूर्णिमा का दिन समीप आता जा रहा है, गुरुचरणों में ध्यान करने की प्रेरणा अधिक से अधिक होती जा रही है| इस तरह की प्रेरणा या विचार जब भी प्रभुकृपा से प्राप्त हो तो उसे तृप्त अवश्य कर लेना चाहिए| आध्यात्म मार्ग के पथिक को गीता में सभी जिज्ञासाओं का समाधान मिल जाता है, वह भी इतना स्पष्ट कि कण मात्र भी संदेह नहीं रहता| मनुष्य की जैसी चेतना होती है वैसी ही प्रेरणा उसे मिलती रहती है|
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उससे पूर्व यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि गुरु कौन है, गुरु सेवा क्या है और गुरु के चरण क्या हैं| आरम्भ मैं एक सामाजिक संस्था से करता हूँ, फिर आध्यात्म पर आऊँगा| भारत में रा.स्व.से.संघ सबसे बड़ी सामाजिक संस्था है| राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में परम पवित्र भगवा ध्वज को ही गुरु माना गया है, किसी मनुष्य को नहीं| उनके स्वयंसेवक सारी प्रेरणा भगवा ध्वज से ही लेते हैं| उनके लिए संघकार्य ही गुरुसेवा, राष्ट्रधर्म और राष्ट्र की आराधना है| संघ की प्रार्थना और एकात्मता स्तोत्र का पाठ स्वयंसेवकों द्वारा नित्य नियमित होता है| यह एक विशुद्ध सामाजिक कार्य है, इस से एक संतुष्टि तो मिलती है पर आध्यात्मिक अभीप्सा की तृप्ति नहीं होती|
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अब निज जीवन की बात करता हूँ| किशोरावस्था में घर पर ही रामायण और महाभारत का अध्ययन कर लिया था पर उस आयु में जैसी समझ होती है वैसा ही समझ में आया| उन्हीं दिनों एक बार रमण महर्षि की जीवनी कहीं से पढने को मिली, उस से सुप्त आध्यामिकता और बौद्धिक भूख जागृत हो उठी| उस बौद्धिक भूख को तृप्त करने के लिए सम्पूर्ण विवेकानंद साहित्य का अध्ययन दो बार किया| उस से बौद्धिक भूख तो तृप्त हुई पर ह्रदय में जल रही अभीप्सा की अग्नि कभी शांत नहीं हुई| जो भी आध्यात्मिक साहित्य कहीं से भी उपलब्ध हो जाता उसका अध्ययन करता और किसी भी संत-महात्मा के बारे में पता चलता तो उनसे जाकर मिलता| पर वह अभीप्सा दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जाती थी, कभी तृप्त नहीं हुई| पूरे भारत के ब्राह्मण परिवारों में गायत्री मन्त्र की साधना सबसे सामान्य बात है| भारत के प्रायः सभी ब्राह्मण गायत्री मंत्र का जाप करते हैं| पारिवारिक संस्कारों के कारण वह ही एकमात्र साधना थी| अन्य कुछ समझ में ही नहीं आता था| धीरे धीरे ईश्वर की कृपा से जीवन में सत्संग लाभ भी हुआ, बहुत ही अच्छे अच्छे संत-महात्माओं से भी मिलना हुआ और मार्गदर्शन व गुरु लाभ भी मिला| ध्यान और क्रियायोग के अभ्यास व निजानुभूतियों से हृदय में जगी हुई अभीप्सा भी तृप्त हुई| वेदान्त का भी निज अनुभूतियों और गुरु कृपा से बोध हुआ| पर यह तो यात्रा का आरम्भ मात्र है| दूसरी या तीसरी कक्षा का ही विद्यार्थी हूँ, अभी तो बहुत पढाई करनी है|
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ध्यान की गहराई में कूटस्थ चैतन्य की अनुभूतियों से ही यह समझ में आया कि कूटस्थ ही गुरु है, सहस्त्रार ही गुरु चरण हैं, और सहस्त्रार में ध्यान ही गुरु चरणों का ध्यान है| सहस्त्रार से परे अनंत आकाश के विस्तार की अनुभूतियों से समझ में आता है कि हम यह देह नहीं, ईश्वर की अनंतता हैं| ईश्वर की अनंतता में ही परमशिव की अवधारणा समझ में आती है, उससे पूर्व नहीं|
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आध्यात्म मार्ग पर चलने के लिए सबसे आवश्यक है .... "अभीप्सा", "भक्ति" और "आत्म संयम"| फिर आगे के सारे द्वार अपने आप ही खुल जाते हैं| गीता का छठा अध्याय ही आत्म-संयम योग है| उसका स्वाध्याय साधकों के लिए अनिवार्य ही समझ लीजिये| 
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इस समय अन्य कुछ भी लिखने की प्रेरणा नहीं मिल रही है| सामने गुरु महाराज के चरण कमलों के अतिरिक्त अन्य कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है| अगले कुछ दिनों तक गुरु चरणों का ही ध्यान करना है और कुछ भी नहीं| इस मंच पर यही कहना चाहता हूँ कि पूरी भक्ति से गुरु चरणों का ही ध्यान करो, आगे के सारे द्वार अपने आप ही खुल जायेंगे|
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सभी को नमन ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ जुलाई २०१८

वर्तमान विषम युग में गीता के अध्ययन और अध्यापन की आवश्यकता .....

वर्तमान विषम युग में गीता के अध्ययन और अध्यापन की आवश्यकता .....
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आजकल दुराचार और हिंसा का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ रहा है| इसका कारण धर्मशिक्षा का अभाव है| बाहरी वातावरण से हम भी अछूते नहीं है| गीता का स्वाध्याय, तदनुसार आचरण और भगवान का ध्यान ही हमें सब प्रकार के विकारों से बचा सकता है| मुझे तो हमारे आचरण में परिलक्षित सब प्रकार के विकारों का उपचार गीता में ही दिखाई देता है| 
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गीता के १७ वें अध्याय में भगवान ने हर मनुष्य के स्वभाव के अनुसार आहार, यज्ञ, तप और दान के बारे में बताया है| गीता के इस अध्याय का स्वाध्याय और उसके अनुसार आचरण निश्चित रूप से हमें अनेक बुराइयों से बचाएगा, ऐसा मेरा विश्वास है| साथ साथ ध्यान भी करना होगा|
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विद्यालयों में बाल्यकाल से ही विद्यार्थियों को गीता पढ़ानी चाहिए और ध्यान साधना सिखानी चाहिए| इस अधर्मसापेक्ष (धर्मनिरपेक्ष) व्यवस्था में हिन्दू अपने विद्यालयों में अपने बच्चों को संविधान की धारा ३०(१) के कारण धर्म की शिक्षा भी नहीं दे सकता| मुसलमान और ईसाई अपने बच्चों को कुरआन और बाइबल पढ़ा सकता है पर हिन्दू गीता नहीं पढ़ा सकता| मदरसों और कोंवेंटों को मान्यता प्राप्त है पर गुरुकुलों को नहीं| धर्मशिक्षा के अभाव के कारण ही हमारे बच्चे अधर्मी हो रहे हैं| भविष्य में कभी भगवान की कृपा होगी तभी हिन्दुओं में चेतना आयेगी और वे अपने विरुद्ध हो रहे अन्याय का प्रतिकार कर पायेंगे| अभी तक तो स्थिति निराशाजनक ही है|
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मेरा सुझाव है कि हम अपनी निजी क्षमता में गीता का अध्ययन स्वयं करें और अपने बच्चों को भी करायें| स्वयं भी भगवान का ध्यान करें और अपने बच्चों को भी सिखायें| सिर्फ बातों से काम नहीं होगा| अनवरत प्रयास करना होगा|
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सभी को शुभ कामनाएँ और नमन! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृप शंकर
२० जुलाई २०१८

Wednesday, 18 July 2018

"अभ्यास" और "वैराग्य" का महत्त्व :---

"अभ्यास" और "वैराग्य" का महत्त्व :---
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अभ्यास और वैराग्य की उपेक्षा न करें, अन्यथा यह जीवन यों ही व्यर्थ में बीत जाएगा| यह मैं अपने निज अनुभव से कह रहा हूँ| प्रमाद और दीर्घसूत्रता हमारे सबसे बड़े शत्रु हैं जिनके आगे हम असहाय हो जाते हैं| महिषासुर हमारे अंतर में प्रमाद और दीर्घसूत्रता के रूप में अभी भी जीवित है, बाकी अन्य सारे शत्रु (राग-द्वेष रूपी काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर्य) इसके पीछे पीछे चलते हैं| यह प्रमाद रूपी महिषासुर ही हमारी मृत्यु है| निरंतर प्रभु से प्रेम और उनके प्रेमरूप पर अनवरत ध्यान के अभ्यास और विषयों से वैराग्य द्वारा ही हम इन शत्रुओं पर विजय पा सकते हैं|
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मैंने अपना सारा जीवन कामनाओं की पूर्ती के लिए उनके पीछे भाग भाग कर नष्ट किया है| इससे मुझे कुछ भी नहीं मिला| मैं नहीं चाहता कि और भी कोई अपना जीवन इस तरह नष्ट करे| हो सकता है कि यह मेरा प्रारब्ध ही था|
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भगवान गीता में कहते हैं .....
"असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं| अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते||६:३५||"
अर्थात् हे महबाहो निसन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है परन्तु हे कुन्तीपुत्र उसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में किया जा सकता है|
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यहाँ अभ्यास का अर्थ है .... अपनी चित्तभूमि में एक समान वृत्ति की बारंबार आवृत्ति| वैराग्य का अर्थ है दृष्ट व अदृष्ट प्रिय भोगों में बारंबार दोषदर्शन और उन से विरक्ति|
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योगदर्शन में भी सूत्र है ..."अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः||१:१२||
इसके व्यास भाष्य में कहा गया है ....
"चित्तनदी नामोभयतोवाहिनी वहति कल्याणाय वहति पापाय च| या तु कैवल्यप्राग्भारा विवेकविषयनिम्ना सा कल्याणवहा| संसारप्राग्भाराऽविवेकविषयनिम्ना पापवहा| तत्र वैराग्येण विषयस्रोतः खिली क्रियते। विवेकदर्शनाभ्यासेन विवेकस्रोत उद्घाट्यत इत्युभयाधीनश्चित्तवृत्तिनिरोधः||"
अर्थात् .....
चित्तनदी नाम उभयतो वाहिनी, वहति कल्याणाय वहति पापाय च (चित्तरूपी नदी दो दिशाओं में प्रवाहित होती है, कल्याण के लिए बहती है और पाप के लिए भी बहती है)|
कैवल्यप्राग्भारा विवेकविषयनिम्ना सा चित्तनदी कल्याणाय वहति (कैवल्य की ओर ले जाने वाली विवेकयुक्त वह चित्तनदी की धारा कल्याण के लिए बहती है)|
संसारप्राग्भारा अविवेकविषयनिम्ना सा पापाय वहति (संसार की ओर ले जानेवाली अविवेक से युक्त वह पाप के लिए बहती है (अवनति की ओर ले जाती है)।
सर्वार्थसिद्धये सर्वभूतानाम् आत्मनश्च सुखावहम् आचरणं कुर्यात् (सकल प्रयोजनों की सिद्धि के लिए समस्त प्राणियों के लिए तथा अपने लिए जो सुखदायक आचरण है, उसे करना चाहिए)|
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हमारा चित्त "उभयतो वाहिनी नदी" यानि परस्पर दो विपरीत दिशाओं में प्रवाहित होने वाली अद्भुत नदी की तरह है| हमें किस और बहना है .... उस का अभ्यास वैराग्य के साथ साथ करें|
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हमारे चित्त में तमोगुण की प्रबलता होने पर निद्रा, आलस्य, निरुत्साह, प्रमाद आदि मूढ़ अवस्था के दोष उत्पन्न हो जाते हैं|
रजोगुण की प्रबलता होने पर चित्त विक्षिप्त अर्थात् चञ्चल हो जाता है|
इन दोनों प्रकार की बाधक वृत्तियों के प्रशमन के लिये अभ्यास तथा वैराग्य सर्वोत्तम साधन हैं| अभ्यास से तमोगुण की निवृत्ति और वैराग्य से रजोगुण की निवृत्ति होती है| वैराग्य से चित्त का बहिर्मुख प्रवाह रोका जाता है, व अभ्यास से आत्मोन्मुख प्रवाह स्थिर किया जा सकता है|
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आप सभी को सादर सप्रेम नमन ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ जुलाई २०१८

नित्यमुक्त को कौन जाने की आज्ञा दे ? ....

हमें अपने अच्युत अपरिछिन्न भाव की सिद्धि और अहम् व इदम् के भेद का ज्ञान हो.
हमारे बंधन स्वतंत्र हैं, परतंत्र नहीं.
ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ
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अंततः साधकत्व और मुमुक्षुत्व भी एक भ्रम ही हैं क्योंकि स्वयं से पृथक कोई सत्ता है ही नहीं. 
कोई बद्धता भी नहीं है.
ॐ ॐ ॐ
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परमशिव स्वेच्छा से अविद्या का मजा चखने स्वतंत्र बंधनों में आये हैं,
वे परतंत्र नहीं है| 
नित्यमुक्त को जाने की आज्ञा कौन दे?
ॐ ॐ ॐ
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गुरुरूप कूटस्थ परब्रह्म की कृपा से "इदम्" मिट जाता है.
वे परब्रह्म ही "अहम्" बन जाते हैं.
अजपाजप सोSहं व अनाहत नादश्रवण साधन हैं.

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सभी मुमुक्षुओं का स्वागत है जो इस मृगतृष्णा रूपी भवसागर की निद्रा को त्याग कर परब्रह्म परमशिव परमात्मा में जागृत होना चाहते हैं.

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यह सच्चिदानंद परमात्मा की करुणा, कृपा और अनुग्रह है कि हमें उनकी याद आ रही है, और हमें उनसे परमप्रेम हो गया है. 
ॐ ॐ ॐ

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जो कभी साहस ही नहीं जुटा पाये ! .....

जो कभी साहस ही नहीं जुटा पाये ! .....
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आध्यात्मिक यात्रा उन साहसी वीर पथिकों के लिए है जो अपना सब कुछ दांव पर लगा सकते हैं| लाभ-हानि की गणना करने वाले और कर्तव्य-अकर्तव्य की ऊहापोह में खोये रहने वाले कापुरुष इस मार्ग पर नहीं चल सकते| यह उन वीरों का मार्ग है जो अपनी इन्द्रियों पर विजय पा सकते हैं, और अपने लक्ष्य की प्राप्ति तक परिस्थितियों से कोई समझौता नहीं करते|
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जो नहीं कर पाए उन्हें भी निराश होने की आवश्यकता नहीं है| अगले जन्मों में उन्हें फिर अवसर मिलेगा| मैं ऐसे बहुत लोगों को जानता हूँ जो बहुत भले सज्जन हैं, उनमें भगवान को पाने की अभीप्सा भी है, पर वे कभी साहस नहीं जुटा पाए| घर-परिवार के लोगों की नकारात्मक सोच, गलत माँ-बाप के यहाँ जन्म, गलत पारिवारिक संस्कार और गलत वातावरण ... उन्हें कोई साधन-भजन नहीं करने देता| घर-परिवार के मोह के कारण ऐसे जिज्ञासु बहुत अधिक दुखी रहते हैं|
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इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में निश्चित ही उन्हें आध्यात्मिक प्रगति का अवसर मिलेगा| ॐ ॐ ॐ !!

कृपा शंकर
१६ जुलाई २०१८

गुरुकृपा फलीभूत हो .....

गुरुकृपा फलीभूत हो .....
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हे कूटस्थ, सर्वव्यापी, सच्चिदानन्दमय, गुरु महाराज, जो कुछ भी है वह आप ही हैं| न तो मैं कुछ हूँ, और न ही मेरा कोई पृथक अस्तित्व है| मैं स्वयं को यह शरीर मानता रहा यही मेरा अहंकार और सब दुःखों का कारण था| इस शरीर के सुख के लिए ही मैंने आपके दिए हुए पता नहीं कितने जन्म व्यर्थ में गँवा दिए| ये शरीर तो आपने भजन-साधन के लिए दिये थे पर अज्ञानतावश मैं जन्म-जन्मान्तरों तक मैं इन्हीं का दास बना रहा| अब यह समस्त अंतःकरण आपको समर्पित है| मुझे अपने साथ एक करो, अपनी पूर्णता प्रदान करो, स्वयं को मुझमें व्यक्त करो, कहीं कोई भेद न हो, व किसी भी कामना, अपेक्षा और आकांक्षा का जन्म ही न हो|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
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गीता में भगवान कहते हैं .....
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः| युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः||६:८||
यहाँ भगवान हमें ज्ञान-विज्ञान से तृप्त, कूटस्थ, और जितेन्द्रिय होकर एक ऐसी अवस्था (परमहंस) में होने का आदेश दे रहे हैं जहाँ चैतन्य में मिट्टी और सोना एक सा (ब्रह्ममय) ही लगे|
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शास्त्रोक्त पदार्थों को समझने का नाम ज्ञान है, और समझे हुए भावों को अपने अंतःकरण में प्रत्यक्ष अनुभव करना विज्ञान है| ऐसे ज्ञान और विज्ञान से तृप्त होने पर कुछ भी जानने को शेष नहीं रहता| अब तो कुछ जानना नहीं बल्कि उसमें समाहित ही होना (ब्रह्ममय) है| यह भाव, इसकी प्रेरणा व इसमें स्थिति .... गुरु की कृपा और आशीर्वाद है|
ऐसे परमेष्टि गुरु को नमन! ॐ ॐ ॐ !!
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भगवान आगे कहते हैं ....
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु | साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ||६:९||
यहाँ भगवान जो बता रहे हैं वह योगारूढ़ होने की अवस्था है जो मुझे अभी तक प्राप्त नहीं हुई है, पर गुरुकृपा से एक न एक दिन निश्चित रूप से मेरे जीवन में भी फलीभूत होगी| यहाँ भगवान .... सुहृत (प्रत्युपकार ना चाहकर उपकार करने वाला), मित्र, प्रेमी, शत्रु, अप्रिय, बन्धु , कुटुम्बी, श्रेष्ठ और पापियों में भी समभाव रखने की बात समझा रहे हैं|
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भगवान का स्वरुप क्या है ? .....
इस विषय को समझने के लिए "पुरुष सूक्त" और गीता के ग्यारहवें अध्याय "विश्वरूप दर्शन योग" का स्वाध्याय, मनन और ध्यान करना होगा|
पुरुष सूक्त की प्रारम्भिक तीन ऋचाएं कहती है .....
"ॐ सहस्त्रशीर्षापुरुष:सहस्त्राक्ष:सहस्त्रपात्॥ सभूमिगूँसर्वतस्पृत्त्वात्त्यतिष्ठ्ठद्दशांगुलम्॥१॥ पुरुषऽएवेदगूँसर्वंयद्भूतंयच्चभाव्यम्॥ उतामृतत्वस्येशानोयदन्नेनातिरोहति॥२॥ एतावानस्यमहिमातोज्यायाँश्चपूरुष:॥ पादोस्यविश्वाभूतानित्रिपादस्यामृतन्दिवि॥३॥"
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ॐ नमो स्त्वनंताय सहस्त्रमूर्तये, सहस्त्रपादा क्षिशिरोरूहावहे | सहस्त्र नाम्ने पुरूषाय शाश्वते, सहस्त्रकोटि युगधारिणे नमः ||
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ जुलाई २०१८

मेरी दृष्टि में गुरु, गुरुदक्षिणा, गुरुस्थान और गुरुसेवा क्या है ? .....

मेरी दृष्टि में गुरु, गुरुदक्षिणा, गुरुस्थान और गुरुसेवा क्या है ? .....
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मेरी दृष्टि में कूटस्थ ही गुरु है, कूटस्थ ही गुरुस्थान है, और कूटस्थ पर निरंतर ध्यान ही गुरुसेवा है| कूटस्थ गुरु-रूप ब्रह्म सब गुणों से परे हैं, वह असीम हैं, उसे किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता| वह परमात्मा की अनंतता, पूर्णता और आनंद है| असली गुरुदक्षिणा है ..... कूटस्थ में पूर्ण समर्पण, जिसकी विधी भी स्वयं गुरु ही बताते हैं|
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यह मनुष्य देह तो लोकयात्रा के लिए परमात्मा से मिला हुआ एक वाहन रूपी उपहार है| हम यह वाहन नहीं हैं, गुरु भी यह वाहन नहीं हैं| पर लोकाचार के लिए लोकधर्म निभाना भी आवश्यक है| लोकधर्म निभाने के लिए गुरु यदि देह में हैं तो प्रतीक के रूप में उनकी देह को, यदि नहीं हैं तो उनकी परम्परा को, आवश्यक धन, अन्न-वस्त्र और पत्र-पुष्प आदि अर्पित करना हमारा दायित्व बनता है| गुरु देह में हैं तो यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें किसी प्रकार का कोई कष्ट तो नहीं है| तब उनकी देह की भी सेवा होनी चाहिए| गुरु के उपदेशों को चरितार्थ करना गुरुसेवा है| गुरु कभी स्वयं को भौतिक देह नहीं मानते| जो स्वयं को भौतिक देह मानते हैं वे गुरु नहीं हो सकते| उनकी चेतना कूटस्थ ब्रह्म के साथ एक होती है| उनके साथ हमारा सम्बन्ध शाश्वत है और वे शिष्य को भी स्वयं के साथ ब्रह्ममय करने के लिए प्रयासरत रहते हैं|
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हमारी सूक्ष्म देह में हमारे मष्तिष्क के शीर्ष पर जो सहस्त्रार है, जहाँ सहस्त्र पंखुड़ियों वाला कमल पुष्प है, वह गुरु के चरण कमल रूपी हमारी गुरु-सत्ता है| वह गुरु का स्थान है| सहस्त्रार में स्थिति ही गुरुचरणों में आश्रय है| उस सहस्त्र दल कमल पर हमें निरंतर परमशिव परात्पर परमेष्टि गुरु का ध्यान करना चाहिए| यह सबसे बड़ी गुरुसेवा है| सहस्त्रार से परे की अनंतता में वे परमशिव हैं| वह अनंतता ही वास्तव में हमारा स्वरुप है| ध्यान करते करते हम स्वयं भी अनंत बन जाते हैं|
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गुरु-चरणों में मस्तक एक बार झुक गया तो वह कभी उठना नहीं चाहिए| वह सदा झुका ही रहे| यही शीश का दान है| इससे हमारे चैतन्य पर गुरु का अधिकार हो जाता है| तब जो कुछ भी हम करेंगे उसमें गुरु हमारे साथ सदैव रहेंगे| तब कर्ता और भोक्ता भी वे ही बन जाते हैं| यही है गुरु चरणों में सम्पूर्ण समर्पण| तब हमारे अच्छे-बुरे सब कर्म भी गुरु चरणों में अर्पित हो जाते हैं| हम पर कोई संचित कर्म अवशिष्ट नहीं रहता| तब गुरु ही हमारी आध्यात्मिक साधना के कर्ता और भोक्ता हो जाते हैं|
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गुरु रूप परब्रह्म को कर्ता बनाओ| साधना, साध्य और साधक; दृष्टा, दृश्य और दृष्टी; व उपासना, उपासक और उपास्य .... सब कुछ हमारे गुरु महाराज ही हैं| हमारी उपस्थिति तो वैसे ही है जैसे यज्ञ में यजमान की होती है| गुरुकृपा ही हमें समभाव में अधिष्ठित करती है| गुरुकृपा हि केवलं||
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ॐ श्री गुरवे नमः ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ जुलाई २०१८