Monday, 2 April 2018

कौन सी उपासना पद्धति सर्वश्रेष्ठ है ? इस पर वैज्ञानिक शोध हों ....

कौन सी उपासना पद्धति सर्वश्रेष्ठ है ? इस पर वैज्ञानिक शोध हों ....
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जैसे जैसे भौतिक विज्ञान विकसित हो रहा है, निष्पक्ष वैज्ञानिक दृष्टि से शोधात्मक प्रयोग होने चाहियें कि .... (१) जितनी भी उपासना पद्धतियाँ हैं, उनमें सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रभावी कौन सी है? इसके लिए आधार बनाया जा सकता है कि कौन सी साधना पद्धति से सर्वाधिक आनंद और सुख-शांति की प्राप्ति होती है| (२) मृत्यु के पश्चात आत्मा की क्या गति होती है? क्या वास्तव में स्वर्ग और नर्क यानि जन्नत और दोज़ख का अस्तित्व है, या फिर जन्नत की हक़ीक़त एक दिल को बहलाने वाली या मुर्ख बनाने वाली ही बात है? (३) आत्मा की शाश्वतता और कर्म फलों की अवधारणा तर्क द्वारा तो समझाई जा सकती है, पर उस पर वैज्ञानिक शोधों की भी आवश्यकता है|
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प्रत्येक मनुष्य को यह अधिकार होना चाहिए कि वह पूरी निष्ठा, ईमानदारी और विवेक से पूर्ण अध्ययन के पश्चात यह तय करे कि उसका मत, सम्प्रदाय या मज़हब कौन सा हो| यह आवश्यक नहीं हो कि जिस माँ-बाप के घर जन्म लिया हो, उनका मज़हब ही स्वयं का भी हो| यह निज विवेक से चुनने का अधिकार सभी को प्राप्त होना चाहिए| बलात् किसी भी लालच, भय या आतंक से किसी पर अपना मत थोपने की स्वतन्त्रता न हो|
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ऐसा ही एक दिन शीघ्र ही आयेगा, यह मेरा विश्वास है|
ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!

कृपा शंकर
२ अप्रेल २०१७

आत्मा से परे कुछ भी नहीं है .....

आत्मा से परे कुछ भी नहीं है .....
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"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात् पूर्णमुदच्यते| पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते||"
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः||
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जो योगमार्ग के पथिक हैं, जो आत्मतत्व यानि अद्वैतब्रह्म का ध्यान करते हैं, उन्हें समय समय पर उपनिषदों का स्वाध्याय करते रहना चाहिए| इस से उन्हें अपार शक्ति और निरंतर प्रेरणा मिलेगी| आत्मा और ब्रह्म एक हैं| ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है| जिसे नानात्व दिखता है वह मृत्यु की ओर बढ़ता है| जब भी समय मिले परमात्मा का ध्यान करें| गीता पाठ तो नित्य करें|
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शुक्ल यजुर्वेद के बृहदारण्यक उपनिषद् व शतपथ ब्राहण का यह मन्त्र (१४/५/४/६) बताता है कि आत्मा से परे कुछ भी नहीं है .....
"ब्रह्म तं परादात् योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद
क्षत्रं तम् परादाद्योऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं वेद
लोकास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो लोकान्वेद
देवास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो देवान्वेद
भूतानि तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद
सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद
इदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमानि भूतानी
इदं सर्वं यदयमात्मा."
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आप सब निजात्मगण को सप्रेम सादर नमन !
"ॐ असतोमा सद्गमय | तमसोमा ज्योतिर्गमय | मृत्योर्मामृतं गमय ||" ॐ शान्ति शान्ति शान्तिः ||
ॐ ॐ ॐ !!
३१ मार्च २०१८

अच्छे दिन आये हैं इसलिए मोदी जी प्रधानमंत्री बने हैं, न कि मोदी जी के आने से अच्छे दिन आये हैं .....

अच्छे दिन आये हैं इसलिए मोदी जी प्रधानमंत्री बने हैं, न कि मोदी जी के आने से अच्छे दिन आये हैं .....
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(१) भारत के अच्छे दिन आए हैं, इसीलिये माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं, न कि मोदी जी के आने से अच्छे दिन आये हैं| मोदी जी के आने के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लाखों स्वयंसेवकों की व्यापक राष्ट्र-साधना और त्याग-तपस्या है| अन्यथा ऐसी कोई गन्दी गाली नहीं है, ऐसा कोई झूठा आरोप नहीं है, और ऐसी कोई न्यायिक जाँच नहीं है जो दुर्भावनावश मोदी जी के विरुद्ध नहीं हुई है| उनकी ह्त्या के भी अनेक प्रयास हुए हैं, पर वे हम सब की शुभ कामनाओं से जीवित हैं| अच्छे दिन आये हैं इसलिए मोदी जी प्रधानमंत्री बने हैं, न कि मोदी जी के आने से अच्छे दिन आये हैं|
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(२) पर अकेला चना क्या भाड़ भोड़ेगा? अकेले मोदी जी क्या करेंगे? व्यवस्था तो वही पुरानी है| पिछली सरकारों के समय बड़े बड़े घोटाले हुए थे| पर आज तक एक भी घोटालेबाज के विरुद्ध कोई मुकदमा नहीं चला है, किसी भी घोटालेबाज की आज तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है|
चोर चोर मौसेरे भाई वाली बात है| मुझे लगता है कि भारत सरकार इसलिए कोई कारवाई नहीं कर रही है क्योंकी वे सारे घोटालेबाज या तो कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आ गए हैं, या उन घोटालों में भाजपा वाले भी सम्मिलित रहे होंगे| उन घोटालों को भुलाने के प्रयास किये जा रहे हैं|
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प्रकृति किसी को क्षमा नहीं करती| जो करेगा वह निश्चित रूप से भरेगा| कर्मों का फल निश्चित रूप से सभी को मिलेगा| राजनेताओं और न्यायाधीशों की सत्ता अंतिम नहीं है, उनका भी न्याय निश्चित रूप से होगा|

ॐ तत्सत् !ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ अप्रेल २०१७

Sunday, 1 April 2018

"समत्व" ही योग है. समाधि कोई क्रिया नहीं, एक अवस्था का नाम है ......

"समत्व" ही योग है. समाधि कोई क्रिया नहीं, एक अवस्था का नाम है ......
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समाधि कोई क्रिया नहीं, एक अवस्था का नाम है जिसमें उपासनारत उपासक समभाव में अधिष्ठित हो जाता है| समभाव में स्थिति ही समाधि है| जब साधक स्थूल, सूक्ष्म, कारण एवं तुरीय भूमियों पर एक ही दशा में अवस्थान करते हैं, उसे समाधि कहते हैं| जब ध्येय ध्याता और ध्यान, ज्ञेय ज्ञाता और ज्ञान, दृष्टा दृश्य और दर्शन ..... इन सब का लय हो जाता है वह समाधि की अवस्था है| यह समत्व ही योग है| तंत्र की भाषा में महाशक्ति कुण्डलिनी का परमशिव से मिलन ... योग है, पर बिना भक्ति के तंत्र भी एक शब्दजाल मात्र है|
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किसी भी तरह के बौद्धिक जंजाल में न पड़कर, जब भी भगवान के प्रति परमप्रेम की अनुभूतियाँ हों तब उस प्रेम में समर्पित होकर स्वयं ही परम प्रेममय हो जाएँ| यही भगवान की भक्ति है| बौद्धिक ज्ञान सिर्फ प्रेरणा दे सकता है पर अंततः काम तो भगवान की भक्ति ही आयेगी| भगवान से इतना प्रेम करो कि उनसे कोई भेद नहीं रह जाय| फिर सब कुछ जो भी आवश्यक है, वह स्वतः ही समझ में आ जाएगा|
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"भगवान मुझ से प्रसन्न हों" ... यह भाव भी छोड़ देना चाहिए| सब तरह की आशाएँ भी आसक्ति हैं जिनका त्याग कर देना चाहिए| अन्तःकरण की शुद्धि से उत्पन्न होनेवाली ज्ञानप्राप्ति तो सिद्धि है, और ज्ञानप्राप्ति का न होना असिद्धि है| ऐसी सिद्धि और असिद्धि में समभाव होने की अवर्णनीय अवस्था "योग" है जहाँ भगवान से कोई भेद नहीं रहता|
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गीता में भगवान कहते हैं....
"योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय | सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||२:४८||
अर्थात् .... हे धनञ्जय, तूँ आसक्ति का त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर, क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है|
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गीता में ही भगवान कहते हैं .....
"ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति | समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ||१८:५४||
अर्थात् वह ब्रह्मभूतअवस्थाको प्राप्त प्रसन्न मनवाला साधक न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी इच्छा करता है| ऐसा सम्पूर्ण प्राणियोंमें समभाव वाला साधक मेरी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है|
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इस अवस्था में कुछ भी जानने को बाकि नहीं रहता है| यही पराभक्ति है, यही परमसिद्धि है, यही योग है, और यही हमारे जीवन का उद्देश्य है|
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निजात्मगण आप सब महान आत्माओं को नमन | ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ अप्रेल २०१८

Saturday, 31 March 2018

यज्ञ का अवशिष्ट भोजन क्या है ? उसका आहार कैसे करें ? .....

यज्ञ का अवशिष्ट भोजन क्या है ? उसका आहार कैसे करें ? .....
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यह समझने में थोड़ा जटिल विषय है पर इसे समझना अति आवश्यक है| गीता में भगवान कहते हैं ... "यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः| भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् || ३:१३||" अर्थात् "यज्ञ के अवशिष्ट अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं किन्तु जो लोग केवल स्वयं के लिये ही पकाते हैं वे तो पापों को ही खाते हैं|" अब इस विषय को ठीक से समझा जाए ताकि हम पाप के भागी न बनें|
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विस्तार में न जाकर संक्षेप में कहना चाहूँगा कि हमारे शास्त्रों के अनुसार रसोईघर में भोजन बनाने की प्रक्रिया में प्रमादवश अनायास ही कुछ अशुद्धियाँ और पाँच प्रकार के पाप सब से ही होते हैं| उन के परिमार्जन के लिए पञ्च महायज्ञ करते हैं, जिन से वे दोष दूर हो जाते हैं| ये पञ्च महायज्ञ वेदोक्त है जिनको करने का आदेश यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण में है, और मनु महाराज ने भी मनुस्मृति में इनको करने का आदेश दिया है|
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भोजन बनाकर देवताओं को भी उनका भाग दें, गाय, कुत्ते व पक्षियों को भी दें, अतिथि को भी भोजन कराएँ, माता-पिता जीवित हैं तो पहले उनको भोजन कराएँ|
फिर गीता के चौथे अध्याय के चौबीसवें मन्त्र ....
"ॐ ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना" द्वारा भगवान को निवेदित करने के पश्चात् गीता के पन्द्रहवें अध्याय के चौदहवें मन्त्र ....
"ॐ अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्" के अर्थ को मानसिक रूप से समझते हुए ही भोजन करें| भोजन से पूर्व आचमन करें और पहले ग्रास के साथ "ॐ प्राणाय स्वाहा" मन्त्र अवश्य मानसिक रूप से बोलें|
उपरोक्त तो कम से कम अनिवार्य से अनिवार्य आवश्यकता है| विस्तार करने के लिए अन्नपूर्णा के मन्त्र का भी पाठ कर सकते हैं, पञ्च प्राणों का कवल भी प्रथम पांच ग्रासों के साथ कर सकते हैं|
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जहाँ तक मैं समझता हूँ उपरोक्त विधि से भोजन करने से कोई दोष नहीं लगता| उपरोक्त विधि ही वह यज्ञ है जिसको करने का आदेश भगवान दे रहे हैं| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ मार्च २०१८

हिन्दू स्वयं को बहुसंख्यक मानने के झूठे भ्रम में न रहें, वास्तव में वे अल्पसंख्यक ही हैं .....

हिन्दू स्वयं को बहुसंख्यक मानने के झूठे भ्रम में न रहें, वास्तव में वे अल्पसंख्यक ही हैं .....
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वर्त्तमान सांविधानिक व्यवस्था में बहुसंख्यक होने से हानि ही हानि है और अल्पसंख्यक होने से लाभ ही लाभ| जो घोषित अल्पसंख्यक हैं वे अपनी शिक्षण संस्थाओं में अपनी धार्मिक शिक्षा दे सकते हैं, और अपने ही वर्ग के शत प्रतिशत विद्यार्थियों को प्रवेश दे सकते हैं, उन्हें मान्यता भी प्राप्त है|

गुरुकुलों की शिक्षा को मान्यता प्राप्त नहीं है जब कि मदरसों की शिक्षा को मान्यता प्राप्त है| ईसाई शिक्षण संस्थानों में सब को ईसाई धर्म की शिक्षा दी जा सकती है पर हिन्दू अपने धर्म की शिक्षा नहीं दे सकते|

वर्षों पूर्व रामकृष्ण मिशन और आर्यसमाज ने स्वयं को इसीलिये अल्पसंख्यक घोषित कर के सरकारी मान्यता की माँग की थी जो उन्हें नहीं दी गयी|

यह अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की अवधारणा किसी शातिर और धूर्त दिमाग की उपज थी जिस का उद्देश्य शनैः शनैः हिन्दू धर्म को नष्ट करना था| हिन्दू मुर्ख बना ही दिए गए| हिन्दू इसी झूठी भ्रान्ति में जीते रहे कि वे बहुसंख्यक हैं| वास्तव में हिन्दू अल्पसंख्यक ही हैं|

अल्पसंख्यक कहलाने से हिन्दुओं को कोई हानि नहीं है| मेरे विचार से हिन्दू धर्म के हर सम्प्रदाय को स्वयं को अल्पसंख्यक घोषित करवाने की माँग करनी चाहिए ताकि कम से कम वे अपनी शिक्षण संस्थाओं में हिन्दू धर्म की शिक्षा तो दे सकें|

वर्षों पूर्व भारत में जब "हम दो हमारे दो" का नारा लगाया गया और सरकारी नौकरों पर दो बच्चे ही पैदा करने की पाबंदी लागू की गयी थी तो यह सिर्फ हिन्दुओं पर ही थी| बाकी सब को चाहे जितने बच्चे पैदा करने की छूट थी|

अतः हिन्दू अल्पसंख्यक ही हैं, यह वास्तविकता उन्हें स्वीकार कर लेनी चाहिए और स्वयं को अल्पसंख्यकों को दी जाने वाली सारी सुविधाओं की माँग करनी चाहिए| धन्यवाद !

३० मार्च २०१८

घृणा व द्वेष क्यों ? घृणा व द्वेष फैलाने वाले सारे मत और विचार ..... असत्य और अन्धकार फैलाते हैं .....

घृणा व द्वेष क्यों ? घृणा व द्वेष फैलाने वाले सारे मत और विचार ..... असत्य और अन्धकार फैलाते हैं .....
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क्या हमें दूसरों से घृणा सिर्फ इसीलिए करनी चाहिए कि दूसरे हमारे विचारों को नहीं मानते, या दूसरे हमारे मत, पंथ या मज़हब के नहीं है? यदि हमारे मन में किसी के भी प्रति ज़रा सी भी घृणा या द्वेष है तो हम स्वयं के लिए अंधकारमय लोकों की यानि घोर नर्क की सृष्टि कर रहे हैं|
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जब भगवान सर्वत्र हैं और सब में हैं, तो किसी से भी घृणा क्यों? क्या हम भगवान से घृणा कर सकते हैं? गीता में भगवान कहते हैं .....
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति| तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति|| ६:३०||"
अर्थात जो सब में मुझ को देखता है और सबको मुझमें देखता है उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता|
कितना बड़ा आश्वासन दिया है भगवान ने !
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घृणा और द्वेष अत्यंत दुर्बल भाव है जो स्वयं की शांति तो भंग करते ही हैं, चारों ओर एक भयावह विनाश भी लाते हैं| भारत में ऐसा विनाश बहुत अधिक हुआ है| विश्व की अनेक संस्कृतियाँ इस घृणा और द्वेष के कारण नष्ट कर दी गईं, सैंकड़ों करोड़ मनुष्यों की हत्या इसी घृणा व द्वेष के कारण की गयी हैं| कुछ लोग तो दूसरों को पीड़ा पहुँचाने की ही प्रार्थना करते हैं, धिक्कार है ऐसे लोगों पर|
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जिनकी बात उन के अनुयायियों ने ही प्रायः नहीं मानी उन ईसा मसीह ने बाइबिल में कहा है ... “Love your enemies and pray for those who persecute you” (Matthew 5:44). उन्होंने यह भी कहा .... “Do good to those who hate you, bless those who curse you, pray for those who abuse you” (Luke 6:27–28).
महान तमिल संत तिरुवल्लुवर ने अपने साहित्य में घृणा के विरुद्ध बहुत अधिक लिखा है| गीता में भी भगवान कहते हैं ....
"उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् | आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ||६:५||"
इसका भावार्थ है कि हम स्वयं ही अपने शत्रु, मित्र और बन्धु हैं, कोई अन्य नहीं|
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घृणा करने वाले द्वेषी और क्रूर लोगों की गति बहुत बुरी होती है| भगवान कहते हैं ....
"तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् | क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ||१६:१९||"
अर्थात् ऐसे उन द्वेष करने वाले क्रूरकर्मी और नराधमों को मैं संसार में बारम्बार आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ अर्थात् उत्पन्न करता हूँ|
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आसुरी योनी में जन्म लेकर क्या होता है ? भगवान कहते हैं ....
"असुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि| मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्||१६:२०||"
अर्थात अविवेकीजन प्रत्येक जन्म में आसुरी योनि को पाते हुए जिनमें तमोगुणकी बहुलता है ऐसी योनियों में जन्मते हुए नीचे गिरते गिरते मुझ ईश्वरको न पाकर उन पूर्वप्राप्त योनियोंकी अपेक्षा और भी अधिक अधम गति को प्राप्त होते हैं|
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अतः किसी से घृणा व द्वेष न करें और क्रूरता पर विजय पायें| भगवान से खूब प्रेम करें|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३० मार्च २०१८