Monday, 22 January 2018

महाशक्ति कुण्डलिनी और परमशिव का मिलन ही योग है .....

महाशक्ति कुण्डलिनी और परमशिव का मिलन ही योग है .....
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सिद्ध गुरु की आज्ञा से भ्रूमध्य में दृष्टी रखते हुए उसके बिलकुल पीछे आज्ञाचक्र पर ध्यान किया जाता है| गुरुकृपा से कुण्डलिनी स्वयं जागृत होकर हमें जगाती है| ध्यान की गहराई में कुण्डलिनी मूलाधार चक्र से जागृत होकर स्वतः ही विभिन्न चक्रों को भेदती हुई सुषुम्ना में विचरण करने लगती है| उसके लिए कोई प्रयास नहीं करने पड़ते| प्रयास करना पड़ता है सिर्फ गुरु की बताई हुई विधि से आज्ञाचक्र पर ध्यान और बीज मन्त्र के जाप पर| मन्त्र की शक्ति और गुरु की कृपा ही सारे कार्य करती है|
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गुरु कृपा भी तभी होती है जब हमारे विचार और हमारा आचरण पवित्र होता है| विचारों और आचरण में पवित्रता के लिए भगवान के प्रति प्रेम जागृत कर उन्हें समर्पित होना पड़ता है, फिर सारा कार्य स्वतः ही होने लगता है| भगवान से प्रेम जागृत करना, विचारों में और आचरण में पवित्रता लाना .... यही हमारा कार्य है, यही साधना है| आगे का सारा कार्य भगवान की कृपा से स्वतः ही होने लगता है| हमारे विचार और हमारा आचरण पवित्र हों, व हमारे ह्रदय में भगवान् की पराभक्ति जागृत हो, यही भगवान से हमारी प्रार्थना है|
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प्रकृति में कुछ भी निःशुल्क नहीं है| हर चीज का शुल्क देना पड़ता है| भगवान की कृपा भी मुफ्त में नहीं मिलती, उसकी भी कीमत चुकानी पड़ती है| वह कीमत है .... "हमारे ह्रदय का पूर्ण प्रेम और हमारे आचार-विचार में पवित्रता"|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ जनवरी २०१८

बसंत पंचमी / सरस्वती पूजा २०१८ की शुभ कामनाएँ .....

बसंत पंचमी / सरस्वती पूजा की शुभ कामनाएँ .....
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आज से बसंत ऋतू का प्रारम्भ हो गया है| बसंत पंचमी पर पचास-साठ वर्ष पूर्व तक हरेक मंदिर में खूब भजन कीर्तन होते थे| आजकल अपना सांस्कृतिक पतन हो गया है अतः इस त्यौहार को मनाना भी प्रायः बंद सा ही हो गया है| बाहर खुले में जाइये, प्रकृति को निहारिये .... चारों ओर सरसों के पीले पीले फूल लहलहा रहे हैं, गेंहूँ की बालियाँ खिल रही हैं, कितना सुहावना मौसम है! लगता है स्वयं परमात्मा ने प्रकृति का शृंगार किया है| प्रकृति का आनंद लीजिये| बचपन में पढ़ी हुई एक लोककथा याद आ रही है कि इस दिन बालक भगवान श्रीकृष्ण ने भगवती श्रीराधा जी का शृंगार किया था| आज से विद्याध्ययन आरम्भ होता था, माँ सरस्वती की आराधना होती थी और गुरुओं का सम्मान होता था|
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आज अधिक से अधिक मौन रखिये और भगवान का खूब ध्यान कीजिये| माँ सरस्वती के गुरु प्रदत्त वाग्भव बीज मन्त्र का खूब जप करें| वाग्भव बीज मन्त्र माँ सरस्वती की आराधना के लिए भी है और गुरु चरणों की आराधना के लिए भी|
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माँ सरस्वती की स्तुति .....
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"या कुंदेंदु तुषारहार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता |
या वीणावर दण्डमंडितकरा, या श्वेतपद्मासना ||
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभ्रृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता |
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्यापहा ||
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमां आद्यां जगद्व्यापिनीं |
वीणा पुस्तक धारिणीं अभयदां जाड्यान्धकारापहां ||
हस्ते स्फटिक मालीकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां |
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदां" ||
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ जनवरी २०१८

क्या स्वयं से पृथक अन्य कोई भी है ? .....

क्या स्वयं से पृथक अन्य कोई भी है ? .....
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सांसारिक चेतना में हर प्राणी एक दूसरे से पृथक है, पर आध्यात्मिक चेतना में नहीं| आध्यात्मिक चेतना में एकमात्र अस्तित्व परमात्मा का ही है, अन्य किसी का नहीं| ध्यान साधना की गहराइयों में पूर्णतः समर्पित हो जाने के पश्चात् पृथकता रूपी "मैं" का नहीं, सिर्फ आत्मतत्व रूपी "मैं" का ही अस्तित्व रहता है| उस आत्मतत्वरूपी "मैं" में ही अपनी चेतना बनाए रखें| उस आत्मतत्व "मैं" के अतिरिक्त अन्य किसी का कोई अस्तित्व नहीं है| जब मुझ से अतिरिक्त अन्य कोई है ही नहीं, तब किस का और किस को भय? जब कोई अन्य होगा तभी तो भय होगा, यहाँ तो कोई अन्य है ही नहीं| पर लोक व्यवहार में इस पृथकतारूपी "मैं" का होना भी आवश्यक है| यह एक गूढ़ विषय है जिसे बुद्धि से नहीं, अनुभव से ही सीखा जा सकता है|
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सभी को सप्रेम सादर नमन और शुभ कामनाएँ| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ जनवरी २०१८

फालतू और घटिया विचारों से स्वयं को मुक्त करें .....

फालतू और घटिया विचारों से स्वयं को मुक्त करें .....
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जब किसी बगीचे में फूल उगाते हैं तब वहाँ की भूमि में कंकर-पत्थर नहीं डालते. अपने दिमाग में फालतू और घटिया विचारों को न आने दें. प्रयास करते हुए फालतू और घटिया विचारों से स्वयं को मुक्त करो. घर में जब किसी को बुलाते हैं तब घर की सफाई करते हैं. यहाँ तो हम साक्षात परमात्मा को आमंत्रित कर रहे हैं. क्या उनको अपने ह्रदय की चेतना में प्रतिष्ठित करने से पूर्व मन को घटिया विचारों से मुक्त नहीं करेंगे? अन्यथा वे यहाँ क्यों आयेंगे?
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निरंतर मन्त्र जाप का उद्देश्य ही यही है कि परमात्मा का एक गुण विशेष हमारे में स्थापित हो जाए और फालतू की बातें मन में न आयें. मन्त्र अनेक हैं, पर सारे उपनिषद् और भगवद्गीता ओंकार की महिमा से भरे पड़े हैं. कहीं पर भी निषेध नहीं है. जो निषेध करते हैं, उन से मैं सहमत नहीं हूँ. मन्त्रों में प्रणव यानि ॐ सबसे बड़ा मन्त्र है, और तंत्रों में आत्मानुसंधान सबसे बड़ा तंत्र है. यदि आप किसी गुरु परम्परा के अनुयायी हैं तो अपने गुरु मन्त्र का ही जप करें क्योंकि गुरु ने आपका दायित्व लिया है.
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मेरे माध्यम से जो भी विचार व्यक्त होते हैं उनका श्रेय परमात्मा को, सदगुरुओं और संतों को जाता है जिन की मुझ पर अपार कृपा है. इसमें मेरी कोई महिमा नहीं है. मेरे में न तो कोई लिखने की सामर्थ्य है न ही मुझे कुछ आता जाता है. ये मेरी कोई बौद्धिक सम्पदा नहीं हैं. सब परमात्मा के अनुग्रह का फल है. मुझे उनसे भी प्रसन्नता है जो इन्हें शेयर करते हैं, और उनसे भी प्रसन्नता है जो इन्हें कॉपी पेस्ट कर के अहंकारवश अपने नाम से पोस्ट करते हैं. मेरी ईश्वर लाभ के अतिरिक्त अन्य कोई कामना नहीं है पर यह एक संकल्प प्रभु ने मुझे अवश्य दिया है कि सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा हो, और भारत माँ अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर बिराजमान हो.
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मुझे मेरी वैदिक संस्कृति, सनातन धर्म व परम्परा, गंगादि नदियाँ, हिमालयादि पर्वत, वन और उन सब लोगों से प्रेम है जो निरंतर परमात्मा का चिन्तन करते हैं और परमात्मा का ही स्वप्न देखते हैं. यह मेरा ही नहीं अनेक मनीषियों का संकल्प है जिसे जगन्माता अवश्यमेव पूर्ण करेगी. मैं उन सब का सेवक हूँ जिन के ह्रदय में परमात्मा को पाने की एक प्रचंड अग्नि जल रही है, जो निरंतर प्रभु प्रेम में मग्न हैं. उन के श्रीचरणों की धूल मेरे माथे की शोभा है. अन्य मेरी कोई किसी से अपेक्षा नहीं है.
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सब के ह्रदय में प्रभुप्रेम जागृत हो और जीवन में पूर्णता प्राप्त हो. सबको शुभ कामनाएँ और सादर प्रणाम !
ॐ श्रीगुरवे नमः | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | ॐ नमः शिवाय !
ॐ तत्सत्ॐ ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ जनवरी २०१८

Sunday, 21 January 2018

समस्त सृष्टि, समस्त विश्व, राष्ट्र, समाज, व स्वयं की समस्याओं, पीड़ा व कष्टों के निवारण हेतु हम क्या कर सकते हैं ? .......

समस्त सृष्टि, समस्त विश्व, राष्ट्र, समाज, व स्वयं की समस्याओं, पीड़ा व कष्टों के निवारण हेतु हम क्या कर सकते हैं ? .......
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एक तो हमारी बुद्धि ही अति अल्प और अति सीमित है, फिर कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका चिंतन करने के लिए सोचने की अतिमानसी क्षमता और विवेक चाहिए| यह सब के वश की बात नहीं है| फिर भी कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर हमारी अति अल्प बुद्धि भी दे देती है| हिमालय जैसी विराट समस्याएँ और प्रश्न दिमाग में उठते हैं जिनका कोई समाधान नहीं दिखाई देता, वहाँ भी भगवान कुछ न कुछ मार्ग दिखा ही देते हैं| मेरी जहाँ तक सोच है हमारे हर प्रश्न का उत्तर और हर समस्या का समाधान आत्म-साक्षात्कार यानि ईश्वर की प्राप्ति है| यह सृष्टि ईश्वर के मन की एक कल्पना है जिसके रहस्यों का ज्ञान ईश्वर की प्राप्ति से ही हो सकता है|
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भगवान तो सच्चिदानंद हैं जैसे महासागर से मिलने के पश्चात झीलों-तालाबों व नदी-नालों से मोह छूट जाता है, वैसे ही सच्चिदानंद की अनुभूति के पश्चात सब मत-मतान्तरों, सिद्धांतों, वाद-विवादों, राग-द्वेष व अहंकार रूपी पृथकता के बोध से चेतना हट कर उन के लिए तड़प उठती है| सारे प्रश्न भी तिरोहित हो जाते हैं| परमात्मा ही हमारे हर प्रश्न का का उत्तर और हर समस्या का समाधान है|
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भगवान जब हृदय में आते हैं तो आकर आड़े हो जाते हैं, फिर वे हृदय से बाहर नहीं जाते| भगवान हमारे हृदय में रहें और हम उनके हृदय में रहें, बस यही उच्चतम स्थिति है, और इसी का होना ही सभी समस्याओं का समाधान है| यह देह तो नष्ट होकर पञ्च महाभूतों में मिल जायेगी पर परमात्मा का साथ शाश्वत है| उनको समर्पित होना ही उच्चतम सार्थकता है|
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"ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै |
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ||"
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते |
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ||"
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय| हर हर महादेव|
ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२१ जनवरी २०१८

पहले परमात्मा को प्राप्त करो, फिर कुछ और .....

पहले परमात्मा को प्राप्त करो, फिर कुछ और .....
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लगता है सारा जीवन मैनें अपने प्रारब्ध कर्मफलों को भोगने में ही व्यतीत कर दिया| जो जीवन का उद्देश्य आत्मज्ञान की प्राप्ति था, उस दिशा में क्या प्रगति की यह तो भगवान ही जानते हैं, कुछ कह नहीं सकता| मुझे तो लगता है कि कुछ भी प्रगति नहीं की है| भगवत प्राप्ति की अभीप्सा और सच्चिदानंद से प्रेम ... बस यही एकमात्र उपलब्धि है इस जीवन की| इससे आगे और कुछ भी नहीं मिला इस जीवन में| कोई बात नहीं, जीवन एक सतत प्रक्रिया है| इस जन्म में नहीं तो अगले में ही सही, भगवान कहीं दूर नहीं है, अवश्य मिलेंगे| वे भी जायेंगे कहाँ? मेरे बिना वे भी दुःखी हैं, वैसे ही जैसे एक पिता अपने पुत्र से बिछुड़ कर दुखी होता है| वे भी मेरे लिए व्याकुल हैं|
श्रुति भगवती के आदेशानुसार बुद्धिमान् ब्राह्मण को चाहिए कि परमात्मा को जानने के लिए उसी में बुद्धि को लगाये, अन्य नाना प्रकार के व्यर्थ शब्दों की ओर ध्यान न दे, क्योंकि वह तो वाणी का अपव्यय मात्र है|
तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः |
नानुध्यायाद् बहूब्छब्दान्वाची विग्लापन हि तदिति ||बृहद., ४/४/२९)
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मुण्डकोपनिषद, कठोपनिषद, गीता और रामचरितमानस में भी इसी आशय के उपदेश हैं|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
२० जनवरी २०१८

राग-द्वेष से कैसे मुक्त हों ? .......

राग-द्वेष से कैसे मुक्त हों ? ....... 
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यह सबसे बड़ी आवश्यकता और समस्या है जो हरेक साधक के समक्ष आती है| हर साधक की अपनी अपनी समस्या है अतः कोई एक ही सामान्य उत्तर सभी के लिए नहीं हो सकता| एक सामान्य उत्तर तो यही हो सकता है कि हमारा अनुराग परमात्मा के प्रति इतना अधिक हो जाए कि अन्य सब विषयों से अनुराग समाप्त ही हो जाए| जब राग ही नहीं रहेगा तो द्वेष भी नहीं रहेगा| आत्मानुसंधान भी साथ साथ ही होना चाहिए| सबसे कठिन कार्य है अनात्मा सम्बन्धी सभी विषयों से उपरति, यानि प्रज्ञा करना|
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तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः |
नानुध्यायाद् बहूब्छब्दान्वाची विग्लापन हि तदिति ||बृहद., ४/४/२९)
श्रुति भगवती के आदेशानुसार बुद्धिमान् ब्राह्मण को चाहिए कि परमात्मा को जानने के लिए उसी में बुद्धि को लगाये, अन्य नाना प्रकार के व्यर्थ शब्दों की ओर ध्यान न दे, क्योंकि वह तो वाणी का अपव्यय मात्र है|
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मुण्डकोपनिषद, कठोपनिषद, गीता और रामचरितमानस में भी इसी आशय के उपदेश हैं| पर इन उपदेशों का पालन बिना वैराग्य के असम्भव है|
मैं स्वयं निज जीवन में इन्हें अपनाने में अब तक विफल रहा हूँ, अतः इनके ऊपर स्वयं के अतिरिक्त अन्य किसी को कोई उपदेश नहीं दे सकता| फिर भी मैं वैराग्य का प्रयास करता रहूँगा| इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में ही सही|
वासना सम्बन्धी विषयों का चिंतन न हो, और चिंतन सिर्फ परमात्मा का ही हो, यही तो वास्तविक साधना है, जिस का निरंतर अभ्यास होता रहे| जैसे एक रोगी के लिए कुपथ्य होता है वैसे ही एक आध्यात्मिक साधक के लिए अनात्म विषय होते हैं|
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इस विषय पर इससे आगे और लिखने की सामर्थ्य मुझ अकिंचन में नहीं है| हे प्रभु, आपकी जय हो|
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ
कृपा शंकर
२० जनवरी २०१८