Friday, 13 January 2017

सद् आचरण में तत्परता .....

सद् आचरण में तत्परता .....
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किसी भी मनुष्य के लिए सर्वाधिक मत्वपूर्ण है ... उसका "आचरण" यानी उसका आचार-विचार कैसा है| हमारी सनातन वैदिक परम्परा में सभी के लिए एक अभेद दृष्टि है, और वह है ... सद आचरण में तत्परता| चाहे कोई विरक्त हो, चाहे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र, सभी का आचरण शुद्ध होना चाहिए| यदि हमारा आचरण शुद्ध नहीं है तो सर्वत्र हमारा तिरस्कार होगा, सभी हमारी उपेक्षा और अनादर करेंगे| कोई भी हमारी बात को गंभीरता से नहीं लेगा|
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रण का आध्यात्मिक अर्थ है ... जिसमें हमारी आत्मा रमण कर सके| उसका निज जीवन में आविर्भाव यानि आगमन निरंतर रहे| हम शाश्वत आत्मा है और सिर्फ परमात्मा में ही रमण कर सकते हैं जैसे महासागर में जल की एक बूँद| हम परमात्मा में निरंतर रमण करते रहें ... यह सद् आचरण है जिसके लिए हमें सदा तत्पर रहना चाहिए|
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अब विचार करते हैं कि सद् आचरण को हम निज जीवन में कैसे अवतरित कर सकते हैं .....
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(१) हमारे जीवन में कुटिलता नहीं हो ....
जो हम कहते हैं, जो हम दूसरों को सिखाना चाहते हैं, या जो दूसरों से अपेक्षा करते हैं, उस को सर्वप्रथम अपने जीवन में अवतरित करना होगा| उपदेश देने से पहले हम स्वयं उसका पालन करें, हमारी कथनी और करनी में कोई अंतर न हो| हमारा कोई सम्मान नहीं करता, हमारी सब उपेक्षा करते हैं, कोई हमें गंभीरता से नहीं लेता, .... इसका एकमात्र कारण है कि हम कहते कुछ और हैं और करते हैं कुछ और| जो हमारे आचरण में नहीं है उसका उपदेश कभी भी प्रभावी नहीं होगा| आजकल बच्चे अपने से बड़ों का और अध्यापकों का सम्मान इसीलिए नहीं करते कि बड़े-बूढ़े और अध्यापक कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं| इसीलिए आजकल राजनेताओं का कहीं कोई सम्मान नहीं है क्योंकि वे कुटिल हैं| उपदेश उसी का प्रभावी होगा जिसके जीवन में कुटिलता नहीं है|
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(२) हम सत्यवादी हों ....
परमात्मा सत्य है, इसीलिए हम उन्हें भगवान सत्यनारायण कहते हैं| हमारे जीवन में जितना झूठ-कपट है, उतना ही हम परमात्मा से दूर हैं| झूठ बोलने से वाणी दग्ध हो जाती है| उस दग्ध वाणी से किया हुआ कोई भी मन्त्र जप, पाठ और प्रार्थना प्रभावी नहीं होगी| असत्यवादी कभी परमात्मा के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकता| सिर्फ धर्मरक्षा और प्राणरक्षा के लिए कहा गया झूठ तो माफ़ हो सकता है, अन्यथा नहीं| झूठे व्यक्ति का कहीं भी कोई सम्मान नहीं होता क्योंकि वह नर्कपथगामी है|
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(३) सबके प्रति प्रेम हमारे ह्रदय में हो ....
सबके प्रति प्रेम हमारे ह्रदय में तभी होगा जब हमारे ह्रदय में परमात्मा के प्रति प्रेम होगा| तभी हम जीवन में अपना सर्वश्रेष्ठ कर पायेंगे, अन्यथा कुछ भी नहीं| तब सारे गुण स्वतः ही हमारे जीवन में आ जायेंगे|
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(४) हमारे विचार और संकल्प सदा शुभ हों ....
यह सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि जैसा हम सोचते हैं वैसे ही बन जाते हैं| हमारे विचारों और संकल्प का प्रभाव सभी पर पड़ता है, अतः अपने विचारों पर सदा दृष्टी रखनी चाहिए| कुविचार को तुरंत त्याग दें, और सुविचार पर दृढ़ रहें|
दूसरों से कोई अपेक्षा न रखें पर हर परिस्थिति में अपना सर्वश्रेष्ठ करें|
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उपरोक्त चारों बातों के प्रति तत्परता ही हमारे आचरण को सद् आचरण बना सकती है| इनके प्रति सदा तत्पर रहें|
आप सब परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ हैं, अतः आप सब को सादर नमन|
ॐ तत्सत ! ॐ शिव | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर

Thursday, 12 January 2017

किसी भी कैसी भी परिस्थिति में हमें निज विवेक से अपना सर्वश्रेष्ठ विचार और सर्वश्रेष्ठ कर्म करना चाहिए ....

किसी भी कैसी भी परिस्थिति में हमें निज विवेक से अपना सर्वश्रेष्ठ विचार और सर्वश्रेष्ठ कर्म करना चाहिए .....
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यह सृष्टि और इस सृष्टि का समस्त घटनाक्रम हमारे ही भावों व विचारों से निर्मित है और उसी के अनुसार चल रहा है, क्योंकि हम सृष्टिकर्ता के अंश हैं| जब हमारे वश में कोई बात नहीं होती तब हम अपनी ही कमी को ढकने के लिए सृष्टिकर्ता को दोष दे देते हैं| विवशतावश कहने के लिए हम यही कहते हैं कि जैसी हरि की इच्छा| पर एक बात नहीं भूलनी चाहिए कि हमारा दृढ़ संकल्प इस सृष्टि और उसके घटनाक्रम को बदल सकता है| हमें किसी भी परिस्थिति में निज विवेक से अपना सर्वश्रेष्ठ कर्म करना चाहिए| जिसने यह सृष्टि बनाई है वह अपनी सृष्टि को चलाने में सक्षम है, उसे हमारी सलाह की आवश्यकता नहीं है, पर उसने हमें हमारा सर्वश्रेष्ठ कर्म करने का अधिकार दे रखा है|
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तेरे भावे जो करे भलो-बुरो संसार | नारायण तू बैठ के अपनो भुवन बुहार ||
कई बार बड़ी पीड़ा होती है दुनिया को देख कर| मन में विचार भी अनेक आते हैं, पर सारे दुःख-सुख, ताप, पीड़ाएँ, यंत्रणाएं और आनंद सब स्वीकार हैं, क्योंकि ये हमारे ही कर्मों के फल हैं| कहने को तो हमें यही कहना चाहिए कि कर्ता भी वो ही है तो भोक्ता भी वो ही है, उसकी इच्छा पूर्ण हो| Let Thy will be done.
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ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय || ॐ ॐ ॐ ||

शब्दातीत ज्ञान .....

शब्दातीत ज्ञान .....
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जब शब्दातीत ज्ञान अनुभूत होना आरम्भ हो जाता है, तब शब्दों में रूचि नहीं रहती|
सच्चिदानंद की अनुभूति ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, रटे हुए या मात्र पढ़े हुए शब्दों की नहीं| शब्दों का ज्ञान सिर्फ प्राथमिक पाठशाला है| परमात्मा सब शब्दों से परे है| वह अनुभूति का विषय है, शब्दों का नहीं|
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भगवान के प्रति अहैतुकी परम प्रेम और समर्पण के अतिरिक्त अन्य कोई आदर्श, कर्तव्य, आचार-विचार या नियम नहीं है| जिसने उस प्रेम को पा लिया, उसके लिए आचरण के कोई नियम नहीं, कोई अनुशासन नहीं है क्योंकि उसने परम अनुशासन को पा लिया है| वह सब अनुशासनों और नियमों से ऊपर है| यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह), नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान) आदि सभी गुण उसमें स्वतः आ जाते हैं| ये गुण उसके पीछे पीछे चलते हैं, वह इनके पीछे नहीं चलता| प्रभु के प्रति परम प्रेम अपने आप में सबसे बड़ी साधना, साधन और साध्य है| यही मार्ग है और यही लक्ष्य है|
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फिर धीरे धीरे साधक का स्थान स्वयं परमात्मा ले लेते हैं| वे ही स्वयं को उसके माध्यम से व्यक्त करते हैं| यहाँ भक्त और भगवान एक हो जाते हैं| उनमें कोई भेद नहीं रहता|
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ॐ तत्सत् |ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | ॐ ॐ ॐ ||

आत्मज्ञान (Self Realization) ही परम धर्म है ....

आत्मज्ञान (Self Realization) ही परम धर्म है ....
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परमात्मा और अपने आत्मस्वरूप का चिंतन न करना एक बहुत बड़ी हिंसा है| यह निजात्मा का तिरस्कार और आत्म-ह्त्या है|
आत्मदर्शन के पश्चात सारे कर्म उस व्यक्ति को छोड़ देते हैं, वह मुक्त हो जाता है|
आत्मस्वरूप को जानने के प्रयास करने वाले के अतिरिक्त अन्य सब मनुष्य आत्म-हत्या ही कर रहे हैं|
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जिसे मैं बाहर अन्यत्र ढूँढ रहा था वह कहीं अन्यत्र बाहर नहीं है, वह तो मेरे अस्तित्व का केंद्र बिंदु है|
उसमें और मुझमें कोई भेद नहीं है| भेद अज्ञानता का था|
आत्म-तत्व, गुरु-तत्व और सर्वस्व ...... परमात्मा ही है|

 महत्व स्वयं के "वह" होने का है, कुछ पाने का नहीं|
कौन है वह, जो कुछ ढूँढ रहा है?
जो ढूँढ रहा है वह तो परमात्मा ही है जो अपनी लीला में स्वयं को ही ढूँढ रहा है|
यह पृथकता, यह भेद .... सब उसकी लीला ही है, कोई वास्तविकता नहीं|
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धर्म, राष्ट्र, समाज और हम सब के समक्ष, बहुत विकराल समस्याएँ हैं| उनके समाधान पर चिंतन अवश्य करना चाहिए| भारत की आत्मा आध्यात्मिक है, और भारत का पुनरुत्थान भी एक विराट आध्यात्मिक शक्ति द्वारा ही होगा|

ॐ आत्मगुरवे नमः | ॐ परमात्मने नमः | ॐ ॐ ॐ ||
ॐ ॐ ॐ || ॐ ॐ ॐ || ॐ ॐ ॐ ||

Monday, 9 January 2017

गुरु चरणों में आश्रय हमारी रक्षा करता है .....

गुरु चरणों में आश्रय हमारी रक्षा करता है .....
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यह मेरा पूर्ण व्यावहारिक अनुभव है कि जब तक गुरु चरणों का ध्यान रहता है, तब तक हर बुराई, जैसे राग-द्वेष, अहंकार, क्रोध, लोभ और ईर्ष्या आदि सब, दूर ही रहती है| गुरु चरणों का आश्रय छोड़ते ही ये फिर पकड़ लेती हैं| अतः गुरु की शरण में रहना ही सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमानी का काम है|
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मेरे लिए तो सहस्त्रार में सहस्त्र दल कमल ही गुरु महाराज की चरण पादुका है, वहीं साक्षात गुरु महाराज सर्वदा बिराजमान हैं| ध्यान में गुरु महाराज तो सर्वत्र अनंतता में व्याप्त परम प्रेम बन जाते हैं जिसने इस सम्पूर्ण सृष्टि को धारण कर रखा है, उनको समर्पण ही मेरी साधना है| वे स्वयं को कूटस्थ अक्षर ब्रह्म और कूटस्थ ज्योति के रूप में व्यक्त करते हैं| वही मेरा उपास्य है| सूक्ष्म देह में आज्ञाचक्र ही मेरा ह्रदय है|
इससे अधिक मुझे कुछ नहीं मालूम|
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आप सब दिव्य निजात्माओं को सप्रेम सादर नमन| आप सब के ह्रदय में भगवान की पराभक्ति जागृत हो| ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

पौष बड़ा महोत्सव ......

पौष बड़ा महोत्सव ......
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पौष के महीने में किसी दिन श्रद्धालू किसी मंदिर में एकत्र होकर खूब भजन-कीर्तन करते हैं और मूंग की दाल से बनाए हुए बड़े भगवान को अर्पित कर उनका प्रसाद बाँटते हैं, इसे पौष बड़ा महोत्सव कहते हैं| आजकल बड़ों के साथ साथ और भी कोई परम्परागत मिठाई कहीं कहीं बाँटने लगे हैं|
यह संस्कृति पहिले जयपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में ही खूब थी, पर अब तो जयपुर के उत्तर में पूरे शेखावाटी क्षेत्र में भी बहुत सामान्य हो गयी है| राजस्थान के अन्य भागों में भी इसका आयोजन होने लगा है|
कल दो स्थानों पर पौष बड़ा महोत्सवों में जाने का अवसर मिला| एक तो एक समाज विशेष की ओर से था, और दूसरा नगर नरेश बालाजी मंदिर झुंझुनू में था| नगर नरेश बालाजी मंदिर में एकत्र अनेक माताओं, बहिनों व भाइयों ने खूब भजन-कीर्तन किये और प्रसाद बाँटा| बड़े आनंद के क्षण थे|
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किसी समय हमारे यहाँ खूब गोठ (संस्कृत के गोष्ठी शब्द का अपभ्रंस) हुआ करती थी, जिसमें एकत्र श्रद्धालू मूंग की दाल, बाटी और चूरमा का प्रसाद पाते थे| अब यह परम्परा बहुत कम रह गयी है|
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सर्दी के मौसम में भगवान की भक्ति का आनंद कुछ अधिक ही है| इस सर्दी के मौसम का खूब लाभ उठाएँ और भगवान की खूब भक्ति करें|
सभी को शुभ कामनाएँ और नमन ! ॐ ॐ ॐ ||

नकारात्मक विचार क्यों आते हैं ? .....

नकारात्मक विचार क्यों आते हैं ? .....
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कई बार बड़े नकारात्मक विचार आते हैं, अतः इसका कारण समझने के लिए मैनें काफी चिंतन किया| आज प्रातः कुछ देर के लिए बड़ी नकारात्मकता थी| मैंने इसका कारण जानना चाहा और पूरे मानसिक घटनाक्रम का विश्लेषण किया तो इसका उत्तर भी मुझे मिल गया जिसे मैं आप सब के साथ साझा करना चाहता हूँ|
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मैंने पाया कि जिस दिन भी मैंने प्रातःकाल में उठते ही प्रातःस्मरणीय महापुरुषों का स्मरण किया और परमात्मा का ध्यान किया उस के बाद लगभग पूरे दिन ही कोई नकारात्मक विचार नहीं आया|
जब किसी नकारात्मक व्यक्ति से मिलना होता है या उसकी स्मृति आती है, तब थोड़ी देर में ही एक गहरी नकारात्मकता भी आ जाती है|
इसीलिए शास्त्रों में कहा है कि कुसंग का सर्वदा त्याग करना चाहिए| किसी नकारात्मक व्यक्ति का स्मरण भी कुसंग होता है|
आज जब नकारात्मकता आई इसका कारण यही था कि प्रातः एक नकारात्मक व्यक्ति कि याद बहुत देर तक आ रही थी| मुझे उसी समय उस से विपरीत गुण वाले व्यक्ति, या गुरुदेव या भगवान के किसी नाम का नाम-जप करना चाहिए था, जो मैंने नहीं किया| अतः एक गहरी नकारात्मकता छा गयी|
परमात्मा के निरंतर चिंतन का अभाव ही नकारात्मकता को जन्म देता है| अतः हमें अपने दिन का प्रारम्भ भी परमात्मा के चिंतन से करना चाहिए, और समापन भी परमात्मा के चिंतन से करना चाहिए| हर समय परमात्मा की स्मृति भी रहनी चाहिए|

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ !!