Saturday, 3 September 2016

ईसा मसीह और उनका भारत में प्रवास .......


(1) ईसा मसीह ने फिलिस्तीन से 13 वर्ष की उम्र में ही भारत आकर 30 वर्ष की उम्र तक यानि 17 वर्षों तक भारत में ही रह कर अध्ययन और साधना की थी |
(2) तत्पश्चात 3 वर्ष के लिए वे बापस फिलीस्तीन चले गए, वहाँ सनातन धर्म का प्रचार किया, व ३३ वर्ष की उम्र में सूली से जीवित बचकर भारत में ही बापस आकर 112 वर्ष तक की उम्र पाने के पश्चात कश्मीर के पहलगांव में देह त्याग किया|
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उपरोक्त विषय पर दिया गया ओशो का प्रवचन ----
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"जब भी कोई सत्‍य के लिए प्‍यासा होता है, अनायास ही वह भारत में उत्‍सुक हो उठता है। अचानक पूरब की यात्रा पर निकल पड़ता है। और यह केवल आज की ही बात नहीं है। यह उतनी ही प्राचीन बात है, जितने पुराने प्रमाण और उल्‍लेख मौजूद हैं। आज से 2500 वर्ष पूर्व, सत्‍य की खोज में पाइथागोरस भारत आया था। ईसा मसीह भी भारत आए थे। ईसामसीह के 13 से 30 वर्ष की उम्र के बीच का बाइबिल में कोई उल्‍लेख नहीं है। और यही उनकी लगभग पूरी जिंदगी थी, क्‍योंकि 33 वर्ष की उम्र में तो उन्‍हें सूली ही चढ़ा दिया गया था। तेरह से 30 तक 17 सालों का हिसाब बाइबिल से गायब है! इतने समय वे कहां रहे? आखिर बाइाबिल में उन सालों को क्‍यों नहीं रिकार्ड किया गया? उन्‍हें जानबूझ कर छोड़ा गया है, कि ईसायत मौलिक धर्म नहीं है, कि ईसा मसीह जो भी कह रहे हैं वे उसे भारत से लाए हैं।
यह बहुत ही विचारणीय बात है। वे एक यहूदी की तरह जन्‍मे, यहूदी की ही तरह जिए और यहूदी की ही तरह मरे। स्‍मरण रहे कि वे ईसाई नहीं थे, उन्‍होंने तो-ईसा और ईसाई, ये शब्‍द भी नहीं सुने थे। फिर क्‍यों यहूदी उनके इतने खिलाफ थे? यह सोचने जैसी बात है, आखिर क्‍यों ? न तो ईसाईयों के पास इस सवाल का ठीक-ठाक जवाबा है और न ही यहूदियों के पास। क्‍योंकि इस व्‍यक्ति ने किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। ईसा उतने ही निर्दोष थे जितनी कि कल्‍पना की जा सकती है।
पर उनका अपराध बहुत सूक्ष्‍म था। पढ़े-लिखे यहूदियों और चतुर रबाईयों ने स्‍पष्‍ट देख लिया था कि वे पूरब से विचार ले रहे हैं, जो कि गैर यहूदी हैं। वे कुछ अजीबोगरीब और विजातीय बातें ले रहे हैं। और यदि इस दृष्टिकोण से देखो तो तुम्‍हें समझ आएगा कि क्‍यों वे बारा-बार कहते हैं- ' अतीत के पैगंबरों ने तुमसे कहा था कि यदि कोई तुम पर क्रोध करे, हिंसा करे तो आंख के बदले में आंख लेने और ईंट का जवाब पत्‍थर से देने को तैयार रहना। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं कि अगर कोई तुम्‍हें चोट पहुंचाता है, एक गाल पर चांटा मारता है तो उसे अपना दूसरा गाल भी दिखा देना।' यह पूर्णत: गैर यहूदी बात है। उन्‍होंने ये बातें गौतम बुद्ध और महावीर की देशनाओं से सीखी थीं।
ईसा जब भारत आए थे-तब बौद्ध धर्म बहुत जीवंत था, यद्यपि बुद्ध की मृत्‍यु हो चुकी थी। गौतम बुद्ध के पांच सौ साल बाद जीसस यहां आए थे। पर बुद्ध ने इतना विराट आंदोलन, इतना बड़ा तूफान खड़ा किया था कि तब तक भी पूरा मुल्‍क उसमें डूबा हुआ था। बुद्ध की करुणा, क्षमा और प्रेम के उपदेशों को भारत पिए हुआ था।
जीसस कहते हैं कि अतीत के पैगंबरों द्वारा यह कहा गया था। कौन हैं ये पुराने पैगंबर? वे सभी प्राचीन यहूदी पैगंबर हैं: इजेकिएल, इलिजाह, मोसेस,- कि ईश्‍वर बहुत ही हिंसक है और वह कभी क्षमा नहीं करता है!? यहां तक कि प्राचीन यहूदी पैगंबरों ने ईश्‍वर के मुंह से ये शब्‍द भी कहलवा दिए हैं कि मैं कोई सज्‍जन पुरुष नहीं हूं, तुम्‍हारा चाचा नहीं हूं। मैं बहुत क्रोधी और ईर्ष्‍यालु हूं, और याद रहे जो भी मेरे साथ नहीं है, वे सब मेरे शत्रु हैं। पुराने टेस्‍टामेंट में ईश्‍वर के ये वचन हैं। और ईसा मसीह कहते हैं, मैं तुमसे कहता हूं कि परमात्‍मा प्रेम है। यह ख्‍याल उन्‍हें कहां से आया कि परमात्‍मा प्रेम है? गौतम बुद्ध की शिक्षाओं के सिवाए दुनिया में कहीं भी परमात्‍मा को प्रेम कहने का कोई और उल्‍लेख नहीं है। उन 17 वर्षों में जीसस इजिप्‍त, भारत, लद्दाख और तिब्‍बत की यात्रा करते रहे। यही उनका अपराध था कि वे यहूदी परंपरा में बिल्‍कुल अपरिचित और अजनबी विचारधाराएं ला रहे थे। न केवल अपरिचित बल्कि वे बातें यहूदी धारणाओं के एकदम से विपरीत थीं। तुम्‍हें जानकर आश्‍चर्य होगा कि अंतत: उनकी मृत्‍यु भी भारत में हुई! और ईसाई रिकार्ड्स इस तथ्‍य को नजरअंदाज करते रहे हैं। यदि उनकी बात सच है कि जीसस पुनर्जीवित हुए थे तो फिर पुनर्जीवित होने के बाद उनका क्‍या हुआ? आजकल वे कहां हैं ? क्‍योंकि उनकी मृत्‍यु का तो कोई उल्‍लेख है ही नहीं !
सच्‍चाई यह है कि वे कभी पुनर्जीवित नहीं हुए। वास्‍तव में वे सूली पर कभी मरे ही नहीं थे। क्‍योंकि यहूदियों की सूली आदमी को मारने की सर्वाधिक बेहूदी तरकीब है। उसमें आदमी को मरने में करीब-करीब 48 घंटे लग जाते हैं। चूंकि हाथों में और पैरों में कीलें ठोंक दी जाती हैं तो बूंद-बूंद करके उनसे खून टपकता रहता है। यदि आदमी स्‍वस्‍थ है तो 60 घंटे से भी ज्‍यादा लोग जीवित रहे, ऐसे उल्‍लेख हैं। औसत 48 घंटे तो लग ही जाते हैं। और जीसस को तो सिर्फ छह घंटे बाद ही सूली से उतार दिया गया था। यहूदी सूली पर कोई भी छह घंटे में कभी नहीं मरा है, कोई मर ही नहीं सकता है।
यह एक मिलीभगत थी, जीसस के शिष्‍यों की पोंटियस पॉयलट के साथ। पोंटियस यहूदी नहीं था, वो रोमन वायसराय था। जूडिया उन दिनों रोमन साम्राज्‍य के अधीन था। निर्दोष जीसस की हत्‍या में रोमन वायसराय पोंटियस को कोई रुचि नहीं थी। पोंटियस के दस्‍तखत के बगैर यह हत्‍या नहीं हो सकती थी।पोंटियस को अपराध भाव अनुभव हो रहा था कि वह इस भद्दे और क्रूर नाटक में भाग ले रहा है। चूंकि पूरी यहूदी भीड़ पीछे पड़ी थी कि जीसस को सूली लगनी चाहिए। जीसस वहां एक मुद्दा बन चुका था। पोंटियस पॉयलट दुविधा में था। यदि वह जीसस को छोड़ देता है तो वह पूरी जूडिया को, जो कि यहूदी है, अपना दुश्‍मन बना लेता है। यह कूटनीतिक नहीं होगा। और यदि वह जीसस को सूली दे देता है तो उसे सारे देश का समर्थन तो मिल जाएगा, मगर उसके स्‍वयं के अंत:करण में एक घाव छूट जाएगा कि राजनैतिक परिस्थिति के कारण एक निरपराध व्‍यक्ति की हत्‍या की गई, जिसने कुछ भी गलत नहीं किया था।
तो पोंटियस ने जीसस के शिष्‍यों के साथ मिलकर यह व्‍यवस्‍था की कि शुक्रवार को जितनी संभव हो सके उतनी देर से सूली दी जाए। चूंकि सूर्यास्‍त होते ही शुक्रवार की शाम को यहूदी सब प्रकार का कामधाम बंद कर देते हैं, फिर शनिवार को कुछ भी काम नहीं होता, वह उनका पवित्र दिन है। यद्यपि सूली दी जानी थी शुक्रवार की सुबह, पर उसे स्‍थगित किया जाता रहा। ब्‍यूरोक्रेसी तो किसी भी कार्य में देर लगा सकती है। अत: जीसस को दोपहर के बाद सूली पर चढ़ाया गया और सूर्यास्‍त के पहले ही उन्‍हें जीवित उतार लिया गया। यद्यपि वे बेहोश थे, क्‍योंकि शरीर से रक्‍तस्राव हुआ था और कमजोरी आ गई थी। पवित्र दिन यानि शनिवार के बाद रविवार को यहूदी उन्‍हें पुन: सूली पर चढ़ाने वाले थे। जीसस के देह को जिस गुफा में रखा गया था, वहां का चौकीदार रोमन था न कि यहूदी। इसलिए यह संभव हो सका कि जीसस के शिष्‍यगण उन्‍हें बाहर आसानी से निकाल लाए और फिर जूडिया से बाहर ले गए।
जीसस ने भारत में आना क्‍यों पसंद किया? क्‍योंकि युवावास्‍था में भी वे वर्षों तक भारत में रह चुके थे। उन्‍होंने अध्‍यात्‍म और ब्रह्म का परम स्‍वाद इतनी निकटता से चखा था कि वहीं दोबारा लौटना चाहा। तो जैसे ही वह स्‍वस्‍थ हुए, भारत आए और फिर 112 साल की उम्र तक जिए। कश्‍मीर में अभी भी उनकी कब्र है। उस पर जो लिखा है, वह हिब्रू भाषा में है। स्‍मरण रहे, भारत में कोई यहूदी नहीं रहते हैं। उस शिलालेख पर खुदा है, जोशुआ- यह हिब्रू भाषा में ईसामसीह का नाम है। जीसस जोशुआ का ग्रीक रुपांतरण है। जोशुआ यहां आए- समय, तारीख वगैरह सब दी है। एक महान सदगुरू, जो स्‍वयं को भेड़ों का गड़रिया पुकारते थे, अपने शिष्‍यों के साथ शांतिपूर्वक 112 साल की दीर्घायु तक यहांरहे। इसी वजह से वह स्‍थान भेड़ों के चरवाहे का गांव कहलाने लगा। तुम वहां जा सकते हो, वह शहर अभी भी है-पहलगाम, उसका काश्‍मीरी में वही अर्थ है- गड़रिए का गांव
जीसस यहां रहना चाहते थे ताकि और अधिक आत्मिक विकास कर सकें। एक छोटे से शिष्‍य समूह के साथ वे रहना चाहते थे ताकि वे सभी शांति में, मौन में डूबकर आध्‍यात्मिक प्रगति कर सकें। और उन्‍होंने मरना भी यहीं चाहा, क्‍योंकि यदि तुम जीने की कला जानते हो तो यहां (भारत में)जीवन एक सौंदर्य है और यदि तुम मरने की कला जानते हो तो यहां (भारत में)मरना भी अत्‍यंत अर्थपूर्ण है। केवल भारत में ही मृत्‍यु की कला खोजी गई है, ठीक वैसे ही जैसे जीने की कला खोजी गई है। वस्‍तुत: तो वे एक ही प्रक्रिया के दो अंग हैं।
यहूदियों के पैगंबर मूसा ने भी भारत में ही देह त्‍यागी थी | इससे भी अधिक आश्‍चर्यजनक तथ्‍य यह है कि मूसा (मोजिज) ने भी भारत में ही आकर देह त्‍यागी थी! उनकी और जीसस की समाधियां एक ही स्‍थान में बनी हैं। शायद जीसस ने ही महान सदगुरू मूसा के बगल वाला स्‍थान स्‍वयं के लिए चुना होगा। पर मूसा ने क्‍यों कश्‍मीर में आकर मृत्‍यु में प्रवेश किया?
मूसा ईश्‍वर के देश इजराइल की खोज में यहूदियों को इजिप्‍त के बाहर ले गए थे। उन्‍हें 40 वर्ष लगे, जब इजराइल पहुंचकर उन्‍होंने घोषणा की कि, यही वह जमीन है, परमात्‍मा की जमीन, जिसका वादा किया गया था। और मैं अब वृद्ध हो गया हूं और अवकाश लेना चाहता हूं। हे नई पीढ़ी वालों, अब तुम सम्‍हालो!
मूसा ने जब इजिप्‍त से यात्रा प्रारंभ की थी तब की पीढ़ी लगभग समाप्‍त हो चुकी थी। बूढ़े मरते गए, जवान बूढ़े हो गए और नए बच्‍चे पैदा होते रहे। जिस मूल समूह ने मूसा के साथ यात्रा की शुरुआत की थी, वह बचा ही नहीं था। मूसा करीब-करीब एक अजनबी की भांति अनुभव कर रहे थेा उन्‍होंने युवा लोगों शासन और व्‍यवस्‍था का कार्यभारा सौंपा और इजराइल से विदा हो लिए। यह अजीब बात है कि यहूदी धर्मशास्‍त्रों में भी, उनकी मृत्‍यु के संबंध में , उनका क्‍या हुआ इस बारे में कोई उल्‍लेख नहीं है। हमारे यहां (कश्‍मीर में ) उनकी कब्र है। उस समाधि पर भी जो शिलालेख है, वह हिब्रू भाषा में ही है। और पिछले चार हजार सालों से एक यहूदी परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन दोनों समाधियों की देखभाल कर रहा है।
मूसा भारत क्‍यों आना चाहते थे ? केवल मृत्‍यु के लिए ? हां, कई रहस्‍यों में से एक रहस्‍य यह भी है कि यदि तुम्‍हारी मृत्‍यु एक बुद्धक्षेत्र में हो सके, जहां केवल मानवीय ही नहीं, वरन भगवत्‍ता की ऊर्जा तरंगें हों, तो तुम्‍हारी मृत्‍यु भी एक उत्‍सव और निर्वाण बन जाती है।
सदियों से सारी दुनिया के साधक इस धरती पर आते रहे हैं। यह देश दरिद्र है, उसके पास भेंट देने को कुछ भी नहीं, पर जो संवेदनशील हैं, उनके लिए इससे अधिक समृद्ध कौम इस पृथ्‍वी पर कहीं नहीं हैं। लेकिन वह समृद्धि आंतरिक है।"
= ओशो =

सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति ........

सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति .....
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परमात्मा को उपलब्ध होने की और उसे स्वयं के जीवन में अवतरित व व्यक्त करने की शाश्वत अभीप्सा ही सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति है|
उस अभीप्सा से ही समस्त गुण स्वयमेव खिंचे चले आते हैं|
यही सार है, बाकी सब निःसार है|
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परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक अभिव्यक्ति भारतवर्ष में ही हुई है|
भारत का भविष्य सनातन हिन्दू धर्म पर निर्भर है, इस पृथ्वी का भविष्य भारत पर निर्भर है, और इस समस्त सृष्टि का भविष्य इस पृथ्वी पर निर्भर है चाहे भौतिक रूप से अनन्त कोटि ब्रह्मांडों में यह पृथ्वी नगण्य है|
धर्म विहीन सृष्टि का सम्पूर्ण विनाश सुनिश्चित है|

ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ ||

पराविद्या और अपराविद्या ..........

पराविद्या और अपराविद्या ... (स्वामी मृगेंद्र सरस्वती जी के सत्संग से संकलित)
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(1) पराविद्या :---- परमात्मा को जानने वाली विद्या है|
(2) अपराविद्या :----- जो धर्म-अधर्म और कर्त्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान कराये वह विद्या है|
ज्ञानशक्ति से हम जानते हैं और क्रियाशक्ति से करते हैं|
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शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, और ज्योतिष ---- इनका ज्ञान होने से ही हम वेदों को समझ सकते हैं| ये अपरा विद्याएँ हैं|
(1) वेदों के सही उच्चारण के ढंग को "शिक्षा" कहते हैं| वेदों के एक ही शब्द के दो प्रकार से उच्चारण से अलग अलग अर्थ निकलते है| इसलिये वेद को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि उच्चारण कैसे हो|
(2) जितने भी धार्मिक कर्म .... पूजा, हवन आदि है उन सब को करने का तरीका जिन ग्रंथों में है वे "कल्प" सूत्र है|
(3) "व्याकरण" वेद के पदों को कैसे समझा जाये यह बताता है|
(4) "निरुक्त" शब्दों के अर्थ लगाने का तरीका है|
(5) "छंद" अक्षर विन्यास के नियमों का ज्ञान कराता है|
(6) "ज्योतिष" से कर्म के लिये उचित समय निर्धारण का ज्ञान होता है|
----- उपरोक्त छःओं का ज्ञान वेदों को समझने के लिए आवश्यक है| ये और चारों वेद "अपराविद्या" में आते हैं|
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"पराविद्या उसको कहते हैं जिससे परमेश्वर की प्राप्ति हो अर्थात् साक्षात्कार होता है| उपनिषद् के पढ़ने में जो ज्ञान है वह अपराविद्या है, पर उसमें बताये का साक्षात्कार जिससे होता है वह पराविद्या है|
"धर्म" -- अपराविद्या है, और "साक्षात्कार" --- "पराविद्या" है|
"शब्दज्ञान" अपराविद्या है और "ब्रह्मसाक्षात्कार" पराविद्या है|
शब्द का ज्ञान होने से हम समझते हैं कि विषय का ज्ञान हो गया, पर मात्र शब्दों के ज्ञान से हम ज्ञानी नहीं हो सकते| शास्त्रों के अध्ययन मात्र से हम ज्ञानी नहीं हो सकते| निज जीवन में परमात्मा को अवतृत कराने का ज्ञान पराविद्या है|
वेद जब परमात्मा का साक्षात्कार करा दे तब वह पराविद्या है| पराविद्या ही वस्तुतः ज्ञान है| पराविद्या से जो परमात्मा का ज्ञान होता है वही एकमात्र ज्ञान है| उससे भिन्न तो सब ज्ञान का आभास मात्र है, ज्ञान नहीं|
!! ॐ ॐ ॐ !!

Thursday, 1 September 2016

मेरा जन्मदिवस ........

आज भाद्रपद अमावस्या है| आज से ६८ वर्ष पूर्व आज ही के दिन ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार दिनांक 03 सितम्बर 1948 थी, जब मध्याह्न के लगभग 3.30 बजे भारतीय समयानुसार इस भौतिक देह का जन्म तत्कालीन शेखावाटी जनपद के झूँझणु (झुंझुनूं) नगर में हुआ था| कहते हैं इस नगर को सैंकड़ों वर्ष पूर्व किसी वीर योद्धा झुझार सिंह जाट ने बसाया था, जिसके नाम पर यह वर्त्तमान में झुंझुनूं कहलाता है|
जीवन की अनेक मधुर/कटु स्मृतियाँ हैं, पर अब उनका महत्व नहीं है|
पता नहीं कितनी बार जन्म लिया है और कितनी बार मरे हैं| पता नहीं कौन कौन लोग किस किस जन्म में मेरे सम्बन्धी थे| सभी के अनुभव मेरे ही अनुभव हैं|
अब तो सभी मेरे सम्बन्धी हैं| परमात्मा में हम सब एक हैं| कोई मुझसे पृथक नहीं है| आप सब दिव्यात्माओं को मैं नमन करता हूँ| आप सब मेरी ही निजात्मा हो|
ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ नमःशिवाय |
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आज इस क्षेत्र के सभी सती मंदिरों के वार्षिकोत्सव हैं| मध्यकाल में हुई ये सब सतियाँ वीरांगणाएँ थीं| उन के वंशज इनको अपनी कुलदेवी मानकर इनकी उपासना करते हैं| आज के परिप्रेक्ष्य में आज की पीढी के लिए इसे समझना कठिन है|
यहाँ के श्री राणी सती जी मंदिर में आज प्रातः वार्षिक पूजा आरम्भ हो गयी है और पूरे भारत से आये हजारों श्रद्धालु (लगभग एक लाख) आज लौटना आरम्भ कर देंगे|
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इस क्षेत्र में अरावली पर्वतमाला में स्थित लोहार्गल तीर्थ की चौबीस कोसीय परिक्रमा का भी अभी समापन हुआ है| सूर्य कुंड में स्नान के पश्चात सभी आये हुए साधू-संत और लाखों श्रद्धालु आज लौटना आरम्भ कर देंगे|
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इस क्षेत्र में खाटू श्याम जी, सालासर बालाजी, शाकम्भरी माता, जीण माता, लोहार्गल, और श्री राणी सती जी आदि प्रसिद्ध धार्मिक स्थान हैं| यहाँ की प्राचीन हवेलियाँ, खंडहर हो चुके प्राचीन किले, और प्राचीन मंदिर दर्शनीय हैं| कभी यह क्षेत्र बहुत अधिक समृद्ध रहा है| अब भी तुलनात्मक रूप से बहुत समृद्ध है|
शमी वृक्षों (खेजड़ी) की प्रचूरता और कृष्ण मृगों के विचरण के कारण लगता है यह मरुभूमि का भाग कभी तपोभूमि भी रहा है|
पूरे भारत में मूल रूप से यहाँ के प्रवासी उद्योगपतियों का वर्चस्व है| भारतीय सेना में भी सर्वाधिक सैनिक इसी क्षेत्र के हैं| सभी युद्धों में सर्वाधिक शहीद हुए सैनिक इसी क्षेत्र के थे|
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प्रसंगवश ऐसा लिख दिया, अन्यथा पूरा ब्रह्मांड ही अपना घर है, और समस्त सृष्टि अपना परिवार| यह संसार एक पाठशाला की तरह ऐसे ही चलता रहेगा, जहाँ एक ही पाठ निरंतर पढ़ाया जा रहा है| कुछ लोग इसे शीघ्र समझ लेते हैं, कुछ देरी से, और जो इसे नहीं समझते वे समझने के लिए बाध्य कर दिए जाते हैं| वह पाठ है कि "मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य है ईश्वर की प्राप्ति"|

ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

प्रधान मंत्री की जापान यात्रा :---

भारत के प्रधानमंत्री ने तोजी और किन्कौजी नाम के दो प्रसिद्ध जापानी बौद्ध मंदिरों का भ्रमण किया|
मुझे गर्व होता है ईसा की छठी शताब्दी में भारत से जापान गए बोधिधर्म नाम के एक धर्म प्रचारक का जिसने जापान में बौद्ध धर्म के जिस रूप (झेन) का प्रचार प्रसार किया वह बारह शताब्दियों तक वहाँ का राजधर्म रहा| बोधिधर्म पहिले चीन गए और वहाँ हुनान प्रांत के प्रसिद्द शाओलिन मन्दिर में कुछ समय तक रहे और फिर जापान जाकर झेन बौद्ध धर्म का प्रचार किया|
"झेन" शब्द संस्कृत के "ध्यान" शब्द का अपभ्रंस है जो चीन में "चेन" और जापान में "झेन" हुआ|
उनसे लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व ही सन 0067 ई. में चीन गये कश्यपमातंग और धर्मारण्य नाम के दो धर्मप्रचारकों ने पूरे चीन में बौद्ध धर्म फैला दिया था|
भारत को आज फिर आवश्यकता है ऐसे धर्म प्रचारकों की जो अपने आचरण और आत्मबल से पूरे विश्व में धर्मप्रसार कर सकें|

समर्पण .....

समर्पण .....
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सूर्य, चन्द्र और तारों को चमकने के लिए क्या साधना करनी पडती है?
पुष्प को महकने के लिए कौन सी तपस्या करनी पडती है?
महासागर को गीला होने के लिए कौन सा तप करना पड़ता है?
शांत होकर प्रभु को अपने भीतर बहने दो|
उसकी उपस्थिति के सूर्य को अपने भीतर चमकने दो|
जब उसकी उपस्थिति के प्रकाश से ह्रदय पुष्प की भक्ति रूपी पंखुड़ियाँ खिलेंगी तो उसकी महक अपने ह्रदय से सर्वत्र फ़ैल जायेगी|
कभी जब आप एक अति उत्तुंग पर्वत के शिखर से नीचे की गहराई में झांकते हो तो वह डरावनी गहराई भी आपमें झाँकती है| ऐसे ही जब आप नीचे से अति उच्च पर्वत को घूरते हो तो वह पर्वत भी आपको घूरता है| जिसकी आँखों में आप देखते हो वे आँखें भी आपको देखती हैं| जिससे भी आप प्रेम या घृणा करते हो उससे वैसी ही प्रतिक्रिया कई गुणा होकर आपको ही प्राप्त होती है|
वैसे ही जब आप प्रभु को प्रेम करते हो तो वह प्रेम अनंत गुणा होकर आपको ही प्राप्त होता है| वह प्रेम आप स्वयं ही हो| प्रभु में आप समर्पण करते हो तो प्रभु भी आपमें समर्पण करते हैं| जब आप उनके शिवत्व में विलीन हो जाते हो तो आप में भी वह शिवत्व विलीन हो जाता है और आप स्वयं साक्षात् शिव बन जाते हो| जहाँ ना कोई क्रिया-प्रतिक्रिया है, ना कोई मिलना-बिछुड़ना, जहाँ कोई अपेक्षा या माँग नहीं है, जो बैखरी मध्यमा पश्यन्ति और परा से भी परे है, वह असीमता, अनंतता व सम्पूर्णता आप स्वयं ही हो|
आपका पृथक अस्तित्व उस परम प्रेम और परम सत्य को व्यक्त करने के लिए ही है|
ॐ नमः शिवाय| शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि | ॐ ॐ ॐ ||

परमात्व तत्व .....

परमात्व तत्व .....
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जिसे उपलब्ध होने के लिए ह्रदय में एक प्रचंड अग्नि जल रही है, चैतन्य में जिसके अभाव में ही यह सारी तड़प और वेदना है, वह परमात्मा ही है|
जानने और समझने योग्य भी एक ही विषय है, जिसे जानने के पश्चात सब कुछ जाना जा सकता है, जिसे जानने पर हम सर्वविद् हो सकते हैं, जिसे पाने पर परम शान्ति और परम संतोष व संतुष्टि प्राप्त हो सकती है, वह है .....परमात्म तत्त्व|
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जिससे इस सृष्टि का उद्भव, स्थिति और संहार यानि लय होता है .... वह परमात्मा ही है| वह परमात्मा ही है जो सभी रूपों में व्यक्त हो रहा है| जो कुछ भी दिखाई दे रहा है या जो कुछ भी है, वह परमात्मा ही है| परमात्मा से भिन्न कुछ भी नहीं है|
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सारी पूर्णता, समस्त अनंतता और सम्पूर्ण अस्तित्व परमात्मा ही है| उस परमात्मा को हम चैतन्य रूप में प्राप्त हों, उसके साथ एक हों|
उस परमात्मा से कम हमें कुछ भी नहीं चाहिए|
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||