Wednesday, 10 August 2016

मेरी जाति, मेरा वर्ण और मेरा गौत्र कौन सा है ? ..........

मेरी जाति, मेरा वर्ण और मेरा गौत्र कौन सा है ? ..........
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औरों की तो मैं कह नहीं सकता पर जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मेरी जाति, मेरा वर्ण और मेरा गौत्र वही है जो सृष्टिकर्ता परमात्मा का है| मेरे इष्ट देवता भगवान शिव हैं| मैं उन्हीं का ध्यान करता हूँ और मेरा समर्पण भी उन्हीं के प्रति है अतः मैं उनका हूँ और वे मेरे हैं| इस प्रकार उनकी जाति ही मेरी जाति है, उनका वर्ण ही मेरा वर्ण है और उनका गौत्र ही मेरा गौत्र है| उनसे पृथक मेरा कोई अस्तित्व नहीं है|
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जब एक स्त्री का विवाह होता है तब वह अपने पति के प्रति समर्पित हो जाती है और पति का वर्ण, पति की जाति और पति का गौत्र ही उस स्त्री के भी हो जाते है|
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वैसे ही एक भक्त का समर्पण जिस इष्ट देव/देवी या परमात्मा के साथ होता है उसके जाति, वर्ण और गौत्र भी उसके इष्ट देव/देवी वाले या परमात्मा के ही हो जाते हैं|
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(परमात्मा को समर्पित आत्माओं की एक ही जाति, वर्ण और गौत्र हो सकता है, और वह है ------ "अच्युत"|)
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ॐ नमः शिवाय | ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

निष्काम कर्म .........

निष्काम कर्म .........
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भक्तों के लिए भगवान की पराभक्ति यानि अहैतुकी भक्ति ही निष्काम कर्म है| जिससे ईश्वर प्रसन्न हों वे कार्य, यानि प्रभु की प्रसन्नता हेतु सम्पादित कार्य ही निष्काम कर्म हैं|
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योगमार्ग के साधकों के लिए पराभक्ति के साथ साथ ध्यान में मेरुदंड स्थित सुषुम्ना नाड़ी में मूलाधार चक्र से आज्ञा चक्र व सहस्त्रार तक और फिर बापस नीचे-ऊपर प्राण ऊर्जा के सचेतन संचलन द्वारा चक्र भेद और अनाहत नाद यानि ओंकार पर ध्यान ही निष्काम कर्म है|
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ॐ नमः शिवाय | ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

रक्षा बंधन की सार्थकता .....


रक्षा बंधन की सार्थकता .....
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रक्षा बंधन की सार्थकता इसी में है कि हम सत्य सनातन हिन्दू धर्म और अपने राष्ट्र भारतवर्ष की रक्षा का संकल्प लें|
पर यह हम तभी कर पायेंगे जब हम पहिले सब तरह के बुरे विचारों और बुरे संकल्पों से अपनी स्वयं की रक्षा करें| बुरे विचारों से अपनी स्वयं की रक्षा करने के उपरांत ही हम कोई सार्थक कार्य कर पायेंगे|
भगवन से हमारी प्रार्थना है --- तन्मेमनःशिवसंकल्पमस्तु|
हमारे सारे विचार शुभ हों|

रक्षा बंधन की शुभ कामनाएँ| समस्त मातृशक्ति को मेरा सस्नेह अभिनन्दन|

कूटस्थ चैतन्य और भ्रामरी गुफा .....

कूटस्थ चैतन्य और भ्रामरी गुफा .................
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जिन साधकों को कूटस्थ ज्योति यानि ज्योतिर्मय ब्रह्म के दर्शन होते हैं उन्हें भ्रामरी गुफा (गुहा) में प्रवेश कर उसे पार करना ही पड़ता है, और विक्षेप व आवरण की मायावी शक्तियों को परास्त भी करना पड़ता है| तभी उनकी स्थाई स्थिति कूटस्थ चैतन्य में होती है|
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कूटस्थ में दिखाई देने वाला पञ्चकोणीय श्वेत नक्षत्र पञ्चमुखी महादेव का प्रतीक है| यह एक नीले और स्वर्णिम आवरण से घिरा हुआ दिखाई देता है, जिसके चैतन्य में स्थित होकर साधक की देह शिवदेह हो जाती है और वह जीव से शिव भी हो सकता है| इस श्वेत नक्षत्र की विराटता ही क्षीरसागर है जिसका भेदन और जिसके परे की स्थिति योग मार्ग की उच्चतम साधना और उच्चतम उपलब्धि है| इसका ज्ञान भगवान की परम कृपा से किसी सद्गुरु के माध्यम से ही होता है|
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शिवनेत्र होकर (बिना तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासामूल के समीप लाकर भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, खेचरी मुद्रा में संभव हो तो ठीक है अन्यथा जीभ को ऊपर पीछे की ओर मोड़कर) प्रणव यानि ओंकार की ध्वनि को सुनते हुए उसी में लिपटी हुई सर्वव्यापी ज्योतिर्मय अंतर्रात्मा का चिंतन करने की साधना नित्य नियमित यथासंभव अधिकाधिक करते रहें|
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समय आने पर हरिकृपा से विद्युत् की चमक के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होगी| उस ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के बाद उसी की चेतना में निरंतर रहने की साधना करें| यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता| लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता| यही कूटस्थ है, और इसकी चेतना ही कूटस्थ चैतन्य है जिसमें स्थिति ही योगमार्ग की उच्चतम उपलब्धी है|
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आज्ञाचक्र ही योगी का ह्रदय है, भौतिक देह वाला ह्रदय नहीं| आरम्भ में ज्योति के दर्शन आज्ञाचक्र से थोड़ा सा ऊपर होता है, वह स्थान कूटस्थ बिंदु है| आज्ञाचक्र का स्थान Medulla Oblongata यानि मेरुशीर्ष के ऊपर खोपड़ी के मध्य में पीछे की ओर है| यही जीवात्मा का निवास है|
फिर गुरुकृपा से धीरे धीरे सहस्त्रार में स्थिति हो जाती है| एक उन्नत साधक की चेतना आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य ही रहती है|
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कुसंग का त्याग और यम-नियमों का पालन अनिवार्य है अन्यथा तुरंत पतन हो जाता है|
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जब ब्रह्मज्योति प्रकट होती है तब आरम्भ में उसके मध्य में ज्योतिर्मय किरणों से घिरा एक काला बिंदु दिखाई देता है, यही भ्रामरी गुफा है| यह अमृतमय मधु से भरी होती है| इसको पार करने के पश्चात् ही एक स्वर्णिम और फिर एक नीली प्रकाशमय सुरंग को भी पार करने पर साधक को श्वेत पञ्चकोणीय नक्षत्र के दर्शन होते हैं|
जब इस ज्योति पर साधक ध्यान करता है तब कई बार वह ज्योति लुप्त हो जाती है, यह 'आवरण' की मायावी शक्ति है जो एक बहुत बड़ी बाधा है|
इस ज्योति पर ध्यान करते समय 'विक्षेप' की मायावी शक्ति ध्यान को छितरा देती है|
इन दोनों मायावी शक्तियों पर विजय पाना साधक के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है|
ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन, सतत साधना और गुरुकृपा से एक आतंरिक शक्ति उत्पन्न होती है जो आवरण और विक्षेप की शक्तियों को कमजोर बना कर साधक को इस भ्रामरी गुफा से पार करा देती है|
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आवरण और विक्षेप का प्रभाव समाप्त होते ही साधक को धर्मतत्व का ज्ञान होता है| यहाँ आकर कर्ताभाव समाप्त हो जाता है और साधक धीरे धीरे परमात्मा की ओर अग्रसर होने लगता है|
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हम सब को परमात्मा की पराभक्ति प्राप्त हो और हम सब उसके प्रेम में निरंतर मग्न रहें इसी शुभ कामना के साथ इस लेख को विराम देता हूँ|
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ॐ नमः शिवाय | ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

भगवान शिव के पाँच मुख ....

भगवन शिव के पाँच मुख .....
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शिवजी के प्रतीकात्मक रूप से पाँच मुख हैं| ये पाँच तत्वों के प्रतीक हैं| इनके नाम भी सद्योजात (जल), वामदेव (वायु), अघोर (आकाश), तत्पुरुष (अग्नि), ईशान (पृथ्वी) हैं। शैवागम शास्त्रों में इनकी विस्तृत व्याख्या है| शैवागम शास्त्रों के आचार्य हैं --- दुर्वासा ऋषि|
व्यवहारिक रूप से योग साधना करने वाले सभी योगियों को पंचमुखी महादेव के दर्शन गहन ध्यान में एक श्वेत रंग के पंचमुखी नक्षत्र के रूप में होते हैं जो एक नीले आवरण से घिरा होता है| यह नीला आवरण भी एक सुनहरे प्रकाश पुंज से घिरा होता है| ध्यान साधना में योगी पहले उस सुनहरे आवरण को, फिर नीले प्रकाश को, फिर उस श्वेत नक्षत्र का भेदन करता है| तब उसकी स्थिति कूटस्थ चैतन्य में हो जाती है| यह योगमार्ग की सबसे बड़ी साधना है| उससे से परे स्थित होकर जीव स्वयं शिव बन जाता है| उसका कोई पृथक अस्तित्व नहीं रहता|
यह अनंत विराट श्वेत प्रकाश पुंज ही क्षीर सागर है जहां भगवान नारायण निवास करते हैं|
यह है भगवन शिव के पाँच मुखों का रहस्य जिसे भगवान शिव की कृपा से ही समझा जा सकता है|
इन तीनो प्रकाश पुंजों को आप शिवजी के तीन नेत्र कह सकते हैं| हो सकता है मैं गलत हूँ| मनीषियों के विचार आमंत्रित हैं|
मेरे विचार से "ॐ तत् सत्" भी तीनों रंगों का प्रतीक है| सुनहरा प्रकाश ॐ है| यह वह स्पंदन है जिससे समस्त सृष्टि बनी है| नीला रंग 'तत्" यानि कृष्ण-चैतन्य या परम-चैतन्य है| 'सत्' श्वेत रंग स्वयं परमात्मा का प्रतीक है| ईसाई मत में 'Father', 'Son' and the 'Holy Ghost' इन तीन शब्दों का प्रयोग किया गया गया है| यह 'ॐ तत्सत्' का ही व्यवहारिक अनुवाद है| Holy Ghost का अर्थ ॐ है, Son का अर्थ है कृष्ण-चैतन्य, और Father का अर्थ है स्वयं परमात्मा|
शिवमस्तु | ॐ नमः शिवाय |

सहस्त्रार में गुरु तत्व का ध्यान ......

एक योगी साधक के लिए ओंकार रूप में राम नाम तो सर्वदा कूटस्थ चैतन्य में है ही, पर स्थिति सुषुम्ना में और उससे भी ऊपर सहस्त्रार में निरंतर गुरु के साथ हो| गुरु और परमात्मा का संग ही वास्तविक सत्संग है|
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किसी भी न्यायालय में कोई भी न्यायाधीश जब अपने आसन पर बैठता है तब वहाँ सब कुछ पूरी तरह से व्यवस्थित हो जाता है| लोग अपने मोबाइल बंद कर देते हैं, कोई वकील भी गपशप या फालतू बात नहीं करता, और सब सतर्क हो जाते हैं| वैसे ही सद्गुरु महाराज तत्व रूप में जब सहस्त्रार में बिराजमान होते हैं तब जीवन में सब कुछ अपने आप ही व्यवस्थित हो जाता है| सहस्त्रार में गुरु महाराज का निरंतर तत्व रूप में ध्यान करो|
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गुरु ॐ ! गुरु ॐ ! गुरु ॐ ! गुरु ॐ ! गुरु ॐ ! जय गुरु ! ॐ ॐ ॐ !!

हम किसी भी तरह की साधना कर के भगवान पर कोई अहसान नहीं कर रहे हैं .....

हम किसी भी तरह की साधना कर के
भगवान पर कोई अहसान नहीं कर रहे हैं .....
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हम चाहे जितना भी जप-तप करते हों इसमें अभिमान की क्या बात है?
कुछ लोग बड़े गर्व से कहते हैं की फलाँ फलाँ मन्त्र के एक करोड़ जप कर लिए, इतनी इतनी मालाएँ फलाँ मन्त्र की नित्य करते हैं, इतने घंटे ध्यान करते हैं आदि आदि| पर इसमें अभिमान की क्या बात है? आपकी क्रियाओं का उतना महत्व नहीं है जितना आपके प्रेम और समर्पण का है|
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जो कुछ भी उपलब्धि होती है वह गुरु और परमात्मा की कृपा से होती है, ना की स्वयं के अहंकारमय प्रयास से| भगवान को और उनकी कृपा को जप-तप से कोई खरीद नहीं सकता|
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अहैतुकी प्रेम और पूर्ण समर्पण का निरंतर प्रयास ही साधना है| जिनके ह्रदय में अभीप्सा और तड़प होती है उन्हें भगवान स्वयं ही मार्ग दिखाते हैं| अपनी सब कमियों को भी प्रभु को समर्पित कर दो| कुछ भी बचाकर मत रखो| भगवान स्वयं अपने भक्तों का मार्गदर्शन करते हैं|
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ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||