जहाँ पर हम हैं, वहीं पर भगवान भी हर समय हमारे साथ एक हैं। वे हमारे बिना नहीं रह सकते। जिस आसन में स्थिर होकर हम सुख से बैठ सकते हैं - वही योगासन है। जिस आसन पर हम बैठे हैं, वहाँ से अनंत ब्रह्मांड में जहाँ तक हमारी कल्पना जाती है, वह सम्पूर्ण ब्रह्मांड हम स्वयं हैं, यह नश्वर देह नहीं।
Thursday, 30 October 2025
जहाँ पर हम हैं, वहीं पर भगवान भी हर समय हमारे साथ एक हैं ---
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इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड में ओंकार रूपी एक नाद निःसृत हो रहा है। उस अनाहत-नाद का निरंतर श्रवण सर्वश्रेष्ठ जप है। अनाहत नाद का निरंतर श्रवण - प्राण तत्व की चंचलता को स्थिर करता है, जिसके बिना मन स्थिर नहीं हो सकता।
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कोई कामना, मांग, या अपेक्षा न रहे। आत्मा की अभीप्सा - परमप्रेम में रूपांतरित हो जाये। इस प्रेम में कोई भी अन्य नहीं है। वह असीम परमप्रेम और अनंत आनंद ही परमात्मा है, जो हम स्वयं हैं।
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इस संसार चक्र में बार बार हम आने को बाध्य हैं क्योंकि हम देह की चेतना से जुड़े हुए हैं। श्रुति भगवती कहती है - "अयमात्मा ब्रह़म्", अर्थात जो आत्मा है, वही ब्रह्म है, वही ईश्वर है, वही हम हैं। हम यह देह नहीं, शाश्वत आत्मा हैं। इसी आत्मा का निरंतर चिंतन करो। स्वयं की पृथकता के बोध को उसमें समर्पित कर दो। यही कल्याण का मोक्ष-मार्ग है।
ॐ तत्सत् !!
३० अक्तूबर २०२१
हमारे शरीर का भ्रूमध्य -- पूर्व दिशा है, सहस्त्रार -- उत्तर दिशा है, बिंदु विसर्ग (शिखास्थल) -- पश्चिम दिशा है, और उससे नीचे का क्षेत्र दक्षिण दिशा है।
हमारे शरीर का भ्रूमध्य -- पूर्व दिशा है, सहस्त्रार -- उत्तर दिशा है, बिंदु विसर्ग (शिखास्थल) -- पश्चिम दिशा है, और उससे नीचे का क्षेत्र दक्षिण दिशा है।
सूक्ष्म देह में सहस्त्रार से परे का क्षेत्र -- परा है। (कुछ रहस्य की भी बातें हैं, जिनकी चर्चा सार्वजनिक रूप से नहीं की जा सकती)
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कहीं कोई पृथकता नहीं है। भगवान के परमप्रेममय रूप पर हम सदा ध्यान करें। जब हम कहते हैं कि पूर्व दिशा में मुँह कर के ध्यान करो, इसका अर्थ है अंतर्दृष्टि भ्रूमध्य में रख कर ध्यान करो। जब हम कहे हैं कि उत्तर दिशा में मुँह कर के ध्यान करो, इसका अर्थ है सहस्त्रार पर अंतर्दृष्टि रख कर ध्यान करो। दक्षिण दिशा में ध्यान मत करो का अर्थ है -- आज्ञा चक्र से नीचे दृष्टी मत रखो ध्यान के समय।
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परमशिव का ध्यान -- सूक्ष्म देह द्वारा देहातीत अवस्था में अनुभूत हो रही अनंतता में और उस से भी परे होता है। ये अनुभूतियाँ बड़ी दुर्लभ हैं, जो अनेक जन्मों के पुण्यों से प्राप्त होती हैं।
ॐ तत्सत् !!
३० अक्तूबर २०२१
सनातन-धर्म अमर है, यह कभी नष्ट नहीं हो सकता ---
सनातन-धर्म अमर है, यह कभी नष्ट नहीं हो सकता, क्योंकि यह उन सत्य सनातन सिद्धांतों पर आधारित है, जिनसे यह सृष्टि चल रही है ---
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कभी कभी मैं नकारात्मक और निराश हो जाता हूँ, पर परमात्मा की कृपा मुझे सदा बचा लेती है। कुछ दिनों पूर्व मैंने लिखा था कि मनुष्य जाति की चेतना इस समय उत्तरोत्तर सकारात्मक ऊर्ध्व दिशा में विस्तृत हो रही है। जिस दिन पुनर्जन्म और कर्मफलों का सिद्धान्त आधुनिक विज्ञान-सम्मत हो जाएगा, उसी दिन से तमोगुणी कलियुगी मत-मतांतर ध्वस्त होने आरंभ हो जाएँगे, और सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण आरंभ हो जाएगा।
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सनातन-धर्म कभी नष्ट नहीं हो सकता, क्योंकि यह इस सनातन सत्य पर आधारित है कि प्रत्येक जीवात्मा शाश्वत है, और अपने कर्मफलों को भोगने के लिए बारंबार नूतन जन्म लेती है। प्रत्येक आत्मा की अभीप्सा परमात्मा को पाने की होती है। परमात्मा को पाने का यानि भगवत्-प्राप्ति का मार्ग सिर्फ सनातन-धर्म ही बताता है। वास्तव में भगवत्-प्राप्ति ही सनातन धर्म है। परमात्मा से अहैतुकी परम-प्रेम यानि भक्ति और समर्पण की शिक्षा सिर्फ सनातन धर्म ही देता है। सनातन धर्म ही पूरी सृष्टि को अपना परिवार मानता है।
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यह सृष्टि भगवान की है, जिसे उनकी प्रकृति अपने नियमानुसार चला रही है। भगवान का दिया हुआ वचन है कि वे धर्म का अभ्युत्थान और अधर्म का नाश करेंगे। उनकी दी हुई शक्ति को जागृत कर हम स्वधर्म का सत्यनिष्ठा से पालन करते रहें, और निमित्त मात्र बनकर, अधर्म का प्रतिकार करते हुए अपनी रक्षा करने में समर्थवान बनें।
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ॐ तत्सत् !!
३० अक्तूबर २०२१
Monday, 27 October 2025
सुषुम्ना के छः चक्रों में भागवत मन्त्र का जाप ....
सुषुम्ना के छः चक्रों में भागवत मन्त्र का जाप .....
इस विषय पर मैं पूर्व में अनेक प्रस्तुतियाँ दे चुका हूँ | कुछ मित्रों ने जिज्ञासा व्यक्त की है अतः मैं उनकी जिज्ञासा को शांत करने मात्र के लिए नए सिरे से संक्षिप्त में पुनश्चः यह लघु लेख लिख रहा हूँ|
द्वादसाक्षरी भागवत मंत्र का जाप अति लाभप्रद और निरापद है| जितना अधिक जाप भक्ति से किया जाए उतना ही कम है|
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योग मार्ग की कुछ अति उन्नत साधनाओं में सूक्ष्म देह की सुषुम्ना नाड़ी के षट्चक्रों में इसके जाप का विधान है, जिसको सदा गोपनीय रखा गया है| ये साधनाएँ गुरु के मार्गदर्शन में ही करनी चाहियें क्योंकि इन साधनाओं से कुछ सूक्ष्म शक्तियों का जागरण होता है| जब सूक्ष्म शक्तियाँ जागृत होती हैं, उस समय साधक के आचार-विचार यदि सही न हों तो वे लाभ के बजाय बहुत अधिक हानि पहुँचाती हैं|
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सामान्यतः योग साधक मूलाधार से सहस्त्रार तक मानसिक रूप से क्रमशः --- लं, वं, रं, यं, हं, ॐ,ॐ, इन बीज मन्त्रों के साथ आरोहण करते हैं और विपरीत क्रम से अवरोहण करते हैं|
पर उन्नत योगी मेरुदंड व मस्तिष्क के चक्रों में भागवत मन्त्र का मानसिक जाप करते हैं| इसके जप का क्रम इस प्रकार है .... पूर्ण प्रेम सहित .... भगवान वासुदेव का ध्यान करते हुए .... स्वाभाविक रूप से साँस लेते हुए सुषुम्ना नाडी में .... दृष्टी को भ्रूमध्य पर रखते हुए ....
ॐ ---- मूलाधार
न ----- स्वाधिष्ठान
मो ---- मणिपुर
भ ----- अनाहत
ग ----- विशुद्धि
व ----- सहस्त्रार (आज्ञा चक्र पर रुके बिना)
ते ----- आज्ञा
वा ----- विशुद्धि
सु ----- अनाहत
दे ----- मणिपुर
वा ----- स्वाधिष्ठान
य ----- मूलाधार ||
इस विधि से कम से कम १२ बार जप कर के आज्ञाचक्र पर ॐ का ध्यान करें|
पूरे मन्त्र का भी आज्ञाचक्र पर यथासंभव खूब जप करें| विशेष ध्यान की बात यह है कि अवरोहण के क्रम में आज्ञा, अनाहत और मूलाधार पर पूर्ण शक्ति से मानसिक रूप से प्रहार करते हैं, इससे तीनों ग्रंथियों का भेदन होता है| इसी की प्रतीक त्रिभंग मुद्रा है|
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दीक्षा देते समय सिद्ध गुरु की शक्ति सुषुम्ना का द्वार खोल देती है जिससे सुषुम्ना चैतन्य हो जाती है और प्राण प्रवाह सुषुम्ना में आरम्भ हो जाता है|
किन्हीं शक्तिपात संपन्न गुरु से दीक्षा लेकर यह साधना करनी चाहिए| उनकी कृपा प्राप्ति से आगे का मार्ग प्रशस्त हो जाता है|
इस विधि से साधना करने पर सामान्य से बारह गुणा अधिक फल मिलता है|
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इस विषय पर मेरी यह अंतिम प्रस्तुति है| इस विषय पर न तो और लिखूँगा, और न ही किसी के प्रश्न का कोई उत्तर दूँगा| सप्रेम सादर धन्यवाद!
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय| ॐ तत्सत्|
२८ अक्टूबर २०१६
यह लेख प्रत्येक गौभक्त को अवश्य पढना चाहिए ---
1966 का वह गो_हत्या बंदी आंदोलन, जिसमें हजारों साधुओं को इंदिरा सरकार ने गोलियों से भुनवा दिया था! आंखों देखा वर्णन!
देश के त्याग, बलिदान और राष्ट्रीय ध्वज में मौजूद 'भगवा' रंग से पता नहीं कांग्रेस को क्या एलर्जी है कि वह आजाद भारत में संतों के हर आंदोलन को कुचलती रही है। आजाद भारत में कांग्रेस पार्टी की सरकार भगवा वस्त्रधारी संतों पर गोलियां तक चलवा चुकी है! गो-रक्षा के लिए कानून बनाने की मांग लेकर जुटे हजारों साधु-संत इस गांलीकांड में मारे गए थे। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में हुए उस खूनी इतिहास को कांग्रेस ने ठीक उसी तरह दबा दिया, जिस कारण आज की युवा पीढ़ी उस दिन के खूनी कृत्य से आज भी अनजान है!
गोरक्षा महाभियान समिति के तत्कालीन मंत्रियों में से एक मंत्री और पूरी घटना के गवाह, प्रसिद्ध इतिहासकार एवं लेखक आचार्य सोहनलाल रामरंग के अनुसार, ''7 नवंबर 1966 की सुबह आठ बजे से ही संसद के बाहर लोग जुटने शुरू हो गए थे। उस दिन कार्तिक मास, शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि थी, जिसे हम-आप गोपाष्ठमी नाम से जानते हैं। गोरक्षा महाभियान समिति के संचालक व सनातनी करपात्री जी महाराज ने चांदनी चैक स्थित आर्य समाज मंदिर से अपना सत्याग्रह आरंभ किया। करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में जगन्नाथपुरी, ज्योतिष पीठ व द्वारका पीठ के शंकराचार्य, वल्लभ संप्रदाय के सातों पीठ के पीठाधिपति, रामानुज संप्रदाय, मध्व संप्रदाय, रामानंदाचार्य, आर्य समाज, नाथ संप्रदाय, जैन, बौद्ध व सिख समाज के प्रतिनिधि, सिखों के निहंग व हजारों की संख्या में मौजूद नागा साधुओं को पंडित लक्ष्मीनारायण जी ने चंदन तिलक लगाकर विदा कर रहे थे। लालकिला मैदान से आरंभ होकर नई सड़क व चावड़ी बाजार से होते हुए पटेल चैक के पास से संसद भवन पहुंचने के लिए इस विशाल जुलूस ने पैदल चलना आरंभ किया। रास्ते में अपने घरों से लोग फूलों की वर्षा कर रहे थे। हर गली फूलों का बिछौना बन गया था।''
आचार्य सोहनलाल रामरंग के अनुसार, '' यह हिंदू समाज के लिए सबसे बड़ा ऐतिहासिक दिन था। इतने विवाद और अहं की लड़ाई होते हुए भी सभी शंकराचार्य और पीठाधिपतियों ने अपने छत्र, सिंहासन आदि का त्याग किया और पैदल चलते हुए संसद भवन के पास मंच पर समान कतार में बैठे। उसके बाद से आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ। नई दिल्ली का पूरा इलाका लोगों की भीड़ से भरा था। संसद गेट से लेकर चांदनी चैक तक सिर ही सिर दिखाई दे रहा था। कम से कम 10 लाख लोगों की भीड़ जुटी थी, जिसमें 10 से 20 हजार तो केवल महिलाएं ही शामिल थीं। जम्मू-कश्मीर से लेकर केरल तक के लोग गो हत्या बंद कराने के लिए कानून बनाने की मांग लेकर संसद के समक्ष जुटे थे। उस वक्त इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी और गुलजारी लाल नंदा गृहमंत्री। गो हत्या रोकने के लिए इंदिरा सरकार केवल आश्वासन ही दे रही थी, ठोस कदम कुछ भी नहीं उठा रही थी। सरकार के झूठे वादे से उकता कर संत समाज ने संसद के बाहर प्रदर्शन करने का निर्णय लिया था।''
रामरंग जी के अनुसार, ''दोपहर एक बजे जुलूस संसद भवन पर पहुंच गया और संत समाज के संबोधन का सिलसिला शुरू हुआ। करीब तीन बजे का समय होगा, जब आर्य समाज के स्वामी रामेश्वरानंद भाषण देने के लिए खड़े हुए। स्वामी रामेश्वरानंद ने कहा, 'यह सरकार बहरी है। यह गो हत्या को रोकने के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाएगी। इसे झकझोरना होगा। मैं यहां उपस्थित सभी लोगों से आह्वान करता हूं कि सभी संसद के अंदर घुस जाओ और सारे सांसदों को खींच-खींच कर बाहर ले आओ, तभी गो हत्या बंदी कानून बन सकेगा।' ''
''इतना सुनना था कि नौजवान संसद भवन की दीवार फांद-फांद कर अंदर घुसने लगे। लोगों ने संसद भवन को घेर लिया और दरवाजा तोड़ने के लिए आगे बढ़े। पुलिसकर्मी पहले से ही लाठी-बंदूक के साथ तैनात थे। पुलिस ने लाठी और अश्रुगैस चलाना शुरू कर दिया। भीड़ और आक्रामक हो गई। इतने में अंदर से गोली चलाने का आदेश हुआ और पुलिस ने भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। संसद के सामने की पूरी सड़क खून से लाल हो गई। लोग मर रहे थे, एक-दूसरे के शरीर पर गिर रहे थे और पुलिस की गोलीबारी जारी थी। नहीं भी तो कम से कम, पांच हजार लोग उस गोलीबारी में मारे गए थे।''
''बड़ी त्रासदी हो गई थी और सरकार के लिए इसे दबाना जरूरी था। ट्रक बुलाकर मृत, घायल, जिंदा-सभी को उसमें ठूंसा जाने लगा। जिन घायलों के बचने की संभावना थी, उनकी भी ट्रक में लाशों के नीचे दबकर मौत हो गई। हमें आखिरी समय तक पता ही नहीं चला कि सरकार ने उन लाशों को कहां ले जाकर फूंक डाला या जमीन में दबा डाला। पूरे शहर में कफ्र्यू लागू कर दिया गया और संतों को तिहाड़ जेल में ठूंस दिया गया। केवल शंकराचार्य को छोड़ कर अन्य सभी संतों को तिहाड़ जेल में डाल दिया गया। करपात्री जी महाराज ने जेल से ही सत्याग्रह शुरू कर दिया। जेल उनके ओजस्वी भाषणों से गूंजने लगा। उस समय जेल में करीब 50 हजार लोगों को ठूंसा गया था।''
रामरंग जी के अनुसार, ''शहर की टेलिफोन लाइन काट दी गई। 8 नवंबर की रात मुझे भी घर से उठा कर तिहाड़ जेल पहुंचा दिया गया। नागा साधु छत के नीचे नहीं रहते, इसलिए उन्होंने तिहाड़ जेल के अदंर रहने की जगह आंगन में ही रहने की जिद की, लेकिन ठंड बहुत थी। नागा साधुओं ने जेल का गेट, फर्निचर आदि को तोड़ कर जलाना शुरू किया। उधर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गुलजारीलाल नंदा पर इस पूरे गोलीकांड की जिम्मेवारी डालते हुए उनका इस्तीफा ले लिया। जबकि सच यह था कि गुलजारीलाल नंदा गो हत्या कानून के पक्ष में थे और वह किसी भी सूरत में संतों पर गोली चलाने के पक्षधर नहीं थे, लेकिन इंदिरा गांधी को तो बलि का बकरा चाहिए था! गुलजारीलाल नंदा को इसकी सजा मिली और उसके बाद कभी भी इंदिरा ने उन्हें अपने किसी मंत्रीमंडल में मंत्री नहीं बनाया। तत्काल महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री व चीन से हार के बाद देश के रक्षा मंत्री बने यशवंत राव बलवतंराव चैहान को गृहमंत्री बना।
Sunday, 26 October 2025
हमारे चिंतन की दिशा सदा परमात्मा की ओर ही रहे ---
परमात्मा के प्रति परमप्रेम, पूर्ण समर्पण, उपासना, और आत्म-साक्षात्कार ही हमारा स्वधर्म है। जैसे चुंबक की सूई का मुंह सदा उत्तर की ओर होता है, वैसे ही हमारे चिंतन की दिशा सदा परमात्मा की ओर ही रहे।
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हमारा दायित्व है कि हम अपनी संतानों में इतना आत्म-विश्वास जागृत करें कि वे बिना किसी भय या संकोच के अपनी कोई भी समस्या या उलझन अपने माता-पिता को बता सकें। सभी से मेरी प्रार्थना है कि वे अपने स्वधर्म का दृढ़ता से पालन करें, और अपने बच्चों को भी सदाचरण और धर्मरक्षा की शिक्षा दें।
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बच्चों को बात-बात पर बुरी तरह मारना-पीटना और डराना-धमकाना नहीं चाहिए। इससे उनके व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता, और वे कायर व डरपोक बन जाते हैं। हम यह सुनिश्चित करें कि हमारी संतानें इतनी शक्तिशाली, सामर्थ्यवान, साहसी, व आत्म-विश्वासी हों, कि वे अपने धर्म व स्वयं की रक्षा अधर्मियों से करने में समर्थ हों।
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परमात्मा से प्रेम करो। सुख व आनंद है ही परमात्मा में, अन्यत्र कहीं भी नहीं है। परमात्मा से दूर होने वाले सब दुःखी हैं, कोई सुखी नहीं हैं।
हरिः ॐ तत्सत् !! हर हर महादेव !! महादेव महादेव महादेव !!
कृपा शंकर
२७ अक्टूबर २०२५
Saturday, 25 October 2025
वर्तमान क्षण में मेरे लिए उपदेशों का सार ---
वर्तमान क्षण में मेरे लिए उपदेशों का सार ---
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दूसरों को तो कुछ कहने का मुझे कोई अधिकार नहीं है, इसलिए स्वयं को ही ये उपदेश दे रहा हूँ। मैं जो भी उपदेश स्वयं को दे रहा हूँ, वे मुझे इसी जन्म में भगवान से मिलाने के लिए मेरे लिए पर्याप्त हैं।
पिछले जन्म-जन्मांतरों और इस जन्म में मैंने अनेक भूलें की होंगी, और अनेक पाप-पुण्य अर्जित किए होंगे। अब भूतकाल को विस्मृत करने और उस से सारे संबंध तोड़ने का मेरा समय आ गया है। इसी क्षण से पूर्व के भूतकाल से अब मेरा कोई संबंध नहीं है। वर्तमान जीवन भी रंगमंच पर किया जा रहा एक अभिनय मात्र ही है। अब तक के अपने सारे अच्छे-बुरे कर्म और उनके फल -- भगवान वासुदेव को अर्पित कर रहा हूँ। एकमात्र कर्ता और भोक्ता वे ही हैं। यह कोई आत्म-मुग्धता या अहंकार नहीं, निज हृदय के गहनतम भाव हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान का आदेश/उपदेश है --
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"यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥९:२७॥"
अर्थात् -- "हे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो॥९:२७॥"
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"शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥९:२८॥"
अर्थात् -- "इस प्रकार तुम शुभाशुभ फलस्वरूप कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाओगे; और संन्यासयोग से युक्तचित्त हुए तुम विमुक्त होकर मुझे ही प्राप्त हो जाओगे॥९:२८॥"
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"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥९:२९॥"
अर्थात् -- "मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ। उन प्राणियोंमें न तो कोई मेरा द्वेषी है और न कोई प्रिय है। परन्तु जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, वे मेरेमें हैं और मैं उनमें हूँ॥"९:२९॥"
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"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥९:३०॥"
अर्थात् -- "यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है॥९:३०॥"
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"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१८:१७॥"
अर्थात् - "जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है, और न (पाप से) बँधता है॥१८:१७:॥"
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"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात् - "मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥१८:५८॥"
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"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
अर्थात् - "सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो॥"
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संसार में किसी की प्रशंसा से स्वयं का अहंकार नहीं बढ़े। किसी की निंदा से उदासी या निराशा न हो। किसी भी तरह की अपेक्षा और आकांक्षा न हो। साधु स्वभाव के लोगों के मुंह पर तो दुनियाँ के लोग प्रशंसा करते हैं, पीठ पीछे सब भद्दी और अश्लील गालियाँ देते हैं। इसलिए सम्मान की अपेक्षा मत रखो। भगवान की दृष्टि में हम क्या हैं? इसी का महत्व है। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ अक्तूबर २०२३
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