सनातन-धर्म -- जिन सत्य सनातन सिद्धांतों पर टिका है, जैसे - आत्मा की शाश्वतता, माया, कर्मफल, पुनर्जन्म, आध्यात्म और भगवत्-प्राप्ति, -- इन्हें कोई नष्ट नहीं कर सकता। ये सनातन सत्य हैं, और इस सृष्टि और प्रकृति के धर्म हैं। रामायण और महाभारत में इसे बहुत अच्छी तरह समझाया गया है। धर्म-शिक्षा के अभाव में हम इसे नहीं जानते।
Sunday, 23 February 2025
स्वयं में आत्म-ज्योति प्रज्ज्वलित होते ही असत्य का अंधकार तुरंत दूर होगा ---
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सूर्योदय होते ही भगवान भुवन-भास्कर के समझ कोई अंधकार नहीं टिकता। वैसे ही हम स्वयं में आत्म-ज्योति को प्रज्ज्वलित करेंगे तो हमारे अंतर में व्याप्त असत्य का अंधकार तत्क्षण दूर हो जायेगा।
आध्यात्म में इधर-उधर की मन बहलाने वाली बातों से काम नहीं बनेगा, उन में भटकाव ही भटकाव है। सीधी सी बात है --
(१) जब तक हम अपने --- मन, बुद्धि और अहंकार पर विजय नहीं पाते तब तक कोई प्रगति नहीं हो सकती।
(२) इन पर विजय के बाद --- जीव भाव से ऊपर उठ कर स्वयं को परमात्मा में दृढ़ता से स्थित करना पड़ेगा।
जहाँ तक मैं जानता हूँ, अन्य कोई मार्ग नहीं है। भटकाव में कुछ नहीं रखा है।
आप सब को नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२७ अप्रेल २०२१
धर्म और आध्यात्म -- बलशाली और समर्थवान व्यक्तियों के लिए हैं, शक्तिहीनों के लिए नहीं ---
धर्म और आध्यात्म -- बलशाली और समर्थवान व्यक्तियों के लिए हैं, शक्तिहीनों के लिए नहीं ---
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श्रुति भगवति (वेद) स्पष्ट कहती है कि बलहीन को परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती -- "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात् तपसो वाप्यलिङ्गात्।"
(मुण्डकोपनिषद् ३/२/४)
अर्थात् -- यह 'परमात्मा' बलहीन व्यक्ति के द्वारा लभ्य नहीं है, न ही प्रमादपूर्ण प्रयास से, और न ही लक्षणहीन तपस्या के द्वारा प्राप्य है|
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एक बलशाली व्यक्ति और समाज ही ईश्वर को उपलब्ध हो सकता है। पहले हम स्वयं की रक्षा करने में समर्थ हों तभी आध्यात्मिक बन सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान अर्जुन को दिया था जो सबसे बड़ा वीर, भक्त और शक्तिशाली था।
हमारी सबसे बड़ी समस्या है -- सनातन-धर्म और भारत की रक्षा कैसे करें?
धर्म की रक्षा -- धर्म के पालन से होती है। हम अपने धर्म व राष्ट्र की रक्षा करें। इस पर गहन विचार करें। यही हमारी एकमात्र समस्या इस समय है। बलशाली और पराक्रमी होकर ही हम परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं।
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आध्यात्म में जितना भी मुझे समझ में आया, और जो भी संभव हुआ, वह मेरे माध्यम से खूब लिखा गया है। भगवान श्रीकृष्ण की कुछ विशेष कृपा ही मुझ पर रही है, इसलिए उनके उपदेशों को समझने में मुझे कभी कोई कठिनाई नहीं हुई।
अब तो प्रत्यक्ष रूप से पूरा अंतःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) ही उनका हो गया है, अतः शेष लौकिक जीवन उन्हीं के ध्यान, भजन, स्मरण आदि में ही व्यतीत हो जाएगा। सोशियल मीडिया पर बना रहूँगा। इसे नहीं छोड़ूँगा।
आप सब में परमात्मा को नमन !!
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
१५ मई २०२२
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पुनश्च: -- धर्म और आध्यात्म की बातें बलशाली और समर्थवान व्यक्तियों के लिए होती हैं, शक्तिहीनों के लिए नहीं। श्रुति भगवति (वेद) स्पष्ट कहती है कि बलहीन को परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती ---
"नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात् तपसो वाप्यलिङ्गात्।"
(मुण्डकोपनिषद् ३/२/४)
अर्थात् -- यह 'परमात्मा' बलहीन व्यक्ति के द्वारा लभ्य नहीं है, न ही प्रमादपूर्ण प्रयास से, और न ही लक्षणहीन तपस्या के द्वारा प्राप्य है|
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
आध्यात्म में किसी भी तरह की आकांक्षा और अपेक्षा ... पतन का कारण हैं, और अभीप्सा व परमप्रेम ... उन्नति का आरंभ है .....
आध्यात्म में किसी भी तरह की आकांक्षा और अपेक्षा ... पतन का कारण हैं, और अभीप्सा व परमप्रेम ... उन्नति का आरंभ है .....
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मैं भगवान की प्रेरणा से पिछले आठ वर्षों से फेसबुक पर हिन्दू-राष्ट्रवाद और भगवान से प्रेम पर आध्यात्मिक लेख लिखता आ रहा हूँ| यह मेरा प्रयास या कणमात्र भी मेरी कोई महिमा नहीं थी| सारी प्रेरणा और कृपा, भगवान की ही थी| अच्छा या बुरा जो कुछ भी लिखा गया वह भगवान की प्रेरणा से ही लिखा गया| वे ही लिखने वाले थे, और वे ही लिखाने वाले थे, सारी महिमा उन्हीं की थी| अब इस शरीर का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा है| अतः कभी-कभी ही जब भी वे चाहेंगे तभी कुछ न कुछ लिखवा लेंगे, अपनी स्वतंत्र इच्छा से कुछ भी नहीं लिख पाऊँगा|
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मेरा फेसबुक पर बस यही एक ही खाता है, दूसरा कोई खाता नहीं है, दूसरा खाता कभी खोलूँगा भी नहीं| एक ब्लॉग भी है| मुझे धर्म के नाम पर, और लोक-व्यवहार में सामाजिक और आर्थिक रूप से कुछ लोगों ने ठगा भी बहुत ही अधिक और बहुत ही बुरी तरह है| उनके प्रति भी मेरे मन में कोई दुर्भावना नहीं है| भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि कोई भी अन्य व्यक्ति, किसी भी तरह की ठगी का शिकार न हो|
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अब बचा-खुचा जो भी जीवन है, वह भगवान के ध्यान में ही व्यतीत होगा| आध्यात्मिक दृष्टि से मुझे किसी भी तरह का कण मात्र भी कोई संशय, शंका, संदेह या भ्रम नहीं है| भगवान की पूर्ण कृपा है| आध्यात्म में कोई भी रहस्य अब रहस्य नहीं रहा है| पूर्व जन्मों के गुरु, सूक्ष्म जगत से मेरा मार्गदर्शन कर रहे हैं| सब से बड़ी बात तो यह है की मुझे आध्यात्मिक रूप से स्वयं भगवान का आशीर्वाद प्राप्त है|
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आप सब निजात्मगण, भगवान की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति, और महान आत्मायें हैं| आप सब को मेरा विनम्र नमन| अंतिम बात यही कहना चाहूँगा कि भगवान से प्रेम करें, और जितना अधिक हो सके उतना पूर्ण प्रेम करें| किसी भी तरह की आकांक्षा न हो| आकांक्षा और अपेक्षा ... पतन का कारण हैं, और अभीप्सा व परमप्रेम ... उन्नति का आरंभ है|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ अक्तूबर २०२०
आओ, अब विशुद्ध आध्यात्म की बातें करेंगे ---
आओ, अब विशुद्ध आध्यात्म की बातें करेंगे ---
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मैं विश्व के कारण नहीं, विश्व मेरे कारण है। मैं ही समस्त जीवन हूँ। जीवन मेरा नहीं, मैं जीवन का निर्माण कर रहा हूँ। मैं भगवान के साथ एक हूँ, और भगवान मेरे साथ एक है। सृष्टि मेरे से है, मैं सृष्टि से नहीं।
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जीवन में आज तक भगवान के रूप में मैं सिर्फ स्वयं से यानि भगवान से ही मिला हूँ, और भगवान में ही विचरण किया है। अन्य कोई है ही नहीं। भगवान ही यह "मैं" बन गए हैं। भगवान से पृथक होने का बोध एक भ्रम मात्र है। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
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"कूटस्थ सूर्यमंडल में पुरुषोत्तम का ध्यान" और "ऊर्ध्वमूल" का रहस्य --- .
"कूटस्थ सूर्यमंडल में पुरुषोत्तम का ध्यान" और "ऊर्ध्वमूल" का रहस्य ---
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यह मेरा सबसे प्रिय विषय है, जिससे आगे की मैं सोच भी नहीं सकता। आध्यात्म में पुरुष शब्द का प्रयोग भगवान विष्णु के लिए होता है जो पूर्ण ब्रह्म परमात्मा हैं। वे ही परमशिव हैं। पुरुषोत्तम शब्द का प्रयोग भगवान श्रीकृष्ण या भगवान श्रीराम के लिए होता है। लौकिक और आध्यात्मिक दृष्टि से वे ही पुरुषोत्तम हैं। कूटस्थ शब्द भगवान श्रीकृष्ण का है जो स्वयं कूटस्थ हैं। वे सर्वत्र हैं पर कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होते, इसलिए वे कूटस्थ हैं।
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योगी महात्मा "कूटस्थ" शब्द का प्रयोग उस ब्रह्मज्योति के लिए करते हैं जो गुरुकृपा से उनके समक्ष भ्रूमध्य में ध्यान करते करते सूक्ष्म जगत में प्रकट होती है। इसे वे ज्योतिर्मयब्रह्म भी कहते हैं, और शब्दब्रह्म भी, क्योंकि उस ब्रह्मज्योति से प्रणव की ध्वनि निःसृत होती रहती है, जिसके दर्शन और श्रवण करते करते वे स्वयं ब्रह्ममय हो जाते हैं।
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जब श्रीगुरुचरणों में आश्रय मिल जाता है, तब उस कूटस्थ ज्योति का केंद्र सहस्त्रार में हो जाता है। सहस्त्रार में कूटस्थ ज्योति के दर्शन का अर्थ है -- श्रीगुरुचरणों में आश्रय मिल गया है। सहस्त्रार में श्रीगुरुचरणों का ज्योतिर्मय रूप में ध्यान करते करते आगे के द्वार अपने आप खुल जाते हैं, और कहीं पर भी कोई अंधकार नहीं रहता।
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सिद्ध गुरु और परमात्मा की कृपा से साधक को जब विस्तार की अनुभूतियाँ होने लगें, तब मान लीजिए कि उस की पदोन्नति हो गई है और वह स्कूल की पढ़ाई समाप्त कर के कॉलेज में आ गया है। उस समय से उस विस्तार का ही ध्यान कीजिए कि आप स्वयं वह अनंत विस्तार हैं, यह नश्वर देह नहीं। आपको कूटस्थ ज्योति के दर्शन, और नाद का श्रवण स्वतः ही हरिःकृपा से होता रहेगा। यह साधना की एक बहुत उन्नत अवस्था है। यह अवस्था साधक को भगवान से मिला देती है। विस्तार की अनुभूति से वैराग्य जागृत होता है।
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एक दिन साधक पाता है कि वह अनंत विस्तार से भी परे चला गया है और उस ब्रह्मज्योति के साथ एक है। उस ब्रह्मज्योति में भगवान परमशिव का, या भगवान विष्णु का या उनके अवतार भगवान श्रीराम या भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान कीजिए। यह भाव रखिए कि आप स्वयं सर्वव्यापक ज्योतिर्मय ब्रह्म हैं, यह नश्वर देह नहीं। हर साँस के साथ इस भावना को दृढ़ करते रहें। यह साधना -- अजपाजप, हंसःयोग, व हंसवतिऋक कहलाती है। नाद का श्रवण करते करते स्वयं की पृथकता के बोध का उसमें विलय कर देना लययोग कहलाता है।
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ध्यान में शिवलिंग के दर्शन भी ज्योतिर्मय रूप में होते हैं। उसका रहस्य यहाँ बता देता हूँ। शिव का अर्थ है -- परम मंगल और परम कल्याणकारी। लिंग का अर्थ है जिसमें सब का विलय हो जाता है। शिवलिंग का अर्थ है वह परम मंगल और परम कल्याणकारी परम चैतन्य जिसमें सब का विलय हो जाता है। सारा अस्तित्व, सारा ब्रह्मांड ही शिव लिंग है। स्थूल जगत का सूक्ष्म जगत में, सूक्ष्म जगत का कारण जगत में, और कारण जगत का सभी आयामों से परे "तुरीय चेतना" में विलय हो जाता है। उस तुरीय चेतना का प्रतीक है -- शिवलिंग, जो साधक के कूटस्थ यानि ब्रह्मज्योति में निरंतर जागृत रहता है। सर्वव्यापी ज्योतिर्मय शिव को परमशिव भी कहते हैं जिन के ध्यान से चेतना ऊर्ध्वमुखी होने लगती है। अनंतता से भी ऊपर के ध्यान में दिखाई देने वाले पञ्चकोणीय विराट श्वेत नक्षत्र को मैं परमशिव कहता हूँ। मेरे लिए वे ही पंचमुखी महादेव हैं।
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जो कुछ भी मैंने यहाँ लिखा है उससे यदि कोई दोष, पाप, या अधर्म हुआ है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी मेरी है। उसके लिए मैं कोई भी दंड भुगतने को तैयार हूँ। मेरी आप सब से इतनी ही प्रार्थना है कि आप अपने मेरुदंड को सदा उन्नत, और भ्रूमध्य में एक ज्योति का बोध सदा बनाए रखें। वह ज्योति ही कूटस्थ सूर्यमंडल है, जिसमें आप सदा पुरुषोत्तम का ध्यान करें। यह कूटस्थ सूर्यमंडल में पुरुषोत्तम का ध्यान है। यह मेरा सबसे प्रिय विषय है जिस पर मैं लिख रहा हूँ। इसी की चेतना में मुझे आनंद मिलता है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। यही मेरी साधना है और यही मेरा जीवन है।
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यह ज्योतिर्मय ब्रह्म ही आप स्वयं हैं। इस का ध्यान करते करते आप हजारों करोड़ किलोमीटर ऊपर अनंत में इस सृष्टि से भी ऊपर उठ जाइए, और भी ऊपर उठ जाइए जहाँ तक आपकी कल्पना जाती है। इस अनंत ब्रह्मांड से भी ऊपर उच्चतम स्थान पर ऊर्ध्वमूल है वहीं पर स्थित होकर आप भगवान का ध्यान कीजिए। इसी के बारे में गीता में भगवान कहते हैं --
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥"
"अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥१५:२॥"
"न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल सङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥१५:३॥"
"ततः पदं तत्परिमार्गितव्य यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५:४॥"
"निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥१५:५॥"
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
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जितना लिखने की प्रेरणा और आदेश मुझे मेरी अन्तर्रात्मा से मिला उतना लिख दिया। और लिखने का आदेश नहीं है। आप सब में भगवान वासुदेव को नमन !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० मई २०२३
भारत की आत्मा ही आध्यात्म है, और सनातन-धर्म ही भारत का प्राण है ---
भारत की आत्मा ही आध्यात्म है, और सनातन-धर्म ही भारत का प्राण है। यह भारत भूमि धन्य है। यहाँ धर्म, भक्ति, और ज्ञान पर जितना चिंतन और विचार हुआ है, उतना पूरे विश्व में अन्यत्र कहीं भी नहीं हुआ है। भगवान की भक्ति पर कितना भी लिखो, कोई अंत नहीं है। गंधर्वराज पुष्पदंत विरचित "शिव महिम्न स्तोत्र" का ३२वाँ श्लोक कहता है --
"असित-गिरि-समं स्यात् कज्जलं सिन्धु-पात्रे।
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी॥
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं।
अर्थात् -- यदि समुद्र को दवात बनाया जाय, उसमें काले पर्वत की स्याही डाली जाय, कल्पवृक्ष के पेड़ की शाखा को लेखनी बनाकर और पृथ्वी को कागज़ बनाकर स्वयं ज्ञान स्वरूपा माँ सरस्वती दिनरात आपके गुणों का वर्णन करें तो भी आप के गुणों की पूर्णतया व्याख्या करना संभव नहीं है।
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कबीर जी का भी एक दोहा है --
"सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं, तऊ हरि गुण लिख्या न जाइ॥"
अर्थात् - यदि मैं सातों समुद्रों के जल की स्याही बना लूँ तथा समस्त वन समूहों की लेखनी कर लूँ, तथा सारी पृथ्वी को काग़ज़ कर लूँ, तब भी परमात्मा के गुण को लिखा नहीं जा सकता। क्योंकि वह परमात्मा अनंत गुणों से युक्त है।
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रामचरितमानस और श्रीमद्भागवत तो भक्ति के ही ग्रंथ हैं।
"मूक होइ बाचाल पंगु चढइ गिरिबर गहन।
जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन॥" (रामचरितमानस)
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नारद भक्तिसूत्र और शांडिल्य भक्तिसूत्रों का स्वाध्याय एक बार अवश्य कर लेना चाहिए। ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
२५ मार्च २०२२
साधना, स्वाध्याय, सत्संग, और आध्यात्म का सार जो मुझे समझ में आया है ---
साधना, स्वाध्याय, सत्संग, और आध्यात्म का सार जो मुझे समझ में आया है ---
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सारी साधनाओं, स्वाध्याय, सत्संग, और आध्यात्म का सार जो मुझे समझ में आया है, वह यह है कि -- "हमारा उच्चतम दायित्व -- परमात्मा के प्रकाश की निरंतर वृद्धि करते रहना है। यही हमारा स्वधर्म है।"
जब हम शांत वातावरण में शांत होकर, मेरुदंड को उन्नत रखते हुए ध्यान के आसन पर बैठते हैं, तो भ्रूमध्य में बंद आंखो के अंधकार के पीछे (कुछ कालखंड की साधना के पश्चात) एक अति उज्ज्वल शाश्वत श्वेत ब्रह्मज्योति के दर्शन होते हैं। वह ब्रह्मज्योति हम स्वयं हैं, यह नश्वर देह नहीं। उसी का ध्यान करें, उसमें से निकल रही ध्वनि को सुनते रहें, और उसके प्रकाश का अपनी चेतना में निरंतर विस्तार करें।
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हमारे सौर मण्डल का स्वामी हमारा सूर्य है, जिसकी ऊर्जा से हम जीवित हैं। इस तरह के लाखों-करोड़ों सूर्य हैं, लाखों-करोड़ों अनगिनत पृथ्वियाँ हैं। यह सृष्टि अनंत है। अपनी आकाश-गंगा के एक छोर से दूसरे छोर तक यदि प्रकाश की गति से यात्रा की जाये तो उस यात्रा को पूर्ण करने में लगभग एक लाख वर्ष लग जाएँगे। इस तरह की अनगिनत लाखों आकाश गंगाएँ हैं।
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किसी स्वच्छ अंधेरी रात में अपने घर की छत पर जाकर ध्रुव तारे को देखिये। वह ध्रुव तारा साढ़े चार सौ से भी अधिक वर्षों पूर्व था। उसके प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में साढ़े चार सौ वर्षों से भी अधिक का समय लगा है। आकाश के कई नक्षत्र जो अब दिखाई दे रहे हैं, वे सैंकड़ों वर्ष पूर्व थे।
अरबों-खरबों प्रकाश वर्ष दूर भी अनंत सृष्टियाँ हैं, जिन्हें समझना मनुष्य की बुद्धि से परे है। वहाँ से प्रकाश की किरणें जब चली थीं तब पृथ्वी ग्रह का कोई अस्तित्व नहीं था। जब तक वे किरणें पृथ्वी तक पहुँचेंगी, तब तक पृथ्वी भी नष्ट हो गई होगी।
यह तो रही स्थूल जगत की बात। सूक्ष्म जगत तो और भी अधिक विराट है। ध्यान साधना करते करते समाधि की अवस्था में सूक्ष्म जगत की अनुभूतियाँ प्रत्येक साधक को होती है। सूक्ष्म जगत इस भौतिक जगत से बहुत अधिक बड़ा है। उस से परे की तो मैं कल्पना करने में भी असमर्थ हूँ।
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इस पृथ्वी पर भी विभिन्न आयामों में अनेक सृष्टियाँ हैं। हमारी तो भौतिक सृष्टि है, इसके अतिरिक्त प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, और आनंदमय सृष्टियाँ हैं। ये स्वर्ग-नर्क आदि सब मनोमय सृष्टियाँ हैं। जो चीज समझ में आती है वही लिख रहा हूँ। जो अज्ञात है वह कोरी कल्पना है। कल्पना में रहना स्वयं को धोखा देना है।
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एक बात तो अनुभूत सत्य है कि हम यह शरीर नहीं हैं। यह शरीर एक दुपहिया वाहन है जो इस लोकयात्रा के लिए मिला हुआ है। यह नष्ट हो जाएगा तो अंत समय की मति के अनुसार तुरंत दूसरा शरीर मिल जाएगा। पुनर्जन्म का सिद्धान्त शत-प्रतिशत सत्य है।
हमारे विचार ही हमारे कर्म हैं, जिनका परिणाम निश्चित रूप से मिलता है। कर्मफलों का सिद्धान्त -- शत-प्रतिशत सत्य है। यह सृष्टि परमात्मा के मन का एक विचार है।
हम यह भौतिक शरीर नहीं, एक शाश्वत आत्मा हैं। सारे देवी-देवता हमारे साथ एक हैं। कोई भी या कुछ भी हमारे से पृथक नहीं है।
आगे की बात समझने के लिए हमें वीतराग और त्रिगुणातीत होना पड़ेगा। तभी हम सत्य को समझ सकेंगे। गीता के अनुसार --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥"
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आत्मवान होकर ही सत्य को समझ सकेंगे। अभी भी अनेक कमियाँ हैं, जिन्हें दूर करनी हैं। परमात्मा ही परम सत्य है, जिनको मैं नमन करता हूँ --
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"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्क: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥"
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
११ अगस्त २०२२
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