Saturday, 22 February 2025

वासनात्मक चिंतन से -- जीवन में न चाहते हुए भी हमारा व्यवहार राक्षसी हो जाता है ---

वासनात्मक चिंतन से -- जीवन में न चाहते हुए भी हमारा व्यवहार राक्षसी हो जाता है। हम असुर/पिशाच बन जाते हैं, और गहरे से गहरे गड्ढों में गिरते रहते हैं। ऐसी परिस्थिति न आने पाये, इसका एक ही उपाय है -- निरंतर परमात्मा का चिंतन, और परमात्मा को समर्पण। अन्य कोई उपाय नहीं है।

मैंने एक-दो बड़े बड़े ज्ञानी पुरुषों को भी जीवन में राक्षस होते हुए देखा है। हमारे विचार ही हमें गिराते हैं और विचार ही हमारा उत्थान करते हैं। जैसा हम सोचते हैं, वैसे ही बन जाते हैं। ॐ तत्सत् !! कृपा शंकर २० अगस्त २०२४

मैं तो एक सेवक मात्र हूँ, जिसका कार्य अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करना है, और कुछ भी नहीं ---

मैं तो एक सेवक मात्र हूँ, जिसका कार्य अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करना है, और कुछ भी नहीं। मेरा कोई कर्तव्य नहीं है। मुझे कुछ भी नहीं आता। जो मेरे स्वामी करवाएँगे वही मुझसे होगा। जो कुछ भी करना है वह मेरे स्वामी ही करेंगे. मैं तो उनका एक उपकरण हूँ। मेरा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है। मेरे स्वामी स्वयं परमात्मा हैं। मैं उनके साथ एक और उन्हीं का परमप्रेम हूँ। मैं पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म से परे हूँ। . धर्म-अधर्म, अच्छे-बुरे, पुण्य-पाप, और शुभ-अशुभ, --- इन सब द्वैतों से परे -- भगवान को समर्पित हो जाना -- ही सबसे बड़ा सार्थक निष्काम कर्मयोग है। किसी भी तरह की आकांक्षा या अपेक्षा नहीं होनी चाहिए।

ॐ ॐ ॐ !!

२२ सितंबर २०२१

परमात्मा की एक झलक जब भी मिल जाये तब अन्य सब गौण है ---

परमात्मा की एक झलक जब भी मिल जाये तब अन्य सब गौण है। वे ही एकमात्र सत्य हैं, वे ही लक्ष्य हैं, वे ही मार्ग हैं, वे ही सिद्धान्त हैं, और सब कुछ वे ही हैं। उनसे परे इधर-उधर देखना भटकाव है। परमात्मा के लिए हमें पाप-पुण्य, और धर्म-अधर्म से भी ऊपर उठना ही पड़ेगा। कालचक्र घूम चुका है। बुरे दिन व्यतीत हो रहे हैं। राष्ट्रद्रोही आसुरी शक्तियों का नाश निश्चित है। भगवान उनके लिए अब काल हैं --

"कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः|
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः||११:३२||"
"तस्मात्त्वमुक्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्‌|
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्‌||११:३३||" (गीता)
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ॐ तत्सत् !!
२१ मई २०२४

भगवान की मेरी अवधारणा क्या है? ---


भगवान की मेरी अवधारणा क्या है?

परम प्रेम और समष्टि के ज्योतिर्मय विस्तार, और उस से भी परे की निरंतर अनुभूति ही मेरे लिए परमात्मा है| उसी में आनंद और तृप्ति है| अब तो कूटस्थ के परम ज्योतिर्मय आलोक में मुझे एक पुराण-पुरुष के दर्शन होते हैं| उन्हीं का ध्यान होता है| वे ही भगवान वासुदेव है, और वे ही परमशिव और नारायण हैं| इस से अधिक मुझे कुछ नहीं पता| धर्म-अधर्म, अच्छे-बुरे, पुण्य-पाप, और शुभ-अशुभ, --- इन सब द्वैतों से परे ... भगवान को समर्पित हो जाना --- ही सबसे बड़ा सार्थक निष्काम कर्म है| किसी भी तरह की आकांक्षा या अपेक्षा नहीं होनी चाहिए| ॐ ॐ ॐ !! २४ नवंबर २०२०  

एक आध्यात्मिक साधक कभी -- धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, और सुख-दुःख की परवाह नहीं करता ---

एक आध्यात्मिक साधक कभी -- धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, और सुख-दुःख की परवाह नहीं करता। उसकी रुचि इन सब में नहीं होती। जैसे चुंबक की सूई सदा उत्तर दिशा में ही रहती है, वैसे ही प्रियतम परमात्मा के सिवाय उसे अन्य कुछ भी दृष्टिगत नहीं होता। वास्तव में परमात्मा के सिवाय अन्य सब व्यर्थ है।
भगवान के चरण कमलों में आश्रय चाहोगे तो वे अपने हृदय में ही आश्रय दे देंगे।
ॐ तत्सत् !!
०७ जुलाई २०२२

परमात्मा के समक्ष होने पर क्या होता है? ---

 परमात्मा के समक्ष होने पर क्या होता है? ---

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जब हम स्वयं परमात्मा के समक्ष होते हैं, तब सारे उपदेश, आदेश, सिद्धान्त, मत-पंथ, संप्रदाय, मांग, कामना, आकांक्षा, अपेक्षा, धर्म-अधर्म, कर्तव्य-अकर्तव्य, पाप-पुण्य आदि सब तिरोहित हो जाते हैं। हमारा समर्पण पूर्ण प्रेम और सत्यनिष्ठा से हो, अन्य कुछ भी नहीं। आध्यात्म में "भटकाव" बड़ा कष्टदायी है। भगवान सर्वत्र सदैव निरंतर हमारे समक्ष हैं, और क्या चाहिए? सदा उनकी चेतना में निरंतर बने रहो।
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शरणागति और समर्पण में कोई मांग, कामना, अपेक्षा या आकांक्षा नहीं होती। भगवान हैं, इसी समय हैं, हर समय हैं, यहीं पर हैं, सर्वत्र और सर्वदा हमारे साथ एक हैं। वे हमारे प्राण और अस्तित्व हैं। वे कभी हमसे पृथक नहीं हो सकते। कहीं कोई भेद नहीं है। हम अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ रहे हैं। परमात्मा का ध्यान कीजिये, वे स्वयं को हमारे में व्यक्त करेंगे। यही सर्वश्रेष्ठ सेवा है, जो हम इस समय कर सकते हैं।
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निराश होने की आवश्यकता नहीं है। तमोगुण की प्रधानता से हम निराश हो जाते हैं। तमोगुण ही असत्य और अंधकार की शक्ति है। जिस समय जिस गुण की प्रधानता हमारे में होती है, उस समय वैसे ही हमारे विचार बन जाते हैं। तमोगुण के कारण हमें अपने चारों ओर का वातावरण बहुत अधिक अंधकारमय लगता है। लेकिन सत्य कुछ और ही है। यह जन्म हमें आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए मिला है। इसे नष्ट करना परमात्मा के प्रति अपराध है। आत्मज्ञान ही परम धर्म है।
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ॐ सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ॐ शांति शांति शांति !!
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ तत्सत् !! हरिः ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ जून २०२४

जन्माष्टमी की मंगलमय शुभ कामनाएँ ---

जन्माष्टमी की मंगलमय शुभ कामनाएँ --- >

भगवान के प्रति हमारा समर्पण पूर्ण हो। स्वयं के प्रयासों से हम भगवान को जान भी नहीं सकते, और पा भी नहीं सकते; लेकिन समर्पित होकर उनके साथ एक हो सकते हैं। जैसे जल की एक बूँद, महासागर को न तो जान सकती है, और न ही पा सकती है; लेकिन समर्पित होकर महासागर के साथ एक हो जाती है। तब वह बूँद, बूँद नहीं रहती, स्वयं महासागर बन जाती है। ऐसे ही स्वयं को भगवान में समर्पित कर हम उनके साथ एक हो जाते हैं।
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सम्पूर्ण सृष्टि मुझ में है, और मैं सम्पूर्ण सृष्टि में हूँ। मेरे सिवाय कोई अन्य नहीं है। यह अनन्य भाव ही कैवल्यावस्था और अनन्य-भक्ति है। इस अनन्य भक्ति-भाव से पूर्णतः समर्पित होकर भगवान का ध्यान किया जाता है। हम भगवान से कुछ ले नहीं रहे, बल्कि उनको अपना सर्वस्व दे ही रहे हैं। अपने अन्तःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार) को उन्हें समर्पित कर उनके सिवाय अन्य कुछ भी न सोचें।
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यह जन्म हमें भगवान की प्राप्ति के लिए ही मिला है, इसे व्यर्थ करना भगवान के प्रति अपराध है। भगवान की चेतना में हम पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म से परे हो जाते हैं। सत्यनिष्ठा और परमप्रेम से समर्पित हो जाएँ। माया की शक्ति बड़ी प्रबल है, उसे निज प्रयास से पार पाना असंभव है। बिना भगवान की कृपा के एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। भगवान की भक्ति (परमप्रेम) ही पार लगा सकती है। शरणागति और समर्पण में कोई मांग, कामना, अपेक्षा या आकांक्षा नहीं होती, सिर्फ एक अभीप्सा होती है। निरंतर उनका स्मरण करो। उनकी कृपा से हमारे सब दुःख, कष्ट दूर होंगे। अपनी श्रद्धा पर दृढ़ रहो॥
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"विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे।
हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते॥"
आप सब महान आत्माओं को नमन ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !
ॐ तत्सत् ! ॐ स्वस्ति !
कृपा शंकर
६ सितंबर २०२३