वासनात्मक चिंतन से -- जीवन में न चाहते हुए भी हमारा व्यवहार राक्षसी हो जाता है। हम असुर/पिशाच बन जाते हैं, और गहरे से गहरे गड्ढों में गिरते रहते हैं। ऐसी परिस्थिति न आने पाये, इसका एक ही उपाय है -- निरंतर परमात्मा का चिंतन, और परमात्मा को समर्पण। अन्य कोई उपाय नहीं है।
Saturday, 22 February 2025
वासनात्मक चिंतन से -- जीवन में न चाहते हुए भी हमारा व्यवहार राक्षसी हो जाता है ---
मैं तो एक सेवक मात्र हूँ, जिसका कार्य अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करना है, और कुछ भी नहीं ---
मैं तो एक सेवक मात्र हूँ, जिसका कार्य अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करना है, और कुछ भी नहीं। मेरा कोई कर्तव्य नहीं है। मुझे कुछ भी नहीं आता। जो मेरे स्वामी करवाएँगे वही मुझसे होगा। जो कुछ भी करना है वह मेरे स्वामी ही करेंगे. मैं तो उनका एक उपकरण हूँ। मेरा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है। मेरे स्वामी स्वयं परमात्मा हैं। मैं उनके साथ एक और उन्हीं का परमप्रेम हूँ। मैं पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म से परे हूँ। . धर्म-अधर्म, अच्छे-बुरे, पुण्य-पाप, और शुभ-अशुभ, --- इन सब द्वैतों से परे -- भगवान को समर्पित हो जाना -- ही सबसे बड़ा सार्थक निष्काम कर्मयोग है। किसी भी तरह की आकांक्षा या अपेक्षा नहीं होनी चाहिए।
ॐ ॐ ॐ !!
२२ सितंबर २०२१
परमात्मा की एक झलक जब भी मिल जाये तब अन्य सब गौण है ---
परमात्मा की एक झलक जब भी मिल जाये तब अन्य सब गौण है। वे ही एकमात्र सत्य हैं, वे ही लक्ष्य हैं, वे ही मार्ग हैं, वे ही सिद्धान्त हैं, और सब कुछ वे ही हैं। उनसे परे इधर-उधर देखना भटकाव है। परमात्मा के लिए हमें पाप-पुण्य, और धर्म-अधर्म से भी ऊपर उठना ही पड़ेगा। कालचक्र घूम चुका है। बुरे दिन व्यतीत हो रहे हैं। राष्ट्रद्रोही आसुरी शक्तियों का नाश निश्चित है। भगवान उनके लिए अब काल हैं --
भगवान की मेरी अवधारणा क्या है? ---
परम प्रेम और समष्टि के ज्योतिर्मय विस्तार, और उस से भी परे की निरंतर अनुभूति ही मेरे लिए परमात्मा है| उसी में आनंद और तृप्ति है| अब तो कूटस्थ के परम ज्योतिर्मय आलोक में मुझे एक पुराण-पुरुष के दर्शन होते हैं| उन्हीं का ध्यान होता है| वे ही भगवान वासुदेव है, और वे ही परमशिव और नारायण हैं| इस से अधिक मुझे कुछ नहीं पता| धर्म-अधर्म, अच्छे-बुरे, पुण्य-पाप, और शुभ-अशुभ, --- इन सब द्वैतों से परे ... भगवान को समर्पित हो जाना --- ही सबसे बड़ा सार्थक निष्काम कर्म है| किसी भी तरह की आकांक्षा या अपेक्षा नहीं होनी चाहिए| ॐ ॐ ॐ !! २४ नवंबर २०२०
एक आध्यात्मिक साधक कभी -- धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, और सुख-दुःख की परवाह नहीं करता ---
परमात्मा के समक्ष होने पर क्या होता है? ---
परमात्मा के समक्ष होने पर क्या होता है? ---
जन्माष्टमी की मंगलमय शुभ कामनाएँ ---
जन्माष्टमी की मंगलमय शुभ कामनाएँ --- . >