Wednesday, 13 April 2022

अनंत विस्तार ही जीवन है, और सीमितता है मृत्यु ---

 अनंत विस्तार ही जीवन है, और सीमितता है मृत्यु ---

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ध्यान करते-करते जिस क्षण अनंतता की अनुभूति हो, उसी क्षण से अनंतता में स्थित होकर, अनंतता से परे, स्वयं परमशिव होकर, परमशिव का ध्यान करें। वे ही विष्णु हैं, वे ही नारायण हैं, वे स्वयं ही अपना स्वयं का ध्यान कर रहे हैं। कहीं कोई पृथकता नहीं है। गुरु-रूप में वे स्वयं ही स्वयं का मार्गदर्शन करते हैं। कर्ता और भोक्ता वे ही हैं, हम नहीं। हम यह भौतिक देह नहीं, परमात्मा की पूर्णता हैं।
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"शिव" का अर्थ शिवपुराण के अनुसार -- जिन से जगत की रचना, पालन और नाश होता है, जो इस सारे जगत के कण कण में व्याप्त हैं, वे शिव हैं। जो समस्त प्राणधारियों की हृदय-गुहा में निवास करते हैं, जो सर्वव्यापी और सबके भीतर रम रहे हैं, वे शिव हैं। अमरकोष के अनुसार -- 'शिव' शब्द का अर्थ मंगल एवं कल्याण होता है। विश्वकोष में -- शिव शब्द का प्रयोग मोक्ष में, वेद में, और सुख के प्रयोजन में, किया गया है। अतः शिव का अर्थ हुआ -- आनन्द, परम मंगल और परम कल्याण। जिन्हें सब चाहते हैं, और जो सबका कल्याण करने वाले हैं, वे ही ‘शिव’ हैं।
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जीवन का मूल उद्देश्य है -- शिवत्व की प्राप्ति। हम शिव कैसे बनें, एवं शिवत्व को कैसे प्राप्त करें? इस का उत्तर है -- ज्योतिर्मय अनंतता में शिव का ध्यान। यह किसी कामना की पूर्ती के लिए नहीं, बल्कि कामनाओं के नाश के लिए है। आते-जाते हर साँस के साथ, उनका चिंतन-मनन और समर्पण -- "हंसः योग" अजपा-जप कहलाता है, जो उनकी परम कृपा की प्राप्ति करा कर आगे का मार्ग प्रशस्त कराता है।
जब गुरुकृपा से ऊर्ध्व चेतना जागृत होती है, और मेरुदंडस्थ सुषुम्ना नाड़ी में प्रवाहित हो रहा प्राण-तत्व, अपनी परिक्रमा में बार-बार आज्ञाचक्र के बिन्दु का स्पर्श करता है (क्रियायोग), तब क्षुब्ध हुआ बिन्दु , नाद का रूप ले लेता है, और वहाँ ओंकार रूप प्रणव की ध्वनि सुनाई देने लगती है। उस ध्वनि में लीन होकर स्वयं का लय कर देना "लय-योग" है। तब कामनाओं व इच्छाओं की समाप्ति होने लगती है। यह मनुष्य जीवन की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। अपनी चेतना को सदा आज्ञाचक्र से ऊपर रखते हुए, परमज्योतिर्मय ब्रह्मरूप शिव को अपनी स्मृति में रखें।
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"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः। यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।"
(गीता १५:६).
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥"
(मुण्डकोपनिषद् , कठोपनिषद्).
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥" (वृहदारण्यकोपनिषद्).
"ॐ सहनाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥"
(श्वेताश्वतरोपनिषद्).
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ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! शिवोहम् शिवोहम् अहम् ब्रह्मास्मि !! 🌹🙏🌹
कृपा शंकर
१३ अप्रेल २०२१

Monday, 11 April 2022

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, को आने वाले नव-संवत्सर व बासंतिक-नवरात्र की मंगलमय हार्दिक शुभ कामनाएँ !! ---

 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, को आने वाले नव-संवत्सर व बासंतिक-नवरात्र की मंगलमय हार्दिक शुभ कामनाएँ !!

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मेरे मानस में अनेक शिव-संकल्प, शुभ-विचार और अति-आकर्षक व अति-प्रिय बुद्धि-विलास की बहुत सारी अलंकृत बातें भरी पड़ी हैं। पूरे विश्व के वर्तमान घटनाक्रम के प्रति भी मैं संवेदनशील हूँ। लेकिन इस समय वर्तमान में यह सब कुछ गौण हो गया है। इन का कोई महत्व नहीं है।
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जीवन का सबसे बड़ा आकर्षण है -- कूटस्थ में भगवान परमशिव का ध्यान। यह जीवन उसी के लिए समर्पित है। अनेक अनुभूतियाँ और उपलब्धियाँ हैं, जिन का वर्णन नहीं किया जा सकता। वे गोपनीय ही रहें तो ठीक हैं। यह बासंतिक नवरात्र, आध्यात्मिक-साधना के लिए ही समर्पित है।
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कर्ता तो जगन्माता स्वयं हैं, जो मेरुदंड की सुषुम्ना नाड़ी में कुंडलिनी-महाशक्ति के रूप में अनुभूत होकर स्वयं ही परमशिव को समर्पित हो रही हैं। एक दूसरे परिप्रेक्ष्य में साकार रूप में एकमात्र छवि वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण की ही समक्ष आती है, जिन के सिवाय कोई अन्य इस पूरी सृष्टि में है ही नहीं। पूरी सृष्टि उन में, और वे पूरी सृष्टि में समाहित हैं। अपने परम ज्योतिर्मय रूप में वे पद्मासन में बैठे हुये अपने स्वयं का ही ध्यान कर रहे हैं। उनका कूटस्थ-विग्रह -- अक्षर-ब्रह्म प्रणव, सर्वत्र गूंज रहा है। कूटस्थ सूर्य-मण्डल में वे ही परमपुरुष हैं, जिन के अतिरिक्त अन्य कोई है ही नहीं। कई बार लगता है कि भगवती महाकाली स्वयं ही साधना कर के उस का फल श्रीकृष्ण को अर्पित कर रही हैं।
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गुरुकृपा निश्चित रूप से फलीभूत हुई है, जिस के कारण आगे का मार्ग प्रशस्त हुआ है। गुरु-रूप-ब्रह्म मुझ अकिंचन पर करुणावश अपनी परम कृपा कर के मेरा आत्म-समर्पण स्वीकार करें| ॐ तत्सत् !! ॐ गुरु !! जय गुरु !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ अप्रेल २०२१
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🌹🕉🌹 भारतीय नववर्ष मंगलमय व परम शुभ हो ---
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सूर्य की प्रथम किरण के साथ आज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वि.सं.२०७८ तदानुसार १३अप्रेल२०२१ को नव-संवतसर का आरंभ हो जाएगा। आज बासंतिक नवरात्रों का भी आरंभ घट-स्थापना के साथ होगा, जिस में नौ दिनों तक जगन्माता की आराधना -- महाकाली, महालक्ष्मी, और महासरस्वती के रूप में होगी। नवरात्रों में भगवान श्रीराम और हनुमान जी की भी आराधना होती है। नौवें दिन तो श्रीरामनवमी है। यह नौ-दिवसीय आराधना-पर्व है।
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परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ, आप सब को मेरा नमन ! आप सब का आशीर्वाद और कृपा, मुझ अकिंचन पर बनी रहे।
ॐ तत्सत् ! 🙏🕉🕉🕉🙏
कृपा शंकर
१३ अप्रेल २०२१

Saturday, 9 April 2022

हम सबका स्वधर्म एक ही है ---

 हमारा स्वधर्म एक ही है --- निरंतर परमात्मा का स्मरण, चिंतन, ध्यान, और उन्हीं में रमण।

निज जीवन में उन्हीं को हर समय व्यक्त करें| यही हमारी राजनीति, सामाजिकता और जीवन हो| जहाँ भी भगवान ने हमें रखा है, वहीं पर वे स्वयं भी हैं| भगवान यहीं पर, इसी समय, सर्वदा, और सर्वत्र हैं| भगवान कहते हैं ---
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति| तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति||६:३०||"
अर्थात् जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता||
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इस स्वधर्म का पालन इस संसार के महाभय से सदा हमारी रक्षा करेगा| भगवान का वचन है ---
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते| स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्||२:४०||"
अर्थात् इसमें क्रमनाश और प्रत्यवाय दोष नहीं है| इस धर्म (योग) का अल्प अभ्यास भी महान् भय से रक्षण करता है||
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इस स्वधर्म में मरना ही श्रेयस्कर है| भगवान कहते हैं ---
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्| स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः||३:३५||
अर्थात् सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है; स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है||
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रात्री को सोने से पूर्व उनका ध्यान कर के सोएँ, और प्रातःकाल उठते ही पुनश्च उनका ध्यान करें| पूरे दिन उन्हें अपनी स्मृति में रखें| साकार और निराकार -- सारे रूप उन्हीं के हैं| प्रयासपूर्वक अपनी चेतना को परासुषुम्ना (आज्ञाचक्र व सहस्त्रारचक्र के मध्य) में रखें| इसे अपनी साधना बनाएँ| जो उन्नत साधक हैं वे अपनी चेतना को ब्रह्मरंध्र से भी बाहर परमात्मा की अनंतता में रखें| अनंतता का बोध और और उसमें स्थिति होने पर आगे का मार्गदर्शन भगवान स्वयं करेंगे|
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ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० अप्रेल २०२१

Friday, 8 April 2022

जो भी अस्तित्व है वह भगवान का है, जो भी उपासना हो रही है, वहाँ उपास्य और उपासक -- भगवान स्वयं हैं ---

 जो भी अस्तित्व है वह भगवान का है, जो भी उपासना हो रही है, वहाँ उपास्य और उपासक -- भगवान स्वयं हैं ---

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प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठते ही लघुशंकादि से निवृत होकर मेरुदंड को उन्नत रखते हुए पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह कर के अपने आसन पर बैठ जाएँ। दृष्टिपथ भ्रूमध्य की ओर, व चेतना -- उत्तरा-सुषुम्ना (आज्ञाचक्र और सहस्त्रारचक्र के मध्य) में रहे। तभी एक चमत्कार घटित हो जाता है, जिसका मैं साक्षीमात्र ही रह जाता हूँ।
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यहाँ तो मैं हूँ ही नहीं। मेरा अस्तित्व-बोध एक मिथ्या भ्रम है। यहाँ तो परमपुरुष वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण स्वयं पद्मासन में ध्यानस्थ बैठे हैं। उनके अतिरिक्त इस पूरी सृष्टि में कोई अन्य है ही नहीं। स्वयं को भूल जाएँ। भगवान स्वयं बिन्दु, नाद, और कला से परे हैं। उन्हें स्वयं का ध्यान करने दें। हम एक साक्षीमात्र यानि निमित्तमात्र होकर रहें।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ अप्रेल २०२१

परमात्मा की चेतना यानि कूटस्थ चैतन्य में जीना हमारा स्वभाव बने ---

 परमात्मा की चेतना यानि कूटस्थ चैतन्य में जीना हमारा स्वभाव बने ---

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गुरु महाराज के उपदेश व आज्ञा से हम ज्योतिर्मय कूटस्थ बिन्दु पर ध्यान करते हैं| अजपा-जप का अभ्यास करते-करते जब सुषुम्ना में प्राण तत्व जागृत होकर कूटस्थ बिन्दु पर प्रहार करता है, तब विक्षुब्ध हुये बिन्दु से नाद की सृष्टि होती है| फिर कला यानि आकारों की उत्पत्ति होती है| यह नाद ही अक्षर शब्दब्रह्म है जो भगवान् का कूटस्थ विग्रह है| इस चेतना में निरंतर स्थिति "कूटस्थ चैतन्य" और "ब्राह्मी स्थिति" कहलाती है|
गीता में भगवान कहते हैं --
"द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च| क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते||१५:१६||"
अर्थात् इस लोक में क्षर (नश्वर) और अक्षर (अनश्वर) ये दो पुरुष हैं, समस्त भूत क्षर हैं और 'कूटस्थ' अक्षर कहलाता है||
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कूटस्थ पर ध्यान हमें सच्चिदानन्दमय बना देता है| कर्ताभाव से मुक्त होकर कर्ता तो भगवान श्रीकृष्ण को ही बनाएँ| हमारी साधना में यदि कोई कमी होगी तो उसका शोधन वे कर देंगे| हमारा वास्तविक "स्व" तो परमात्मा है जिसकी चेतना में जीना हमारा स्वभाव है| निरंतर ब्रह्म-चिंतन और भक्ति ही हमारा स्वभाव है, अन्यथा हम अभाव ग्रस्त हैं| अभाव में जीने से हमारा पतन सुनिश्चित है| माया के विक्षेप और आवरण बहुत अधिक शक्तिशाली हैं जो हमें निरंतर अधोगामी बनाते है| सिर्फ भगवान की भक्ति और उनका ध्यान ही हमारी रक्षा कर सकते हैं| जब हम स्वभाव में जीते हैं तब पूर्णतः सकारात्मक होते हैं, अन्यथा बहुत अधिक नकारात्मक|
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हमारा वास्तविक "स्व" तो परमात्मा है, जिनकी चेतना में जीना हमारा वास्तविक और सही स्वभाव है| हम अपने स्वभाव में जीएँ और स्वभाव के विरुद्ध जो कुछ भी है उसका परित्याग करें| निरंतर अभ्यास करते करते परमात्मा व गुरु की असीम कृपा से निरंतर ब्रह्म-चिंतन और भक्ति ही हमारा स्वभाव बन जाता है| जब भगवान ह्रदय में आकर बैठ जाते हैं तब वे फिर बापस नहीं जाते| यह स्वाभाविक अवस्था कभी न कभी तो सभी को प्राप्त होती है| सरिता प्रवाहित होती है, पर किसी के लिए नहीं| प्रवाहित होना उसका स्वभाव है| व्यक्ति .. स्वयं में जब परमात्मा को व्यक्त करना चाहता है, यह उसका स्वभाव है|
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जो लोग सर्वस्व यानि समष्टि की उपेक्षा करते हुए इस मनुष्य देह के हित की ही सोचते हैं, प्रकृति उन्हें कभी क्षमा नहीं करती| वे सब दंड के भागी होते हैं| समस्त सृष्टि अपना परिवार है और समस्त ब्रह्माण्ड अपना घर| यह देह रूपी वाहन और यह पृथ्वी भी बहुत छोटी है अपने निवास के लिए| अपना प्रेम सर्वस्व में पूर्णता से व्यक्त हो| हम समष्टि का चिंतन करेंगे तो समष्टि भी हमारा चिंतन करेगी| इसलिए सदा कूटस्थ चैतन्य में स्थित रहें|
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परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ साकार अभिव्यक्ति आप सब को सादर नमन !
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
८ अप्रेल २०२१