Monday, 24 January 2022

आध्यात्मिक रूप से हमारा सबसे बड़ा शत्रु -- हमारी स्वयं की अधोगामी निम्न प्रकृति है ---

आध्यात्मिक रूप से हमारा सबसे बड़ा शत्रु -- हमारी स्वयं की अधोगामी निम्न प्रकृति है। यह अधोगामी निम्न प्रकृति ही हमारी सभी बुराइयों की जड़ है, जो हमारे अहंकार को प्रबल कर हमें परमात्मा से दूर करती है। यह गीता के १४वें अध्याय "गुण-त्रय-विभाग योग" का सार है। इसका स्वाध्याय बार-बार तब तक करना चाहिए जब तक यह पूरी तरह समझ में नहीं आ जाये।

.
मुझे यह लिखते हुए बड़ा अफसोस भी होता है कि मेरी दृष्टि में ऐसे बहुत से लोग हैं, जिनका अगला जन्म मनुष्य योनि में नहीं, बल्कि पशु आदि नीच योनियों में होगा। लेकिन मैं उन्हें सचेत नहीं कर सकता, क्योंकि इस विषय पर कुछ बोलते ही वे मेरे शत्रु बन जाएँगे, जिनकी संख्या नहीं बढ़ाना चाहता।
.
ॐ तत्सत् ! ॐ ब्रह्मणे नमः ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ जनवरी २०२२

आध्यात्मिक दृष्टि से हमारा शत्रु व मित्र कौन है? सत्य-मुक्ति का उपाय क्या है? ---

 आध्यात्मिक दृष्टि से हमारा शत्रु व मित्र कौन है? सत्य-मुक्ति का उपाय क्या है?

.
(इधर-उधर की झूठी और बनावटी बातें करना अधर्म है। जब सत्य का पता है तो सत्य ही कहना चाहिए। हरिःकृपा से जिस सत्य का मुझे बोध है, वही लिख रहा हूँ।)
.
(१) आध्यात्मिक दृष्टिकोण से हमारे से पृथक अन्य कोई है ही नहीं। हमारी उच्च प्रकृति जो हमें परमात्मा की ओर आकर्षित कर रही है, वह ही हमारी एकमात्र मित्र है। और जो निम्न प्रकृति हमें परमात्मा से दूर ले जा रही है, हमारी एकमात्र शत्रु है।
.
(२) इस सृष्टि में कर्ता - हमारे तीनों गुण (सतोगुण, रजोगुण व तमोगुण) हैं। उन्हीं से बंधे हुये हम कठपुतली की तरह नृत्य कर रहे हैं। परमात्मा की कृपा से त्रिगुणातीत (निस्त्रेगुण्य) होना ही मुक्ति का एकमात्र ज्ञात उपाय है। कोई कर्मकांड हमें मुक्त नहीं कर सकता।
.
(३) जहाँ तक मैं समझता हूँ, त्रिगुणातीत होने के लिए अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति ही एकमात्र साधन है, बाकी परमात्मा की कृपा है। अनन्य का अर्थ है कि मेरे सिवाय कोई भी अन्य नहीं है। व्यभिचार का अर्थ है - किसी अन्य से भी प्रेम। अव्यभिचारिणी भक्ति का अर्थ है -- सिर्फ परमात्मा से ही प्रेम होना। कोई भी किसी भी मार्ग की साधना/उपासना हो, बिना भक्ति के वह सफल नहीं हो सकती। कितने भी प्राणायाम करो, कितना भी ध्यान करो, बिना भक्ति के वहाँ कोई सिद्धि नहीं हो सकती। बिना भक्ति के कोई भी ज्ञान या वैराग्य सिद्ध नहीं हो सकता। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कम से कम दो बार अव्यभिचारिणी भक्ति का उल्लेख किया है --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
"मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥१४:२६॥"
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥१४:२७॥"
.
हमारा एकमात्र शत्रु - हमारी स्वयं की अधोगामी निम्न प्रकृति है, अन्य कोई हमारा शत्रु नहीं है। इब्राहिमी मज़हबों (Abrahamic Religions) ने इसे 'शैतान' का नाम दिया है। यह शैतान कहीं बाहर नहीं, हमारी स्वयं की ही निम्न प्रकृति है, जिस पर विजय प्राप्त करने का उपदेश गीता के १४ वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण हमें देते हैं।
.
हम ब्रह्म यानि परमात्मा के साथ सदा अभेद का चिंतन करें। इसी से हम अपने परम शत्रु - हमारी निम्न प्रकृति पर विजय प्राप्त कर पायेंगे। किसी श्रौत्रीय/ब्रहमनिष्ठ महात्मा से मार्गदर्शन लें। आप सब को शुभ कामनाएँ और नमन!!
ॐ तत्सत् ! ॐ ब्रह्मणे नमः ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
२२ जनवरी २०२२
.
पुनश्च -- भागवत पुराण, भक्ति सूत्र, रामचरितमानस, विष्णु पुराण, पद्म पुराण -- आदि आगम ग्रन्थों में भक्ति की महिमा भरी पड़ी है। लेख का विस्तार न हो, इस भय से उनका उल्लेख यहाँ नहीं किया है।

परमात्मा की खोज अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकती ---

 ॐ श्री गुरुभ्यो नमः !! जीवन में सब कुछ प्रतीक्षा कर सकता है, लेकिन परमात्मा की खोज अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकती ---

.
हमारा प्रथम, अंतिम, और एकमात्र लक्ष्य है - "भगवत्-प्राप्ति", जिसके लिए पूरी तरह मुझे आवश्यक है --
(१) गीता में बताई हुई "ब्राह्मी-स्थिति" या "कूटस्थ-चैतन्य" या "क्रिया की परावस्था" में रहने का नित्य निरंतर अभ्यास।
(२) अपनी गुरु-परंपरानुसार नित्य नियमित - साधना/उपासना, जिसकी अवधि दिन में कम से कम कुल मिलाकर तीन घंटे की तो होनी ही चाहिए। उससे कम में काम नहीं चलेगा। अधिकतम की तो कोई सीमा नहीं है। फिर भी जो सेवानिवृत हैं, उन्हें अपने साधनाकाल की अवधि को बढ़ाकर दिन में कम से कम आठ घंटे तक तो ले ही आना चाहिए। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। मुझे छोड़कर मेरे अनेक मित्र हैं जो नित्य नियमित आठ-नौ घंटे भगवान का ध्यान करते हैं, और चैतन्य की एक अति उच्च अवस्था में रहते हैं। मैं ही सबसे अधिक पिछड़ा हुआ हूँ। मुझे भी अब "प्रमाद" और "दीर्घसूत्रता" को त्याग कर, उनकी बराबरी करनी ही पड़ेगी। परमात्मा से भी ऐसी ही प्रेरणा मिल रही है। अतः सत्यनिष्ठा से प्रयास करेंगे। कर्ता तो स्वयं परमात्मा है, जिनका मैं निमित्त मात्र तो हूँ ही।
.
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ जनवरी २०२२

Sunday, 23 January 2022

स्वयं भगवान के शब्दों में, भगवान को कौन प्राप्त कर सकता है? :---

 स्वयं भगवान के शब्दों में, भगवान को कौन प्राप्त कर सकता है? :---

-----------------------------------------------------------
जहाँ तक मेरी समझ है, भगवान वास्तव में एक छोटे से बच्चे की तरह बड़े ईर्ष्यालु प्रेमी हैं| उन का बाल-स्वभाव और बाल-हठ है| उन्हें एक छोटे से बालक की तरह मनाना पड़ता है| वे चाहते हैं कि हम उन्हे अपना शत-प्रतिशत प्रेम दें, और इधर-उधर कहीं भी नहीं देखें| उन्हें हमारा ९९.९९% प्रेम भी पसंद नहीं है| उन्हें तो १००% + ही चाहिए| जहाँ भी हमारा ध्यान इधर-उधर किसी भी अन्य विषय में चला जाता है, वहीं वे रूठ कर चले जाते हैं| फिर अन्य सब ओर से मन को हटाकर उन में ही लगाना पड़ता है, तभी वे प्रसन्न होते हैं|
.
पूरी तरह तो वे तभी प्रसन्न होते हैं, जब हम उन्हें मनाने के चक्कर में, स्वयं को भी भूलकर, उन्हीं में विलीन हो जाते हैं| वे हरिः (चोर) भी हैं| उनका शौक है अपने भक्तों के अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) की चोरी करना| साथ-साथ वे दुःख-तस्कर (दुःखों के चोर) भी हैं जो अपने भक्तों के दुःखों को चुपचाप इस तरह चुरा लेते हैं कि भक्त को पता ही नहीं चलता कि कब उसके सारे दुःख चोरी चले गए| इस तरह वे चोर-जार-शिखामणि यानि चोरों के सरदार हैं|
.
उन्होने मुझे इतना छोटा सा हृदय दिया, और दुनियाँ भर के सारे दुःख-दर्द उसमें रखने को दे दिये| इस छोटे से हृदय में दुनियाँ भर के दुःख-दर्द नहीं समा सकते, इस लिए उनका सारा सामान (दुःख-दर्द) और यह हृदय भी उन्हीं को बापस दे दिया है|
.
गीता में वे कहते हैं कि उन्हें "अनन्य-भक्ति" से ही प्राप्त किया जा सकता है| यह अनन्य-भक्ति, वेदान्त की पराकाष्ठा है| वे कहते हैं ---
"पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया| यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्||८:२२||"
अर्थात् हे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है||
.
भगवान हम सब के इस शरीर रूपी पुर में शयन करते हैं, और सर्वत्र परिपूर्ण हैं, इसलिए भगवान का नाम पुरुष है| उन पुरुष से यह सारा संसार व्याप्त है, और उनके अतिरिक्त अन्य कुछ है भी नहीं| वे भगवान, अनन्य भक्ति से ही प्राप्य हैं|
उपासक का यह भाव रहता है कि मेरे से अन्य कोई है ही नहीं| मैं भगवान के साथ सर्वत्र व्याप्त और उनके साथ एक हूँ| इस आत्म-विषयक ज्ञान को ही स्वनामधन्य आचार्य शंकर ने 'अनन्य भक्ति' बताया है|
.
भगवान से जब प्रेम ही हो गया है, तब उनके अतिरिक्त अन्य कुछ भी चिंतन उन की दृष्टि में व्यभिचार है| सब कुछ भुलाकर हम भगवान की ही अनन्य भक्ति करें, जिसे भगवान ने "अव्यभिचारिणी-भक्ति" बताया है ---
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी| विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि||१३:११||"
अर्थात् अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि||
.
आज भगवान ने कुछ अधिक ही लिखवा दिया है| हे परमप्रेमी भगवन् , अब कुछ ऐसी सिद्धि दो कि सब कुछ भूल कर दिन-रात तुम्हारा ही भजन-चिंतन-ध्यान करता रहूँ, और तुम्हारे में विलीन होकर तुम्हारे साथ एक होकर, तुम्हारा प्रेम सब के हृदयों में जगा सकूँ| 🌹🙏🌹
.
ॐ तत्सत् ! ॐ ब्रह्मणे नमः ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ जनवरी २०२१

हमारा लक्ष्य आत्म-तत्व यानि परमात्मा की प्राप्ति है, न कि स्वर्ग आदि की कामना ---

हमारा लक्ष्य आत्म-तत्व यानि परमात्मा की प्राप्ति है, न कि कुछ अन्य आकर्षक सिद्धान्त, विभूति, या स्वर्ग आदि की कामना| सर्वप्रथम हम परमात्मा को प्राप्त करें, फिर उन की चेतना में रहते हुए, उन के उपकरण बन कर संसार के अन्य सारे कार्य करें| जब भी जीवन में परमात्मा को पाने की अभीप्सा जागृत हो, हमें उसी समय विरक्त होकर आत्मानुसंधान में लग जाना चाहिए| संसार में रहते हुए परमात्मा की खोज लगभग असंभव है| हमारे जैसे सामान्य मनुष्य, राजा जनक नहीं बन सकते|

.
परमात्मा तो हमें सदा से ही प्राप्त है लेकिन माया के आवरण से हमें उनका बोध नहीं होता| जब हम उन की दिशा में अग्रसर होते हैं, तब माया का विक्षेप हमें भटका देता है| यह सृष्टि का खेल ऐसे ही चल रहा है, जैसे एक छायाचित्र चलता है| परमात्मा के अतिरिक्त अन्य आकर्षणों से मोहित हो कर जब हम संसार में सुख ढूंढते हैं तो हमें निराशा ही निराशा हाथ लगती है| सब तरह की निराशाओं से तंग आकर हम परमात्मा की ओर उन्मुख होते हैं| प्रेमपूर्वक जब हम परमात्मा से प्रार्थना करते हैं तब वे कल्याण का मार्ग दिखाते हैं|
.
यहाँ मैं रामचरितमानस, श्रीमद्भगवद्गीता, और वेदान्त दर्शन से कुछ प्रामाणिक बातें लिखना चाहता था| पर उन्हें लिखने से कोई लाभ नहीं है, क्योंकि लंबे लेखों को फेसबुक पर कोई पढ़ता नहीं है| कोई असली मुमुक्षु होगा, तो उसे भगवान स्वयं मार्ग दिखाएंगे|
.
आप सब को शुभ कामनाएँ और नमन !!
कृपा शंकर
२३ जनवरी २०२१

Friday, 21 January 2022

हमारा एकमात्र शत्रु कौन है? उस पर विजय कैसे प्राप्त करें? ---

 हमारा एकमात्र शत्रु कौन है? उस पर विजय कैसे प्राप्त करें? ---

.
हमें किसी भी व्यक्ति की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न नहीं करना चाहिए| दूसरों के सामने एक आदर्श प्रस्तुत कर, उसी से दूसरों को कुछ कहना चाहिए| दूसरा है ही कौन? हम स्वयं ही अपने समक्ष अपना स्वयं का आदर्श रखें| फालतू और घटिया विचारों से स्वयं को मुक्त करें| स्वयं से पृथक अन्य कोई भी नहीं है|
.
हमारा एकमात्र शत्रु -- हमारी स्वयं की अधोगामी निम्न प्रकृति है, अन्य कोई हमारा शत्रु नहीं है| यह अधोगामी प्रकृति ही हमारी सभी बुराइयों की जड़ है| यही हमारे अहंकार को प्रबल कर हमें परमात्मा से दूर करती है| इब्राहिमी मज़हबों ने इसे 'शैतान' का नाम दिया है| यह शैतान कहीं बाहर नहीं हमारी स्वयं की ही निम्न प्रकृति है, जिस पर विजय प्राप्त करने का उपदेश गीता के १४ वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण हमें देते हैं| इस गुण_त्रय_विभाग योग का स्वाध्याय बार बार तब तक करें, जब तक यह पूरी तरह समझ में नहीं आ जाये| हम ब्रह्म यानि परमात्मा के साथ सदा अभेद का चिंतन करें| इसी से हम अपने परम शत्रु -- हमारी निम्न प्रकृति पर विजय प्राप्त कर पायेंगे|
.
ॐ तत्सत् ! ॐ ब्रह्मणे नमः ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ जनवरी २०२१

Saturday, 15 January 2022

वे मरे नहीं, अमर हुए. वे हारे नहीं, वीरगति को प्राप्त हुए ---

 वे मरे नहीं, अमर हुए. वे हारे नहीं, वीरगति को प्राप्त हुए. उन्होंने भारत की अस्मिता (सनातन धर्म और संस्कृति) की रक्षा के लिए युद्ध किया था. भारत की भूमि पर महाभारत के पश्चात लड़ा गया यह सबसे बड़ा धर्मयुद्ध था.

.
१४ जनवरी १७६१ को हुए पानीपत के तीसरे युद्ध में हुतात्मा एक लाख तीस हजार से भी अधिक अमर हिन्दू योद्धाओं को श्रद्धांजलि और नमन !!
.
सदाशिव राव भाऊ एक महान वीर हिन्दू योद्धा था, जिसके नेतृत्व में यह युद्ध लड़ा गया था| उसकी सेना धर्मरक्षा हेतु, दुर्दांत लुटेरे अहमदशाह अब्दाली से लड़ने के लिए हजारों मील दूर महाराष्ट्र से पैदल चल कर आई थी, जिसके साथ में भारी तोपखाना भी था| उस के सैनिकों ने उस दिन भूखे, प्यासे, सर्दी में ठिठुरते हुए युद्ध किया था, क्योंकि उन्हें पर्याप्त समय ही नहीं मिला था| फिर भी वे वीरता से लड़े और अमर हुए| महाराष्ट्र का शायद ही कोई ऐसा घर होगा जिसका कोई न कोई सदस्य वीरगति को प्राप्त नहीं हुआ था|
.
भारत के शत्रु वामपंथी इतिहासकारों ने भारत का गलत इतिहास लिखा है| इस युद्ध के बाद अहमदशाह अब्दाली भाग गया था और उसका फिर कभी साहस ही नहीं हुआ, भारत की ओर आँख उठाकर देखने का| अहमदशाह अब्दाली ने पंजाब में भयंकर नर-संहार और विनाश किया, फिर मथुरा के और आसपास के सारे हिन्दू मंदिर तोड़कर ध्वस्त कर दिये थे| उसने चालीस हज़ार से अधिक तीर्थयात्रियों व धर्मनिष्ठ नागरिकों का सामूहिक नरसंहार कर उनके नरमुंडों से मथुरा के पास एक मीनार खड़ी कर दी थी| उसी की सजा उसे देने के लिए सदाशिवराव भाऊ महाराष्ट्र से आया था| उस युद्ध के पश्चात पश्चिम में खैबर घाटी से होकर फिर किसी आक्रमणकारी का भारत में आने का साहस नहीं हुआ|
.
सिर्फ दस वर्षों में ही मराठे हिन्दुओं ने अपनी खोयी हुई शक्ति को पुनः प्राप्त किया और उन सब विश्वासघातियों को निपटा दिया जिनके कारण पानीपत में उनकी हार हुई थी| महादजी शिंदे ने पूरे रुहेलखण्ड को बर्बाद कर दिया जिनकी गद्दारी से पानीपत में हार हुई थी| बाजीराव ने दिल्ली पर अपना अधिकार कर पूरी मुग़ल सत्ता समाप्त कर दी। साहू जी द्वारा अभयदान देने से ही मुगलों को जीवित छोड़ दिया गया। पंजाब में मराठा सेना की सहायता से ही सिखों का राज्य स्थापित हुआ। अंग्रेजों ने भारत की सत्ता मराठों से प्राप्त की थी, न कि मुगलों से। इस तरह के और भी अनेक युद्ध लड़े गए, जिन्हें छिपाया गया है| वीर-प्रसूता भारत माता की जय|
इस लेख को लिखने का उद्देश्य --- किसी पूर्वजन्म की स्मृति को व्यक्त करना है| ध्यान में वह पूरा युद्ध याद आ जाता है| लगता है किसी पूर्व जन्म में उस महायुद्ध में मेरी भी कोई भूमिका थी| कृपा शंकर
१५ जनवरी २०२१