Tuesday, 26 October 2021

सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण कैसे होगा? ---

 काल की गति पर पूर्ण नियंत्रण सिर्फ भगवान का है। इस समय काल की गति ऊर्ध्वमुखी है, अतः इस आरोह-काल में मनुष्य की चेतना का भी निरंतर उत्थान और विस्तार हो रहा है। जिस दिन आत्मा की शाश्वतता और कर्मफलों की प्राप्ति हेतु पुनर्जन्म का सत्य , जन-सामान्य को समझ में आने लगेगा, उसी दिन से सत्य-सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा सम्पूर्ण विश्व में होने लगेगी। सत्य-सनातन-धर्म सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त होगा, और असत्य का अंधकार दूर होगा।

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भगवान की सर्वोत्तम और सर्वाधिक अभिव्यक्ति भारतभूमि में हुई है। अतः भारत निश्चित रूप से एक सत्य-सनातन-धर्मनिष्ठ अखंड हिन्दू राष्ट्र बनेगा। भारत में छाया असत्य का अंधकार दूर होगा, और सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा। वह दिन देखने के लिए मैं जीवित रहूँ या नहीं, लेकिन उस घटना का साक्षी अवश्य रहूँगा। सनातन धर्म का आधार ही -- आत्मा की शाश्वतता, कर्मफलों की प्राप्ति हेतु पुनर्जन्म, और भगवत्-प्राप्ति है।
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अपनी वर्तमान आयु और अवस्था में अब भगवत्-प्राप्ति को ही अपना एकमात्र धंधा बना लिया है। इस धंधे में केवल भगवान ही सम्मिलित हैं, और कोई भी अन्य नहीं है। सारी साधनाएँ और उपासना इसी धंधे का भाग हैं। सारा नफा-नुकसान भी भगवान का है, अन्य किसी से कुछ भी लेना-देना नहीं है। मैं रहूँ या न रहूँ, इसका भी कोई महत्व नहीं है। मेरी चेतना में एकमात्र अस्तित्व भगवान का ही रहे। इस समय मेरी आयु आधिकारिक रूप से ७५ वर्ष है, अतः यही धंधा मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ है।
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सभी को मंगलमय शुभ कामनाएँ और नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२४ अक्तूबर २०२१

सत्यधर्मनिष्ठ क्षत्रिय ही देश की रक्षा, और सुशासन दे सकते हैं ---

 सत्यधर्मनिष्ठ क्षत्रिय ही देश की रक्षा, और सुशासन दे सकते हैं।

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अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए हिंदुओं को एक ब्रहमतेज के साथ-साथ क्षात्रबल भी जागृत कर अपना सैन्यीकरण करना होगा। क्षत्रियत्व ही वास्तव में देश की रक्षा कर सकता है। हिन्दू जाति शस्त्र धारण करे। सभी हिंदुओं के पास आत्मरक्षा हेतु अस्त्र-शस्त्र हों, और उनका प्रयोग करना भी आता हो। सरकार को बाध्य किया जाये कि वह नियमों में परिवर्तन करे, और हिंदुओं को अस्त्र-शस्त्र रखने और धर्मरक्षा का अधिकार दे। सत्यधर्मनिष्ठ क्षत्रिय ही देश की रक्षा और सुशासन दे सकते हैं।
२५ अक्तूबर २०२१

जिसे प्यास लगी है, वही पानी पीयेगा ---

 जिसे प्यास लगी है, वही पानी पीयेगा ---

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यह संसार त्रिगुणात्मक है। इस समय विश्व में तमोगुण का प्रभाव अधिक है। इस सृष्टि के स्वामी स्वयं भगवान हैं जिन का आदेश है कि हम इस त्रिगुणात्मक सृष्टि से ऊपर उठें। स्वयं निमित्त मात्र बनकर भगवान के आदेश का ही पालन करेंगे।
जीवन में परमात्मा का अवतरण सर्वप्रथम स्वयं में हो, फिर जो कुछ भी करना है, वह वे परमात्मा स्वयं करेंगे।
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जब तक स्वयं में प्राण और चेतना है, तब तक हरिःनाम विस्मृत नहीं हो सकता। यह शरीर रहे या न रहे, लेकिन परमात्मा का चैतन्य और उनकी स्मृति सदा रहेगी। मेरा नहीं, सिर्फ परमात्मा का ही अस्तित्व होगा।
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"हरिः अनंत हरिः कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥
रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥"
हरिः अनंत हैं (उनका कोई पार नहीं पा सकता) और उनकी कथा भी अनंत है। सब संत उसे बहुत प्रकार से कहते-सुनते हैं। रामचंद्र के सुंदर चरित्र करोड़ों कल्पों में भी गाए नहीं जा सकते।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
२५ अक्तूबर २०२१

भगवत्-प्राप्ति में सफलता कैसे प्राप्त हो? सत्य-सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण कब व कैसे होगा? ----

प्रश्न (१):--- भगवत्-प्राप्ति में सफलता कैसे प्राप्त हो?

प्रश्न (२):--- सत्य-सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण कब व कैसे होगा?

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उत्तर (१):-- जिस तरह एक व्यापारी दिन-रात अपने धंधे के बारे में नफे-नुकसान की ही सोचता है, और उन्हीं लोगों से मिलता-जुलता है जो उसके धंधे में सहायक हों, --- उसी तरह जिन लोगों ने अपना धंधा ही परमात्मा की प्राप्ति को बना लिया है, वे दिन-रात सप्ताह में सातों दिन, और दिन में चौबीस घंटे --- सिर्फ परमात्मा का ही चिंतन करे; और उन्हीं लोगों से मेल-जोल रखें जो उनके धंधे में सहायक हों। बाकी अन्य सब का विष की तरह परित्याग कर दें। भगवान श्रीकृष्ण के वचनों में श्रद्धा और विश्वास रखें --
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् -- "जो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मेरे में निरन्तर लगे हुए उन भक्तों का योगक्षेम (अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी रक्षा) मैं वहन करता हूँ।"
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यही एकमात्र मार्ग है परमात्मा की प्राप्ति का। हृदय में सत्यनिष्ठा, श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए। यह भगवत्-प्राप्ति ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। यही कल्याण का, और मोक्ष का एकमात्र मार्ग है। यही सत्य-सनातन-धर्म है।
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उत्तर (२):--- जिस दिन आधुनिक विज्ञान व निज अनुभव द्वारा मनुष्य की बुद्धि -- कर्मफलों, पुनर्जन्म व आत्मा की शाश्वतता को मान लेगी, उसी दिन से सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण आरंभ हो जाएगा। फिर भारत भी अखंड होगा और अपने परम वैभव को भी प्राप्त करेगा। कलियुगी पंथों का प्रभाव भी क्षीण होते होते लुप्त हो जाएगा।
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विशेष :-- परमात्मा से प्रेम (भक्ति) व अन्य संबन्धित विषयों पर अब तक अनेक बार लिख चुका हूँ। बार बार उसी बात को घूमा-फिरा कर लिखना समय की बर्बादी है।
जिन के हृदय में परमात्मा के प्रति प्रेम होगा, वे निश्चित रूप से रामायण, महाभारत और उपनिषदों आदि का स्वाध्याय, व सत्संग करेंगे।
जिन का मन और बुद्धि -- विषय-वासनाओं में लिप्त है, उनके भाग्य में भटकना ही लिखा है, वे भटकते ही रहेंगे। अनेक जन्मों तक कष्ट पाते-पाते वे भी एक न एक दिन सन्मार्ग पर आ ही जाएँगे।
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आप सब महान आत्माएँ हैं और परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ हैं।
आप सब को मेरा नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२५ अक्तूबर २०२१

भगवान के प्रति अहैतुकी परमप्रेम, समर्पण और ध्यान साधना -- हिन्दू धर्म का प्राण है ---

 सनातन हिन्दू धर्म क़ा प्राण है ... भगवान के प्रति अहैतुकी पूर्ण-परम-प्रेम, समर्पण और ध्यान साधना|

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भारत का सबसे बड़ा अहित किया है अधर्मसापेक्ष यानि धर्मनिरपेक्ष अधर्मी सेकुलरवाद, मार्क्सवाद और मैकाले की शिक्षा व्यवस्था ने|
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हमारे जीवन का केंद्रबिंदु परमात्मा हों, और हम उन्हें शरणागति द्वारा समर्पित हों ... यही सर्वश्रेष्ठ कार्य है जिसे हम इस जीवन में कर सकते हैं|
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पूरी सृष्टि ओंकार का, यानि राम नाम का जप कर रही है| हमें उसे निरंतर सुनना और उसी में लीन हो जाना चाहिए| अतः पढो कम, और ध्यान अधिक करो| उतना ही पढो जिससे प्रेरणा और शक्ति मिलती हो| पढने का उद्देश्य ही प्रेरणा और शक्ति प्राप्त करना है|
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साथ भी उन्हीं लोगों का करो जो हमारी साधना में सहायक हों, यही सत्संग है| साधना भी वही है, जो हमें निरंतर परमात्मा का बोध कराये|
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सृष्टि निरंतर गतिशील है, कहीं भी जड़ता नहीं है| जड़ता का आभास, माया का आवरण है| यह भौतिक विश्व जिन अणुओं से बना है उनका निरंतर विखंडन और नवसृजन हो रहा है| यह विखंडन और नवसृजन की प्रक्रिया ही नटराज भगवान शिव का नृत्य है|
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वह परम चेतना जिससे समस्त ऊर्जा और सृष्टि निर्मित हुई है वे शिव हैं| सारी आकाश गंगाएँ, सारे नक्षत्र अपने ग्रहों और उपग्रहों के साथ अत्यधिक तीब्र गति से परिक्रमा कर रहे हैं| सृष्टि का कहीं ना कहीं तो कोई केंद्र है, वही विष्णु नाभि है और जिसने समस्त सृष्टि को धारण कर रखा है वे विष्णु हैं|
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उस गति की, उस प्रवाह की, और नटराज के नृत्य की भी एक ध्वनी हो रही है जिसकी आवृति हमारे कानों की सीमा से परे है| वह ध्वनी ही ओंकार रूप में परम सत्य 'राम' का नाम है| उसे सुनना और उसमें लीन हो जाना ही उच्चतम साधना है| समाधिस्थ योगी जिसकी ध्वनी और प्रकाश में लीन हैं, और सारे भक्त साधक जिस की साधना कर रहे हैं, वह 'राम' का नाम ही है जिसे सुनने वालों का मन उसी में मग्न हो जाता है|
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आप सब में हृदयस्थ परमात्मा को नमन ! ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२६ अक्टूबर २०२०

Monday, 25 October 2021

भगवान श्रीराम की उपासना हमें निर्भीक व शक्तिशाली बनाती है ---

 

विजयदशमी का दिव्य-तेजस्वी पर्व धनुर्धारी भगवान श्रीराम को अपने हृदय में रखते हुए उन सब आध्यात्मिक सीमाओं के उल्लंघन का पर्व है जिन्होने हमें सीमित बना रखा है| जो भी अस्त्र-शस्त्र-आयुध हमारे पास हैं, उनका पूजन करें| हमारा सबसे बड़ा शस्त्र तो हमारी हर आती-जाती साँस और हमारा मन है| सब सीमाओं का उल्लंघन कर भगवान श्रीराम का कूटस्थ में ध्यान करें और उन्हें समर्पित हों|

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रावण की चिंता न करें| रावण कभी मरने वाला नहीं है| रावण है हमारा लोभ व अहंकार, जो निरंतर पराये धन व पराई स्त्री/पुरुष की कामना करता है|
महिषासुर भी हमारा तमोगुण, प्रमाद व दीर्घसूत्रता है| यह भी कभी नहीं मरता|
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भगवान जब हमारे हृदय में प्रतिष्ठित होंगे, तभी ये तमोगुण रूपी असुर भागेंगे| भगवान श्रीराम की उपासना हमें निर्भीक व शक्तिशाली बनाती है|
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भगवान श्रीराम जब रावण से युद्ध करने गए तब उनके पास न तो रथ था, न उन के पैरों में जूते, और न ही उनकी सेना के पास कोई अस्त्र-शस्त्र| उनकी ओर से लड़ रहे वानर और रीछ, वृक्षों और पत्थरों को ही अस्त्र-शस्त्र बनाकर लड़ रहे थे| रावण को रथ पर और श्री रघुवीर को बिना रथ के देखकर विभीषण अधीर हो गए| प्रेम अधिक होने से उनके मन में सन्देह हो गया कि वे बिना रथ के रावण को कैसे जीत सकेंगे|
श्रीराम जी के चरणों की वंदना करके वे स्नेह पूर्वक कहने लगे ... हे नाथ! आपके न रथ है, न तन की रक्षा करने वाला कवच है और न जूते ही हैं| वह बलवान्‌ वीर रावण किस प्रकार जीता जाएगा?
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कृपानिधान श्री रामजी ने कहा ... हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है ... शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिए हैं| सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं| बल, विवेक, दम (इंद्रियों का वश में होना) और परोपकार ... ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं|
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ईश्वर का भजन ही (उस रथ को चलाने वाला) चतुर सारथी है, वैराग्य ढाल है, और संतोष तलवार है| दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है|
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निर्मल (पापरहित) और अचल (स्थिर) मन तरकस के समान है| शम (मन का वश में होना), (अहिंसादि) यम और (शौचादि) नियम- ये बहुत से बाण हैं| ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है| इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है|
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हे धीरबुद्धि वाले सखा! सुनो, जिसके पास ऐसा धर्ममय दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार (जन्म-मृत्यु) रूपी महान्‌ दुर्जय शत्रु को भी जीत सकता है (रावण की तो बात ही क्या है)|
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रावनु रथी बिरथ रघुबीरा| देखि बिभीषन भयउ अधीरा||
अधिक प्रीति मन भा संदेहा| बंदि चरन कह सहित सनेहा||१||
नाथ न रथ नहि तन पद त्राना| केहि बिधि जितब बीर बलवाना||
सुनहु सखा कह कृपानिधाना| जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना||२||
सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे| छमा कृपा समता रजु जोरे||३||
ईस भजनु सारथी सुजाना| बिरति चर्म संतोष कृपाना||
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा| बर बिग्यान कठिन कोदंडा||४||
अमल अचल मन त्रोन समाना| सम जम नियम सिलीमुख नाना||
कवच अभेद बिप्र गुर पूजा| एहि सम बिजय उपाय न दूजा||५||
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आप सब महान दिव्य आत्माओं को नमन !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ अक्टूबर २०२०

श्रीकृष्ण समर्पण ---

 श्रीकृष्ण समर्पण ...

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आजकल पिछले कुछ दिनों से एक विचित्र सी स्थिति हो गई है| इस से एक परम शांति भी मिल रही है और भगवान से एक दिव्य आश्वासन भी|
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अपने चारों ओर ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में हो रहे घटनाक्रम के प्रति मैं बहुत अधिक संवेदनशील हूँ| पूरी पृथ्वी का और पृथ्वी के हर भाग का मानचित्र मेरे मानस में है| इतना ही नहीं, पृथ्वी के हर भाग की जलवायू, और विश्व की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं आदि का भी काफी कुछ ज्ञान है| विश्व के बहुत सारे देशों का भ्रमण भी किया है, सभी महासागरों को जलयान से पार किया है, पृथ्वी की परिक्रमा भी की है, व प्रकृति का सौम्य और विकराल रूप भी देखा है| अपने निज जीवन के भूतकाल की अनेक बुरी-अच्छी स्मृतियाँ आती हैं| बहुत अधिक विचित्र अनुभव हैं, कई बातों की पीड़ा भी होती है| भारत और सनातन धर्म की वर्तमान दुःखद स्थिति की भी पीड़ा होती है|
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पर अब परिदृश्य परिवर्तित हो गया है| अच्छी-बुरी जो भी स्मृति आती है, वे सब अब भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित हो जाती हैं| जीवन का हरेक अच्छा-बुरा पक्ष, हर अनुभव, सब कुछ, पूरा जीवन ही श्रीकृष्ण को समर्पित है| बस एक यही भाव है जो जीवन के हर अभाव और कष्ट को दूर करता है| सारे अभाव व कष्ट, सारी अपूर्णता-पूर्णता, सारा अस्तित्व ... श्रीकृष्ण को समर्पित है| कुछ भी अपने लिए नहीं रखा है, सब कुछ भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है|
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गीता का यह चरम श्लोक बार-बार स्मृति में आमने आता है ...
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज| अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः||१८:६६||"
अब भगवान वासुदेव ही सर्वस्व हैं|
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते| वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः||७:१९||"
सारा जीवन उन्हें समर्पित है| मेरा कहने को कुछ भी नहीं है|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ अक्तूबर २०२०