Monday, 23 August 2021

भारत की राजनीति सत्य-सनातन-धर्म हो, व गो-ब्राह्मण-प्रतिपालक सत्यधर्मनिष्ठ क्षत्रिय शासकों का नवोन्मेष हो ---

 

"भारत की राजनीति सत्य-सनातन-धर्म हो, व गो-ब्राह्मण-प्रतिपालक सत्यधर्मनिष्ठ क्षत्रिय शासकों का नवोन्मेष हो।" ---
.
हमारा यह शिव-संकल्प निश्चित रूप से फलीभूत होगा, क्योंकि गीता में भगवान का वचन है, जो कभी मिथ्या नहीं हो सकता --
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥
.
भगवान की स्तुति --
"नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च, जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:॥"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्, यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥"
"वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्, देवकीपरमानन्दं कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्॥"
"वंशी विभूषित करा नवनीर दाभात् , पीताम्बरा दरुण बिंब फला धरोष्ठात्।
पूर्णेन्दु सुन्दर मुखादर बिंदु नेत्रात् , कृष्णात परम किमपि तत्व अहं न जानि॥"
"कस्तुरी तिलकम् ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम् ,
नासाग्रे वरमौक्तिकम् करतले, वेणु करे कंकणम्।
सर्वांगे हरिचन्दनम् सुललितम्, कंठे च मुक्तावलि,
गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते, गोपाल चूड़ामणी॥"
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||"
.
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
२२ अगस्त २०२१

जिसमें जैसे गुण होंगे, उसकी वैसी ही गति होगी ---

 

जिसमें जैसे गुण होंगे, उसकी वैसी ही गति होगी। हमारे सारे बंधनों का और मोक्ष का कारण हमारा अहंकार ही है। अहंकार भी दो तरह का होता है। एक अहंकार तो स्वयं को यह शरीर मानता है, वहीं दूसरा अहंकार स्वयं को यह शरीर न मानकर सम्पूर्ण सृष्टि में व उस से भी परे सर्वव्यापी अनंत ब्रह्मरूप मानता है। पहले वाला अहंकार बंधनों का कारण है, और दूसरा वाला मुक्ति का।
.
प्राचीन भारत में लोग संतान उत्पन्न करने के लिए बड़ी सावधानी बरतते थे। दो तरह की संताने होती हैं -- कामज और धर्मज। काम वासना के वशीभूत होकर उत्पन्न की गई संतान कामज होती है, और धर्म की दृष्टि से उत्पन्न संतति धर्मज कहलाती हैं। आज के समय उत्पन्न अधिकांश संतति कामज हैं, धर्मज नहीं। प्राचीन काल में प्रधानतः धर्मज संतति होती थी, इसलिये संतति के मन में प्रश्न होते थे कि -- "मैं कौन हूँ?", "मेरा क्या कर्तव्य है?", "मुझे क्या करना चाहिये?" आदि। आज कामज संतति द्वारा प्रश्न किया जाता है कि क्या करने से उन्हें भोग-विलास की प्राप्ति होगी। संतानोत्पत्ति के समय माता-पिता में यदि सतोगुण है तो सतोगुणी संतान होगी, रजोगुण है तो रजोगुणी, और तमोगुण है तो तमोगुणी संतान होगी।
.
जिस समय पुरुष का शुक्राणु और स्त्री का अंडाणु मिलते हैं, उस समय सूक्ष्म जगत में एक विस्फोट होता है, और जैसे उनके भाव होते हैं, वैसी ही जीवात्मा आकर गर्भस्थ हो जाती है। संभोग के समय जिनमें कुटिलता होती है, उनकी सन्तानें कुटिल यानि Crook/Cunning होती हैं। जिनमें जैसी भावना होती है वैसी ही सन्तानें उनके यहाँ उत्पन्न होती हैं। आजकल कोई नहीं चाहता कि उनकी सन्तानें सतोगुणी हों, सब को कमाऊ संतान ही चाहिए।
.
जिनमें कुटिलता नहीं है, वे सतोगुणी ही ब्रह्मज्ञान के अधिकारी होते हैं। अन्यथा उन्हें और अनेक जन्म लेने होंगे। ब्रह्मविद्या के लिए रुचि होगी तभी प्रवृति होगी। हमारे मन में अनेक तरह के भाव होते हैं, इसलिए अखंड परमात्मा खंडित रूप में अनुभूत होते हैं। शरणागत होकर समर्पित होने पर, करुणावश भगवान हमें अखंड भाव का बोध कराते हैं। वैराग्य होने से ही परमात्मा की प्राप्ति होती है। जो साधन-साध्य है, वह साध्य भी साधन के अभाव में लुप्त हो जाएगा। विषयों के प्रति वैराग्य हुये बिना आत्मज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। राग से बन्धन है, और वैराग्य से निवृत्ति है। जिनके अंदर विवेक जागृत होता है, वे जीवन के आरंभिक काल में ही विरक्त हो जाते हैं।
.
हम स्वयं मुक्त होंगे तभी दूसरों को मुक्ति दिला सकते हैं। कोई हमारे से पृथक नहीं है, मिथ्या परोपकार का भाव भी एक बंधन है। इसलिए अनन्य भाव से भक्ति करनी चाहिए। जैसे हम स्वयं होंगे, वैसी ही हमारे चारों ओर की सृष्टि होगी।
.
ये भाव मुझ में व्यक्त हुए, इसके लिए लिए मैं परमात्मा को नमन करता हूँ।
ॐ तत्सत् !
२३ अगस्त २०२१

चौक च्यानणी भादूड़ो, दे दे माई लाडूड़ो ---


गणेशचतुर्थी पर मैं एक बहुत पुराना बच्चों द्वारा गाये जाने वाला एक राजस्थानी गीत प्रस्तुत करना चाहता था जिसे ५०-६० वर्षों पूर्व गणेशचतुर्थी पर बच्चे लोग गाया करते थे, और किसी भी सहपाठी या परिचित के घर लड्डू खाने चले जाते थे| जिस के भी घर जाते वह बच्चों को लड्डू, गुड़-धाणी तो बड़े प्रेम से खिलाता ही, साथ में कुछ पैसे भी देता| मुझे वह गीत ठीक से याद नहीं आ रहा था और नेट पर भी कहीं मिल नहीं रहा था| आज एक मित्र ने भेजा है, जिसे प्रस्तुत कर रहा हूँ ...
"चौक च्यानणी भादूड़ो,
दे दे माई लाडूड़ो |
आधौ लाडू भावै कौनी,
सा'पतौ पाँती आवै कौनी ||
सुण सुण ऐ गीगा की माँ,
थारौ गीगौ पढ़बा जाय |
पढ़बा की पढ़ाई दै,
छोराँ नै मिठाई दै ||
आळो ढूंढ दिवाळो ढूंढ,
बड़ी बहु की पैई ढूंढ |
ढूंढ ढूंढा कर बारै आ,
जोशी जी कै तिलक लगा ||
लाडूड़ा में पान सुपारी,
जोशी जी रै हुई दिवाळी |
जौशण जी ने तिलिया दै,
छोराँ नै गुड़-धाणी दै |
ऊपर ठंडो पाणी दै ||
एक विद्या खोटी,
दूजी पकड़ी . चोटी |
चोटी बोलै धम धम,
विद्या आवै झम झम ||"
.
२३ अगस्त २०२०

Sunday, 22 August 2021

परमात्मा को हम अकिंचन दे ही क्या सकते हैं? ---

 

परमात्मा को हम अकिंचन दे ही क्या सकते हैं? ---
-----------------------------------------
हम परमात्मा में बापस अपने "स्वयं" का समर्पण ही कर सकते हैं, अन्य कुछ हमारे पास है ही नहीं। अपना सम्पूर्ण अस्तित्व बापस उन्हीं को लौटा दें, जिन की हम रचना हैं। सब कुछ तो उन्हीं का है। यह देह रूपी वाहन तो परमात्मा ने हमें इस लोकयात्रा के लिए दिया है, जिस पर आत्म-तत्व के रूप में वे स्वयं बिराजमान हैं। वे ही इस देहरूपी विमान के चालक हैं, यह विमान भी वे स्वयं ही हैं। हम यह देह नहीं, परमात्मा की परमप्रेममय अनंतता हैं।
.
वे परमात्मा ही इस देह में साँस ले रहे हैं। इस देह के साथ साथ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड यानि सम्पूर्ण सृष्टि भी साँस ले रही है। इस श्वास-प्रश्वास रूपी यज्ञ में हर श्वास के साथ-साथ हम अपने अहंकार रूपी शाकल्य की आहुति श्रुवा बन कर दे दें। "यह आहुति ही है जो हम परमात्मा को दे सकते हैं, अन्य कुछ भी नहीं"| गीता में भगवान कहते हैं --
"ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥४:२४॥"
अर्थात् .... अर्पण (अर्पण करने का साधन श्रुवा) ब्रह्म है, और हवि (शाकल्य अथवा हवन करने योग्य द्रव्य) भी ब्रह्म है, ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा जो हवन किया गया है वह भी ब्रह्म ही है। इस प्रकार ब्रह्मरूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष का गन्तव्य भी ब्रह्म ही है॥
.
परमात्मा द्वारा दी हुई अपनी इस अति सीमित व अति अल्प बुद्धि और क्षमता द्वारा इस से अधिक और कुछ भी लिखा नहीं जा सकता; हालाँकि लिखने वाले वे स्वयं हैं। परमात्मा का आश्वासन है कि जिनमें भी उनके प्रति परमप्रेम और उन्हें पाने की अभीप्सा होगी, उन्हें वे निश्चित रूप से प्राप्त होंगे। उन्हें मार्गदर्शन भी मिलेगा। हम अपनी साधना में परमात्मा को सर्वत्र देखें, और सब में परमात्मा को देखें। गीता में भगवान कहते हैं --
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति"॥६:३०॥
अर्थात् - जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है, और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता), और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
.
सब में हृदयस्थ परमात्मा को सप्रेम नमन !! हम सब परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ साकार अभिव्यक्तियाँ हैं। ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ अगस्त २०२१

Saturday, 21 August 2021

ॐ नमस्ते गणपतये | त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि | त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ---

 

ॐ नमस्ते गणपतये | त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि | त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ...
.
आज भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन, पंच-प्राण (प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान) रूपी गणों के, ओंकार रूप (ॐ) में अधिपति, भगवान श्रीगणेश को रिद्धि-सिद्धि सहित नमन!! सभी श्रद्धालुओं को भी नमन!! भगवान श्रीगणेश, ओंकार रूप में हमारे चैतन्य में नित्य विराजमान रहें| आप चिन्मय, आनंदमय, सच्चिदानंद, प्रत्यक्ष ब्रह्म हो| ॐ ॐ ॐ !!
.
भारत की संस्कृति में गणेश-चतुर्थी का अत्यधिक महत्व है| भारत में अंग्रेजी शिक्षा प्रचलित होने से पूर्व बालक/बालिकाओं की शिक्षा का आरंभ गणेश-चतुर्थी के दिन से ही होता था| मुझे भी अतीत की कुछ स्मृतियाँ हैं| गणेश चतुर्थी के दिन हमें धुले हुए साफ़ वस्त्र पहिना कर पाठशाला भेजा जाता था| गले में दो डंके भी लटका कर ले जाते थे| विद्यालयों में लड्डू बाँटे जाते थे| अब वो अतीत की स्मृतियाँ हैं| आधुनिक अंग्रेजी अध्यापकों व विद्यार्थियों को गणेश चतुर्थी का कोई ज्ञान नहीं है|
.
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सम्पूर्ण भारत में गणेश चतुर्थी के पर्व ने बड़ा महत्वपूर्ण योगदान दिया है| एक समय था जब अंग्रेजों ने पूरे भारत में धारा-१४४ लागू कर रखी थी| पाँच से अधिक व्यक्ति एक स्थान पर एकत्र नहीं हो सकते थे| अंग्रेज पुलिस गश्त लगाती रहती और जहाँ कहीं भी पाँच से अधिक व्यक्ति एक साथ एकत्र दिखाई देते उन पर बिना चेतावनी के लाठी-चार्ज कर देती| पूरा भारत आतंकित था| ऐसे समय में पं. बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में गणपति-उत्सव का आरंभ किया| सिर्फ धार्मिक आयोजनों के लिए ही एकत्र होने की छूट थी| गणपति पूजा के नाम पर लोग एकत्र होते और धार्मिकता के साथ-साथ उनमें राष्ट्रवादी विचार भी भर दिये जाते| तत्पश्चात महाराष्ट्र के साथ-साथ पूरे भारत में गणपति उत्सव का चलन हो गया|
.
गणपति अथर्वशीर्ष :---
ॐ नमस्ते गणपतये ॥ त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि ॥ त्वमेव केवलं कर्तासि ॥ त्वमेव केवलं धर्तासि ॥ त्वमेव केवलं हर्तासि ॥ त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि ॥ त्वं साक्षादात्मासि नित्यम् ॥१॥
ऋतम् वच्मि ॥ सत्यं वच्मि ॥ २॥
अव त्वं माम्‌ ॥ अव वक्तारम् ॥ अव श्रोतारम् ॥ अव दातारम् ॥ अव धातारम् ॥ अवानूचानमव शिष्यम् ॥ अव पश्चात्तात्‌ ॥ अव पुरस्तात् ॥ अवोत्तरात्तात् ॥ अव दक्षिणात्तात् ॥ अव चोर्ध्वात्तात् ॥ अवाधरात्तात् ॥ सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात् ॥३॥
त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः ॥ त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममयः ॥ त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि। त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥४॥
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते ॥ सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति ॥ सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति ॥ सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति ॥
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः ॥ त्वं चत्वारि वाक्पदानि ॥५॥
त्वं गुणत्रयातीतः। त्वं अवस्थात्रयातीतः। त्वं देहत्रयातीतः। त्वं कालत्रयातीतः। त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम् ॥ त्वं शक्तित्रयात्मकः। त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम् ॥ त्वं ब्रहमा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं‌ चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुवः स्वरोम् ॥६॥
गणादिन् पूर्वमुच्चार्य वर्णादिस्तदनन्तरम्। अनुस्वारः परतरः। अर्धेन्दुलसितम्। तारेण ऋद्धम्। एतत्तव मनुस्वरूपम्। गकारः पूर्वरूपम्। अकारो मध्यमरूपम्। अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्। बिन्दुरुत्तररूपम्। नादः संधानम् ॥ संहिता सन्धिः। सैषा गणेशविद्या। गणक ऋषिः। निचृद्‌गायत्रीछंदः गणपतिर्देवता। ॐ गं गणपतये नमः ॥७॥
एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥ ८ ॥
एकदन्तं चतुर्हस्तम् पाशमं कुशधारिणम् ॥ रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम्। रक्तम् लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् ॥
रक्तगन्धानुलिप्तांगं रक्तपुष्पैः सुपूजितम्। भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्। आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम् ॥ एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः ॥९॥
नमो व्रातपतये नमो गणपतये नमः प्रमथपतये नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्ननाशिने शिवसुताय वरदमूर्तये नमः ॥ १० ॥
.
॥ फलश्रुति ॥ (सिर्फ हिंदी अनुवाद) :----
----------------------------------------
इस अथर्वशीर्ष का जो पाठ करता है, वह ब्रह्मीभूत होता है, वह किसी प्रकार के विघ्नों से बाधित नहीं होता, वह सर्वतोभावेन सुखी होता है, वह पंच महापापों से मुक्त हो जाता है। सायंकाल इसका अध्ययन करनेवाला दिन में किये हुए पापों का नाश करता है, प्रातःकाल पाठ करनेवाला रात्रि में किये हुए पापों का नाश करता है। सायं और प्रातःकाल पाठ करने वाला निष्पाप हो जाता है। (सदा) सर्वत्र पाठ करनेवाले सभी विघ्नों से मुक्त हो जाता है एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करता है। यह अथर्वशीर्ष इसको नहीं देना चाहिये, जो शिष्य न हो। जो मोहवश अशिष्य को उपदेश देगा, वह महापापी होगा। इसकी १००० आवृत्ति करने से उपासक जो कामना करेगा, इसके द्वारा उसे सिद्ध कर लेगा। ॥ ११॥
जो इस मन्त्र के द्वारा श्रीगणपति का अभिषेक करता है, वह वाग्मी हो जाता है। जो चतुर्थी तिथि में उपवास कर जप करता है, वह विद्यावान् हो जाता है। यह अथर्वण-वाक्य है। जो ब्रह्मादि आवरण को जानता है, वह कभी भयभीत नहीं होता। ॥ १२॥
जो दुर्वांकुरों द्वारा यजन करता है, वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजा के द्वारा यजन करता है, वह यशस्वी होता है, वह मेधावान होता है। जो सहस्त्र मोदकों के द्वारा यजन करता है, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है। जो घृताक्त समिधा के द्वारा हवन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है। ॥ १३॥
जो आठ ब्राह्मणों को इस उपनिषद् का सम्यक ग्रहण करा देता है, वह सूर्य के समान तेज-सम्पन्न होता है। सूर्यग्रहण के समय महानदी में अथवा प्रतिमा के निकट इस उपनिषद् का जप करके साधक सिद्धमन्त्र हो जाता है। सम्पूर्ण महाविघ्नों से मुक्त हो जाता है। महापापों से मुक्त हो जाता है। महादोषों से मुक्त हो जाता है। वह सर्वविद् हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है-वह सर्वविद् हो जाता है। ॥ १४॥
.
(आज गुरु-प्रदत्त विधि से यथासंभव अधिक से अधिक उपासना करें)
कृपा शंकर
२२ अगस्त २०२०
.
पुनश्च: --- राजस्थान में बच्चों का एक गीत होता था ... "चथुड़ा चौथ भादुड़ों, कर दे माई लाडुड़ो" (पूरा गीत अब याद नहीं है), जिसे गाते-गाते सब बच्चे मिलकर किसी भी संबंधी या परिचित के घर चले जाते| जिस के भी घर जाते, वह बहुत प्रसन्न होता, और सब बच्चों को बड़े प्रेम से लड्डू खिलाकर और दक्षिणा देकर ही भेजता|

आसुरी जगत का प्रभाव हम पर कैसे होता है? ---

 

आसुरी जगत का प्रभाव हम पर कैसे होता है? ---
.
सूक्ष्म जगत की आसुरी और पैशाचिक शक्तियाँ निरंतर अपने शिकार ढूँढ़ती रहती हैं। जिसके भी चित्त में वासनाएँ होती हैं, उस व्यक्ति पर अपना अधिकार करके वे उसे अपना उपकरण बना लेती हैं, और उस से सारे गलत काम करवाती हैं। जितना हमारा गलत और वासनात्मक चिंतन होता है, उतना ही हम उन आसुरी शक्तियों को स्वयं पर अधिकार करने के लिए निमंत्रित करते हैं। भौतिक जगत पूर्ण रूप से सूक्ष्म जगत के अंतर्गत है। सूक्ष्म जगत की अच्छी या बुरी शक्तियाँ ही यहाँ अपना कार्य कर रही हैं। कई बार मनुष्य कोई जघन्य अपराध जैसे ह्त्या, बलात्कार या अन्य कोई दुष्कर्म कर बैठता है; फिर सोचता है कि उसके होते हुए भी यह सब कैसे हुआ, मैं तो ऐसा कर ही नहीं सकता था। पर उसे यह नहीं पता होता कि वह किन्हीं आसुरी शक्तियों का शिकार हो गया था जिन्होंने उस पर अधिकार कर के यह दुष्कर्म करवाया।
.
ईश्वर के मार्ग में ही नहीं, अन्य सभी क्षेत्रों में भी हमारी सभी बुराइयों की जड़ हमारे स्वयं का लोभ और अहंकार हैं। लोभ और अहंकार के कारण ही - काम, क्रोध, राग-द्वेष, प्रमाद, व दीर्घसूत्रता आदि जन्म लेते हैं। हमारा लोभ और अहंकार ही सूक्ष्म जगत की आसुरी शक्तियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। प्रेतबाधा एक वास्तविकता है। जिनका मन कमजोर होता है, उन्हें यह प्रेतबाधा अधिक होती है, लेकिन वास्तविक कारण अवचेतन मन में छिपा लोभ और अहंकार ही है।
.
अगर हम संसार में कोई अच्छा कार्य करना चाहते हैं तो उसका एक ही उपाय है कि परमात्मा को निरंतर स्वयं के भीतर प्रवाहित होने दें, उसके उपकरण बन जाएँ। परमात्मा का साथ ही शाश्वत है, अन्य सब नश्वर हैं। परमात्मा को निरंतर अपने चित्त में, अपने अस्तित्व में प्रवाहित होने दें, सब बातों का सार यही है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२१ अगस्त २०२१
.
पुनश्च :--
लोभ और अहंकार ही सबसे बड़ी हिंसा हैं। इनसे मुक्ति ही अहिंसा है, जो हमारा परमधर्म है।
पैशाचिक जगत भी हम पर हावी है। प्राणियों को तड़पा-तड़पा कर मारने से पिशाचों को तृप्ति मिलती है। ये पिशाच ही इतना खून-खराबा और हिंसा करवाते हैं। ये अपार यौन सुख व धन का लोभ देकर अपने शिकारों को अपने वश में रखते हैं। मनुष्य इन का सामना नहीं कर सकता। इनसे मुक्त होने के लिए उसे दैवीय सहायता लेनी ही पड़ती है।
पिशाचों के शिकार हुये मनुष्य नर-पिशाच बन जाते हैं, इसका एक उदाहरण - तालिबानी हिंसा है। इससे अधिक नहीं लिखना चाहता, क्योंकि मेरी बात कोई सुनेगा भी नहीं, पसंद भी नहीं करेगा, और मेरे अनेक शत्रु हो जाएँगे। इतना ही बहुत है। धन्यवाद॥

उन के प्रेम में एक बार मग्न होकर तो देखो, जीवन में आनंद ही आनंद होगा ---

 

सारी शाश्वत जिज्ञासाओं का समाधान, सभी प्रश्नों के उत्तर, पूर्ण संतुष्टि, पूर्ण आनंद और सभी समस्याओं का निवारण - सिर्फ और सिर्फ परमात्मा में है। अपनी चेतना को सदा भ्रूमध्य में रखो, और निरंतर परमात्मा का स्मरण करो। अपने हृदय का सम्पूर्ण प्रेम उन्हें दीजिये। पूरा मार्गदर्शन स्वयं परमात्मा करेंगे। हमारी एकमात्र समस्या ईश्वर की प्राप्ति है, अन्य कोई समस्या नहीं है। गीता में भगवान कहते हैं --
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् - अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥
.
बहुत अधिक लोगों की भीड़ से अधिक अच्छा तो दो-तीन लोगों का साथ है जो परमात्मा की चेतना में सदा रहते हों। दो लाख लोगों की भीड़ में बड़ी कठिनता से कोई एक व्यक्ति होता है जिसका साध्य परमात्मा हो। अधिकांश लोगों के लिए परमात्मा एक साधन मात्र है, साध्य तो संसार है। कोई अच्छा साथ न मिले तो परमात्मा के साथ अकेले रहना ही अधिक अच्छा है। जहाँ कोई अन्य नहीं है, वही तो "अनन्य योग" है। हमारी भक्ति कहीं व्यभिचारणी न हो।
.
महाभारत के अनुशासन पर्व में भगवान श्रीकृष्ण, महाराज युधिष्ठिर को तंडि ऋषि कृत "शिवसहस्त्रनाम" का उपदेश देते हैं, जो भगवान श्रीकृष्ण को उपमन्यु ऋषि से प्राप्त हुआ था। उसका १६६वां श्लोक है --
"एतद् देवेषु दुष्प्रापं मनुष्येषु न लभ्यते। निर्विघ्ना निश्चला रुद्रे भक्तिर्व्यभिचारिणी॥"
.
महाभारत के भीष्म पर्व में कुरुक्षेत्र की रण-भूमि में भगवान श्रीकृष्ण, अपने प्रिय शिष्य अर्जुन को जो भगवद्गीता का उपदेश देते हैं, उसके १३वें अध्याय का ११वां श्लोक है --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥"
इसे भगवान ने अनन्ययोग कहा है, जिसके लिए अव्यभिचारिणी भक्ति, एकान्तवास के स्वभाव, और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि का होना बताया है।
.
नदी का विलय जब महासागर में हो जाता है, तब नदी का कोई नाम-रूप नहीं रहता, सिर्फ महासागर ही महासागर रहता है। हमारी आयु अनंत है। हम यह देह नहीं, एक शाश्वत आत्मा, और परमात्मा का अंश हैं। यह सृष्टि परमात्मा की अभिव्यक्ति और उनकी लीला है। परमात्मा से परमप्रेम हो जाने पर वे स्वयं ही हमारा ध्यान करते हैं, और अपना बोध कराते हैं। उन के प्रेम में एक बार मग्न होकर तो देखो। जीवन में आनंद ही आनंद होगा
ॐ तत्सत् !!
२१ अगस्त २०२०