Sunday, 20 January 2019

ब्रिटेन की समृद्धि के पीछे का सच जो हम से छिपाया गया है .....

ब्रिटेन की समृद्धि के पीछे का सच जो हम से छिपाया गया है .....
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वैसे तो यूरोप की सारी समृद्धि अन्य महाद्वीपों को लूट कर प्राप्त हुए धन से ही हुई है, पर ब्रिटेन की सारी समृद्धि तो भारत को लूट कर मिले हुए धन से ही हुई है| हम लोग अपनी हीनभावना के कारण अंग्रेजों को महान समझते हैं और ब्रिटेन में जाना अपनी शान समझते हैं, पर इस ऐतिहासिक तथ्य को नहीं भूलना चाहिए कि सत्रहवीं शताब्दी तक समूचा ब्रिटेन अर्धसभ्य लोगों का उजाड़ देश था जो झोंपड़ियों में रहते थे| उनकी झोपड़ियाँ घासफूस और सरकंडों की बनी होती थीं, जिनके ऊपर मिट्टी का गारा लगाया हुआ होता था| घास-फूस जलाकर घर में आग तैयार की जाती थी जिससे सारी झोपड़ी में धुआँ भर जाता था| उनकी खुराक जौ, मटर, उड़द, कन्द और वृक्षों की छाल तथा मांस थी| उनके कपड़ों में जुएँ भरी होती थीं|
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वहां की जनसंख्या बहुत कम थी, जो महामारी और दरिद्रता के कारण आए दिन घटती जाती थी| शहरों की हालत गाँवों से कुछ अच्छी न थी| शहर वालों का बिछौना भूस से भरा एक थैला होता था| तकिये की जगह लकड़ी का एक गोल टुकड़ा लगाते थे| शहरी लोग जो खुशहाल होते थे, चमड़े का कोट पहनते थे| गरीब लोग हाथ-पैरों पर पुआल लपेट कर सर्दी से जान बचाते थे| न कोई कारखाना था, न कारीगर, न सफाई का इन्तजाम, न रोगी होने पर चिकित्सा की व्यवस्था|
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सड़कों पर डाकू फिरते थे और नदियाँ तथा समुद्री मुहाने समुद्री डाकुओं से भरे रहते थे| उन दिनों दुराचार का तमाम यूरोप में बोलबाला और यौन संक्रमित करने वाली गनोरिया व सिफलिस की बीमारी सामान्य बात थी| विवाहित या अविवाहित, गृहस्थ, पादरी, और यहाँ तक कि पोप दसवें लुई तक भी इस रोग से नहीं बचे थे| पादरियों ने इंग्लैंड की लाखों स्त्रियों को भ्रष्ट किया था| कोई भी पादरी बड़े से बड़ा अपराध करने पर भी केवल थोड़े से जुर्माने की सज़ा पाता था| मनुष्य-हत्या करने पर भी केवल छः शिलिंग आठ पैंस .... लगभग पाँच रुपया जुर्माना देना पड़ता था| ढोंग-पाखण्ड और जादू-टोना पादरियों का व्यवसाय था।
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सत्रहवीं शताब्दी के अंतिम चरण तक लंदन नगर इतना गंदा था और वहाँ के मकान इस कदर भद्दे थे कि उसे मुश्किल से शहर कहा जा सकता था| सड़कों की हालत ऐसी थी कि पहियेदार गाड़ियों का चलना खतरे से खाली न था| लोग गधों, घोड़ों व टट्टुओं पर लद कर यात्राएँ करते थे| अधनंगी स्त्रियां जंगली और भद्दे गीत गाती फिरती थीं, पुरुष कटार घुमा-घुमाकर लड़ाई के नाच नाचा करते थे| लिखना-पढ़ना बहुत कम लोग जानते थे, यहाँ तक कि बहुत-से लार्ड अपने हस्ताक्षर भी नहीं कर सकते थे| प्रायः पति कोड़ों से अपनी स्त्रियों को पीटा करते थे|
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अपराधी को टिकटिकी से बाँधकर पत्थर मार-मारकर मार डाला जाता था| औरतों की टाँगों को सरेबाजार शिकंजों में कसकर तोड़ दिया जाता था| शाम होने के बाद लंदन की गलियाँ सूनी, डरावनी और अंधेरी हो जाती थीं| उस समय कोई जीवट का आदमी ही घर से बाहर निकलने का साहस कर सकता था| हर समय वहाँ लुट जाने या गला कट जाने का भय था| असभ्य औरतें खिड़की खोल कर गन्दा पानी हर किसी पर फेंक देती थीं| गलियों में लालटेन थीं ही नहीं| लोगों को भयभीत करने के लिए टेम्स के पुराने पुल पर अपराधियों के सिर काट कर लटका दिए जाते थे| धार्मिक स्वतन्त्रता न थी| सम्राट के सम्प्रदाय से भिन्न दूसरे किसी सम्प्रदाय के गिरजाघर में जाकर उपदेश सुनने की सजा मौत थी| ऐसे अपराधियों के घुटने को शिकंजे में कसकर तोड़ दिया जाता था| स्त्रियों को दंड देने के लिए सहतीरों में बाँधकर समुद्र के किनारे पर मरने के लिए छोड़ देते थे ताकि धीरे-धीरे बढ़ती हुई समुद्र की लहरें उन्हें निगल जाएँ| बहुधा उनके गालों को लाल लोहे से दागदार अमेरिका निर्वासित कर दिया जाता था| उन दिनों इंग्लैंड की रानी गुलामों के व्यापर में अपने लाभ का भाग लेती थी।
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इंग्लैंड के किसान की अवस्था उस ऊदबिलाव के समान थी जो नदी किनारे मांद बनाकर रहता हो| कोई ऐसा धंधा-रोजगार न था कि जिससे वर्षा न होने की सूरत में किसान दुष्काल से बच सकें| उस समय समूचे इंग्लैंड की जनसंख्या पचास लाख से अधिक न थी| जंगली जानवर हर जगह फिरते थे| सड़कों की हालत बहुत खराब थी| बरसात में तो सब रास्ते ही बन्द हो जाते थे| देहात में प्रायः लोग रास्ता भूल जाते थे और रात-रात भर ठण्डी हवा में ठिठुरते फिरते थे| दुराचार का बोलबाला था| राजनीतिक और धार्मिक अपराधों पर भयानक अमानुषिक सजाएं दी जाती थीं|
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यह दशा केवल ब्रिटेन की ही न थी, समूचे यूरोप की थी| यूरोप के सब देशों के निरंकुश राजा स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि बताते थे| उन की इच्छा ही कानून थी| जनता की दो श्रेणियाँ थीं| जो कुलीन थे वे ऊँचे समझे जाते थे और जो जन्म से नीच थे वे दलित माने जाते थे| ऐसा एक भी राजा न था जो प्रजा के सुख-दुख से सहानुभूति रखता हो| विलासिता और अपनी शान ही में वे मस्त रहते थे| वे अपनी सब प्रजा के जानोमाल के स्वामी थे| राजा होना उनका जन्मसिद्ध अधिकार था| उनकी प्रजा को बिना सोचे-समझे उनकी आज्ञा का पालन करना पड़ता था|
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अब आप समझ गए होंगे कि हमारे ऊपर राज्य कर के हमें दरिद्र बना कर गए हुए अँगरेज़ कैसे थे| हमारे भारत के ही एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री ने तो इंग्लैंड को भारत पर राज्य करने के लिए धन्यवाद भी दिया था| उन्होंने कहा था कि अंग्रेजों ने भारत पर राज्य कर के भारत को सभ्य बनाया, भारत को पोस्ट ऑफिस और रेलवे दी| उनको इंग्लैंड के एक विश्वविद्यालय (जो भारत में लुटे हुए धन से बना था) ने डॉक्टरेट की उपाधी भी दी थी| वे बड़े शान से अपने नाम के साथ डॉक्टर की उपाधी लिखते थे| ऐसे ही भारत के एक भूतपूर्व गृहमंत्री और वित्तमंत्री ने भी इंग्लैंड में अपने एक भाषण में भारत की सभ्यता का श्रेय ब्रिटिश शासन को दिया था| मुझे भारत के ही कई तथाकथित बुद्धिजीवियों ने ही बताया था कि यदि अँगरेज़ भारत में नहीं आते तो हम भारतीय लोग झाड़ियों व गुफाओं में ही रह रहे होते| अँगरेज़ लोग जाते जाते अपना शासन अपने ही मानसपुत्र एक काले अंग्रेज़ को सौंप गए थे जिसने भारत की अस्मिता को नष्ट ही किया| धन्य है वे सब लोग !!!
सही बातों का पता सब को होना चाहिए| भारत का तो इतिहास ही भारत के शत्रुओं ने लिखा है|
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हमारी तो पं.रामप्रसाद बिस्मिल के शब्दों में एक ही कामना है कि ..... 
"तेरा गौरव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें|" भारत माता की जय! वन्दे मातरम् !

भारतभूमि सदा अज्ञान में नहीं रह सकती .....

भारतभूमि सदा अज्ञान में नहीं रह सकती, यह परमात्मा की भूमि है जहाँ भगवान स्वयं अनेक बार अवतृत हुए हैं| ब्रह्माजी ने यहीं इसी भूमि पर अपने ज्येष्ठ पुत्र ऋषि अथर्व को और भगवान सनत्कुमार ने अपने प्रिय शिष्य देवर्षि नारद को ब्रह्मज्ञान दिया| इसी भूमि पर ऋषि याज्ञवल्क्य ने राजा जनक को, और भगवान कपिल ने अपनी माता देवाहुति को उपदेश दिए| इसी भूमी पर रणक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय शिष्य अर्जुन को गीता के उपदेश दिए| यह त्यागी तपस्वी, योगियों, भक्तों और वीरों की भूमि है| कालखंड में कुछ समय के लिए यहाँ तिमिर छा जाता है, पर फिर ज्ञान का सूर्योदय होने लगता है| अब ज्ञान का सूर्योदय होने लगा है जो सारे तिमिर को दूर कर देगा| बुरा समय निकल चुका है| 
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हारिये न हिम्मत, बिसारिये न हरिनाम ! जीवन के केंद्र में परमात्मा को रखिये| जो भी होगा वह अच्छा ही होगा| ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय||
कृपा शंकर
२७ दिसंबर २०१८

अंत मति सो गति .....

(संशोधित व पुनर्प्रेषित लेख). अंत मति सो गति .....
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गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि अंतकाल में भ्रूमध्य में ओंकार का स्मरण करो, निज चेतना को कूटस्थ में रखो,आदि| संत-महात्मा भी कहते हैं कि मूर्धा में ओंकार का निरंतर जप करो| योगी लोग कहते हैं कि आज्ञाचक्र से भी ऊपर उत्तरा-सुषुम्ना के प्रति सजग रहो और ब्रह्मरंध्र में ओंकार का ध्यानपूर्वक जप करो| सभी कहते हैं कि परमात्मा से परम प्रेम करो| मुझे लगता है कि स्वाभाविक रूप से जब मनुष्य अपनी देह छोड़ता है उस से पूर्व ही कर्मफलानुसार यह तय हो जाता है कि उसका अगला जन्म कब और कहाँ होगा| सूक्ष्म लोक अनंत हैं, पर मुझे लगता है कि स्वर्ग और नर्क कोई स्थान नहीं बल्कि प्राण जगत की सुखदायी या दुखदायी अवस्थाएँ हैं जिनमें से जीवात्माओं को निकलना ही पड़ता है|
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सार की बात यह है कि अंत समय में जैसी मति होती है वैसी ही गति होती है| महात्माओं ने बताया है कि इस देह में ग्यारह छिद्र हैं जिनसे जीवात्मा का मृत्यु के समय निकास होता है ..... दो आँख, दो कान, दो नाक, एक पायु, एक उपस्थ, एक नाभि, एक मुख और एक मूर्धा|
१.यह मूर्धा वाला मार्ग अति सूक्ष्म है और पुण्यात्माओं के लिए ही है|
२.नरकगामी जीव पायु यानि गुदामार्ग से बाहर निकलता है|
३.कामुक व्यक्ति मुत्रेंद्रियों से निकलता है और निकृष्ट योनियों में जाता है|
४.नाभि से निकलने वाला प्रेत बनता है|
५. भोजन लोलूप व्यक्ति मुँह से निकलता है,
६. गंध प्रेमी नाक से,
७. संगीत प्रेमी कान से, और
८. तपस्वी व्यक्ति आँख से निकलता है|
अंत समय में जहाँ जिसकी चेतना है वह उसी मार्ग से निकलता है और सब की अपनी अपनी गतियाँ हैं| कोई बात मैनें यहाँ नहीं लिखी है तो मुझे उसका बोध नहीं है| ये ज्ञान की बातें ऋषि याज्ञवल्क्य और राजा जनक के संवादों में मिल जायेंगी|
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जो ब्राह्मण संकल्प कर के और दक्षिणा लेकर भी यज्ञादि अनुष्ठान विधिपूर्वक नहीं करते/कराते वे ब्रह्मराक्षस बनते हैं| मद्य, मांस और परस्त्री का भोग करने वाला ब्राह्मण ब्रह्मपिशाच बनता है| इस तरह की कर्मों के अनुसार अनेक गतियाँ हैं| कर्मों का फल सभी को मिलता है, कोई इससे बच नहीं सकता|
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सबसे बुद्धिमानी का कार्य है परमात्मा से परम प्रेम, निरंतर स्मरण का अभ्यास और ध्यान | सभी को शुभ कामनाएँ | ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ दिसंबर २०१८
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पुनश्चः :---- मैं उन सभी संत-महात्माओं को नमन करता हूँ जिनके अनुग्रह और आशीर्वाद से मेरे हृदय में परमात्मा के प्रति प्रेम जगा है|

परमात्मा ही सत्य है .....

चारों ओर असत्य और अन्धकार की शक्तियों का वर्चस्व है, पर साथ साथ सत्य और देवत्व की भी शक्तियाँ हैं| परमात्मा ही सत्य है| हम यह देह नहीं, परमात्मा की अनंतता व परमप्रेम हैं| हम सृष्टि का भाग नहीं, सृष्टि हमारा भाग है|
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किसी व्यक्ति पर यदि भूत चढ़ जाए तो आवश्यकता उस भूत को उतारने की है, न कि उस व्यक्ति को प्रताड़ित करने की| वह व्यक्ति तो एक victim यानी शिकार मात्र है| वह भूत कोई विचारधारा भी हो सकती है जो हमारे हर कार्य को विकृत कर देती है| कहीं हम असत्य और अन्धकार की शक्तियों के उपकरण तो नहीं बन गए हैं, इस पर भी विचार करते रहें| हम परमात्मा के ही उपकरण बनें|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !
कृपा शंकर
२७ दिसंबर २०१८

अंडमान के तीन द्वीपों का नाम परिवर्तन .....

भारत सरकार द्वारा अंडमान-निकोबार के तीन लोकप्रिय द्वीपों के नाम बदलने का मैं स्वागत करता हूँ| यहाँ के हेवलॉक, नील और रोज द्वीपों के नामों पर मुझे सदा ही आपत्ति रही है| ये नाम उन राक्षस अँगरेज़ सेना नायकों के सम्मान में रखे गए थे जिन्होनें सन १८५७ में भारत के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम को निर्दयता से कुचला और करोड़ों भारतीयों का नरसंहार किया| इन राक्षसों ने १८५७ के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम का बदला लेने के लिए व्यापक नर-संहार किया था जो विश्व इतिहास में सबसे बड़ा था| एक करोड से अधिक निर्दोष भारतीयों की पेड़ों से लटका कर हत्याएँ की गयी थीं| दो माह के भीतर भीतर इतना बड़ा नर-संहार विश्व इतिहास में कहीं भी नहीं हुआ है|
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(१) हेवलॉक द्वीप का नाम अँगरेज़ General Sir Henry Havelock के सम्मान में रखा गया था जिनके नेतृत्व में अँगरेज़ सेना ने झाँसी की रानी को भागने को बाध्य किया और उनकी ह्त्या की| इस राक्षस ने झांसी के आसपास के क्षेत्रों में लाखों भारतीयों की हत्याएँ करवाई थीं|
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(२) रोज द्वीप का नाम अँगरेज़ Field Marshal Henry Hugh Rose के सम्मान में रखा गया था जो १८५७ के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम को कुचलने का जिम्मेदार था| इस राक्षस ने कानपुर की ३ लाख की जनसंख्या में से लगभग दो लाख सत्तर हज़ार नागरिकों की ह्त्या कर कानपुर नगर को श्मसान बना दिया था| यह एक नर-पिशाच और भयानक हत्यारा था| कानपुर के पास के एक गाँव कालपी की तो पूरी आबादी को ही क़त्ल कर दिया गया| वहाँ तो किसी पशु-पक्षी को भी जीवित नहीं छोड़ा गया|
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(३) नील द्वीप का नाम अँगरेज़ सेनाधिकारी General James George Smith Neill के सम्मान में रखा गया था जिसने भी लाखों भारतीयों की निर्मम हत्याएँ की| बिहार में कुंवर सिंह के क्षेत्र में आरा और गंगा नदी के बीच के एक गाँव में इस राक्षस ने वहाँ के सभी ३५०० लोगों की हत्याएँ की| फिर बनारस के निकट के एक गाँव में जाकर वहाँ के सभी ५५०० लोगों की हत्याएँ करवाई| यह जहाँ भी जाता, गाँव के सभी लोगों को एकत्र कर उन्हें गोलियों से भुनवा देता|
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उपरोक्त तीनों अँगरेज़ सेनाधिकारियों में से हरेक ने अपनी सेवा काल में कम से कम बीस बीस लाख भारतीयों की हत्याएँ की, इसलिए इनके नाम पर उपरोक्त द्वीपों के नाम रख कर इन्हें सम्मानित किया गया था|
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अब तक किसी भी सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया| अब केंद्र सरकार अंडमान और निकोबार के तीन लोकप्रिय द्वीपों .... रोज द्वीप, नील द्वीप और हैवलॉक द्वीप के नाम बदलने जा रही है| यह कदम स्वागत योग्य है| रोज द्वीप का नाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप, नील द्वीप का नाम शहीद द्वीप और हैवलॉक द्वीप का नाम स्‍वराज द्वीप रखने का फैसला किया गया है|
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नेताजी सुभाषचंद्र बोस को मैं भारत का प्रथम प्रधानमंत्री मानता हूँ| ३० दिसंबर १९४३ को नेताजी ने पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान में राष्ट्रीय ध्वज फहराया था और भारत की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी| अनेक देशों ने उनकी सरकार को मान्यता भी दे दी थी| पर द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की पराजय के कारण उन्हें भारत छोड़कर ताईवान और मंचूरिया होते हुए रूस भागना पडा जहाँ उन की ह्त्या कर दी गयी| उन की ह्त्या के पीछे स्वतंत्र हो चुके भारत की सरकार की भी सहमति थी| ताईवान में वायुयान दुर्घटना में उनकी मृत्यु की झूठी कहानी रची गयी| आज़ाद हिन्द फौज का खजाना जवाहार लाल नेहरू ने अपने अधिकार में ले लिया था| वह कहाँ गया उसे वे ही जानें|
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इंडोनेशिया में हनुमान जी को हन्डूमान कहते हैं| कुछ लोग कहते हैं कि अंडमान का नाम हन्डूमान से पड़ा|
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(अंडमान-निकोबार के कई द्वीपों में मुझे जाने का खूब अवसर मिला है जहाँ बिना विशेष सरकारी अनुमति के कोई जा ही नहीं सकता| वहाँ खूब घूमा हूँ अतः वहाँ के बारे में काफी जानकारी है)
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !
कृपा शंकर
२६ दिसंबर २०१८

सांता क्लॉज़ बनने की अपसंस्कृति और सांताक्लॉज़ की वास्तविकता .....

सांता क्लॉज़ बनने की अपसंस्कृति और सांताक्लॉज़ की वास्तविकता .....
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अभी कुछ देर पूर्व एक चित्र देखा जिसमें भगवान् श्रीकृष्ण और राधा जी को किसी ने सांता क्लॉज़ की ड्रेस पहना रखी थी, जिससे मुझे बहुत हँसी आई और ये पंक्तियाँ लिखने को मैं बाध्य हुआ| इसे मैं सांस्कृतिक पतन ही कहूंगा| भारत के अधिकाँश निजी विद्यालयों में बच्चों को सांता क्लॉज़ की ड्रेस पहनाई गयी, टॉफियाँ बाँटी गयी और भाषण दिया गया कि हमें ईसा मसीह के आदर्शों पर चलना चाहिए| अनेक लोगों ने बीयर या स्कॉच पी कर सपरिवार डांस भी किया, पार्टी भी की और एक दूसरे को खूब बधाइयाँ भी दीं| चलो सब खुश रहो!
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सबसे पहिले तो यह बताना कहूंगा कि पूरे विश्व में सांता क्लॉज़ के नाम पर जो नाटकबाजी हो रही है यह एक विशुद्ध बाजारवाद और मनोरंजन मात्र है| वास्तविकता यह है कि सांता क्लॉज़ नाम का चरित्र कभी इतिहास में जन्मा ही नहीं| यह ईसा की चौथी शताब्दी में सैंट निकोलस नाम के एक ग्रीक पादरी के दिमाग की कल्पना थी| ठण्ड से पीड़ित स्केंडेनेवियन देशों (नोर्वे, स्वीडन और डेनमार्क) व अन्य ठन्डे ईसाई देशों के पादरियों ने ठण्ड से पीड़ित अपने देशों के बच्चों के मन को बहलाने के लिए सांता क्लॉज़ की कल्पना को खूब लोकप्रिय बनाया|
बच्चों के मनोरंजन के लिए जैसे सुपरमैन, बैटमैन, स्पाइडरमैन, ग्रीन लैंटर्न, हल्क, डोनाल्ड डक, मिक्की माउस इत्यादि अनेकों कार्टून चरित्रों की कल्पना की गयी है वैसे ही संता क्लॉज़ भी एक काल्पनिक चरित्र है|

जीसस क्राइस्ट का जन्मदिवस २५ दिसम्बर को ही क्यों मनाया जाता है ?

एक बड़ी विचित्र बात है कि जीसस क्राइस्ट का जन्मदिवस २५ दिसम्बर को ही क्यों मनाया जाता है ?
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उपलब्ध प्रमाणों द्वारा पता चलता है कि जीसस क्राइस्ट का जन्म दिन ईसा की तीसरी शताब्दी में रोमन सम्राट कोंस्टेंटाइन द ग्रेट ने तय किया था| उसी को प्रमाण माना जाता है| यह सम्राट स्वयं ईसाई नहीं था, पर इसने ईसाईयत का उपयोग अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए किया| स्वयं यह एक सूर्य उपासक था| जब यह मरने वाला और असहाय था तब पादरियों ने जबरदस्ती इसका बप्तिस्मा कर के इसे ईसाई बना दिया| इसी सम्राट ने ११ मई ३३० ई.को कुस्तुन्तुनिया (Constantinople) (वर्तमान में इस्ताम्बूल) को अपनी राजधानी बनाया| वर्तमान में ईसाईयत की जो दिशा है वह इसी सम्राट ने तय की थी| यहाँ तक कि वर्तमान में उपलब्ध न्यू टेस्टामेंट के सारे ग्रन्थ भी इसी ने संशोधित करवाए और जो इसे अच्छे नहीं लगे वे नष्ट करवा दिए| रविवार को छुट्टी भी इसी ने शुरू करवाई क्योंकि यह एक सूर्योपासक था| अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए इसने ईसाईयत का प्रचार-प्रसार चारों ओर आरम्भ कराया|
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कुस्तुन्तुनिया रोमन/बैज़ेन्टाइन साम्राज्य (३३०-१२०४ व १२६१-१४५३ ई.) का भाग रही| बीच में इस पर १२०४-१२६१ ई.तक लेटिन साम्राज्य का अधिकार रहा| कुस्तुन्तुनिया ईसा की पांचवीं से तेरहवीं सदी तक यूरोप का सर्वाधिक समृद्ध और भव्यतम नगर था| यहाँ का ग्रीक ऑर्थोडॉक्स कैथेड्रल हागिया सोफिया वेटिकन के बाद ईसाई मज़हब का दूसरा सबसे बड़ा केंद्र था| यहाँ के एक पुस्तकालय में प्राचीन ग्रंथों की एक लाख से अधिक पांडुलिपियाँ थीं जिसे बाद में तुर्कों ने जला दिया| आरम्भ में यहीं से ईसाई मज़हब का पूरी दुनियाँ में फैलाव हुआ था|
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सन १४५३ ई.में तुर्की की सल्तनत-ए-उस्मानिया (Ottoman Empire) के सुल्तान महमूद ने एक युद्ध में अपनी उस्मानी फौज द्वारा ईसाइयों को हराकर कुस्तुन्तुनियाँ पर अपना अधिकार कर लिया और अगले लगभग पाँच सौ वर्षों तक यानि सन १९२३ ई.तक यह तुर्की की राजधानी रही| सुल्तान महमूद ने हागिया सोफिया कैथेड्रल को छोड़ कर लगभग सारे नगर को नष्ट कर दिया जो यूरोपीय स्थापत्य कला का भव्यतम रूप था| यह नगर तुर्कों ने दुबारा बसाया| तुर्की की उस्मानी फौज ने वहाँ से सारे ईसाइयों को मार कर भगा दिया, जो भी पुरुष मिला उसे क़त्ल कर दिया गया, सभी महिलाओं को गुलाम बंदी बना लिया गया और जो भी कोई जीवित बचे उन्हें मुसलमान बना दिया गया| हागिया सोफिया को एक शाही मस्जिद में बदल दिया गया था पर कालान्तर में अतातुर्क मुस्तफा कमाल पाशा ने इसे बापस ईसाइयों को सौंप दिया था| अब तो वहाँ एक म्यूजियम है| यहाँ एक बात यह भी बताना चाहता हूँ कि सल्तनत-ए-उस्मानिया अपने चरम काल में विश्व की सबसे बड़ी सल्तनत थी और वहाँ के सुल्तान बड़े शक्तिशाली थे जिनसे पूरा यूरोप डरता था| पर प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की पराजित हुआ और सारी उस्मानी सल्तनत (Ottoman Empire) बिखर गयी|
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बास्फोरस जलडमरूमध्य और निकट के दर्रा-दानियल के कारण इस्ताम्बूल भौगोलिक सृष्टि से विश्व का बहुत ही अधिक महत्वपूर्ण स्थान है|
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(Note: मुझे १९७६ में तुर्की में इस्तांबूल जाने का एक बार अवसर मिला था पर भाषा की समस्या रही| वहाँ के एक अधिकारी से मित्रता हो गयी थी, उसी ने वहाँ घुमाया| उसे भी पूरी अंग्रेजी नहीं आती थी| फिर एक कैफ़े का मालिक मिला जो बहुत अच्छी अंग्रेजी जानता था| उसी से वहाँ के बारे में काफी कुछ जानने को मिला| १९८८ में फिर तुर्की जाने का अवसर मिला था पर कोई विशेष बात वहाँ नहीं लगी)
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पुनश्चः ----- (बाद में जोड़ा हुआ भाग) :---
यीशु के जन्म का कोई प्रमाण कभी भी नहीं मिला| अब पश्चिमी जगत के कुछ इतिहासकार भी यह दावा कर रहे हैं कि जीसस क्राइस्ट नाम का कोई व्यक्ति कभी हुआ ही नहीं था| उनके अनुसार सैंट पॉल द्वारा रचित वे एक काल्पनिक चरित्र हैं| पर २५ दिसंबर का दिन उनके जन्मदिवस के रूप में रोमन सम्राट कोंस्टेंटाइन द ग्रेट ने ही तय किया था|
जीसस क्राइस्ट भौतिक रूप से कभी हुए या नहीं इससे मुझे कोई मतलब नहीं है| मेरा सम्बन्ध सिर्फ कृष्ण-चैतन्य यानी कूटस्थ चैतन्य से है जो जीसस में भी थी और जो सदा मेरे साथ भी है| जीसस में और मुझ में मैं कोई भेद नहीं पाता, जो वे थे वह ही मैं हूँ|
यूरोप के ही कई इतिहासकार अब यह दावा भी करते हैं कि जीसस क्राइस्ट ने मार्था से विवाह भी किया था और सारा नाम की एक पुत्री भी उन्हें हुई थी| मार्था की कब्र एक गुप्त स्थान पर फ़्रांस में थी, जिस की कई शताब्दियों तक एक सम्प्रदाय ने रक्षा की| उस सम्प्रदाय के लोगों को बाद में वेटिकन ने मरवा दिया और उस कब्र को नष्ट कर दिया गया| कुछ इतिहासकारों के अनुसार अपने पुनरोत्थान के बाद जीसस जब बापस भारत जा रहे थे तब उनके भक्त यहूदियों ने मार्था और सारा को फिलिस्तीन से निकाल कर बड़े गोपनीय तरीके से फ्रांस भिजवा दिया|
जीसस क्राइस्ट हुए थे और उनकी कब्र अभी भी कश्मीर के पहलगाम में है| उन की कब्र वहीं हैं जहाँ हज़रत मूसा की कब्र है| दोनों की कब्रें पास पास हैं| उनकी फोटो मैनें देखी है| जीसस की माता मेरी की कब्र पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मरी नामक स्थान पर है| उसकी फोटो मैनें देखी है|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !
कृपा शंकर
२५ दिसंबर २०१८
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पुनश्चः :--- ईस्वी कैलेंडर कई बार संपादित हुआ है।यह सब इतिहास में दर्ज है।अतः उसमें कई तारीखों में अंतर आ गया है।