मेरे विचार से सभी हिन्दुओं के लिए एक सर्वमान्य अविवादित मूलभूत साधना
पद्धति ..... (१) सूर्य नमस्कार व्यायाम, (२) अनुलोम-विलोम प्राणायाम, (३)
भगवान के अपने प्रियतम रूप का जप, ध्यान और भजन-कीर्तन ही हो सकती है| इसका
अंतिम निर्णय तो सभी धर्माचार्य आपस में मिल कर करें| जैसे एक सामान्य
नागरिक संहिता की बात कही जाती है, वैसे ही एक सामान्य मूलभूत साधना पद्धति
भी सभी हिन्दुओं की होनी चाहिए|
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मैनें व्यवहारिक रूप से देखा है कि धर्म-शिक्षण के अभाव और आज के भागदौड़ के जीवन में विधिवत संध्या
कर पाना असंभव है| अधिकाँश ब्राह्मणों को ही संध्या विधि का ज्ञान नहीं
है| अंग्रेजी शिक्षा के कारण संस्कृत का शुद्ध उच्चारण और मन्त्र पढ़ना
ब्राह्मण ही भूल रहे हैं| जो संध्या कर सकते हैं उन्हें संध्या करनी चाहिए|
संधिक्षणों में की हुई साधना संध्या कहलाती है| चार सन्धिक्षण आते हैं ...
प्रातः, सायं, मध्याह्म और मध्यरात्री| पर सबसे महत्वपूर्ण सन्धिक्षण है
.... दो साँसों के मध्य का समय|
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जो लोग गुरूकुलों में पढ़े हैं
उन्हें ही संस्कृत का सही उच्चारण आता है| बड़े बड़े पंडित भी अपने बच्चों को
अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में पढ़ाते हैं जहाँ उन्हें कोई भारतीय
संस्कार नहीं मिलते| वे पंडित भी अपने बालकों को संध्यादि कर्म नहीं
सिखाते, यह हमारा दुर्भाग्य ही है| रही बात गुरुकुलों की तो दो ही तरह के
बच्चे गुरुकुलों में भेजे जाते हैं ..... या तो जिनके माँ-बाप अत्यंत गरीब
होते हैं, या किसी कारण से बच्चे अन्य विद्यालयों में पढ़ नहीं पाते| यह बात
मैं व्यवहारिक रूप से कुछ गुरुकुलों को देख कर ही कह रहा हूँ| जो भी
वर्तमान परिस्थिति में सर्वश्रेष्ठ है वह हमें करना चाहिए| अंतिम निर्णय तो
धर्माचार्य ही करेंगे| कुम्भ के मेलों में सभी धर्माचार्यों को एक मंच पर
आसीन होकर धर्म रक्षा के लिए विचार विमर्श करना चाहिए और एकमत से धर्मादेश
देने चाहिएँ| साभार धन्यवाद !
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पुनश्चः : --- भारत में जितने भी
मत-मतान्तरों और पंथों का जन्म हुआ है, उनमें ये तथ्य सर्वमान्य हैं .....
(१) आत्मा की शाश्वतता, (२) पुनर्जन्म, (३) कर्म फलों का सिद्धांत, (४)
हठयोग के आसन, प्राणायाम आदि और (५) जप, कीर्तन और ध्यान| एक सामान्य
मूलभूत साधना पद्धति भी सभी हिन्दुओं की होनी ही चाहिए|