Saturday, 29 September 2018

हिन्दुओं में एक सर्वमान्य मूलभूत साधना पद्धति हो .....

मेरे विचार से सभी हिन्दुओं के लिए एक सर्वमान्य अविवादित मूलभूत साधना पद्धति ..... (१) सूर्य नमस्कार व्यायाम, (२) अनुलोम-विलोम प्राणायाम, (३) भगवान के अपने प्रियतम रूप का जप, ध्यान और भजन-कीर्तन ही हो सकती है| इसका अंतिम निर्णय तो सभी धर्माचार्य आपस में मिल कर करें| जैसे एक सामान्य नागरिक संहिता की बात कही जाती है, वैसे ही एक सामान्य मूलभूत साधना पद्धति भी सभी हिन्दुओं की होनी चाहिए|
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मैनें व्यवहारिक रूप से देखा है कि धर्म-शिक्षण के अभाव और आज के भागदौड़ के जीवन में विधिवत संध्या कर पाना असंभव है| अधिकाँश ब्राह्मणों को ही संध्या विधि का ज्ञान नहीं है| अंग्रेजी शिक्षा के कारण संस्कृत का शुद्ध उच्चारण और मन्त्र पढ़ना ब्राह्मण ही भूल रहे हैं| जो संध्या कर सकते हैं उन्हें संध्या करनी चाहिए| संधिक्षणों में की हुई साधना संध्या कहलाती है| चार सन्धिक्षण आते हैं ... प्रातः, सायं, मध्याह्म और मध्यरात्री| पर सबसे महत्वपूर्ण सन्धिक्षण है .... दो साँसों के मध्य का समय|
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जो लोग गुरूकुलों में पढ़े हैं उन्हें ही संस्कृत का सही उच्चारण आता है| बड़े बड़े पंडित भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में पढ़ाते हैं जहाँ उन्हें कोई भारतीय संस्कार नहीं मिलते| वे पंडित भी अपने बालकों को संध्यादि कर्म नहीं सिखाते, यह हमारा दुर्भाग्य ही है| रही बात गुरुकुलों की तो दो ही तरह के बच्चे गुरुकुलों में भेजे जाते हैं ..... या तो जिनके माँ-बाप अत्यंत गरीब होते हैं, या किसी कारण से बच्चे अन्य विद्यालयों में पढ़ नहीं पाते| यह बात मैं व्यवहारिक रूप से कुछ गुरुकुलों को देख कर ही कह रहा हूँ| जो भी वर्तमान परिस्थिति में सर्वश्रेष्ठ है वह हमें करना चाहिए| अंतिम निर्णय तो धर्माचार्य ही करेंगे| कुम्भ के मेलों में सभी धर्माचार्यों को एक मंच पर आसीन होकर धर्म रक्षा के लिए विचार विमर्श करना चाहिए और एकमत से धर्मादेश देने चाहिएँ| साभार धन्यवाद !
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पुनश्चः : --- भारत में जितने भी मत-मतान्तरों और पंथों का जन्म हुआ है, उनमें ये तथ्य सर्वमान्य हैं ..... (१) आत्मा की शाश्वतता, (२) पुनर्जन्म, (३) कर्म फलों का सिद्धांत, (४) हठयोग के आसन, प्राणायाम आदि और (५) जप, कीर्तन और ध्यान| एक सामान्य मूलभूत साधना पद्धति भी सभी हिन्दुओं की होनी ही चाहिए|

श्राद्ध के बारे में यह मेरा एक निजी विचार है .....

श्राद्ध के बारे में यह मेरा एक निजी विचार है .....
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सिद्ध गुरु द्वारा प्रदत्त विधि से बीजमंत्रों का प्रयोग करते हुए निज चेतना और चंचल प्राण को बार बार मूलाधार चक्र से उठाकर सुषुम्ना मार्ग से होते हुए आज्ञाचक्र का भेदन कर उत्तरा सुषुम्ना में ज्योतिर्मय ब्रह्म परमात्मा को अर्पित करना भी पिण्डदान और तर्पण है| उत्तरा सुषुम्ना में ध्यान करने से प्राण तत्व की चंचलता धीरे धीरे कम होने लगती है और मन नियंत्रित होने लगता है जिससे दारुण दुःखदायी काम, क्रोध व लोभ आदि का शमन होने लगता है|
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लौकिक श्राद्ध तो करें ही पर वास्तविक संतुष्टि तो आत्मतत्व पर ध्यान से ही मिलती है| आत्मतत्व में स्थिति ही मेरी सीमित समझ से परमात्मा का साक्षात्कार है| यह हमारा सर्वोपरी दायित्व व सर्वोच्च सेवा है| इस से स्वतः ही सभी पित्तरों का उद्धार हो जाता है| आत्मतत्व में स्थिति ही हमारा परमधर्म है|
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जिन के विचार नहीं मिलते वे अपना समय नष्ट न करते हुए मेरी उपेक्षा कर दें और अपनी अपनी मान्यता पर दृढ़ रहें| किसी उग्र प्रतिक्रिया की आवश्यकता नहीं है|
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आप सब निजात्मगण को नमन ! हरि ॐ तत्सत् !
कृपा शंकर
२८ सितम्बर २०१८
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पुनश्च: ---
इस शरीर को पिण्ड कहते हैँ। इसे परमात्मा को अर्पण करना ही पिण्डदान है । यही निश्चय करना है कि मुझे अपना जीवन ईश्वर को अर्पित करना है । जो अपना जीवन ईश्वर को समर्पित करता है उसी का जीवन सार्थक है और उसी का पिण्डदान सच्चा है ।
जीवन मृत्यु के त्रास से छुड़ाने वाला केवल सत्कर्म ही है और वह सत्कर्म भी अपना ही किया हुआ स्वयं ही अपनी आत्मा का उद्धार करता है । जीव स्वयं ही अपना उद्धार कर सकता है । श्रीगीता मेँ स्पष्ट कहा - "उद्धरेदात्मानाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् ।"
स्वयं अपने द्वारा ही अपनी आत्मा का संसार सागर से उद्धार करना है और अपनी आत्मा को अधोगति की ओर नही जाने देना है । ईश्वर के जो जीता है उसे मुक्ति अवश्य मिलती है । श्रुति भगवती कहती है - जब तक ईश्वर का अपरोक्ष अनुभव न हो , ज्ञान न हो तब तक मुक्ति नहीँ मिलती । मृत्यु के पहले जो भगवान का अनुभव करते हैँ , उन्हेँ ही मुक्ति मिलती है । परमात्मा के अपरोक्ष साक्षात्कार बिना मुक्ति नहीँ मिलती ।
"तमेव विदित्वादि मृत्युमेति नान्यः पंथा विद्यतेष्यनाय "
ईश्वर को जानकर ही हम मृत्यु का उल्लंघन कर पायेगे है । परमपद की प्राप्ति हेतु इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीँ है । श्रीभगवान को जाने बिना कोई दूसरा उपाय नहीँ है । अन्यथा केवल श्राद्ध करने से कोई मुक्ति नहीँ मिलती । अपने पिण्ड का दान करने अर्थात् अपने शरीर को ही श्रीपरमात्मा को अर्पण करने से हमारा कल्याण होगा ।
अपना पिण्डदान हमे स्वयं अपने हाथोँ से ही करना होगा यही उत्तम होगा । जो पिण्ड मेँ है वही ब्रह्माण्ड मेँ है । हमे यह निश्चय करना चाहिए कि इस शरीर रुपी पिण्ड श्रीपरमात्मा को अर्पण करना है ।

मोक्ष के मार्ग पर हम अकेले ही हैं, अकेले ही हमें चलना पडेगा .....

मोक्ष के मार्ग पर हम अकेले ही हैं, अकेले ही हमें चलना पडेगा .....
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"आत्मतत्व" का जो बोध कराये वह "विद्या" है| विद्या हमें सब दुःखों, कष्टों व पीड़ाओं से "मुक्त" कराती है| विद्या हमें अज्ञान से "मुक्त" करती है| अन्य सब जिसे हम संसार में ज्ञान कहते हैं, वह "अविद्या" है|
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"समत्व" में स्थिति ही वास्तविक "ज्ञान" है| समत्व का अभाव ही "अज्ञान" है| इन्द्रिय सुखों की ओर प्रवृति हमारा अज्ञान है जो हमें परमात्मा से दूर करता है| परमात्मा से दूरी ही हमारे सब दुःखों का कारण है| एक ही अविनाशी परम तत्त्व का सर्वत्र दर्शन हमें समत्व में स्थित करता है|
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हम ने जन्म लिया था परमात्मा की प्राप्ति के लिए, पर कुबुद्धि से कुतर्क कर के स्वयं को तो भटका ही रहे हैं, अहंकारवश औरों को भी भटका रहे हैं| हम जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त होने का उपाय न करने के लिए तरह तरह के बहाने बनाते हैं| सही शिक्षा जो हमें आत्मज्ञान की ओर प्रवृत करती है, उसको हमने साम्प्रदायिक और पुराने जमाने की बेकार की बात बताकर हीन मान लिया है|
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हम जहाँ भी हैं, वहीं से परमात्मा की ओर उन्मुख हो जाएँ तो निश्चित रूप से मार्गदर्शन मिलेगा| परमात्मा की ओर उन्मुख तो होना ही पडेगा, आज नहीं तो फिर किसी अन्य जन्म में| अभी सुविधाजनक नहीं है तो अगले जन्मों की प्रतीक्षा करते रहिये|
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मनुष्य द्वारा बनाए गए नियम परिवर्तित हो सकते हैं, पर परमात्मा द्वारा बनाए गए नियम सदा अपरिवर्तनीय हैं| जैसे सत्य बोलना, परोपकार करना आदि पहले पुण्य थे तो आज भी पुण्य हैं| झूठ बोलना, चोरी करना, हिंसा करना पाप था तो आज भी पाप है| परमात्मा के बनाए हुए नियम अटल हैं, और पूरी प्रकृति उनका पालन कर रही है|
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दुःखों से निवृति ही "मोक्ष" है| मोक्ष के मार्ग पर हमें अकेले ही चलना पड़ता है| ॐ तत्सत् !
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आप सभी निजात्म गणों को सप्रेम नमन !
कृपा शंकर
२७ सितम्बर २०१८

योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय की पुण्य तिथि .....

पुराण-पुरुष योगिराज श्री श्री श्याचरण लाहिड़ी महाशय (३० सितम्बर १८२८ – २६ सितम्बर १८९५ ) की आज १२३ वीं पुण्यतिथि है| जीवात्मा कभी मरती नहीं है, सिर्फ अपना चोला बदलती है| भगवान श्रीकृष्ण का वचन है ....
"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि |
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही ||२:२२||"
अर्थात् जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही देही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है|
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जीवात्मा सदा शाश्वत है| भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ...
"नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः|
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः||२:२३||"
अर्थात् इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते और न अग्नि इसे जला सकती है जल इसे गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती।।
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भगवान श्रीकृष्ण ने ही कहा है ....
"न जायते म्रियते वा कदाचि न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः|
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे||२:२०||"
अर्थात् यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है और न यह एक बार होकर फिर अभावरूप होने वाला है| यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है| शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता||
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पुराण-पुरुष योगिराज श्री श्री लाहिड़ी महाशय अपनी देहत्याग के दूसरे दिन प्रातः दस बजे दूरस्थ अपने तीन शिष्यों के समक्ष एक साथ एक ही समय में अपनी रूपांतरित देह में यह बताने को साकार प्रकट हुए कि उन्होंने अपनी उस भौतिक देह को त्याग दिया है, और उन्हें उनके दर्शनार्थ काशी आने की आवश्यकता नहीं है| उनके साथ उन्होंने और भी बातें की| समय समय पर उन्होंने अपने अनेक शिष्यों के समक्ष प्रकट होकर उन्हें साकार दर्शन दिए हैं| विस्तृत वर्णन उनकी जीवनियों में उपलब्ध है|
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सचेतन देहत्याग के पूर्व उन्होंने कई घंटों तक गीता के श्लोकों की व्याख्या की और अचानक कहा कि "मैं अब घर जा रहा हूँ"| यह कह कर वे अपने आसन से उठ खड़े हुए, तीन बार परिक्रमा की और उत्तराभिमुख हो कर पद्मासन में बैठ गए और ध्यानस्थ होकर अपनी नश्वर देह को सचेतन रूप से त्याग दिया| पावन गंगा के तट पर मणिकर्णिका घाट पर गृहस्थोचित विधि से उनका दाह संस्कार किया गया| वे मनुष्य देह में साक्षात शिव थे|
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ऐसे महान गृहस्थ योगी को नमन ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ शिव ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ सितम्बर २०१८

Tuesday, 25 September 2018

जिनकी भाषा अभद्र है, उन राजनेताओं से मुझे कोई मतलब नहीं है .....

जिनकी भाषा अभद्र है, उन राजनेताओं से मुझे कोई मतलब नहीं है .....
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कुछ राजनेता मूर्खतापूर्ण और असभ्य भाषा का प्रयोग कर रहे हैं मैं कभी भूल कर भी उन का समर्थन नहीं कर सकता, विशेषकर एक ऐसे घटिया राजनेता और उसके अंधभक्तों का जो अपना गला फाड़ फाड़ कर बिना किसी प्रमाण के देश के प्रधानमंत्री को चोर बता रहे हैं|
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मुझे सन १९६२ में हुए चीनी आक्रमण के समय का घटनाक्रम पूरी तरह याद है| उस समय मेरी आयु चौदह वर्ष की थी| वह युद्ध हम पूरी तरह तत्कालीन प्रधानमंत्री की मूर्खता के कारण हारे थे| उन्होंने अपने निज जीवन में ऐसा कोई भी कार्य नहीं किया जिसे हम आदर्श कह सकें| उनके समय देश का पहला रक्षा घोटाला हुआ था| उसके बाद उनके वंशज शासकों ने महा भयंकर घोटाले ही घोटाले किये| क्या इस घटिया राजनेता ने अपने पूर्वजों को कभी चोर कहा है?
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राफेल का पूरा विवाद यही है कि एक विमान के लिए २००७ में जो मूल्य निर्धारित हुआ था वह २०१७ में तीन गुणा कैसे हो गया? मेरा सीधा सा प्रश्न है कि सांसदों को इस समय उस समय से आठ गुणा अधिक वेतन क्यों मिल रहा है? सांसदों को भी भी वही वेतन मिलना चाहिए जो २००७ में मिल रहा था| कम से कम इस राजनेता के अंधभक्तों को तो ग्यारह वर्ष पुराना वेतन ही लेना चाहिए था|
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एक भवन के सामने मोहल्ले के सारे चोर एकत्र होकर नारे लगा रहे थे कि चौकीदार चोर है चोर है, ताकि वह चौकीदार भाग जाए औए वे खुल कर चोरी कर सकें| इस बात का राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं है|

सभी को साभार सादर धन्यवाद !
२५ सितम्बर २०१८
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श्री अरुण उपाध्याय जी द्वारा टिप्पणी .....

अन्य देशों में भी अपने देश का विरोध करने वाले हुए हैं, पर भारत से बहुत कम। दूसरे देशों में उनको दण्डित किया जाता है। यहां वे पूजनीय और आदर्श बन जाते हैं। एक और बड़ा अन्तर यह है कि अन्य स्थानों में सरकार विरोधी लोग ही विदेशी मदद लेते हैं, वह भी बहुत कम समय के लिए, उनके भक्त कभी नहीं होते।
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भारत जैसा कभी और कहीं नहीं हुआ कि शासक ही देश का सबसे बड़ा शत्रु हो और विश्व शान्ति और अहिंसा के नाम पर अपने ही देश की आधी भूमि दूसरे देश को सौंप दे तथा करोड़ देशवासियों की हत्या करवा दे। शासन पाने के लिये पाकिस्तान अलग किया गया, कश्मीर भी पाकिस्तान को देने की कोशिश हुयी और आज तक भारत से अलग ही है तथा संविधान की ३७० धारा का समर्थन कांग्रेस द्वारा हो रहा है। उसके बाद तिब्बत चीन को बिना लड़े सौंप दिया तथा उसकी अनुमति ब्रिटेन से लेने की कोशिश की। ब्रिटेन ने अपने विवेक का उपयोग करने के लिये कहा तो तुरत तिब्बत चीन को सौंप दिया। पाकिस्तान+ कश्मीर +तिब्बत का क्षेत्रफल वर्तमान भारत के बराबर है।
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हिन्दू मुस्लिम के आधार पर विभाजन हुआ, अतः पाकिस्तान मुस्लिम देश बना, पर भारत भी अल्पसंख्यक सुविधा के नाम पर व्यवहार में मुस्लिम देश ही रहा। यदि भारत हिन्दू देश नहीं था,तो पाकिस्तान के हिन्दू जान बचाने के लियॆ भारत क्यों आये, ईरान-अफगानिस्तान भी जा सकते थे। तिब्बत यदि भारत का अंग नहीं था, तो तिब्बती शरणार्थी और दलाई लामा जान बचाने के लिये भारत क्यों आये।
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द्वितीय विश्वयुद्ध में परमाणु बम मिला कर १०० लाख लोग मरे थे। उसमें भारत के २७ लाख सैनिक थे। अर्थात् शेष विश्व के मात्र ७३ लाख मरे। भारत में इसके अतिरिक्त विभाजन में तथा तिब्बत में ३०-३० लाख लोग अहिंसा के नाम पर मरे जबकि उस समय भारत के पास आधुनिक हथियार वाली सबसे बड़ी स्थल सेना थी। अर्थात् भारत मे सत्य-अहिंसा से ८७ लाख, बाकी विश्व में युद्ध और अणु बम से ७३ लाख मरे।

मेरी श्रद्धा और विश्वास .....

मेरी श्रद्धा और विश्वास .....
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मैं अपने मन को नियंत्रित नहीं कर पा रहा हूँ, पर कोई चिंता मुझे नहीं है| मुझे पूर्ण श्रद्धा और विश्वास है कि मेरे इष्टदेव प्रेम की डोरी से बाँधकर इसे एक न एक दिन अपने आप ही अपने आधीन कर ही लेंगे| वे ही मेरी हर परिस्थिति में रक्षा कर रहे हैं और सदा ही करेंगे| मैं निश्चिन्त हूँ क्योंकि खोने को मेरे पास कुछ भी नहीं है, सब कुछ तो उन्हीं का है| एकमात्र बाधा यह जीवभाव है जिसका भी वे हरि एक न एक दिन हरण कर ही लेंगे| यह उनका स्वभाव है| यह जीवभाव नहीं रहेगा तो कोई राग-द्वेष और अहंकार भी नहीं रहेगा| उन हरि का चिंतन ही मेरा स्वभाव है| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ सितम्बर २०१८

हम भगवान को दान में क्या दे सकते हैं ? .....

हम भगवान को दान में क्या दे सकते हैं ? .....
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(जो मैं इस लेख में लिखने जा रहा हूँ यह सब संत-महात्माओं के सत्संग से प्राप्त ज्ञान है)
इस देह के साथ हमारा सम्बन्ध सिर्फ कर्मफलों का है, इसमें विगत जन्मों के कर्मफल भी आते हैं| इस जन्म में किये हुए सकाम कर्मफलों को भोगने के लिए फिर से देह धारण करनी होगी| इसमें हमारी इच्छा नहीं चलती, सब कुछ प्रकृति के नियमों के अनुसार होता है| हमें कर्म करने का अधिकार है पर उनके फलों को भोगने में हम स्वतंत्र नहीं हैं| उनका फल भुगतने के लिए प्रकृति हमें बाध्य कर देती है| हमारे सारे सगे-सम्बन्धी, माता-पिता, संतानें, शत्रु-मित्र ..... सब पूर्व जन्मों के कर्मफलों के आधार पर ही मिलते हैं| अतः जिस भी परिस्थिति में हम हैं वह अपने ही कर्मों का भोग है, अतः कोई पश्चात्ताप न करके इस दुश्चक्र से निकलने का प्रयास करते रहना चाहिए|
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इस निरंतर हो रहे जन्म-मरण के दुश्चक्र से मुक्ति के लिए सर्वप्रथम तो हमें परमात्मा को स्थायी रूप से अपने हृदय में बैठाना होगा, और परमप्रेम से उनको समर्पित होना होगा| फिर सतत् दीर्घकाल की साधना द्वारा कर्ताभाव और देहबोध से मुक्त होना होगा|
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इसके लिए चिंता की कोई बात नहीं है, क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण का अभय वचन है .....
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे||१८:६५||"
अर्थात् तूँ मुझ में ही मन और चित्त लगा, मेरा ही भक्त यानि मेरा ही भजन पूजन करने वाला हो, तथा मुझे ही नमस्कार कर| इस प्रकार करता हुआ तूँ मुझ वासुदेव में अपने साधन और प्रयोजन को समर्पित कर के मुझे ही प्राप्त होगा| मैं तुझ से सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तूँ मेरा प्रिय है|
भगवान का इतना बड़ा आश्वासन है अतः भय किस बात का? हमें उन की शरण में तुरंत चले जाना चाहिए| महाभारत में अनेक स्थानों पर भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसी ही बातें सत्य की शपथ खाकर कही हैं|
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अब प्रश्न उठता है कि हम भगवान को दान में क्या दे सकते हैं? बात बड़ी अजीब सी है, जिस भगवान ने सब कुछ दिया है उन को हम दान में क्या दे सकते हैं? हाँ, एक चीज ऐसी अवश्य है जिसका दान भगवान भी हमारे से स्वीकार कर लेते हैं| यदि भगवान हमारा दिया हुआ दान स्वीकार कर लेते हैं तो उससे बड़ा पूण्य कोई दूसरा नहीं है| वह दान है ..... हमारी अपनी "जीवात्मरूपता" का यानी "जीवात्मभाव" का| इस जीवात्मरूपता के अतरिक्त हमारे पास अन्य कुछ है भी नहीं|
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भगवान का आदेश है .....
"यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्| यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्||९:२७||"
अर्थात् हे कौन्तेय तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो|
भगवान ने इस से पूर्व यह भी कहा है ....
"ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्| ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना||४:२४||"
अर्थात् अर्पण (अर्थात् अर्पण करने का साधन श्रुवा) ब्रह्म है, और हवि (शाकल्य अथवा हवन करने योग्य द्रव्य) भी ब्रह्म है, ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा जो हवन किया गया है वह भी ब्रह्म ही है| इस प्रकार ब्रह्मरूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष का गन्तव्य भी ब्रह्म ही है||
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हमारा हर कर्म ब्रह्मकर्म हो, हमारी चेतना ब्रह्ममय हो, हम जीवात्मभाव से मुक्त हों, यह भगवान को दिया हुआ दान है| हमारा अपना है ही क्या? हमारे हृदय में भगवान ही धड़क रहे हैं, हमारी सांसे भी वे ही ले रहे हैं, हमारी आँखों से भी वे ही देख रहे हैं, और हमारे पैरों से भी वे ही चल रहे हैं| यह पृथकता यानी जीवात्मभाव का बोध एक मायावी भ्रम और धोखा है|
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हे मनमोहन भगवान वासुदेव, हमारा मन तुम्हारे ही श्रीचरणों में ही समर्पित हो, तुम्हें छोड़कर यह मन अन्यत्र कहीं भी नहीं भागे| आप ही गुरु हो और आप ही मेरे परमशिव और मेरी परमगति हो| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ सितम्बर २०१८