Wednesday, 18 July 2018

तैत्तिरीय उपनिषद् में नित्य पठनीय शान्ति पाठ और नित्य मननीय उपदेश .....

तैत्तिरीय उपनिषद् में नित्य पठनीय शान्ति पाठ और नित्य मननीय उपदेश .....
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शान्तिपाठ :--
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं बह्मासि । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम । अवतु वक्तारम् ।
ॐ शान्तिः । शान्तिः । शान्तिः ।
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उपदेश :--
वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजानन्तुं मा व्यवच्छेसीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् ।।
(तैत्तिरीय उपनिषद्, शिक्षावल्ली, अनुवाक ११, मंत्र १)
अर्थ:- वेद के शिक्षण के पश्चात् आचार्य आश्रमस्थ शिष्यों को अनुशासन सिखाता है । सत्य बोलो । धर्मसम्मत कर्म करो । स्वाध्याय के प्रति प्रमाद मत करो । आचार्य को जो अभीष्ट हो वह धन (भिक्षा से) लाओ और संतान-परंपरा का छेदन न करो (यानी गृहस्थ बनकर संतानोत्पत्ति कर पितृऋण से मुक्त होओ) । सत्य के प्रति प्रमाद (भूल) न होवे, अर्थात् सत्य से मुख न मोड़ो । धर्म से विमुख नहीं होना चाहिए । अपनी कुशल बनी रहे ऐसे कार्यों की अवहेलना न की जाए । ऐश्वर्य प्रदान करने वाले मंगल कर्मों से विरत नहीं होना चाहिए । स्वाध्याय तथा प्रवचन कार्य की अवहेलना न होवे ।
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देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि । तानि सेवितव्यानि । नो इतराणि । यान्यस्माकं सुचरितानि । तानि त्वयोपास्यानि ।।
(तैत्तिरीय उपनिषद्, शिक्षावल्ली, अनुवाक ११, मंत्र २)
अर्थ:- देवकार्य तथा पितृकार्य से प्रमाद नहीं किया जाना चाहिए । (कदाचित् इस कथन का आशय देवों की उपासना और माता-पिता आदि के प्रति श्रद्धा तथा कर्तव्य से है ।) माता को देव तुल्य मानने वाला बनो (मातृदेव = माता है देवता तुल्य जिसके लिए) । पिता को देव तुल्य मानने वाला बनो । आचार्य को देव तुल्य मानने वाला बनो । अतिथि को देव तुल्य मानने वाला बनो । अर्थात् इन सभी के प्रति देवता के समान श्रद्धा, सम्मान और सेवाभाव का आचरण करे । जो अनिन्द्य कर्म हैं उन्हीं का सेवन किया जाना चाहिए, अन्य का नहीं । हमारे जो-जो कर्म अच्छे आचरण के द्योतक हों केवल उन्हीं की उपासना की जानी चाहिए; उन्हीं को संपन्न किया जाना चाहिए । (अवद्य = जिसका कथन न किया जा सके, जो गर्हित हो, प्रशंसा योग्य न हो ।)संकेत है कि गुरुजनों का आचरण सदैव अनुकरणीय हो ऐसा नहीं है । अपने विवेक के द्वारा व्यक्ति क्या करणीय है और क्या नहीं इसका निर्णय करे और तदनुसार व्यवहार करे ।
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आनंद "प्यास" में है, "तृप्ति" में नहीं .....

आनंद "प्यास" में है, "तृप्ति" में नहीं .....
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जो आनंद "विरह" में है वह "मिलन" में नहीं हो सकता| परमात्मा नहीं मिलें तो ही अच्छा है| बस उन्हें पाने की यह "अभीप्सा" यानि "अतृप्त प्यास" और "तड़प" बनी रहे| ह्रदय में एक "प्रचंड अग्नि" जल रही है, एक बड़ी "प्यास" और "तड़प" है परमात्मा को पाने की| उसका अपना ही आनंद है| यदि परमात्मा मिल गए तो यह "प्यास" बुझ जायेगी, अतः परमात्मा नहीं चाहिए, बस उनको पाने की "अभीप्सा" रूपी "प्रचंड अग्नि" जलती रहे| जो आनंद इस "द्वैत" में है, वह "अद्वैत" में नहीं हो सकता|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जुलाई २०१८

Friday, 13 July 2018

आध्यात्मिक व्यक्ति के लक्षण :---

आध्यात्मिक व्यक्ति के लक्षण :---

(१) निरंतर आनंद और प्रफुल्लता की अनुभूति |
(२) अल्प सात्विक भोजन से ही तृप्ति |
(३) व्यर्थ की बातचीत नहीं करने का स्वभाव |
(४) श्वास-प्रश्वास की धीमी गति |
(५) विस्तार (देह से परे होने) की अनुभूतियाँ |
(६) राग-द्वेष-कामनाओं व दुःखों का अभाव |


उपरोक्त छओं लक्षण जिसमें है, वह निश्चित रूप से एक साधू, संत, सज्जन और आध्यात्मिक व्यक्ति है| ऐसे व्यक्ति सदा प्रणाम करने योग्य हैं, इनका सदा आदर/सम्मान करना चाहिए|

कौन व्यक्ति कैसा है इसका निर्णय उपरोक्त लक्षण देखकर ही करें|

पुनश्चः :-- उपरोक्त में से प्रथम तीन लक्षणों का होना भी आध्यात्म मार्ग पर अग्रसर होने का संकेत है|

कूटस्थ चैतन्य .....

(संशोधित व पुनर्प्रस्तुत). कूटस्थ चैतन्य .....
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गुरु की आज्ञा से शिवनेत्र होकर (बिना तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासिकामूल के समीपतम लाकर, भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, और जीभ को ऊपर पीछे की ओर मोड़ते हुए तालू से सटा कर) प्रणव यानि ओंकार की ध्वनि को अपने अंतर में सुनते हुए उसी में लिपटी हुई सर्वव्यापी ज्योतिर्मय अंतर्रात्मा का ध्यान-चिंतन नित्य नियमित करते करते कुछ महिनों की साधना के उपरांत गुरुकृपा से विद् युत् की चमक के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होती है|
ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के बाद उसी की चेतना में रहें| यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता| लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता| यही कूटस्थ है, और इसकी चेतना ही कूटस्थ चैतन्य है| यह योगमार्ग की उच्चतम साधनाओं/उपलब्धियों में से एक है|
(इसकी साधना श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ सिद्ध योगी महात्मा गुरु के सान्निध्य में ही करें).
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आज्ञाचक्र ही योगी का ह्रदय है, भौतिक देह वाला ह्रदय नहीं| आरम्भ में ज्योति के दर्शन आज्ञाचक्र से थोड़ा सा ऊपर होता है, वह स्थान कूटस्थ बिंदु (शिखा स्थान) है| आज्ञाचक्र का स्थान Medulla Oblongata यानि मेरुशीर्ष, खोपड़ी के मध्य में पीछे की ओर का भाग है जहाँ मेरुदंड की सभी नाड़ियाँ आकर मस्तिक से मिलती हैं| यहीं जीवात्मा का निवास है|
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कूटस्थ में परमात्मा सदा हमारे साथ हैं| हम सदा कूटस्थ चैतन्य में रहें| कूटस्थ में समर्पित होने पर ब्राह्मी स्थिति प्राप्त होती है जिसमें हमारी चेतना परम प्रेममय हो समष्टि के साथ एकाकार हो जाती है| हम फिर परमात्मा के साथ एक हो जाते हैं| परमात्मा सब गुरुओं के गुरु हैं| उनसे प्रेम करो, सारे रहस्य अनावृत हो जाएँगे| हम भिक्षुक नहीं हैं, परमात्मा के अमृत पुत्र हैं| एक भिखारी को भिखारी का ही भाग मिलता है, पुत्र को पुत्र का| पुत्र के सब दोषों को पिता क्षमा तो कर ही देते हैं, साथ साथ अच्छे गुण कैसे आएँ इसकी व्यवस्था भी कर ही देते हैं|
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भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं ....
"प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव |
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैतिदिव्यं" ||८:१०||
अर्थात भक्तियुक्त पुरुष अंतकाल में योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित कर के, फिर निश्छल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष को ही प्राप्त होता है|
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आगे भगवान कहते हैं .....
"सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च,
मूधर्नायाधायात्मन: प्राणमास्थितो योगधारणाम् ||८:१२||
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्,
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्" ||८:१३||
अर्थात सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृदय में स्थिर कर के फिर उस जीते हुए मन के द्वारा प्राण को मस्तक में स्थापित कर के, योग धारणा में स्थित होकर जो पुरुष 'ॐ' एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ ब्रह्म का चिंतन करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है|
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भगवान कहते हैं ....
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च| क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते||१५:१६||
अर्थात् इस लोक में क्षर (नश्वर) और अक्षर (अनश्वर) ये दो पुरुष हैं| समस्त भूत क्षर हैं और कूटस्थ अक्षर कहलाता है||
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पढने में तो यह सौदा बहुत सस्ता और सरल लगता है कि जीवन भर तो मौज मस्ती करेंगे, फिर मरते समय भ्रूमध्य में ध्यान कर के ॐ का जाप कर लेंगे तो भगवान बच कर कहाँ जायेंगे? उनका तो मिलना निश्चित है ही| पर यह सौदा इतना सरल नहीं है| दिखने में जितना सरल लगता है उससे हज़ारों गुणा कठिन है| इसके लिए अनेक जन्म जन्मान्तरों तक अभ्यास करना पड़ता है, तब जाकर यह सौदा सफल होता है|
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यहाँ पर महत्वपूर्ण बात है निश्छल मन से स्मरण करते हुए भृकुटी के मध्य में प्राण को स्थापित करना और ॐकार का निरंतर जाप करना| यह एक दिन का काम नहीं है| इसके लिए हमें आज से इसी समय से अभ्यास करना होगा| उपरोक्त तथ्य के समर्थन में किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, भगवान का वचन तो है ही, और सारे उपनिषद्, शैवागम और तंत्रागम इसी के समर्थन में भरे पड़े हैं|
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ॐ तत्सत्| ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०१८

दिल का हुजरा साफ़ कर ज़ाना के आने के लिए .....

दिल का हुजरा साफ़ कर ज़ाना के आने के लिए .....
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घर में जब कोई मेहमान आते हैं तो उनको बैठाने के स्थान को बहुत अच्छी तरह से साफ़ करते हैं कि कहीं कोई गन्दगी न रह जाए| पर हम यो यहाँ साक्षात परमात्मा को निमंत्रित कर रहे हैं| देह में या मन में कहीं भी कोई गन्दगी होगी तो वे नहीं आयेंगे| अपने हृदय मंदिर को तो विशेष रूप से साफ़ करना होगा| ह्रदय मंदिर को स्वच्छ कर जब उसमें परमात्मा को बिराजमान करेंगे तो सारे दीपक अपने आप ही जल जायेंगे, कहीं कोई अन्धकार नहीं रहेगा, आगे के सारे द्वार खुल जायेंगे और मार्ग प्रशस्त हो जायेगा| वहाँ उनके सिवा अन्य कोई नहीं होगा| एक बहुत पुरानी और बहुत प्रसिद्ध ग़ज़ल है ....
"दिल का हुजरा साफ़ कर ज़ाना के आने के लिए,
ध्यान गैरों का उठा उसके ठिकाने के लिए |
चश्मे दिल से देख यहाँ जो जो तमाशे हो रहे,
दिलसिताँ क्या क्या हैं तेरे दिल सताने के लिए ||
एक दिल लाखों तमन्ना उसपे और ज्यादा हविश,
फिर ठिकाना है कहाँ उसको टिकाने के लिए |
नकली मंदिर मस्जिदों में जाये सद अफ़सोस है,
कुदरती मस्जिद का साकिन दुःख उठाने के लिए ||
कुदरती क़ाबे की तू मेहराब में सुन गौर से,
आ रही धुर से सदा तेरे बुलाने के लिए |
क्यों भटकता फिर रहा तू ऐ तलाशे यार में,
रास्ता शाह रग में हैं दिलबर पे जाने के लिए ||
मुर्शिदे कामिल से मिल सिदक और सबुरी से तकी,
जो तुझे देगा फहम शाह रग पाने के लिए |
गौशे बातिन हों कुशादा जो करें कुछ दिन अमल,
ला इल्लाह अल्लाहहू अकबर पे जाने के लिए ||
ये सदा तुलसी की है आमिल अमल कर ध्यान दे,
कुन कुरां में है लिखा अल्ल्हाहू अकबर के लिए ||
(लेखक: तुलसी साहिब)
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ह्रदय की अनुभूतियाँ शब्दों से परे हैं| उन्हें कोई व्यक्त नहीं कर सकता| कहीं कोई हसरत, तड़प और अरमान दिल में नहीं रहते| वह एक वर्णनातीत अनुभूति है| उस और ताकते रहो, लगातार देखते रहो, रहस्य अपने आप खुल जायेंगे| कुछ भी नहीं करना है|
"दीदार की हविश है तो नज़रें जमा के रख, चिलमन हो या नकाब सरकता जरूर है|"
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ऊपर से कुछ मत थोपो, सारे गुण अपने आप प्रकट हो जायेगे| एक ही गुण "प्रेम" होगा तो बाकी सारे गुण अपने आप आ जायेंगे| पूर्णता तो हम स्वयं हैं, आवरण अधिक समय तक नहीं रह सकता| ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ जुलाई २०१८

आचार्यवान् पुरुषो वेद .....

श्रुति भगवती कहती है ..... "आचार्यवान् पुरुषो वेद" .... अर्थात् आचार्य (गुरु) को प्राप्त व्यक्ति ही परमात्मा को जान सकता है| (छान्दोग्योपनिषद्-६/१४/२)

आज से पंद्रह दिन बाद गुरु-पूर्णिमा आ रही है| उस की अभी से तैयारी करनी आरम्भ करें| गुरुरूप परब्रह्म परमशिव का ध्यान ही मेरे लिए गुरु की सेवा और गुरुवचनों का पालन है| भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करें|

ॐ शिव ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
१२ जुलाई २०१८

भवसागर को पार कैसे करें ? ....

भवसागर को पार कैसे करें ? ....
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यह भवसागर एक ऐसा सागर है जिसमें मृगतृष्णा रूपी जल भरा पडा है| हमारी असंख्य कामनाएँ और वासनाएँ ही इस भवसागर का निर्माण करती हैं| कामनाओं ओर वासनाओं से मुक्त होना ही भवसागर को पार करना है| और भी स्पष्ट शब्दों में संसार की निःसारता को समझ कर, विषय-वासनाओं को त्याग कर परमात्मा के प्रेम में मग्न हो जाना ही .... भवसागर को पार करना है|
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अनेक साधन हैं, पर मुझ अल्पज्ञ को तो परमशिव के आत्मस्वरूप से ध्यान के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं आता-जाता| साधनों का ज्ञान और सिद्धि, परमात्मा की कृपा से ही मिलती है| जो कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ है, जिसका कभी जन्म ही नहीं हुआ है, पर जो शाश्वत ओर परम कल्याणकारी है ..... वह मेरा आराध्य इष्टदेव परमशिव है| उस परमशिव से प्रेम और उस का ध्यान ही मेरा स्वधर्म है| उस परमशिव में स्थिति ही मेरे लिए भवसागर को पार करना है|
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संसार सागर को इस उदाहरण से समझ सकते हैं .... हम खाते क्यों हैं? ....कमाने के लिए, और कमाते क्यों हैं? .... खाने के लिए| यह चक्र कभी समाप्त नहीं होता| यही भवसागर का एक छोटा सा रूप है| इस संसार से सुख की आशा ही वह ईंधन है जो हमें इस भवसागर में फँसाए रखता है|
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श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में संत तुलसीदास जी ने भवसागर को पार करने की जो विधि भगवान श्रीराम के मुख से कहलवाई है, वह समझने में सबसे सरल है .....
चौपाई :--
"एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई।।
नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं।।
ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई।।
आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी।।
फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा।।
कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही।।
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।।
करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।।"
दोहा/सोरठा :--
"जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ।
सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ ||"

इसका सार यह कि यह मनुष्य शरीर इस भवसागर को पार करने के लिए भगवान द्वारा दी हुई एक नौका है| अनुकूल वायु ....भगवान का अनुग्रह है| इस नौका के कर्णधार सदगुरु हैं| जो इस नौका को पाकर भी भवसागर को न तरे, उस से बड़ा अभागा अन्य कोई नहीं है|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ जुलाई २०१८
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पुनश्चः :--- यह संसार एक मृगतृष्णा है| अपने आत्मस्वरूप में स्थित हो जाना ही इसे पार करना है|