Saturday, 21 January 2017

सारा श्रेय परमात्मा को है .....

मेरे माध्यम से जो भी विचार व्यक्त होते हैं उनका श्रेय परमात्मा को, सद्गुरुओं और संतों को जाता है जिन की मुझ पर अपार कृपा है| इसमें मेरी कोई महिमा नहीं है| मेरे में न तो कोई लिखने की सामर्थ्य है न ही मुझे कुछ आता जाता है| ये मेरी कोई बौद्धिक सम्पदा नहीं हैं| सब परमात्मा के अनुग्रह का फल है| मुझे उनसे भी प्रसन्नता है जो इन्हें शेयर करते हैं, और उनसे भी प्रसन्नता है जो इन्हें कॉपी पेस्ट कर के अहंकारवश अपने नाम से पोस्ट करते हैं| मेरी ईश्वर लाभ के अतिरिक्त अन्य कोई कामना नहीं है पर यह एक संकल्प प्रभु ने मुझे अवश्य दिया है कि सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा हो, और भारत माँ अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर बिराजमान हो|
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मुझे मेरी वैदिक संस्कृति, सनातन धर्म व परम्परा, गंगादि नदियाँ, हिमालयादि पर्वत, वन और उन सब लोगों से प्रेम है जो निरंतर परमात्मा का चिन्तन करते हैं और परमात्मा का ही स्वप्न देखते हैं| यह मेरा ही नहीं अनेक मनीषियों का संकल्प है जिसे जगन्माता अवश्यमेव पूर्ण करेगी| मैं उन सब का सेवक हूँ जिन के ह्रदय में परमात्मा को पाने की एक प्रचंड अग्नि जल रही है, जो निरंतर प्रभु प्रेम में मग्न हैं| उन के श्रीचरणों की धूल मेरे माथे की शोभा है| अन्य मेरी कोई किसी से अपेक्षा नहीं है|
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सब के ह्रदय में प्रभुप्रेम जागृत हो और आपको जीवन में पूर्णता प्राप्त हो|
आप सबको शुभ कामनाएँ| सादर प्रणाम|
ॐ श्रीगुरवे नमः |.ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर

कूटस्थ चैतन्य व आत्मगुरुतत्व .....

कूटस्थ चैतन्य व आत्मगुरुतत्व .....
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कुछ विषय ऐसे हैं जिन पर सार्वजनिक चर्चा नहीं की जाती है| यह विषय भी एक ऐसा ही विषय है जो दुधारी तलवार है| इससे साधक देवता भी बन सकता और इसके विपरीत भी| पर इसी काल में देश-विदेश में अनेक मनीषियों ने इस विषय पर खूब चर्चाएँ की हैं और इस विषय को बहुत लोकप्रिय बनाया है|
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वर्तमान विकट संक्रमण काल में जब हमारे सनातन धर्म व आस्थाओं पर मर्मान्तक प्रहार हो रहे हैं और राष्ट्र में कुछ आसुरी शक्तियों के शिकार लोग उनका उपकरण बनकर बहुत गन्दी राजनीति कर के हमारी आस्थाओं पर प्रहार कर रहे हैं, ऐसे समय में हम अपने धर्म का पालन कर के ही उसकी रक्षा कर सकते हैं| धर्म भी उन्हीं की रक्षा करेगा जो धर्म की रक्षा करेंगे|
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हमारी श्रुतियों में, गीता में, और योगदर्शन में ओंकार की महिमा भरी पड़ी है| मन्त्रों में प्रणव यानि "ॐ" (ओ३म्) सबसे बड़ा बीज मन्त्र है, अन्य सब मन्त्रों की उत्पत्ति इसी मन्त्र से हुई है| सृष्टि की उत्पत्ति भी इसी मंत्र से हुई है| तंत्रों में आत्मानुसंधान सबसे बड़ा तंत्र है, जिसकी साधना करते करते साधक 'ॐ' पर ही पहुँच जाता है| यह परमात्मा का सर्वप्रथम और सर्वश्रेष्ठ साकार रूप है|
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"ॐ" (ओ३म् ) और तारक मन्त्र "राम" दोनों एक ही हैं| दोनों का फल भी एक ही है| 'राम' पर ध्यान करते करते साधक ॐ पर पहुँच जाता है| वैसे तो ओंकार की चेतना में निरंतर रहें पर विधिवत् साधना में कुछ बातों का ध्यान रखना अति आवश्यक है ---
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(1) ओंकार का ध्यान करते समय कमर सीधी रहे यानि मेरु दंड उन्नत रहे|
(2) दृष्टी भ्रूमध्य में रहे| जो बहुत उन्नत साधक है उनकी दृष्टी भ्रूमध्य और सहस्त्रार पर एक साथ सहज रूप से चली जाती है|
(3) आसन ऊनी हो जिस पर एक रेशम का वस्त्र विछा हो|
(4) मुँह पूर्व या उत्तर दिशा में हो| वैसे उन्नत योगियों के लिए भ्रूमध्य पूर्व दिशा है और सहस्त्रार उत्तर दिशा है|
(5) जिनको खेचरी मुद्रा का अभ्यास है वे खेचरी मुद्रा में रहें, अन्य सब जीभ को ऊपर की ओर मोड़कर तालू से सटा लें|
(6) जो दायें हाथ से लिखते हैं उनको दायें कान में व जो बाएँ हाथ से लिखते हैं उनको बाँयें कान में ओंकार की ध्वनी सुनेगी| कुछ समय पश्चात ओंकार की ध्वनी खोपड़ी के पीछे के भाग, शिखास्थान से नीचे, मेरुशीर्ष (medulla) जहां मस्तिष्क से मेरुदंड की नाड़ियाँ मिलती हैं, वहाँ सुननी आरम्भ हो जायेगी और उसका विस्तार सारे ब्रह्माण्ड में होने लगेगा| एक विराट ज्योति का प्रादुर्भाव भी यहीं से होगा जो भ्रूमध्य में प्रतिबिंबित होगी| यह मेरुशीर्ष यानि मस्तक ग्रंथि ही वास्तविक आज्ञाचक्र है| भ्रूमध्य तो दर्पण की तरह है जहाँ गुरु की आज्ञा से ध्यान करते हैं|
(7) आरम्भ में लकड़ी के "T" के आकार के लकड़ी के एक हत्थे को सामने रखकर उस पर अपनी कोहनियाँ टिका दें, अंगूठों से कान बंद कर लें और जो भी ध्वनियाँ सुनती हैं उनमें से सबसे तीब्र ध्वनी को सुनें| साथ साथ मानसिक रूप से ओ३म् ओ३म् ओ३म् का जाप करते रहें|
"ॐ" .....यह लिखने में प्रतीकात्मक है, और "ओ३म्" ..... यह ध्वन्यात्मक है| इस की लिखावट पर कोई विवाद ना करें| महत्व उस का है जो सुनाई देता है, न कि कैसे लिखा गया है|
आरम्भ में जब कान बंद करेंगे तो कई प्रकार की ध्वनियाँ सुनेंगी| जो सबसे तीब्र है उसी पर ध्यान दें और मानसिक रूप से ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ का जाप करते रहें|
(8) कुछ धर्मगुरुओं के अनुसार ॐ के जाप का अधिकार मात्र सन्यासियों को है, गृहस्थों को नहीं| वे कहते हैं कि गृहस्थ ॐ के साथ भगवान के अन्य किसी नाम का सम्पुट लगाएँ| एक बार एक धर्मगुरु ने तो यहाँ तक कहा कि गृहस्थों द्वारा ओंकार का जाप अधर्म है| पर मैं इस विवाद में नहीं पड़ना चाहता| क्योंकि इसका कोई प्रमाण नहीं है| सारे उपनिषद् और भगवद्गीता "ओंकार' की महिमा से भरे पड़े हैं| जो उपनिषदों में यानि वेदों में है वही प्रमाण है, वही मान्य है| जो वेदविरुद्ध है वह अमान्य है|
(9) भ्रूमध्य में ज्योतिर्मय ब्रह्म के दर्शन, और कानों से ओंकार की ध्वनी यानि नादब्रह्म को सुनते रहें व मन में ओंकार का जप करते रहें| किसी भी तरह के वाद-विवाद में ना पड़ें| हमारा लक्ष्य परमात्मा है, ना कि कोई सिद्धांत या बौद्धिकता|
(10) उपरोक्त साधना की सफलता एक ही तथ्य पर निर्भर है की हमारे ह्रदय में कितनी भक्ति है| बिना भक्ति के कोई लाभ नहीं होगा और आप कुछ कर भी नहीं पाएँगे| जितनी गहरी भक्ति होगी उतनी ही अच्छी साधना होगी, उतना ही गहरा समर्पण होगा| कर्ताभाव ना आने दें| सब कुछ प्रभु के चरणों में समर्पित कर दें| कर्ता भी वे ही है और भोक्ता भी वे हैं| आप तो उनके एक उपकरण मात्र हैं|
अपना सब कुछ, अपना सम्पूर्ण अस्तित्व उन्हें समर्पित कर दें| इसकी इतनी महिमा है कि उसे बताने की सामर्थ्य मेरी क्षमता से परे है|
(11) ज्योतिर्मय नाद ब्रह्म की सर्वव्यापक चेतना और उस में विलय होकर उससे एकाकार होना ही 'कूटस्थ चैतन्य' है और यह कूटस्थ ही आत्मगुरु है और यही गुरुतत्व है|
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इसकी महिमा अनंत है| मनुष्य की बुद्धि जितनी कल्पना कर सकती है उससे भी बहुत परे इसकी महिमा है|.
ॐ श्रीगुरवे नमः |.ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |
ॐ नमः शिवाय ! ॐ शिव शिव शिव शिव शिव ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
पौष शु. १३ वि.सं.२०७२| 22 जनवरी2016.

परमात्मा ही हमारे हर प्रश्न का का उत्तर और हर समस्या का समाधान है ,,,,

जैसे महासागर से मिलने के पश्चात झीलों-तालाबों व नदी-नालों से मोह छूट जाता है, वैसे ही सच्चिदानंद की अनुभूति के पश्चात सब मत-मतान्तरों, सिद्धांतों, वाद-विवादों, राग-द्वेष व अहंकार रूपी पृथकता के बोध से चेतना हट कर परमात्मा के लिए तड़प उठती है| सारे प्रश्न भी तिरोहित हो जाते हैं| परमात्मा ही हमारे हर प्रश्न का का उत्तर और हर समस्या का समाधान है|
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हे प्रभु, जब आप ह्रदय में आकर आड़े हो ही गए हो तो बस अब सदा ऐसे ही रहना| अब कहीं भी मत जाना| आप मेरे ह्रदय में हो तो मेरी भी स्थायी स्थिति आपके ही ह्रदय में है| मेरा ह्रदय ही आपका भी ह्रदय है| ॐ ॐ ॐ ||
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"ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै |
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ||"
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते |
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ||"
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय| हर हर महादेव| ॐ ॐ ॐ ||

मेरा धर्म क्या है ? .....

मेरा धर्म क्या है ? .....
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यह एक बड़ा ही गूढ़ प्रश्न है जिसने मुझे बहुत आंदोलित और उद्वेलित किया है| अब इस ढलती आयु में इस प्रश्न के उत्तर की कुछ कुछ झलक मिलती है| इस विषय पर मेरे विचार बड़े स्पष्ट हो गए हैं जिनसे मेरा अधिकाँश लोगों से मतभेद ही होगा|
विषय को लघु रखने के लिए मैं कम से कम शब्दों का प्रयोग करूंगा| विस्तृत व्याख्या में न जाकर सार की ही बात करूंगा|
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निज स्वभाव और धर्म इनमें बहुत अंतर है जबकि ये एक से प्रतीत होते हैं|
कुछ लोगों की भावनाओं को मेरी बातें आहत भी कर सकती हैं| पर मुझे जो भी कहना है उसे स्पष्ट कहूंगा|
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(१) मेरा स्वभाव ....... मेरे लिए अनिर्वचनीय, अनंत, सर्वव्यापी परम प्रेम ही मेरा स्वभाव है|
इसको वो ही समझ सकता है जिसने इसकी एक झलक की अनुभूति की हो|
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(२) मेरा धर्म .........
साधनाकाल में मेरा धर्म ....."प्राणायाम" ..... है| जिन साधना पद्धतियों में मैं दीक्षित हूँ वे सुक्ष्मदेह में मेरुदंडस्थ परा सुषुम्ना नाडी में, और सहस्त्रार में उत्तरा सुषुम्ना और उससे भी परे सूक्ष्म प्राणायाम पर आधारित हैं| मुझे सूक्ष्म जगत से मार्गदर्शन मिलता है अतः कोई शंका या संदेह नहीं है| इसलिए साधनाकाल में मेरा धर्म प्राणायाम ही है|
साधना की परावस्था में मेरा धर्म सच्चिदानंद भगवान को समर्पण करने का निरंतर प्रयास है| इससे आगे मैं कुछ नहीं जानता| यही मेरा धर्म है|
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(३) मेरी जाति कुल व गौत्र .....
जैसे विवाह के पश्चात नव विवाहिता की जाति, कुल व गौत्र अपने पति का ही हो जाता है, वैसे ही मेरी जाति भी वह ही है जो परमात्मा की है, मेरा कुल व गौत्र भी वही है जो परमात्मा का है| यह देह तो एक दिन नष्ट हो कर पंचभूतों में मिल जायेगी पर परमात्मा के साथ मेरा सम्बन्ध शाश्वत है|
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ॐ नमः शिवाय ! ॐ शिव शिव शिव ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
पौष शु. १२ वि.सं.२०७२| 21जनवरी2016.

Friday, 20 January 2017

इस समय राष्ट्र को ब्रह्मत्व की आवश्यकता है .....

इस समय राष्ट्र को ब्रह्मत्व की आवश्यकता है| स्वयं के शिवत्व को प्रकट करें| वर्तमान नकारात्मक घटना क्रमों की पृष्ठभूमि में आसुरी शक्तियाँ हैं| राक्षसों, असुरों और पिशाचों से मनुष्य अपने बल पर नहीं लड़ सकते| सिर्फ ईश्वर ही रक्षा कर सकते हैं| अपने अस्तित्त्व की रक्षा के लिये हमें भगवान् की शरण लेकर समर्पित होना ही होगा, अन्यथा नष्ट होने के लिये तैयार रहें|
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साधना ..... अपने आप को सम्पूर्ण ह्रदय और शक्ति के साथ भगवान के हाथों में सौंप देना है| कोई शर्त मत रखो, कोई चीज़ मत माँगो, यहाँ तक कि योग में सिद्धि भी मत माँगो| जो भी साधना या जो भी भक्तिभाव या जो भी पूजापाठ हम करते हैं वह हमारे लिये नहीं अपितु भगवान के लिये ही है| उसका उद्देश्य व्यक्तिगत मुक्ति नहीं है| उसका एकमात्र उद्देश्य है ---- "आत्म समर्पण"|
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भगवान का शाश्वत वचन है -- "मच्चितः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि|"
यानी अपने आपको ह्रदय और मन से मुझे दे देने से तूँ समस्त कठिनाइयों और संकटों को मेरे प्रसाद से पार कर जाएगा| "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणम् व्रज | अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः|" समस्त धर्मों (सभी सिद्धांतों, नियमों व हर तरह के साधन विधानों का) परित्याग कर और एकमात्र मेरी शरण में आजा ; मैं तुम्हें समस्त पापों और दोषों से मुक्त कार दूंगा --- शोक मत कर|
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हम केवल उस यजमान की तरह हैं जो यज्ञ को संपन्न होते हुए देखता है; जिसकी उपस्थिति यज्ञ की प्रत्येक क्रिया के लिये आवश्यक है| सारे कर्म तो जगन्माता स्वयं करती हैं और यज्ञरूप में परमात्मा को अर्पित करती है| कर्ताभाव एक भ्रम है| जो लोग भगवान से कुछ माँगते हैं, उन्हें वे वही चीज़ देते हैं जो वे माँगते हैं| परन्तु जो अपने आप को दे देते हैं और कुछ भी नहीं माँगते उन्हें वे अपना सब कुछ दे देते हैं| न केवल कर्ताभाव, कर्मफल आदि बल्कि कर्म तक को उन्हें समर्पित कर दो| साक्षीभाव या दृष्टाभाव तक उन्हें समर्पित कर दो| साध्य भी वे ही हैं, साधक भी वे ही हैं और साधना भी वे ही है| यहाँ तक कि दृष्य, दृष्टी और दृष्टा भी वे ही हैं|ॐ तत् सत्|
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"ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै |
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ||"
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते |
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ||"
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय| हर हर महादेव| ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
पौष शु. ११ वि.सं.२०७२| 20जनवरी2016.

चित्त की वृत्तियों का निरोध करना .....

चित्त की वृत्तियों का निरोध करना .....
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चित्त की वृत्ति दो रूपों --- श्वास-प्रश्वास और वासनाओं द्वारा व्यक्त होती हैं| वासनाएँ तो अति सूक्ष्म होती हैं जो पकड़ में नहीं आतीं| अतः स्थूल रूप श्वास-प्रश्वास के माध्यम से प्राण तत्व की चंचलता को स्थिर किया जाता है| प्राण तत्व के स्थिर होने पर मन और चित्त की वृत्तियाँ भी स्थिर यानि नियंत्रित हो जाती हैं|
एक सूक्ष्म प्राणायाम है जो सुषुम्ना नाड़ी में किया जाता है| इस से प्राण तत्व की चंचलता कम होती है| यह चित्त की वृत्तियों के निरोध का एक अति प्रभावशाली साधन है|
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चित्त की वृत्तियों के निरोध को योग बताया गया है| चित्त की वृत्तियाँ अधोमुखी होती हैं, उनका अधोगमन रोक कर उन्हें ऊर्ध्वमुखी बनाना ही उनका निरोध है| चंचल मन सबसे बड़ी बाधा है जिस पर विजय पाई जाती है चंचल प्राण को स्थिर कर| प्राण तत्व तक पहुँचने के लिए श्वास-प्रश्वास एक माध्यम है| अजपाजाप इसमें बहुत सहायक है| पर बिना भक्ति के कोई एक क़दम भी नहीं चल सकता योग मार्ग पर|
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योग है .... महाशक्ति कुण्डलिनी का परमशिव से मिलन|
योग मार्ग में यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) और नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान) पर जोर इसी लिए दिया है कि बिना सदाचार के की गयी साधना साधक को या तो विक्षिप्त कर देती है या आसुरी जगत का उपकरण बनाकर असुर बना देती है| यह एक दुधारी तलवार है| सदाचार पूर्वक की गयी साधना दैवीय जगत से जोड़ती है|
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परमात्मा के प्रति अहैतुकी परमप्रेम एक ऐसी शक्ति है जो सब बाधाओं के पार पहुंचा देती है|
सभी को शुभ कामनाएँ| आप सब के ह्रदय में प्रभु के प्रति प्रेम जागृत हो|
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय| हर हर महादेव| ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
पौष शु. ११ वि.सं.२०७२| 20जनवरी2016.

निज विवेक से अपने अनुभूतिजन्य विचारों पर दृढ़ रहें .....

निज विवेक से अपने अनुभूतिजन्य विचारों पर दृढ़ रहें .....
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मैं अब तक जीवन में जितने भी लोगों से मिला हूँ, उन में से अधिकाँश में एक बात सामान्य देखी है कि उनकी चिंतनधारा दूसरों के विचारों के इर्दगिर्द ही सीमित रहती थी या है| स्वतंत्र विचारक बहुत कम नाममात्र के ही मिले हैं जीवन में| अधिकाँश लोग दूसरों का ही जीवन जीते हैं, स्वयं का नहीं| हमें अपनी मौलिकता को खोज कर उस पर दृढ़ रहना चाहिए|
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अपना चिंतन स्वतंत्र रहे| सत्य की खोज में हम स्वयं लगे रहें और निजानुभव से जिस भी सत्य का आभास हो उस पर दृढ़ता से डटे रहें| बहुत पहले की बात है, स्वामी रामतीर्थ का साहित्य पढ़ते पढ़ते एक पंक्ति पर कुछ देर के लिए मैं अटक गया था जिसका भावार्थ था कि परमात्मा को खोजते खोजते हम स्वयं को ही पा लेते हैं| वे स्वयं को सदा परमात्मा से अभिन्न मानते थे| अपने इस विचार पर वे सदा दृढ़ रहे, उन्होंने कभी यह सोचा भी नहीं कि अन्य लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं|
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जीवन में परम सत्य की खोज भी एक गहन अभीप्सा और तड़फ का परिणाम है जो सब में नहीं होती| धन्य हैं वे लोग जिनके हृदय में ऐसी प्रचंड अग्नि प्रज्ज्वलित हो रही है या है| यह कई जन्मों के अच्छे कर्मों से प्राप्त होती है| इसे दूसरों पर थोपा नहीं जा सकता| थोपने का प्रयास भी ना करें| अपना स्वयं का जीवन जीयें और यदि हमारे में कोई अच्छाई होगी तो दूसरे भी उसका अनुसरण करेंगे| दूसरों को अपना अनुयायी बनाने का प्रयास ना करें| यह बहुत बड़ी हिंसा है|
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जब हम स्वयं को अति महत्वपूर्ण मान लेते हैं और सोचते हैं कि हम ही सही हैं और अन्य सब गलत, और अन्य सब हमारी ही बात मानें, तब हम जाने अनजाने में मायावी यानि नकारात्मक शक्तियों के उपकरण बन जाते हैं|
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यह दुनिया हमारे बिना भी चल रही थी और हमारे बिना भी चलती रहेगी| हर पल हज़ारों लोग काल के गाल में समा रहे हैं, फिर भी हम स्वयं को अमर मान रहे हैं|
हम उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं जितना हम स्वयं को मानते हैं| अब तक पता नहीं कितने लोग आये और चले गए, उन सब के बिना भी दुनियाँ चल रही है|
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यह सृष्टि परमात्मा की है और उसे हमारे सुझावों की आवश्यकता नहीं है| वह अपनी सृष्टि चलाने में सक्षम है| एकमात्र अच्छा कार्य जो हम कर सकते हैं वह है अपनी सर्वश्रेष्ठता यानि अपनी यथासंभव पूर्णता को पाने का प्रयास करते रहें| उस परम सत्य परमात्मा को पाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है उसे पाने का निरंतर प्रयास करना ही हमारा परम कर्तव्य और लक्ष्य हो सकता है|
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कुछ भी ना देखें, किसी ओर भी ना देखें, सिर्फ अपना लक्ष्य जो एकदम सामनें एक विराट ज्योति के रूप में परिलक्षित हो रहा है| उसी की ओर बढ़ते रहें| गिर भी जाएँ तो कोई बात नहीं, मर भी जाएँ तो कोई बात नहीं| न जाने कितनी बार मरे हैं, एक बार और सही| जीवन तो निरंतरता है, फिर मिल जाएगा| हार ना मानो, चलते रहो|
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इस बात का कोई महत्व नहीं है कि अपने साथ क्या होता है| महत्व सिर्फ और सिर्फ इसी बात का है कि हम अपने अनुभवों से क्या बनते हैं| इस तरह गिरते गिरते एक दिन हम पाएँगे की हम स्वयं परमात्मा के ह्रदय में हैं और उनके साथ एकाकार हैं|
उनको अपनी दृष्टी से कभी ओझल मत होने दो| बेशर्म होकर उनके पीछे पड़ जाओ|
एक दिन हम पायेंगे की वे स्वयं हमारे पीछे पीछे चल रहे हैं|
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संसार की दृष्टी में हम क्या हैं इसका कोई महत्व नहीं है| महत्व इसी बात का है कि हम परमात्मा की दृष्टी में क्या हैं|
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"ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै |
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ||"
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते |
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ||"
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय| हर हर महादेव| ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर