Friday, 5 August 2016

हम अपनी मनःस्थितियों व भावावेशों से क्यों दुखी होते हैं ? ......

हम अपनी मनःस्थितियों व भावावेशों से क्यों दुखी होते हैं ? ......
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यह बात पूर्णतः वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुकी है कि हमारी तरह तरह की मनःस्थितियों (Moods) और भावावेशों (अचानक भयंकर क्रोध आना) का कारण भूतकाल यानि पूर्व में हमारा इन्द्रिय सुखों में अत्यधिक लिप्त होना, और अपेक्षाओं की पूर्ति न होने व असहायता की भावना से उत्पन्न कुंठा ही है|
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इन मनःस्थितियों से किसी भी परिस्थिति में बचना चाहिए, अन्यथा ये पुनश्चः भूतकाल की यादें दिलाते हुए भ्रमित कर हमें पतन के मार्ग पर डाल देंगी|
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यह विषय इतना गंभीर है कि मुझे अभिव्यक्ति के लिए सही शब्द नहीं मिल रहे हैं, अतः ठीक से लिख नहीं पा रहा हूँ| फिर भी प्रयास कर रहा हूँ|
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जब भी ऐसी मनःस्थिति उत्पन्न हो हमें उसका मानसिक रूप से प्रतिरोध करना चाहिए| इसके लिए भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गीता में सिखाई गयी निःस्पृहता का अभ्यास करना होगा| यह एक साधना का विषय है अतः गीता का निरंतर गहन अध्ययन और नित्य नियमित ध्यान साधना करनी चाहिए|
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परमात्मा की कृपा सब पर बनी रहे| प्राण तत्व के रूप में परमात्मा सभी जीवों और जड़-चेतन सभी में व्याप्प्त है| प्रभु की आरोग्यकारी उपस्थिति सभी के देह, मन और आत्मा में प्रकट हो| सभी का कल्याण हो|
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ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ !!

सिर्फ बलशाली की ही पूछ होती है .......

सिर्फ बलशाली की ही पूछ होती है .......
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प्रिय मित्रो, नमस्ते !
भारत पर हुए चीनी आक्रमण के कुछ वर्षों के बाद की बात है| डा.सर्वपल्ली राधाकृष्णन चीन गए थे और चीन के राष्ट्र प्रमुख माओत्सेतुंग से मिले| उन्होंने माओ को भारतीय दर्शन --- वेदांत और गीता आदि की अनेक अच्छी अच्छी बातें बताईं| माओ ने सब बातें बड़े ध्यान से सुनी और डा.राधाकृष्णन से दो प्रश्न किये औए एक बात और कही जिसके बाद डा.राधाकृष्णन चुप हो गए और कुछ भी नहीं बोल सके|
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माओ ने पहला प्रश्न किया कि १९४८ के भारत-पाक युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को हरा दिया था फिर भी आधा कश्मीर पकिस्तान के कब्जे में क्यों है?
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माओ का दूसरा प्रश्न था कि आप युद्ध में हम से पराजित क्यों हो गए? आपके आध्यात्म, दर्शन और धर्म की बड़ी बड़ी बातें किस काम आईं?
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अंतिम बात माओ ने यह कही कि बहुत शीघ्र ही हम भारत से अक्साईचिन छीन लेंगे| आपमें हिम्मत है तो रोक कर दिखा देना| चीन ने वह भी कर के दिखा दिया क्योंकि हम बलहीन थे|
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हिंदी की एक बहुत प्रसिद्द कविता की पंक्ति है -
"क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो|"
हमारी विश्व शांति की बड़ी बड़ी बातें, बड़े बड़े उपदेश और झूठा दिखावा सब व्यर्थ हैं यदि हम बलहीन हैं|
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भारत पर यूनानी आकमण हुआ तब पौरुष से पराजित हुई यूनानी फौजें भाग खड़ी हुईं जब उन्हें पता चला कि मगध साम्राज्य की सेनाएं लड़ने आ रही हैं| फिर कई शताब्दियों तक किसी का साहस नहीं हुआ भारत की और आँख उठाकर देखने का|
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भारत में इस्लाम और ईसाई मत किसी संत महात्मा द्वारा नहीं आए| ये आये क्रूरतम आतंक और प्रलोभन द्वारा| हम सिर कटाते रहे और 'अहिंसा परमोधर्म' का जप करते रहे| यह गलत धारणा भर दी गई कि युद्ध करना सिर्फ क्षत्रियों का काम है| यदि पूरा हिंदू समाज एक होकर मुकाबला करता तो किसी का साहस नहीं होता हिन्दुस्थान की ओर नज़र उठाकर देखने का|
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समय के साथ हम अपनी मान्यताओं और सोच को नहीं बदल सके|
वर्तमान में हम फिर संकट में हैं| हमें सब तरह के भेदभाव मिटाकर एक होना होगा और शक्ति-साधना करनी होगी, तभी हम अपना अस्तित्व बचा पाएंगे| अपने सोये हुए क्षत्रियत्व और ब्रह्मत्व को जागृत करना होगा|
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धर्मगुरुओं और आचार्यों से निवेदन है कि वे हिंदू समाज का मार्गदर्शन करें| अन्यथा सनातन हिंदू धर्म नहीं बचेगा और ये दर्शन और आध्यात्म की बातें निराधार हो जायेंगी|
ओम् |

गुरु प्रदत्त साधना ही करनी चाहिए ......

गुरु प्रदत्त साधना ही करनी चाहिए ......
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जब ह्रदय में भक्ति (परम प्रेम) और अभीप्सा जागृत होती है, तब जीवन में सद्गुरु के रूप में परमात्मा का अवतरण निश्चित रूप से होता है| इसमें कोई संदेह नहीं है|
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गुरु ही जिज्ञासु को पात्रता के अनुसार साधना का सही मार्ग दिखाता है|
एक विद्यार्थी चौथी कक्षा में पढ़ता है, एक दसवीं में, एक कॉलेज में, और किसी ने पढाई आरम्भ ही की है; इन सब की पढाई एक जैसी नहीं हो सकती| सब को अपनी अपनी पात्रता और योग्यता के अनुसार ही प्रवेश और अध्ययन का विषय मिलता है|
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इसी तरह सब की साधना भी एक जैसी ही नहीं हो सकती| एक सद्गुरु ही यह निर्णय कर सकता है कि किस साधक के लिए कौन सी साधना उचित है|
अतः सदा गुरु प्रदत्त साधना ही करनी चाहिए, और वह भी गुरु को समर्पित होकर| इससे साधना में कोई भूल होने पर गुरु महाराज उसका शोधन कर देते हैं|
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गुरु को सामान्य मनुष्य मानना अज्ञानता है| साधक को अपनी साधना हेतु गुरु से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए| यह आवश्यक नहीं है कि गुरु भौतिक देह में ही हो| कई बार पूर्व जन्मों के गुरु भी सूक्ष्म देह में आकर जिज्ञासु साधक का मार्गदर्शन करते हैं| जब तक गुरुलाभ नहीं होता तब तक भगवान ही गुरु हैं|
हर किसी को गुरु नहीं बनाना चाहिए| गुरु एक ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य ही हो सकता है जिसने परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया हो| इसका पता परमात्मा की कृपा से तुरंत चल जाता है| जब हम भगवान को ठगना चाहते हैं तो हमें ठगगुरु मिल जाते हैं| श्रद्धावान को सदा सद्गुरु ही मिलते हैं|
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ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||

Monday, 1 August 2016

आज वास्तव में शिवकृपा की वर्षा हो रही है .........

आज वास्तव में शिवकृपा की वर्षा हो रही है .........
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आज श्रावण के पवित्र माह का द्वितीय सोमवार है और इस श्रावण मास की शिवरात्री भी है| आज भगवान शिव की साक्षात् परम कृपा बरस रही है|
आज भगवान शिव का चाहे थोड़ा सा ही ध्यान करो, बड़ी सुन्दर अनुभूतियाँ होंगी| किसी शिवालय में जाकर भगवान शिव का अभिषेक करो और वहीं बैठकर उन का ओंकार रूप में ध्यान करो, आनंद से भर जाओगे|
हमने घर पर ही एक पारद शिवलिंग, और एक नर्मदेश्वर बाणलिंग स्थापित कर रखा है जिस का नित्य अभिषेक होता है| आज स्वप्रेरणा से नर्मदेश्वर बाणलिंग को भस्म स्नान और खस के इत्र से स्नान कराया, जिसकी अनुभूतियाँ बड़ी सुखद थीं|
भगवान शिव की कृपा सब पर हो|
ॐ नमःशिवाय ! ॐ नमःशिवाय ! ॐ नमःशिवाय ! ॐ ॐ ॐ ||
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(नर्मदा नदी में ओंकारेश्वर के पास "धावड़ी कुंड" नामक एक स्थान है, जहां से प्राप्त शिवलिंग को बाणलिंग कहते हैं| यह पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है| यह कभी शिवभक्त वाणासुर का यज्ञकुंड था जो कालान्तर में नर्मदा में समाहित हो गया| अब तो वहाँ बाँध बनने से धावडी कुन्ड भी नर्मदा जल में डूब गया है|)

नियमित गहन और दीर्घ ध्यान साधना की आवश्यकता .......

नियमित गहन और दीर्घ ध्यान साधना की आवश्यकता .......
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आप सभी निजात्माओं को नमन ! आज कई दिनों के पश्चात फेसबुक पर उपस्थित हुआ हूँ| भौतिक रूप से आप सब से दूर था पर आप सब मेरे ह्रदय में थे| लिखने की आदत छूट सी गयी है| कुछ दिनों में लिखने का अभ्यास पुनश्चः हो जाएगा|
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कभी कभी एकांत में दूर जाकर उचित वातावरण में अधिकाधिक समय देकर गहन और दीर्घ काल तक साधना में रहना चाहिए| पर जहाँ भी रहें नियमित गहन ध्यान साधना आवश्यक है क्योंकि हमारा अवचेतन मन अथाह है जिसमें इस जन्म के ही नहीं, अनेक जन्मों के अच्छे-बुरे संस्कार भरे हुए हैं; कब कौन सा कुसंस्कार जागृत हो जाए कुछ कह नहीं सकते|
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कई बार अनायास हम ऐसे गलत कार्य कर बैठते हैं जिन पर विश्वास नहीं कर सकते कि हमारे होते हुए भी यानी in spite of me यह कैसे हो गया| यह हमारे अवचेतन मन में छिपे कुसंस्कारों के अनायास जागृत होने से होता है|
नियमित गहन और दीर्घ साधना से अवचेतन मन में छिपे कुसंस्कार नष्ट होते हैं| अन्य कोई मार्ग नहीं है|
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नियमित ध्यान साधना से हमारा अधिचेतन मन सक्रिय हो जाता हैं जो अंतर्ज्ञान यानि सीधे सत्य का बोध कराता है और किसी भी तरह के गलत कार्यों से हमें रोकता है|
अधिचेतन मन की जागृति .... समाधि की प्रथम अवस्था है, जो आत्मा की शुद्ध, अंतर्ज्ञानात्मक और आनंद दायक चेतना है| अपनी मनोदशाओं पर नियंत्रण का अन्य कोई मार्ग नहीं है|
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पुनश्चः आप सब को नमन ! आप सब मेरी ही निजात्मा हैं, मेरे ही प्राण हैं| आप सब के कल्याण में ही मेरा कल्याण है| ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ !

एक विचार बहु विवाह के बारे में ........

एक विचार .....
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मैं प्रबुद्ध और चिंतनशील लोगों के विचार जानना चाहता हूँ बहु-विवाह पर| वर्तमान में एक धर्म विशेष के लोगों को अनेक पत्नियां रखने की छूट है| उनकी जनसंख्या तीब्रता से बढ़ रही है, वहीं हिंदुओं की तीब्रता से घट रही है|
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सनातन धर्म में एक से अधिक पत्नियां रखने का कहीं भी निषेध नहीं है| भारत के सभी राजाओं के (भगवान श्री राम को छोड़कर) अनेक पत्नियाँ थीं| अनेक ऋषि-मुनियों की भी अनेक पत्नियाँ थीं| सामान्य नागरिकों के लिए भी बहु-विवाह अति सामान्य था| भारत में तलाक की अनुमति कभी नहीं थी| एक से अधिक पत्नी रखना कभी भी बुरा नहीं माना जाता था| जवाहर लाल नेहरु ने हिंदू विवाह कानून हिंदुओं पर थोपा वह धर्म-विरुद्ध था| या तो यह कानून सभी नागरिकों के लिए समान होता पर सिर्फ हिंदुओं के लिए ऐसा बनाना एक सोची समझी जेहादी चाल थी|
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समाज में बहुत सी परित्यक्ता, असहाय, निर्धन और विपरीत परिस्थितियों की शिकार महिलायें होती हैं| कोई हिंदू चाह कर भी इन्हें नहीं अपना सकता| ऐसी स्त्रियाँ अंततः विधर्मियों के जाल में फँस जाती हैं और उनकी जनसंख्या और भी तेजी से बढ़ती है|
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हिंदुओं को यदि बचे रहना है तो या तो सामान नागरिक क़ानून की मांग करनी चाहिए या इस कानून में संशोधन की मांग करनी चाहिए और बहु-विवाह करने चाहियें| अन्यथा अगले बीस तीस साल में हिंदुओं की वही गति होगी जो आज पाकिस्तान और बंगला-देश में हो रही है| याद रखिये कि आप की धर्म-निरपेक्षता तभी तक है जब तक यहाँ हिंदू बाहुल्य है| जब हिंदू अल्पसंख्यक हो जयेगा तब आप अपनी धर्मनिरपेक्षता का कीर्तन करते रहना पर सुनने वाला कोई नहीं होगा और यह देश पाकिस्तान का ही भाग होने को विवश कर दिया जाएगा|
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आप सब से हाथ जोड़कर प्रार्थना है कि उपरोक्त विषय पर विचार करें और जन मानस में चेतना जगाएं| इस विचार से सभी को अवगत कराएं| धन्यवाद|

एक अनुभूति .....

एक अनुभूति .....
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हमारा जैसा भौतिक और मानसिक परिवेश है, तदनुरूप ही सूक्ष्म जगत के प्राणी हमारे पास आते हैं और हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं| जैसे भौतिक व मानसिक वातावरण में हम रहते हैं वैसे ही सूक्ष्म जगत के प्राणियों को हम आकर्षित करते हैं, जो देवता भी हो सकते हैं और निम्न जगत के अधम प्राणी भी जिन्हें हम आँखों से नहीं देख सकते पर अनुभूत कर सकते हैं|
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सूक्ष्म और कारण जगत, भौतिक जगत से दूर नहीं है सिर्फ उनके स्पंदन अलग हैं, वैसे ही जैसे एक ही टेलीविजन पर अलग अलग चैनल पर अलग अलग कार्यक्रम|
अतः भौतिक रूप से अपने आसपास स्वच्छता और पवित्रता रखें| सुन्दर और स्वच्छ वातावरण में रहें| आपके यहाँ देवताओं का निवास होगा अन्यथा बुरी आत्माएँ आकर्षित होंगी| वैसे ही अपने मन को भी निर्विकार रखने का निरंतर प्रयास करते रहें तो अच्छा है||
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हमारे विचार और भाव ही हमारे कर्म हैं| कर्म का अर्थ भौतिक क्रिया नहीं है| हमारे विचार और भाव ही हमारे कर्म हैं जो निरंतर हमारे खाते में जुड़ते रहते हैं| उनका फल हमें जन्म-जन्मान्तरों में अवश्य मिलता है| जैसे हमारे विचार और भाव होंगे, जैसा हमारा चिंतन होगा और वैसे ही प्राणियों को हम आकर्षित करते हैं|
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अतः हमारा हर विचार सद्विचार हो और हर संकल्प शिवसंकल्प हो| निरंतर प्रभु को अपने ह्रदय में रखें| बाहर का जगत हमारे विचारों की ही अभिव्यक्ति है|

ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||