आत्मज्ञान (Self Realization) ही परम धर्म है। आत्मस्वरूप का चिंतन न करना बहुत बड़ी हिंसा, निजात्मा का तिरस्कार और आत्म-हत्या है।
.
इस भौतिक देह के भ्रूमध्य से एक ज्योति निकल कर सारी सृष्टि में फैल जाती है। वह ज्योति सारी सृष्टि में, और सारी सृष्टि उस ज्योति में होती है। उस ज्योति से ही प्रणव का एक मधुर नाद भी निःसृत होता रहता है। वह सर्वव्यापी ज्योति और वह नाद -- मैं स्वयं हूँ, यह नश्वर देह नहीं। उस चेतना में मैं सच्चिदानंद परमब्रह्म के साथ एक होकर रहता हूँ। हरेक सांस के साथ अजपा-जप (हंसवतीऋक/हंसःयोग) चलता रहता है। कुंभक के समय, और जब भी प्रेरणा मिले तब तेलधारा की तरह नादानुसंधान होता रहता है।
.
श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय का उनत्तीसवाँ मंत्र एक बहुत ही गोपनीय साधना का संकेत करता है जिसे प्राणक्रिया कहते हैं --
"अपाने जुह्वति प्राण प्राणेऽपानं तथाऽपरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥४:२९॥
उपरोक्त विद्या एक गोपनीय विद्या है जिसे आचार्य अपने शिष्य की पात्रता देखकर उसे अपने सामने बैठाकर सिखाता है। यह आत्म-साधना आध्यात्मिक यज्ञ का एक रूप है, जिसे महावतार बाबाजी ने क्रिया-योग का नाम दिया है। यह भी इस जीवन की एक उपलब्धि है।
.
आप सब मेरी ही निजात्मा और मेरे ही प्राण हो। आप सब को नमन॥ ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
१० जनवरी २०२६
No comments:
Post a Comment