Thursday, 2 April 2026

भक्ति और सेवा के मार्ग में श्रीहनुमान जी से बड़ा अन्य कोई भक्त या सेवक, भगवान का नहीं है ---

भक्ति और सेवा के मार्ग में श्रीहनुमान जी से बड़ा अन्य कोई भक्त या सेवक, भगवान का नहीं है। वे स्वयं प्रत्यक्ष देवता हैं। सफलता उनके पीछे-पीछे चलती है। उन्होंने कभी कोई विफलता नहीं देखी। असत्य और अंधकार की कोई आसुरी शक्ति, उनके समक्ष नहीं टिक सकती। उनसे अधिक शक्तिशाली और ज्ञानी अन्य कोई नहीं है। हनुमान जी की शक्ति ही हम सब की और इस राष्ट्र की रक्षा करेगी।

"अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं, दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं, रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥"
श्रीहनुमान जी की अनुभूतियाँ हमें गहरे ध्यान में होती है। जब भी हम सांस लेते हैं, तब हम पाते हैं कि वे कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में मूलाधारचक्र से सहस्त्रारचक्र के मध्य विचरण कर रहे हैं। और भी गहरे ध्यान में सहस्त्रारचक्र के ऊपर का आवरण हट जाता है, और सूक्ष्म जगत में ईश्वर की अनंतता से भी परे एक ज्योतिर्मय जगत के दर्शन होते हैं जिसके बारे में श्रीमद्भगवद्गीता कहती है --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
श्रुति भगवती जिसके बारे में कठोपनिषद (२.२.१५) व मुंडकोपनिषद (२.२.१०) में कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥"
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उपरोक्त अनुभूतियाँ हमें हनुमान जी की परम कृपा से ही होती हैं जो प्राण-तत्व और वायु-तत्व के देवता हैं। वे हमें भक्ति, शक्ति, साहस और बुद्धि प्रदान करते हैं। वे हमें निस्वार्थ सेवा और समर्पण सिखाते हैं। वे हमारी हर सांस में जीवित और अमर हैं। उनका निवास मेरे हृदय (विचारों व भावों) में और मेरी साँसों में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। ध्यान में उनकी निरंतर अनुभूति मुझे अपनी चेतना में होती है। मुझे अपना माध्यम बना कर वे भगवान श्रीराम का ध्यान स्वयं करते हैं। यह उनकी परम अनुकंपा है। मैं उन्हें नमन करता हूँ। उन्हीं की परम कृपा मुझे राम जी का बोध कराती है।
"मनोजवं मारुततुल्यवेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं, श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥" ॐ ॐ ॐ !!
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कृपा शंकर / २ अप्रेल २०२६

Wednesday, 1 April 2026

भगवान ने ही मुझे पकड़ रखा है ---

लोग मुझसे पूछते हैं कि आपने भगवान को क्यों पकड़ रखा है? वास्तविकता यह है कि मैंने भगवान को नहीं पकड़ा, भगवान ने ही मुझे पकड़ रखा है। अब मैं असहाय हूँ। किसी को घने वन में कोई सिंह या व्याघ्र पकड़ ले तो वह मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता। जो करना है वह तो सिंह या व्याघ्र ही करेगा। भगवान की पकड़ से मैं बहुत अधिक आनंदित हूँ। उनकी पकड़ बनी रहे, और उसमें निरंतर वृद्धि हो। ॐ तत् सत् !!

कृपा शंकर
२८ मार्च २०२६

उन अनंतातीत पुराण-पुरुष परमात्मा को नमन ---

 उन अनंतातीत पुराण-पुरुष परमात्मा को नमन ---

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लगता है कि मैंने कभी किसी पूर्वजन्म में कोई पुण्यकार्य किया होगा, जिसका फल अब मिल रहा है। इस जन्म में यदि भूल से भी कुछ अच्छा काम किया है तो वह मुझे याद नहीं है। इस संसार के लिए एक अनुपयुक्त व्यक्ति (Misfit person) मात्र बन कर रह गया हूँ। कहीं भी जाऊँ, कुछ भी करूँ, मन अनायास ही पुराण-पुरुष परमात्मा के चरण-कमलों में स्वतः ही लिप्त हो जाता है। कुछ भी प्रयास नहीं करना पड़ता।
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अब जैसी उन पुराण-पुरुष परमात्मा की इच्छा, जो अनायास ही मुझे प्राप्त हो रहे हैं। अब इसमें आनंद भी आने लगा है। आध्यात्म का कोई भी रहस्य अपने आप में अब रहस्य नहीं रहा है। भगवान सहज रूप से स्वयं को व्यक्त कर रहे हैं
(यहाँ सहज का अर्थ है— जिसने साथ-साथ जन्म लिया है)।
मैं उन पुराण-पुरुष की शरण में हूँ, जिनकी शरणागति से सभी श्रद्धालुओं ने कृतकृत्य होकर निज जीवन को कृतार्थ किया है। वे पुराण-पुरुष ही पुरुषोत्तम हैं, और वे ही परमशिव हैं। मैं एक अकिंचन निमित्त साक्षी-मात्र, उन्हें नमन करता हूँ। आचार्य शंकर ने अपने ग्रंथ "विवेक चूड़ामणि" के १३१ वें मंत्र में पुराण-पुरुष की वंदना की है --
"एषोऽन्तरात्मा पुरुषः पुराणो निरन्तराखण्ड-सुखानुभूति |
सदा एकरूपः प्रतिबोधमात्र येनइषिताः वाक्असवः चरन्ति ||" ॐ ॐ ॐ !!
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श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन ने पुराण-पुरुष की स्तुति इस प्रकार की है --
"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥"
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥११:३९॥"
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥"
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मैं पुराण-पुरुष भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व अर्पित करता हूँ। ये मन बुद्धि चित्त अहंकार, कारण सूक्ष्म व भौतिक देह, अपनी तन्मात्राओं सहित सारी इंद्रियाँ, सारा धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, अच्छे-बुरे सारे कर्म और उनके फल, सब कुछ उन्हें अर्पित है। स्वयं को भी शरणागति द्वारा उन्हें समर्पित करता हूँ। वे मेरा समर्पण स्वीकार करे।
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"कस्तूरी तिलकम् ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम् ,
नासाग्रे वरमौक्तिकम् करतले, वेणु: करे कंकणम्।
सर्वांगे हरिचन्दनम् सुललितम्, कंठे च मुक्तावली,
गोपस्त्री परिवेष्टितो विजयते, गोपाल चूड़ामणि:॥"
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"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने,
प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:॥"
"नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च,
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥"
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"वसुदॆव सुतं दॆवं कंस चाणूर मर्दनम्।
दॆवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दॆ जगद्गुरुम्॥"
"वंशीविभूषित करान्नवनीरदाभात् ,
पीताम्बरादरूण बिम्बफला धरोष्ठात्।
पूर्णेंदु सुन्दर मुखादरविंदनेत्रात् ,
कृष्णात्परं किमपि तत्वमहं न जाने॥"
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
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कृपा शंकर
२९ मार्च २०२६

नास्तिक व आस्तिक कौन हैं? .

 (प्रश्न) : नास्तिक व आस्तिक कौन हैं?

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(उत्तर) : जो वेदों को अपौरुषेय नहीं मानते, वे नास्तिक हैं। जो वेदों को अपौरुषेय मानते हैं, वे आस्तिक हैं।
भारत के नास्तिक मतों में प्रमुख हैं -- जैन , बौद्ध, व चार्वाक मत।
आज यहाँ चार्वाक मत की ही चर्चा कर रहा हूँ, अन्य नास्तिक मतों की बाद में किसी दिन करूँगा। वर्तमान में चार्वाक मत संगठित मत नहीं है, लेकिन चार्वाक मतानुयायी छद्म रूप से भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में भरे पड़े हैं। भारत में तो उनकी संख्या बहुत अधिक है।
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जीवन में दुख से बचकर अधिकतम इंद्रिय सुख पाने को ही बुद्धिमानी मानना— चार्वाक मत है। यह दर्शन 'भोगवाद' और 'सुखवाद' पर जोर देता है और मृत्यु के बाद जीवन को नहीं मानता। चार्वाक मत केवल प्रत्यक्ष प्रमाण (जो आँखों से दिखे) को स्वीकार करता है। यह आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म, स्वर्ग-नर्क और वेदों को पूरी तरह नकारता है। इसका मुख्य सिद्धांत "यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्" (जब तक जीओ तब तक सुख से जीओ, उधार लेकर भी घी पीओ) है। किसी भी युक्ति से दूसरों का पैसा हड़पो और खूब मौज-मस्ती करो। दूसरों का पैसा कभी वापस मत करो। ये लोग यदि किसी भगवान को मानते भी हैं तो उसी को मानते हैं, जो उनकी चोरी में सहायक हो। ऐसे लोग भारत में कदम-कदम पर हैं, जो दूसरों को ठगने का अवसर ढूंढते रहते हैं। चार्वाक का नाम उन्होंने कभी सुना नहीं होगा, लेकिन वे कार्य सारा उसी के मतानुसार करते हैं। ये वामपंथी भी चार्वाक से कम नहीं हैं।
कृपा शंकर
३० मार्च २०२६

ईश्वर के मार्ग पर हम भटकते क्यों हैं ?

 ईश्वर के मार्ग पर हम भटकते क्यों हैं ?

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कुछ देर पूर्व ही मन में एक प्रश्न उठा कि हम भटकते क्यों हैं? तभी निम्न पंक्तियाँ लिखने की प्रेरणा प्राप्त हुई, जिन्हें लिख रहा हूँ। आध्यात्मिक साधना में भटकाव का एकमात्र कारण -- हमारा राग-द्वेष और अहंकार है। अन्य कोई कारण नहीं है। भगवान ने इसका निदान "वीतरागता" बतलाया है। राग, द्वेष और अहंकार से मुक्ति ही वीतरागता है। हमारी प्रज्ञा निरंतर परमात्मा में स्थित रहे तो हम स्थितप्रज्ञ कहलाते हैं। वहाँ कोई भटकाव नहीं है। लेकिन एक वीतराग व्यक्ति ही स्थितप्रज्ञ हो सकता है। वीतराग व्यक्ति ही महत् तत्व से जुड़कर महात्मा कहलाता है। वीतरागता ही महात्मा होने का लक्षण है।
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गुरुकृपा से हम कूटस्थ में ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करते हुए अजपा-जप, और पूर्ण या अर्धखेचरी मुद्रा में ओंकार का श्रवण व जप करते है। यह साधना हमें वीतरागता की ओर अग्रसर करती है। अंततः भगवान की अनुकंपा ही हमें सिद्धि प्रदान करती है। मुख्य बात भगवान की कृपा है। हमें भगवान की परम कृपा कैसे प्राप्त हो? यही हमारे विचार का विषय हो।
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हमारे वश में एक ही बात है, और वह है— भगवान से परम प्रेम। भक्ति-सूत्रों का छठा सूत्र कहता है -- "यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति स्तब्धो भवति आत्मारामो भवति।" यहाँ आत्माराम का अर्थ है आत्मा में रमण। जो आत्माराम है वह बाहरी विषयों की खोज छोड़ देता है, व अपने भीतर ही आत्मा के परमानंद में निरंतर संतुष्ट और लीन रहता है। यह आत्मा में रमण यानि आत्माराम होना भी एक बहुत बड़ी साधना है जो हमें वीतराग बनाती है।
कठोपनिषद में भी इस विषय पर कुछ उपदेश हैं जो हमें -- ''ज्ञानवान, सचेतनमना तथा सदा शुचिमान् होकर परम पद को प्राप्त करने को कहते हैं।
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ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
३० मार्च २०२६

आज श्रमण परंपरा (जैन मत) के २४ वें व अंतिम तीर्थंकर महावीर की जयंती है ---

आज श्रमण परंपरा (जैन मत) के २४ वें व अंतिम तीर्थंकर महावीर की जयंती है। तीर्थंकर का अर्थ है जो स्वयं तप के माध्यम से आत्मज्ञान प्राप्त करते है और संसार-सागर से पार लगाने वाले तीर्थ की रचना करते हैं। तीर्थंकर वह व्यक्ति है जिसने पूरी तरह से क्रोध, अभिमान, छल, इच्छा, आदि पर विजय प्राप्त की है। इस अवसर पर सभी श्रद्धालुओं का अभिनंदन।

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जैन मत का लक्ष्य है— "वीतरागता"। स्यात् इसी कारण मेरा आकर्षण महावीर स्वामी की शिक्षाओं के प्रति है। यह लेख लंबा न हो इसलिए "स्यादवाद" जिसे अनेकांतवाद, सप्तभङ्गी का सिद्धान्त, और "सापेक्षतावाद" भी कहते हैं की चर्चा इस लेख में नहीं कर रहा। इसी तरह "कैवल्य" शब्द पर भी चर्चा नहीं करूंगा। इस लेख में मैं बिना किसी पूर्वाग्रह के कम से कम शब्दों में श्रमण-परंपरा और ब्राह्मण-परंपरा में भेद, आस्तिकता, व नास्तिकता पर अपने विचार लिखूंगा।
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सभी जीना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता। सुख सबको प्रिय है, और दुःख अप्रिय। इसलिए हम जैसा व्यवहार दूसरों से स्वयं के प्रति चाहते हैं, वैसा ही व्यवहार दूसरों के प्रति भी करें। किसी भी प्राणी को मारना, काटना या प्रताड़ित करना अमानवीय क्रूरता है। हम जीयें और दूसरों को भी जीने दें -- यह महावीर की शिक्षाओं का सार है।
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महावीर का जन्म वैशाली के क्षत्रिय गणतंत्र राज्य कुण्डलपुर में हुआ था। तीस वर्ष की आयु में महावीर ने संसार से विरक्त होकर राज-वैभव त्याग दिया और संन्यास धारण कर आत्मकल्याण के पथ पर निकल गये। १२ वर्षो की कठिन तपस्या के बाद उन्हें केवल्यज्ञान प्राप्त हुआ। यह श्रमण परम्परा ही कालान्तर में जैन धर्म कहलाई। जैन का अर्थ होता है जितेन्द्रिय, यानि जिस ने मन आदि इन्द्रियों को जीत लिया है।
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श्रमण परम्परा के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे जिनके पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष है। ऋषभदेव का उल्लेख वेदों में भी है और भागवत में भी। तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अहिंसा को उच्चतम नैतिक गुण बताया। उनके पंचशील के सिद्धांत -- अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) और ब्रह्मचर्य हैं। योग-दर्शन में ये ही 'यम' कहलाते हैं। उन्होंने अनेकांतवाद व स्यादवाद जैसे अद्भुत सिद्धांत दिए। हम दूसरों के प्रति वही विचार एवं व्यवहार रखें जो हमें स्वयं को पसंद है। यह महावीर का "जीओ और जीने दो" का सिद्धांत है।
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श्रमण परम्परा और ब्राह्मण परम्परा दोनों ही अति प्राचीन काल से चली आ रही हैं। इनमें अंतर यह है कि श्रमण परम्परा नास्तिक है जो वेदों को अपौरुषेय नहीं मानती। ब्राह्मण परम्परा आस्तिक है जो वेदों को अपौरुषेय मानती है। लेकिन इन दोनों में एक समानता भी है। ये दोनों परम्पराएँ आत्मा की शाश्वतता, पुनर्जन्म और कर्मफलों के सिद्धांत को मानती हैं।
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ब्राह्मण परम्परा में ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म को ही मोक्ष का आधार मानता है और वेदवाक्य को ही ब्रह्म-वाक्य मानता है।
श्रमण परम्परा में श्रमण वह है जो निज श्रम द्वारा मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को मानता है और जिसके लिए जीवन में ईश्वर की नहीं बल्कि श्रम की आवश्यकता है। श्रमण परम्परा ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानती।
श्रमण परम्परा का आधार -- श्रमण, समन, शमन -- इन तीन शब्दों पर है। 'श्रमण' शब्द 'श्रमः' धातु से बना है, जिसका अर्थ है 'परिश्रम करना'। श्रमण शब्द का उल्लेख वृहदारण्यक उपनिषद् में 'श्रमणोऽश्रमणस' के रूप में हुआ है। यह शब्द इस बात को प्रकट करता है कि व्यक्ति अपना विकास अपने ही परिश्रम द्वारा कर सकता है। सुख–दुःख, उत्थान-पतन सभी के लिए वह स्वयं उत्तरदायी है। 'समन' का अर्थ है, समताभाव, अर्थात् सभी को आत्मवत् समझना, सभी के प्रति समभाव रखना। जो बात अपने को बुरी लगती है, वह दूसरे के लिए भी बुरी है। ‘शमन' का अर्थ है अपनी वृत्तियों को शान्त रखना, उनका निरोध करना। जो व्यक्ति अपनी वृत्तियों को संयमित रखता है वह महाश्रमण है। इस प्रकार श्रमण परम्परा का मूल आधार श्रम, सम, शम इन तीन तत्त्वों पर आश्रित है।
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अंग्रेज़ इतिहासकारों के अनुसार तीर्थंकर महावीर का जन्म ईसा से ५९९ वर्ष पूर्व हुआ था, लेकिन आधुनिक भारतीय गणनाओं के अनुसार बुद्ध का जन्म ईसा से १८०० वर्ष पूर्व हुआ था, और तीर्थंकर महावीर उनसे आयु में ३० वर्ष बड़े थे। अंग्रेज़ इतिहासकारों ने भारतीयों को नीचा दिखाने के लिए द्वेष व दुर्भावनावश भारत का गलत इतिहास लिखा है।
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कुछ अस्वस्थ होने के कारण यह लेख आज प्रातः पोस्ट नहीं कर पाया, इसलिए शाम को पोस्ट कर रहा हूँ। सभी को नमन !! ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
३१ मार्च २०२६

भगवान की अनन्य पराभक्ति हमारा स्वभाव हो, और सभी के हृदयों में जागृत हो ---

भगवान के और हमारे मध्य एक परम प्रेममयी सत्ता अवश्य है, जिसे हम जगन्माता या भगवती कहते हैं। इस विषय पर मैंने अपनी अति सीमित व अति अल्प बौद्धिक क्षमतानुसार बहुत अधिक चिंतन-मनन किया है।
सिद्धान्त रूप से इस विषय पर मेरे कुछ संशय थे। मेरे एक परम विद्वान तपस्वी सन्यासी मित्र ने मुझे अपने सिद्ध गुरु महाराज से परिचय करवा कर उनसे अनेक सत्संग करवाये, और यह सुनिश्चित किया कि मेरे सारे संशय दूर हों।
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अब कोई संशय नहीं है, लेकिन अनेक जन्मों से जमा हुआ मैल, इतनी आसानी से नहीं छूटता। अपने पूर्व जन्मों के व इस जन्म में जमा हुए मैल से छुटकारा पाना इतना आसान नहीं है। फिर भी एक ईश्वरीय शक्ति सहायता कर रही है, जिन्हें हम जगन्माता कहते हैं। वे भगवती अपने किसी भी सौम्य या उग्र रूप में स्वयं को व्यक्त कर सकती हैं। मेरे लिए उनके सारे रूप सौम्य ही हैं, उनके किसी भी रूप में कोई उग्रता नहीं है।
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सिर्फ राजयोग ही पर्याप्त नहीं है, साधना में सफलता के लिए हठयोग और तंत्र का ज्ञान भी आवश्यक है। भूख और नींद पर विजय पाना भी एक चुनौती है। पर्याप्त शारीरिक व मानसिक क्षमता, संकल्प शक्ति, लगन, और पराभक्ति का होना भी आवश्यक है। बिना भक्ति के तो एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते।
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भगवान की अनन्य पराभक्ति हमारा स्वभाव हो, और सभी के हृदयों में जागृत हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
१ अप्रेल २०२४


भारत से नक्सलवाद का अंत ---

 भारत से नक्सलवाद का अंत ---

कल ३१ मार्च २०२६ को देश की संसद में माननीय गृहमंत्री श्री अमित शाह ने देश से नक्सलवाद समाप्त होने की घोषणा की थी। यह एक ऐतिहासिक घोषणा थी जो भारत के इतिहास में अमर रहेगी। नक्सलवादी आन्दोलन का विचार कानू सान्याल नाम के एक व्यक्ति के दिमाग की उपज था। उसको इस आंदोलन से इतनी ग्लानि हुई कि २३ मार्च २०१० को उसने आत्महत्या कर ली। इससे पूर्व उसका सहयोगी चारु मजूमदार सन १९७२ में हृदय रोग से मर गया था। यह एक रहस्य है कि कानू सान्याल इतना विद्रोही कैसे हो गया। निजी जीवन में वह एक गरीब ब्राह्मण और साधु व्यक्ति था जिसका जन्म एक सात्विक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उसका जीवन बड़ा सात्विक, और दिनचर्या बड़ी सुव्यवस्थित थी। भगवान ने उसे बहुत अच्छा स्वास्थ्य दिया था। सन १९६२ में वह बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री को काला झंडा दिखा रहा था कि पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जहाँ उसकी भेट चारु मजुमदार से हुई। चारु मजूमदार एक कायस्थ परिवार से था जो जो तेलंगाना के किसान आन्दोलन से जुड़ा हुआ था और जेल में बंदी था। जेल में ही दोनों मित्र बने, और जेल से छूटकर सन १९६७ में दोनों ने बंगाल के नक्सलबाड़ी नामक गाँव से तत्कालीन व्यवस्था के विरुद्ध एक घोर मार्क्सवादी आन्दोलन आरम्भ किया जो नक्सलवाद कहलाया। इस आन्दोलन में छोटे-मोटे तो अनेक नेता थे पर इनको दो प्रभावशाली कर्मठ नेता मिल गये -- एक तो था नागभूषण पटनायक, और दूसरा था टी.रणदिवे। इन्होंने आंध्र प्रदेश में श्रीकाकुलम के जंगलों से इस आन्दोलन का विस्तार किया।
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यह आन्दोलन पथभ्रष्ट हो गया जिससे कानु सान्याल और चारु मजूमदार में मतभेद हो गए और दोनों अलग अलग हो गए। चारु मजुमदार की मृत्यु सन १९७२ में हृदय रोग से हो गयी, और कानु सान्याल को इस आन्दोलन का सूत्रपात करने से इतनी अधिक मानसिक ग्लानि और पश्चाताप हुआ कि २३ मार्च २०१० को उसने आत्महत्या कर ली। उस समय के जितने भी नक्सलवादी थे, उनमें से लगभग आधे तो पुलिस की गोली से मारे गये थे, और बचे हुए आधों ने सरकार से माफी मांग ली और देश की मुख्यधारा में लौट आये।
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वर्तमान नक्सलवादियों का मूल नक्सलवाद से कोई संबंध नहीं है। मूल नक्सलवाद और नक्सलवादियों का अब कोई अस्तित्व नहीं है। वर्तमान नक्सलवादी और उनके समर्थक "ठग", "डाकू" और "तस्कर" के अलावा कुछ भी नहीं हैं, जिन्हें सिर्फ बंदूक की भाषा ही समझ में आती है। भारत सरकार ने उनका सही इलाज कर दिया। वे कोई भटके हुए नौजवान नहीं, अपितु कुटिल राष्ट्रद्रोही तस्कर हैं, जिनको बिकी हुई प्रेस, वामपंथियों और राष्ट्र्विरोधियों का समर्थन प्राप्त है।
वन्दे मातरं। भारत माता की जय।
कृपा शंकर
१ अप्रेल २०२६

"ॐ नमो हनुमते पवनपुत्राय वैश्वानरमुखाय पापदृष्टि-चोरदृष्टि हनुमदाज्ञास्फुर ॐ स्वाहा।"

 उपरोक्त पंक्ति एकमुखी हनुमत्कवच में आती है, जिसे अनेक श्रद्धालु अपने घर के मुख्य द्वार पर लिख कर रखते हैं। कहते हैं कि इस से घर में कोई चोर नहीं घुस सकता। पर जो घुस चुका है उसका क्या इलाज है? हमारा घर तो पूरा भारत है जहाँ पता नहीं कितने तस्कर, चोर-डाकू, और आतंकवादी नर-पिशाच घुसे हुए हैं जो इस राष्ट्र को नष्ट करना चाहते हैं। ये सब असत्य और अंधकार की शक्तियाँ हैं। हनुमान जी की शक्ति ही हम सब की और इस राष्ट्र की रक्षा करेगी। हनुमान जयंती पर श्रीहनुमान जी को नमन। वे इस राष्ट्र की रक्षा करें।

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"सभी दैवीय शक्तियाँ, भारत में छायी हुईं असत्य और अंधकार की शक्तियों का नाश करें। धर्म का अभ्युदय व वैश्वीकरण हो। भारत एक अखंड सत्यनिष्ठ और धर्मावलम्बी राष्ट्र बने। भारत की रक्षा हो।" ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर १ अप्रैल २०२६

शिव ही विष्णु हैं, और विष्णु ही शिव हैं ---

 "ॐ नमःशिवाय विष्णुरूपाय शिवरूपाय विष्णवे।

शिवस्य हृदयं विष्णु: विष्णोश्च हृदयं शिव:॥"
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मनुष्य की बुद्धि परमात्मा की ऊंची से ऊंची परिकल्पना जो कर सकती है, वह शिव और विष्णु की है। तत्व रूप में दोनों एक हैं। शिव ही विष्णु हैं, और विष्णु ही शिव हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम वासुदेव भी वे हैं, रामायण के राम भी वे हैं, और वेदान्त के ब्रह्म भी वे ही हैं। अपनी उच्चतम ऊर्ध्वस्थ चेतना में उनके विराटतम सर्वव्यापी ज्योतिर्मय रूप का ध्यान ही हमें करना चाहिये, जहां कोई भेद नहीं है।
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"भक्ति" -- भगवान से एक स्वाभाविक अनुराग और परमप्रेम को भक्ति कहते हैं, जिसके साथ साथ भगवान को उपलब्ध होने की एक स्वाभाविक अभीप्सा भी हो। बिना अभीप्सा के कोई आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो सकती। भक्ति की पूर्णता शरणागति और समर्पण में है।
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"साधना" के लिए आसन, मुद्रा और यौगिक क्रियाओं का ज्ञान आवश्यक है। साथ साथ दृढ़ मनोबल और बलशाली स्वस्थ शरीर रुपी साधन भी हो। मन में उठने वाले बुरे विचार और दुष्वृत्तियों से मुक्त होने का अभ्यास भी करते रहना पड़ता है।
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ध्यान हमेशा परमात्मा के अनंत ज्योतिर्मय ब्रह्मरूप और नाद का होता है। हम बह्म-तत्व में विचरण और स्वयं का समर्पण करें, -- यही आध्यात्मिक साधना है। परमात्मा के प्रति परमप्रेम और शरणागति/समर्पण का भाव हो तो साधना का मार्ग सरल हो जाता है।
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भगवान हम से पृथक नहीं हैं। हमें स्वयं को ही ईश्वर बनना पड़ता है। भगवान हमारे ही माध्यम से स्वयं को व्यक्त करते हैं। वे आकाश से उतर कर, या किसी अन्य विश्व से आने वाले कोई नहीं हैं। परमात्मा की अनुभूति में हम सब तरह की सीमितताओं से मुक्त होकर, असीम आनंद और असीम प्रेम (भक्ति) से भर जाते हैं। यह असीम प्रेम (भक्ति) और असीम आनंद ही आत्म-साक्षात्कार है, यही भगवत्-प्राप्ति है। यही हमारे जीवन का उद्देश्य है।
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सभी को मंगलमय शुभ कामनाएँ।
ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत्
कृपा शंकर
१ अप्रेल २०२५

Tuesday, 31 March 2026

होली के त्योहार को मनाने के तरीकों में एक सकारात्मक क्रांतिकारी परिवर्तन आया है जो स्वागत योग्य व हर्ष का विषय है|

 होली के त्योहार को मनाने के तरीकों में एक सकारात्मक क्रांतिकारी परिवर्तन आया है जो स्वागत योग्य व हर्ष का विषय है| पिछले साठ वर्षों से अधिक की स्पष्ट स्मृतियाँ हैं, जब होली का त्योहार अत्यधिक अश्लीलता व फूहड़ता से मनाया जाता था| लोग एक-दूसरे को अत्यधिक गंदी व अश्लील गालियां बकते थे और उनका आचरण भी बहुत अधिक निंदनीय होता था| मुझे यह देखकर स्वयं पर और अपने समाज पर शर्म आती थी कि इस पवित्र त्योहार को मनाने का तरीका इतना निकृष्ट और निंदनीय है| महिलाओं का तो साहस ही नहीं होता था कि घर से बाहर कदम भी रख सकें| मैं तो असहाय था और भगवान से प्रार्थना ही कर सकता था कि समाज से यह आसुरी-भाव और तामसिकता समाप्त हो|

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अब तो परिदृश्य एकदम से ही बदल गया है| अब तो महिलाएँ भी खुले में फूलों की होली खेलती हैं, और भजन-कीर्तन करते हुए प्रभात-फेरी भी निकालती हैं| किसी भी तरह का फूहड़पन और अश्लीलता नहीं रही है| अबकी बार भी नगर के चुने हुए तीन-चार मंदिरों में महिलाओं ने खूब भजन-कीर्तन किए और ठाकुर जी के साथ फूलों की होली खेली|
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समय का चक्र सही दिशा में जा रहा है| लोगों की मानसिकता और सोच में भी परिवर्तन हो रहा है| एक दिन में ही सब कुछ नहीं बदल सकता, लेकिन निश्चित रूप से धीरे-धीरे सकारात्मक परिवर्तन हो रहा है| लोगों में आध्यात्मिकता, भक्ति और परोपकार की भावना भी बढ़ रही है| आने वाला समय अच्छा ही अच्छा होगा|
ॐ तत्सत् !!
३१ मार्च २०२१

Saturday, 28 March 2026

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ..... यही शास्त्रों का सार है ---

 गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ..... यही शास्त्रों का सार है||

नवरात्र का आध्यात्मिक महत्व :---
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दुर्गा देवी तो एक है पर उसका प्राकट्य तीन रूपों में है, या यह भी कह सकते हैं कि इन तीनों रूपों का एकत्व ही दुर्गा है| ये तीन रूप हैं ---- (१) महाकाली| (२) महालक्ष्मी (३) महासरस्वती| नवरात्र में हम माँ के इन तीनों रूपों की साधना करते हैं| माँ के इन तीन रूपों की प्रीति के लिए ही समस्त साधना की जाती है|
(१) महाकाली ---- ======== महाकाली की आराधना से विकृतियों और दुष्ट वृत्तियों का नाश होता है| माँ दुर्गा का एक नाम है -- महिषासुर मर्दिनी| महिष का अर्थ होता है -- भैंसा, जो तमोगुण का प्रतीक है| आलस्य, अज्ञान, जड़ता और अविवेक ये तमोगुण के प्रतीक हैं| महिषासुर वध हमारे भीतर के तमोगुण के विनाश का प्रतीक है| इनका बीज मन्त्र "क्लीम्" है|
(२) महालक्ष्मी ------ ======== ध्यानस्थ होने के लिए अंतःकरण का शुद्ध होना आवश्यक होता है जो महालक्ष्मी की कृपा से होता है| सच्चा ऐश्वर्य है आतंरिक समृद्धि| हमारे में सद्गुण होंगे तभी हम भौतिक समृद्धि को सुरक्षित रख सकते हैं| तैतिरीय उपनिषद् में ऋषि प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु जब पहिले हमारे सद्गुण पूर्ण रूप से विकसित हो जाएँ तभी हमें सांसारिक वैभव देना| हमारे में सभी सद्गुण आयें यह महालक्ष्मी की साधना है| इन का बीज मन्त्र "ह्रीं" है|
(३) महासरस्वती ---- ========= गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि अपनी आत्मा का ज्ञान ही ज्ञान है| इस आत्मज्ञान को प्रदान करती है -- महासरस्वती| इनका बीज मन्त्र है "अईम्"|
नवार्ण मन्त्र: ======= माँ के इन तीनों रूपों से प्रार्थना है कि हमें अज्ञान रुपी बंधन से मुक्त करो| बौद्धिक जड़ता सबसे अधिक हानिकारक है| यही अज्ञान है और यही हमारे भीतर छिपा महिषासुर है जो माँ की कृपा से ही नष्ट होता है|
सार ----- === नवरात्रि का सन्देश यही है कि समस्त अवांछित को नष्ट कर के चित्त को शुद्ध करो| वांछित सद्गुणों का अपने भीतर विकास करो| आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करो और सीमितताओं का अतिक्रमण करो| यही वास्तविक विजय है| मैंने मेरी बात कम से कम शब्दों में व्यक्त कर दी है, इससे अधिक लिखना मेरे लिए बौद्धिक स्तर पर संभव नहीं है| जय माँ| सबका कल्याण हो|
भवान्याष्टकम् :- (यह जगन्माता का मेरा सर्वाधिक प्रिय स्तोत्र है)
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न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ १ ॥
भवाब्धावपारे महादुःखभीरु पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः ।
कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ २ ॥
न जानामि दानं न च ध्यानयोगं न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम् ।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ३ ॥
न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित् ।
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ४ ॥
कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः कुलाचारहीनः कदाचारलीनः ।
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ५ ॥
प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित् ।
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ६ ॥
विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये ।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ७ ॥
अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः ।
विपत्तौ प्रविष्टः प्रनष्टः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ८ ॥
॥ इति श्रीमदादिशंकराचार्य विरचिता भवान्याष्ट्कं समाप्ता ॥ २९ मार्च २०१४

Friday, 27 March 2026

अनन्य भाव से की गई अव्यभिचारिणी भक्ति ही परमात्मा को पाने का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है ---

 अनन्य भाव से की गई अव्यभिचारिणी भक्ति ही परमात्मा को पाने का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है -

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मैं एक ऐसे स्थान पर और ऐसे ही लोगों के मध्य रहना चाहता हूँ, जहां परमात्मा के स्पंदन पूर्ण रूपेण व्यक्त हों। मुझे न तो ऐसा कोई स्थान मिला, और न ही ऐसे लोग जो निरंतर परमात्मा की चेतना में रहते हों। थक हार के कूटस्थ में ही परमात्मा का ध्यान आरंभ किया। कूटस्थ ने मुझे कभी निराश नहीं किया। वहीं मुझे अनुभूति हुई कि मेरे से अन्य कोई नहीं है। उस अनन्य भाव में ही परमात्मा की अनुभूतियाँ हुईं। उस अनन्यता में अव्यभिचारिणी भक्ति हो, इसके अतिरिक्त कोई अन्य अभीप्सा अब नहीं है।
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताई हुई अनन्य भाव से अव्यभिचारिणी भक्ति ही परमात्मा को उपलब्ध होने का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। भगवान कहते हैं --
"मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥१४:२६॥"
अर्थात् -- जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा अर्थात् उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों के अतीत होकर ब्रह्म बनने के लिये योग्य हो जाता है॥
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् -- अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
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उपरोक्त विषय पर स्वनामधन्य आचार्य शंकर सहित अनेक आचार्यों ने भाष्य लिखे हैं। उन भाष्यों का स्वाध्याय भी उपयोगी होगा। महाभारत के अनुशासन पर्व में भगवान श्री कृष्ण ने एक स्थान पर महाराजा युधिष्ठिर को भी अव्यभिचारिणी भक्ति का उपदेश दिया है (तंडी ऋषि कृत शिवसहस्त्रनाम में, जो उन्हें उपमन्यु ऋषि से प्राप्त हुआ।)।
यह लिखने के पश्चात अन्य कुछ लिखने का प्रयोजन ही नहीं रहा है। धीरे धीरे उन सब अनेक समूहों को छोड़ रहा हूँ जिन का सदस्य मुझे लोगों ने बिना पूछे बना दिया है। फेसबुक पर साढ़े चार हज़ार (४५०० +) से अधिक लेख लिख चुका हूँ। अनन्य योग से अव्यभिचारिणी भक्ति से आगे लिखने योग्य भी अन्य कुछ नहीं है।
आप सब में भगवान वासुदेव को नमन॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ मार्च २०२६

भारतीय सभ्यता को नष्ट करने के लिये सर्वप्रथम --- भारत की गुरुकुल शिक्षा पद्धति, और कृषि व्यवस्था को नष्ट किया गया ---

भारतीय सभ्यता को नष्ट करने के लिये सर्वप्रथम --- भारत की गुरुकुल शिक्षा पद्धति, और कृषि व्यवस्था को नष्ट किया गया ---

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प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति में गुरुकुलों में -- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, और ज्योतिष आदि वेदांगों की पढ़ाई मुख्य और निःशुल्क होती थी। इन्हें पढ़ाने वाले गुरुओं को "उपाध्याय" कहते थे। वेद, उपनिषद आदि श्रुतियों को पढ़ाने वाले गुरुओं को "आचार्य" कहते थे। इनके अतिरिक्त शास्त्रोक्त अन्य अनेक विषयों के अध्यापक भी होते थे। अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति की जड़ों पर ही प्रहार किया। हमारे पूर्वज ब्राह्मण अध्यापकों, और हिन्दू कृषकों ने अंग्रेज़ी राज्य में कितने मर्मांतक कष्ट सहे, इसकी एक झलक इस लेख में मिल जायेगी।
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Indian Education Act बनाकर सारे गुरुकुलों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, ब्राह्मणों के सारे ग्रन्थ छीन कर जला दिये गये, गुरुकुलों को आग लगा कर नष्ट कर दिया गया और ब्राहमणों को इतना दरिद्र बना दिया गया कि वे अपनी संतानों को पढ़ाने में भी असमर्थ हो गये। सिर्फ वे ही ग्रन्थ मूल रूप से सुरक्षित रहे जिनको ब्राह्मणों ने रट रट कर याद कर रखा था। ग्रंथों को प्रक्षिप्त यानी इस तरह विकृत कर दिया गया जिस से भारतीयों में ब्राह्मण विरोध की भावना और हीनता व्याप्त हो जाये। ब्राह्मणों के अत्याचार की झूठी कहानियाँ गढ़ी गयीं, ब्राह्मणों की संस्था को नष्ट प्राय कर दिया गया। भारत पर आर्य आक्रमण का झूठा और कपोल-कल्पित इतिहास थोपा गया। भारत के हर गाँव में एक न एक गुरुकुल होता था जहाँ ब्राह्मण वर्ग अपना धर्म मान कर निःशुल्क विद्यादान करता था। उसका खर्च समाज चलाता था। वे सारे गुरुकुल बंद कर दिए गये। भारत से जाते हुए भी अंग्रेज़, भारत की सत्ता अपने मानसपुत्रों को सौंप गये, जिन्होनें भारत को नष्ट करने की रही सही कसर भी पूरी कर दी।
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भारत में गायों की संख्या मनुष्यों की संख्या से अधिक थी। हर गाँव में गोचर भूमियाँ थीं। अंग्रेज़ी राज्य में सर्वप्रथम तो एक विशाल पैमाने पर गौ हत्या शुरू की गयी। सबसे पहला क़साईख़ाना सन १७६० ई.में आरम्भ किया गया। फिर हज़ारों कसाईखाने खोले गये। अंग्रेजी राज में प्रतिवर्ष लगभग एक करोड़ गायों की ह्त्या होने लगी थी। खाद के रूप में प्रयुक्त होने वाले गोबर के अभाव में भूमि बंजर होने लगी। फिर जहाँ जहाँ उपजाऊ भूमि थी वहाँ के किसानों को बन्दूक की नोक पर नील की खेती करने को बाध्य किया जाने लगा, जिस से भूमि की उर्वरता बिलकुल ही समाप्त हो गयी।
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लगान वसूली के लिए इंग्लैंड के सारे गुंडों-बदमाशों को भारत में कलेक्टर नियुक्त कर दिया गया जो घोड़े पर बैठकर हर गाँव में हर खेत में जाते और बड़ी निर्दयता से लगान बसूलते। किसानों पर तरह तरह के कर लगा कर उन्हें निर्धन बना दिया गया। अपने खास खास लोगों को जमींदार बना कर जमींदारी प्रथा आरम्भ कर अंग्रेजों ने भारत के किसानों पर बहुत अधिक अत्याचार करवाये। सबसे अधिक अत्याचार तो बंगाल में हुए, जहाँ कृत्रिम अकाल उत्पन्न कर के करोड़ों लोगों को भूख से मरने के लिए बाध्य कर दिया गया। नेपाल की तराई के क्षेत्रों में भूमि बहुत अधिक उपजाऊ थी जिस पर नील की खेती करा कर भूमि को बंजर बना दिया गया। भारत अभी तक कृषि के क्षेत्र में उबर नहीं पाया है।
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देखिये अब आगे और क्या होता है। भगवान से प्रार्थना करते हैं की जो भी हो वह अच्छा ही हो। ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ मार्च २०२६