ऊँची से ऊँची और बड़ी से बड़ी ब्रह्मविद्या को श्रीमद्भगवद्गीता और उपनिषदों के माध्यम से परमात्मा ने हमारे कल्याण के लिए हमें प्रदान किया है। उसका निज जीवन में अभ्यास कर के परमात्मा को पूर्ण समर्पण द्वारा उपलब्ध होने में ही सार्थकता है।
जैसे कितना भी स्वादिष्ट भोजन हमारे समक्ष रखा हो, सार्थकता उसे ग्रहण करने में है, न कि उसकी विवेचना करने में। इधर-उधर की फालतू गपशप करने की अपेक्षा नित्य कम से कम तीन-चार घंटे परमात्मा की यथासंभव उपासना करें।
जितनी क्षमता भगवान ने मुझे दी है, उसके अनुसार उन्हीं की प्रेरणा से मेरे माध्यम से यह सब लिखा गया है। आपका जीवन कृतार्थ, और आप कृतकृत्य हों, यही मेरी मंगलमय शुभ कामना है। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
८ जनवरी २०२५
No comments:
Post a Comment