Tuesday, 30 December 2025

इस संसार में जवानी भी देखी, बुढ़ापा भी देखा, और भगवान से दिल लगाकर भी देख लिया। अब और देखने के लिए कुछ भी नहीं बचा है।

 इस संसार में जवानी भी देखी, बुढ़ापा भी देखा, और भगवान से दिल लगाकर भी देख लिया। अब और देखने के लिए कुछ भी नहीं बचा है। इसलिये सभी को राम राम !! वंदे मातरम् !! भारत माता की जय॥

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समय के साथ सब कुछ बदल जाता है, जीवन परिवर्तनशील है। सारा दृश्य भगवान की माया है। भगवान भी क्या क्या दृश्य दिखलाते हैं! इस संसार में बहुत कुछ अनुभव किया है, लोगों के कष्ट भी बहुत देखे हैं, और उनकी जिजीविषा भी। झूठ, लोभ, अहंकार, छल, कपट, व विश्वासघात भी बहुत अधिक देखा है; और सत्यनिष्ठा भी। हे प्रभु, तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो ! अब परमात्मा में शरणागति द्वारा समर्पण करते हुए स्वयं को देखना चाहता हूँ। और कुछ भी देखने की इच्छा नहीं है। ॐ तत्सत्॥ ॐ शांति शांति शांति॥
कृपा शंकर
३० दिसम्बर २०२१

Monday, 29 December 2025

इस जन्म में मैं स्वाभिमान और गर्व सहित सनातनी हिन्दू हूँ ---

 इस जन्म में मैं स्वाभिमान और गर्व सहित सनातनी हिन्दू हूँ। हिन्दू का अर्थ है जो हिंसा से दूर है। मनुष्य में हिंसा का जन्म लोभ व अहंकार से होता है। लोभ व अहंकार ही राग-द्वेष है। राग-द्वेष से मुक्ति ही वीतरागता है। वीतराग व्यक्ति ही महत् तत्व से जुड़कर महात्मा बनता है। वीतराग व्यक्ति ही स्थितप्रज्ञता को प्राप्त होता है जो ईश्वर प्राप्ति की अवस्था है। स्थितप्रज्ञता ही कैवल्य/ब्राह्मी-स्थिति/कूटस्थ-चैतन्य आदि है। हम शाश्वत आत्मा हैं, इसलिए हमारा स्वधर्म परमात्मा से परमप्रेम और समर्पण है। इस पृथ्वी पर वह हर व्यक्ति हिन्दू है जिसे परमात्मा से प्रेम है, व जो परमात्मा को उपलब्ध होना चाहता है। हिन्दुत्व ही हमें आत्मा की शाश्वतता, पुनर्जन्म और कर्मफलों की शिक्षा देता है। घृणा व क्रोध से मुक्त होकर, ईश्वर की चेतना में रहते हुए हम अपने शत्रुओं का संहार करें। हमारे मन में शत्रुभाव का अभाव तो सदा रहे, लेकिन शत्रुबोध सदा बना रहे।

ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ दिसंबर २०२५

कांग्रेस के नेताओं को अपनी हार के लिए अपने अलावा सब जिम्मेदार लगते हैं ---

 कांग्रेस के नेताओं को अपनी हार के लिए अपने अलावा सब जिम्मेदार लगते हैं

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अंग्रेज भारत से इसलिए गये थे कि द्वितीय विश्वयुद्ध में उनकी कमर टूट गयी थी, और भारतीय सैनिकों ने उनके आदेश मानने बंद कर दिये थे। लेकिन अंग्रेजों को भगाने का झूठा श्रेय लेने वाली कांग्रेस मानती है कि उसने देश को आज़ाद करवाया है, इसलिए सिर्फ उसे ही इस देश पर शासन करने का अधिकार है। इसी झूठ को फैलाकर कांग्रेस ने देश पर शासन किया है।
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कांग्रेस के नेताओं को अपनी हार के लिए अपने अलावा सब जिम्मेदार लगते हैं। वे सोचते हैं कि उनके जैसे योग्य और समझदार नेताओं के होते हुए जनता किसी दूसरे को कैसे चुन सकती है? यही कारण है कि वे कभी तो चुनाव आयोग को, कभी ईवीएम को और कभी मतदाता सूची को दोष देते हैं। कांग्रेस और उसके नेता स्वयं को देश का मालिक समझते हैं। वे यह स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि देश की जनता उन्हें ठुकरा चुकी है। उन्हें अब पूरी व्यवस्था ही खराब नजर आने लगी है। अब वे भारतीय सेना का जिस तरह से अपमान कर रहे हैं, वह अस्वीकार्य है। एक तरह से कांग्रेस देश के विरुद्ध पाकिस्तानी झूठ ही फैला रही है। देश को अब कांग्रेस की आवश्यकता नहीं है।
कृपा शंकर
२० दिसम्बर २०२५

"राम" नाम पर सबका जन्मसिद्ध अधिकार है ---

"राम" नाम पर सबका जन्मसिद्ध अधिकार है। इसने पता नहीं अब तक कितने असंख्य लोगों को तारा है और कितनों को तारेगा। यह हमें परमात्मा का सबसे बड़ा उपहार है। ध्यानमुद्रा शांभवी में तो इसका विधिवत जप करें ही, लेकिन चलते-फिरते, उठते-बैठते, शौच-अशौच और देश-काल आदि के सब बंधनों से स्वयं को मुक्त कर इसका हर समय मानसिक जप कर सकते हैं।

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मंदिरों के बाहर द्वार पर एक घंटा लटका रहता है, जिसके अंदर लटकते हुए लौहदंड से जब इस पर प्रहार किया जाता है तब एक ध्वनि गूँजती है। वह ध्वनि हमारे सूक्ष्मदेह में मेरुदण्ड के अनाहतचक्र पर प्रहार करती है जिससे भक्तिभाव जागृत होता है। वैसे ही कल्पना कीजिये कि अन्तरिक्ष में एक घंटा लटका हुआ जिसमें से एक ध्वनि निकल रही है। उस ध्वनि को सुनते रहिए और "रां" बीज का मानसिक जप करते रहिये। आपके जीवन में एक चमत्कार घटित हो जायेगा।
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इसकी महिमा इतनी अधिक महान है कि शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती।
"राम नाम मणि दीप धरु, जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहिरौ, जो चाहसी उजियार॥"
इसमें रूपक अलंकार और भक्ति रस है। यहाँ 'राम नाम' को 'मणि-दीप' (रत्न-दीपक) के समान बताया गया है, जो उपमेय और उपमान का भेद मिटाकर एक रूप कर देता है, जिससे भीतर और बाहर ज्ञान और पवित्रता फैल सके।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२० दिसंबर २०२५

रहस्यों का रहस्य ---

रहस्यों का रहस्य --- यह एक अनमोल बात है -- रात्री के सन्नाटे में जब घर के सब लोग सोये हुए हों तब चुपचाप शांति से भगवान का ध्यान/जप आदि करें। न तो किसी को बताएँ और न किसी से इस बारे में कोई चर्चा करें। निश्चित रूप से आपको परमात्मा की अनुभूति होगी। किसी भी तरह के वाद-विवाद आदि में न पड़ें। हमारा लक्ष्य वाद-विवाद नहीं है, हमारा लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति है। परमात्मा को समर्पण हमें चिन्ता मुक्त कर देता है। तत्पश्चात हम केवल एक निमित्त मात्र बन जाते हैं। हमारे माध्यम से भगवान ही सारे कार्य करते हैं।
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हे प्रभु इतनी तो कृपा करो। स्वयं को मुझमें पूर्णतः व्यक्त करो। मुझे अपने साथ एक करो। हे प्रभु, राष्ट्र की अस्मिता -- धर्म की रक्षा करो। हमारे में ज्ञान, भक्ति, वैराग्य और आप स्वयं की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति हो॥ हमें भगवान नहीं मिलते, इसका एकमात्र कारण है --"सत्यनिष्ठा का अभाव"। हमारे पतन का एकमात्र कारण है हमारा --"लोभ और अहंकार"। हम स्वयं पानी पीयेंगे तभी हमारी प्यास बुझेगी, स्वयं भोजन करेंगे तभी हमें तृप्ति होगी, और स्वयं साधना करेंगे तभी हमें भगवत्-प्राप्ति होगी। दूसरों के पीछे पीछे भागने से कुछ नहीं मिलेगा। हम जहां हैं, वहीं परमात्मा हैं।
हरिः ॐ तत्सत् !! कृपा शंकर
२४ दिसंबर २०२५

हमारा कार्य केवल परमात्मा के प्रकाश का विस्तार करना है ---

 हमारा कार्य केवल परमात्मा के प्रकाश का विस्तार करना है, अन्य सब उनकी यानि परमात्मा की समस्या है।

मेरे चारों ओर अनेक प्रकार की शक्तियाँ कार्य कर रही हैं, कुछ सकारात्मक हैं जो मुझे परमात्मा के मार्ग पर धकेल रही हैं। कुछ नकारात्मक शक्तियाँ हैं जिनका वश चले तो वे मुझे अभी इसी समय जलाकर भस्म कर दें। वे नकारात्मक शक्तियाँ मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ पा रही हैं। मैं निरपेक्ष भाव में हूँ। यह सृष्टि परमात्मा की है, मेरी नहीं। उनकी इच्छा कि वे स्वयं को कैसे व्यक्त करें। सकारात्मक हो या नकारात्मक सब में परमात्मा हैं। मुझे एक महापुरुष के वचन याद हैं। उन्होने कहा था कि हमारा कार्य केवल परमात्मा के प्रकाश का विस्तार करना है, अन्य सब उनकी यानि परमात्मा की समस्या है। मेरा भी आदर्श यही है। मेरे साथ क्या होता है, उसका महत्व नहीं है। उस अनुभव से मैं क्या बनता हूँ, महत्व सिर्फ इसी बात का है। जीवन का हर अनुभव कुछ नया सीखने का अवसर है। क्रियायोग व कूटस्थ में ज्योतिर्मय ब्रह्म का अनन्य भाव से ध्यान -- ईश्वरीय प्रेरणा से यही मेरी आध्यात्मिक साधना है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ दिसंबर २०२५

यह वृद्धावस्था बड़ी खराब चीज है --

 यह वृद्धावस्था बड़ी खराब चीज है -- (भगवान के भजन करने के इस मौसम में यह शरीर महाराज पूरा सहयोग नहीं करता। बड़ा धोखेबाज़ मित्र है)

"दुनिया भी अजब सराय फानी देखी, हर चीज यहां की आनी जानी देखी।
जो आके ना जाये वो बुढ़ापा देखा, जो जा के ना आये वो जवानी देखी॥"
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दिन-रात भगवान का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करने का मौसम आ गया है। ध्यान हमें ज्योतिर्मय ब्रह्म का करना चाहिये। जो ब्रह्म शब्द का अर्थ नहीं समझते उन्हें किसी ब्रहमनिष्ठ श्रौत्रीय महात्मा से मार्गदर्शन लेना होगा। "ब्रह्म" शब्द में सब समाहित हो जाते हैं। वे ही पुरुषोत्तम, वे ही परमशिव, और वे ही परमात्मा हैं। यह निरंतर हो रहा अनंत विस्तार, प्राण, ऊर्जा, और सम्पूर्ण अस्तित्व वे ही हैं। ऊर्जा के खंड व कण, उनकी गति, प्रवाह और विभिन्न आवृतियों पर उनके स्पंदनों से ही इस भौतिक सृष्टि का निर्माण हुआ है। प्राण तत्व से ही समस्त चैतन्य है। इन सब के पीछे जो अनंत सत्य और ज्ञान है, वह ब्रह्म है।
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नदियों का प्रवाह महासागर की ओर होता है। लेकिन एक बार महासागर में समर्पित होने के पश्चात नदियों का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो जाता है। फिर महासागर का ही अवशेष रहता है। जो जलराशि महासागर में समर्पित हो गयी है, वह बापस नदियों में नहीं जाना चाहती। ऐसे ही हम स्वयं का समर्पण ब्रह्म में करें। इसकी विधि किसी सद्गुरु आचार्य से सीखनी होगी।
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आध्यात्मिक साधना में महत्व "परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूतियों" का है जो प्रेम और आनंद के रूप में अनुभूत और व्यक्त हो रही हैं। जिस साधना से परमात्मा की अनुभूति होती है, और हम परमात्मा को उपलब्ध होते हैं, केवल वही सार्थक है। परमात्मा को सदा अपने समक्ष रखो और उनमें स्वयं का विलय कर दो।
हमारे जीवन का प्रथम, अंतिम और एकमात्र लक्ष्य/उद्देश्य -- "ईश्वर की प्राप्ति" है। इसके लिए कोई से भी साधन हों -- भक्ति, योग, तंत्र आदि सब स्वीकार्य हैं। भगवान हैं, इसी समय है, यही पर हैं, हर समय और सर्वत्र हैं। वे हैं, बस यही महत्वपूर्ण है। भगवान की आनंद रूपी जलराशि में हम तैर रहे हैं, उनकी जलराशि बन कर उनके महासागर में विलीन हो गये हैं। यही भाव सदा बना रहे।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ दिसंबर २०२५

आजकल मुझे निमित्त बनाकर भगवान श्रीकृष्ण अपनी साधना स्वयं कर रहे हैं ---

आजकल मुझे निमित्त बनाकर भगवान श्रीकृष्ण अपनी साधना स्वयं कर रहे हैं। मैं जहां भी हूँ, आप सब के हृदय में हूँ। आप सबसे मिले प्रेम के कारण मैं अभिभूत हूँ। आप सब कृतकृत्य हों, और आपका जीवन कृतार्थ हो।

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जब भी समय मिले अपनी साँसों पर ध्यान दें और अजपाजप करें। इसे हंसयोग और हंसवतीऋक भी कहते हैं। इसका वर्णन कृष्णयजुर्वेद का श्वेताश्वरोपनिषद करता है। प्रणव का मूर्धा में मानसिक जप भी कीजिये। सारे उपनिषद इसकी महिमा करते हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी इसे बहुत अच्छी तरह समझाया है। इसे खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा में करेंगे तो लाभ बहुत अधिक होगा।
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यह हमारा भ्रम है कि हम सांसें ले रहे हैं। हमारे माध्यम से भगवान स्वयं साँस ले रहे हैं। वे ही हमारे हृदय में धडक रहे हैं, वे ही इन आँखों से देख रहे हैं, इन पैरों से वे ही चल रहे हैं, और इस मष्तिष्क से वे ही सोच रहे हैं। इन कानों से मंत्र-श्रवण भी वे ही कर रहे हैं, और जप भी वे ही कर रहे हैं। हम अपना मन उनमें लगा देंगे तो हमारा काम बड़ा आसान हो जाएगा। मन को भगवान में लगाना -- इस सृष्टि में सबसे अधिक कठिन काम है। मन -- भगवान में लग गया तो मान लीजिये कि आधे से अधिक युद्ध हम जीत चुके हैं।
शुभाशीर्वाद !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२६ दिसंबर २०२५

सद्गुरु कौन हो सकता है? गुरु की आवश्यकता क्यों है? --- (Amended & Re-Posted)

 सद्गुरु कौन हो सकता है? गुरु की आवश्यकता क्यों है? --- (Amended & Re-Posted)

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वेदों के निर्देशानुसार एक श्रौत्रीय (जिसे श्रुतियों यानि वेदों का ज्ञान हो) ब्रहमनिष्ठ (ब्रह्म में स्थित) आचार्य ही सद्गुरु हो सकता है ---
"परीक्ष्य लोकान्‌ कर्मचितान्‌ ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्‌ समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्‌ ॥"
(मुण्डक. १:२:१२)
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ऐसे सद्गुरु का आज के युग में मिलना बड़ा कठिन है, इसलिए दक्षिणामूर्ति भगवान शिव, या जगतगुरु भगवान श्रीकृष्ण, को ही गुरु रूप में मानना चाहिए। या फिर गुरु का वरण ऐसे आचार्य को करें जिसने ईश्वर का साक्षात्कार किया हो।
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गुरु की आवश्यकता हमें इसलिए है कि साधनाएँ अनेक हैं, मार्ग अनेक हैं, अनेक मंत्र हैं, अनेक विद्याएँ हैं, लेकिन परमात्मा की प्राप्ति के लिए हमें एक ही मार्ग चाहिए। कौन सा मार्ग हमारे लिए उपयुक्त और सर्वश्रेष्ठ है इसका निर्णय जब हम नहीं कर पाते तब किसी आचार्य सद्गुरु की शरण लेते हैं। हमारी अब तक की आध्यात्मिक उपलब्धियों का आंकलन कर के एक सद्गुरु ही बता सकता है कि कौन सा मार्ग हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ है। ऐसे गुरु ही हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं। हमें मार्गदर्शन उन्हीं से लेना चाहिए। गुरु की शिक्षा भी तभी फलदायी होगी जब हम सत्यनिष्ठ होंगे।
"अखंडमंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरं।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मे श्रीगुरवेनमः॥"
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२७ दिसंबर २०२५ . कल लिखा गया था ---
किसी भी आध्यात्मिक साधना को आरंभ करने से पूर्व एक ब्रहमनिष्ठ श्रौत्रीय (जिसे श्रुतियों यानि वेदों का ज्ञान हो) आचार्य का मार्गदर्शन अनिवार्य है।
जिनको पूर्व जन्मों में सिद्धि मिल चुकी है, ऐसे मुमुक्षुओं को उनके पूर्व जन्मों के आचार्य उन्हें ढूंढ कर उनका मार्गदर्शन करते हैं।
केवल पुस्तकों से पढ़कर किसी साधना का आरंभ न करें। किसी ब्रहमनिष्ठ आचार्य से मार्गदर्शन अवश्य लें। आपका मंगल हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !!
कृपा शंकर
२६ दिसंबर २०२५

जो वेदान्त के ब्रह्म हैं, वे ही साकार रूप में भगवान श्रीकृष्ण हैं। यह अनुभूतिजन्य सत्य है ---

निज जीवन में बहुत अधिक भटकाव के पश्चात मैं अब अपने विचारों पर दृढ़ हूँ। जो वेदान्त के ब्रह्म हैं, वे ही साकार रूप में भगवान श्रीकृष्ण हैं। यह अनुभूतिजन्य सत्य है। किसी भी तरह का कोई संशय नहीं है। द्वैत-अद्वैत / साकार-निराकार ये सब मन की अवस्थाएँ हैं। किसी भी रूप में भगवान अपनी साधना करें, यह उनकी इच्छा है। भगवान अपनी ज्योतिर्मय अनंतता व उससे भी परे की अनुभूतियाँ करा रहे हैं, यह उनकी कृपा है। उनकी कृपा से ही ये साँसे चल रही हैं, और उन्हीं की कृपा से यह शरीर जीवित है। अपनी साधना भी वे स्वयं ही कर रहे हैं।

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आज मेरा भौतिक स्वास्थ्य बिलकुल भी ठीक नहीं है। कल रात को बहुत अधिक उल्टियाँ हुईं और दस्त लगे। इस शरीर में बिलकुल भी जान नहीं है, लेकिन अपनी संकल्प शक्ति से मैं बिलकुल स्वस्थ (स्व+स्थ) हूँ। असत्य और अंधकार की शक्तियों का प्रतिकार करते हुए परमशिव में स्थित हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ दिसंबर २०२५

३१ दिसंबर की रात्रि "निशाचर रात्रि" होती है। निशाचर लोग अभिसारिकाओं की खोज में रहते हैं, और अभिसारिकायें निशाचरों की खोज में ---

 ३१ दिसंबर की रात्रि "निशाचर रात्रि" होती है। निशाचर लोग अभिसारिकाओं की खोज में रहते हैं, और अभिसारिकायें निशाचरों की खोज में। वहाँ धोखा ही धोखा है। मद्यपान, नाचगाना और हो-हुल्लड़ के सिवाय और कुछ भी नहीं होता। जिस रात भगवान का भजन नहीं होता वह राक्षस-रात्रि है, और जिस रात भगवान का भजन हो जाए वह देव-रात्रि है। मेरी बात की लोग हंसी उड़ायेंगे, लेकिन मुझ पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं वही कहूँगा जिससे आपका कल्याण हो।

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काम वही करें जिससे आत्म-शक्ति में वृद्धि हो। सर्वश्रेष्ठ कार्य है -- "ज्योतिर्मय पारब्रह्म/पुरुषोत्तम/परमशिव का ध्यान और जपयज्ञ"। इससे असत्य और अंधकार की शक्तियाँ क्षीण होंगी। अपनी बुद्धिमत्ता और ओजस्विता को मत लुटायें। परमशिव की आसक्ति का आलम्बन करें। ईश्वर और संतपुरुषों के अनुग्रह के लिए प्रार्थना करें, ताकि राष्ट्र शक्तिशाली हो, और हम वीर्यवान बनें।
ॐ तत्सत् !! महादेव महादेव महादेव !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ दिसंबर २०२५

परमात्मा ही मेरा वास्तविक स्वरूप है ---

 परमात्मा ही मेरा वास्तविक स्वरूप है ---

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योग के साथ भोग की कामना -- जीवन का सबसे बड़ा भटकाव है। "राम" और "काम" कभी साथ-साथ नहीं रह सकते, वैसे ही जैसे प्रकाश और अंधकार। आत्म-साक्षात्कार -- हमारे इस मनुष्य जीवन का प्रथम, अंतिम, और एकमात्र उद्देश्य है। हमारा लक्ष्य भगवत्-प्राप्ति है, उस से कम कुछ भी नहीं। इस मार्ग में कोई भी नीति, नियम या सिद्धांत यदि बाधक हो तो उसका उसी क्षण परित्याग कर दो। कोई भी नीति, नियम या सिद्धांत -- परमात्मा से बड़ा नहीं है।
धर्म और अधर्म से भी ऊपर हमें उठना होगा। अंततः ये भी बंधन हैं। परमात्मा सब तरह के धर्म और अधर्म से परे है।
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भगवान ने गीता में जिस ब्राह्मी-स्थिति की बात की है, उस ब्राह्मी स्थिति में हम सब प्रकार के बंधनों से ऊपर होते हैं। कूटस्थ-चैतन्य में रहने का अभ्यास करते करते हमें ब्राह्मी-स्थिति प्राप्त हो जाती है। गीता में भगवान कहते हैं --
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२:७२॥"
अर्थात् - हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है॥
(O Arjuna! This is the state of the Self, the Supreme Spirit, to which if a man once attains, it shall never be taken from him. Even at the time of leaving the body, he will remain firmly enthroned there, and will become one with the Eternal.)
कूटस्थ सूर्यमंडल में पुरुषोत्तम/परमशिव का ध्यान मेरे विचारों व आचरण को निरंतर परमात्मा की चेतना में रखता है। यही मेरी साधना और ब्रह्मविद्या का सार है।
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एक बड़े से बड़ा ब्रह्मज्ञान -- कृष्ण यजुर्वेद में श्वेताश्वतर उपनिषद के छठे अध्याय के पंद्रहवें -- इस महाचिन्मय हंसवती ऋक मंत्र में है। इस की एक विधि है जिसका संधान गुरु प्रदत्त विधि से उन्हीं के आदेशानुसार करना पड़ता है। "हंस" शब्द का अर्थ परमात्मा के लिए व्यवहृत हुआ है। परमात्मा को अपना स्वरूप जानने पर ही जीव -- मृत्यु का अतिक्रम कर पाता है। इसका अन्य कोई उपाय नहीं है।
"एको हंसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिले संनिविष्टः।
तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥" (श्वेताश्वतरोपनिषद्-६/१५)
इस सम्पूर्ण विश्व के अन्तर में 'एक' 'हंसस्वरूपी आत्मसत्ता' है एवं 'वह' अग्निस्वरूप' है जो जल की अतल गहराई में स्थित है। 'उसका' ज्ञान प्राप्त करके व्यक्ति मृत्यु की पकड़ से परे चला जाता है तथा इस महद्-गति के लिए दूसरा कोई मार्ग नहीं है। (अस्य भुवनस्य मध्ये एकः हंसः। सः एव सलिले संनिविष्टः अग्निः। तम् एव विदित्वा मृत्युम् अत्येति अयनाय अन्यः पन्थाः न विद्यते॥)
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यह ब्रह्मविद्या का सार है। यह व्यावहारिक रूप से स्वयं पर हरिःकृपा से ही अवतृत होता है ।
हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ दिसंबर २०२५

मेरे द्वारा सबसे बड़ी सेवा क्या हो सकती है ??

 मेरे द्वारा सबसे बड़ी सेवा क्या हो सकती है ??

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प्रकृति ने अपने नियमानुसार जहाँ भी मुझे रखा है, उससे मुझे कोई शिकायत नहीं है। पूर्वजन्मों के कर्मानुसार मेरा यह जीवन निर्मित हुआ। भविष्य की कोई कामना नहीं है। हृदय में यह गहनतम और अति अति प्रबल अभीप्सा अवश्य है कि यदि पुनर्जन्म हो तो मैं इस योग्य तो हो सकूँ कि भगवान को पूर्णरूपेण समर्पित होकर, उनकी अनन्य-अव्यभिचारिणी-भक्ति सभी के हृदयों में जागृत कर सकूँ। भगवान की पूर्ण अभिव्यक्ति मुझ में हो। किसी भी कामना का जन्म न हो।
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विवक्तदेशसेवित्वरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ दिसंबर २०२३

Friday, 26 December 2025

चित्त वृत्ति निरोध ------

 जब ह्रदय शांत और और आज्ञा चक्र जागृत होने लगता है तभी चित्त की वृत्तियों का निरोध होना आरम्भ होने लगता है|

चित्त स्वयं को दो रूपों ------ श्वास-प्रश्वास और वासनाओं के रूप में व्यक्त करता है|
वासनाएँ तो अति सूक्ष्म हैं जो पकड़ में नहीं आतीं, अतः ध्यान साधना का आरम्भ श्वास-प्रश्वास से होता है| श्वास-प्रश्वास पर ध्यान करते करते प्राण भी स्थिर होने लगते हैं और मन की वासनाएँ शांत होने लगती हैं क्योंकि चंचल प्राण ही मन है| भौतिक देह और मन के बीच की कड़ी भी प्राण ही है|
यह मार्ग सिर्फ उन पथिकों के लिए है जिन्हें प्रभु से परम प्रेम हैं और जिनके ह्रदय में एक गहन अभीप्सा है उन्हें उपलब्ध होने की| ऐसे पथिक ही टिक पते हैं इस मार्ग पर, अन्य सब भटक जाते हैं| जब ह्रदय में एक अभीप्सा यानि तड़फ होती है प्रभु को पाने की तो प्रभु एक सद्गुरु के रूप में स्वयं ही आ जाते हैं|
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार और धारणा ये सब साथ साथ चलते हैं| प्रभु के प्रति तड़फ यदि बहुत गहरी हो अपने आप ही ये सब पीछे पीछे चलने लगते हैं|
प्रभु के प्रति प्रेम बहुत अधिक गहन हो तो ध्यान भी स्वयं होने लगता है| तब प्रभु ही आपको अपना उपकरण बना कर सब कुछ स्वयं करने लगते हैं| तब आप कर्ता नहीं रहते|
प्रथम अंतिम और एकमात्र आवश्यकता है प्रभु प्रेम की| बाकि सब गौण है|
आप में हृदयस्थ भगवान नारायण को नमन करते मैं आप सब के प्रति अपना अहैतुकी प्रेम और शुभ कामनाएँ व्यक्त करता हूँ| आप सब को मेरा प्रणाम| ॐ तत्सत्|
जयतु वैदिकीसंस्कृतिः जयतु भारतम् |
२७ दिसंबर २०१३

Thursday, 25 December 2025

मन में आ रहे फालतू और भटकाने वाले विचारों से ध्यान हटा कर भगवान में मन कैसे लगाएँ?

 (प्रश्न) : मन में आ रहे फालतू और भटकाने वाले विचारों से ध्यान हटा कर भगवान में मन कैसे लगाएँ?

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(उत्तर) : अपने चारों ओर की परिस्थितियों और वातावरण को हमें तुरंत बदलना पड़ेगा, अन्य कोई उपाय नहीं है। जो हम बनना चाहते हैं, उसी के अनुकूल परिस्थितियों और वातावरण का हमें निर्माण करना होगा, या वैसे ही वातावरण में जाकर रहना होगा। अच्छा साहित्य पढ़ें, अच्छे लोगों के साथ रहें, सात्विक भोजन लें और भोजन की मात्रा को कम करें।
नित्य नियमित ध्यान करें, और गीता का स्वाध्याय करें। श्रीमद्भगवद्गीता के अक्षरब्रह्मयोग (अध्याय ८) के स्वाध्याय और अभ्यास से बहुत लाभ होगा। बृहदारण्यकोपनिषद में याज्ञवल्क्य ऋषि ने गार्गी को भी इसका उपदेश दिया है।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२५ दिसंबर २०२३

Wednesday, 24 December 2025

भारत के लिए ये ५ जलडमरूमध्य स्वतंत्र और सुचारू अंतर्राष्ट्रीय-नौपरिवहन के लिए बहुत आवश्यक हैं-- मलक्का, बाब-अल-मंडेब, होरमुज, बास्फोरस और जिब्राल्टर। स्वेज़ और पनामा नहरों का चालू रहना भी बहुत अधिक आवश्यक है।

 भारत के लिए ये ५ जलडमरूमध्य स्वतंत्र और सुचारू अंतर्राष्ट्रीय-नौपरिवहन के लिए बहुत आवश्यक हैं-- मलक्का, बाब-अल-मंडेब, होरमुज, बास्फोरस और जिब्राल्टर। स्वेज़ और पनामा नहरों का चालू रहना भी बहुत अधिक आवश्यक है।

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समुद्रों में जो मालवाहक जहाज चलते हैं, उनका एक अंतर्राष्ट्रीय नियम होता है कि वे जिस देश में पंजीकृत होते हैं, उसी देश का ध्वज उन पर फहराया जाता है, और वे चलते-फिरते उसी देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। किसी भी समुद्री मालवाहक जहाज पर आक्रमण उस देश पर आक्रमण माना जाता है जिस देश का ध्वज उस जहाज पर फहराया हुआ है। यदि भारत के ध्वज-वाहक किसी भी मालवाहक जहाज पर कहीं भी आक्रमण होता है तो वह भारत पर आक्रमण ही माना जायेगा। भारत के ध्वज-वाहक जहाजों की रक्षा के लिए ही भारतीय नौसेना के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित दो युद्धपोत हर समय अदन की खाड़ी में गश्त लगाते रहते हैं। वहाँ अब तक सबसे बड़ा खतरा सोमालिया के समुद्री डाकुओं से था, अब यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों से है। ये हूती विद्रोही शिया मुसलमान हैं, और उनका झगड़ा पिछले ५० वर्षों से वहाँ के सुन्नी मुसलमानों से चल रहा है। सोमालिया के समुद्री डाकू सब सुन्नी मुसलमान हैं, जिनका धंधा ही डकैती है। अभी दो दिन पहले ही भारत की आर्थिक सीमा (Exclusive Economic Zone) में भारत के ही एक Chemical Carrier (हजारों टन केमिकल रूपी माल के परिवाहक) जहाज पर आक्रमण एक बहुत ही गंभीर घटना है।
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आज से ६०-७० वर्षों पहले तक कोई जमाना था जब अदन (यमन की तत्कालीन राजधानी) के बाजार भारतीयों से भरे हुए थे। सारी बड़ी बड़ी दुकानें भारतीयों की थीं, और वहाँ का सारा व्यापार भारतीयों के हाथ में था। फिर एक दिन ऐसा आया जब वहाँ (इस्लामिक) क्रान्ति हुई और वहाँ के हिन्दू भारतीय व्यापारियों को अपना सब कुछ छोड़कर जो कपड़े वे पहिने हुये थे उन्हीं में प्राण बचाने के लिए भारत में भाग कर शरण लेनी पड़ी।
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जब हूती विद्रोहियों में और सऊदी अरब में युद्ध आरंभ हुआ था तब भारत सरकार वहाँ काम कर रहे सारे भारतियों को सुरक्षित रूप से बापस भारत ले आई थी। अब हूती विद्रोहियों ने बाब-अल-मंडेब से गुजर रहे सभी जहाजों पर आक्रमण आरंभ कर दिया है। यह विश्व-युद्ध की भूमिका है।
२४ दिसंबर २०२३

भविष्य में एक दिन ईसा मसीह के सारे अनुयायी -- सत्य-सनातन-धर्म को अपना लेंगे।

 आज रात्रि को मैं पूर्ण प्रयास करूंगा कि आज की पूरी रात्री परमात्मा के ध्यान में ही व्यतीत हो। मुझे पूर्ण विश्वास है कि भविष्य में एक दिन ईसा मसीह के सारे अनुयायी -- सत्य-सनातन-धर्म को अपना लेंगे। यह प्रक्रिया आरंभ भी हो गई है। भारत की सबसे अधिक हानि भी उन्हीं लोगों ने की है।

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मराठा सेनाओं ने मुगलों व अन्य सभी मुस्लिम शासकों को परास्त कर सारे भारत पर अधिकार कर हिन्दू पद पादशाही की स्थापना कर दी थी, लेकिन अंग्रेजों ने धोखे से उन्हें हराकर भारत की सत्ता पर अपना अधिकार कर लिया। भारत की सत्ता अंग्रेजों ने मराठों से ली थी, न कि मुस्लिम शासकों से। पंजाब में सिक्खों की रक्षा मराठा सेनापति रघुनाथ राव ने की थी। सन १७५८ में अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण के बाद सिखों की स्थिति अत्यंत कमजोर हो गई थी। मराठा सेना झांसी से बंगाल की ओर अपने विजय अभियान पर जा रही थी, लेकिन सिक्खों के मार्मिक अनुरोध के पश्चात पंजाब की ओर मुड़ गयीं और पंजाब पहुंच कर वहाँ के अफगान शासकों को हराया। रघुनाथ राव ने तैमूर शाह (अब्दाली के पुत्र) को पंजाब से बाहर खदेड़ा। उन्होंने स्वर्ण मंदिर (हरमंदिर साहिब) का पुनर्निर्माण करवाया, जो अफगानों द्वारा क्षतिग्रस्त हो गया था। इस अभियान से मराठों ने अटक तक अपना प्रभाव बढ़ाया।
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भारत को प्रेमपूर्वक हम "भारत माता" कहते हैं। अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ भारत माता -- अखंडता के सिंहासन पर बिराजमान होगी। सम्पूर्ण भारत से असत्य और अंधकार की शक्तियाँ पराभूत होंगी। हर हर महादेव !! महादेव महादेव महादेव !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ दिसंबर २०२५

Monday, 22 December 2025

जब तक मैं परमात्मा से दूर था ---

जब तक मैं परमात्मा से दूर था, यह जीवन अपने केंद्र-बिन्दु से बहुत दूर एक मरीचिका (Mirage) यानि दृष्टिभ्रम या एक झूठा प्रतिबिंब (false image) मात्र ही था। एक झूठी आशा के पीछे भाग रहा था। सत्य का बोध तो अभी हो रहा है। भगवान श्रीकृष्ण का गीता में यह आश्वासन एक नयी दृष्टि और बोध दे रहा है --

"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् - अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।
But if a man will meditate on Me and Me alone, and will worship Me always and everywhere, I will take upon Myself the fulfillment of his aspiration, and I will safeguard whatsoever he shall attain.
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मैं -- मैं नहीं रहा। जीवन एक सतत प्रक्रिया है, अब तो उनका हृदय छोड़कर अन्यत्र की कल्पना भी मृत्यु है। शिवोहं शिवोहं॥ अहं ब्रह्मास्मि॥ ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१७ दिसंबर २०२५

उस आभामंडल को ही अपना काम करने दें ---

 निरंतर परमात्मा के चिंतन से हमारे चारों और एक आध्यात्मिक आभामंडल का निर्माण हो जाता है। वह आभामंडल ही चुम्बकत्व की तरह उन सब चीजों को आकर्षित करेगा जो जीवन में सर्वश्रेष्ठ है। उस आभामंडल को ही अपना काम करने दें।

जीवन में किसी से भी कोई अनावश्यक बात न करें, और न ही अनावश्यक रूप से किसी से कोई मेलजोल रखें। प्रयास करें की मानसिक रूप से निरंतर किसी पवित्र मंत्र का जप होता रहे, जैसे प्रणव-मंत्र या तारक-मंत्र। यह भाव रखें कि स्वयं परमात्मा ही यह जप कर रहे हैं। जब भी समय मिले परमात्मा को समर्पित होकर कूटस्थ में उनका ध्यान करें। हमारा जीवन धन्य होगा। हरिः ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
१८ दिसंबर २०२५

प्रकाश का अभाव ही अंधकार है ---

"प्रकाश का अभाव ही अंधकार है। चारों ओर छाये हुए असत्य के अंधकार को मिटाने के लिए हमारा सबसे बड़ा योगदान यही हो सकता है कि हम परमात्मा के प्रकाश को प्रकट कर उसका निरंतर विस्तार करें।"
सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में परमात्मा का ध्यान करो, और उनकी चेतना में निरंतर हर समय बने रहो। यही सबसे बड़ी सेवा है जो हम समष्टि के लिए कर सकते हैं।
हजारों साधनायें और हजारों मंत्र हैं. कौन सी साधना करें? कौन से मंत्र का जप करें?
यह भगवान पर छोड़ दें कि वे किस विधि से उपलब्ध होना चाहते हैं। यह थोड़ा कठिन कार्य है, लेकिन भगवान से प्रार्थना कर के उन पर छोड़ दे। भगवान से उत्तर मिलेगा, निश्चित रूप से मिलेगा, बस हृदय में प्रेम और एक घनीभूत अभीप्सा होनी चाहिए। वे बड़े भाग्यशाली हैं जो मेरी इस बात को समझ सकते हैं। मैं उन्हें नमन करता हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ दिसंबर २०२५

Sunday, 21 December 2025

उत्तरायण की शुभ कामनाएँ ---

 उत्तरायण की शुभ कामनाएँ ---

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खगोलीय दृष्टि से (ज्योतिष के हिसाब से नहीं) आज (२२ दिसंबर २०२२) से पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में उत्तरायण (Winter Solstice २०२२) का आरंभ हो गया है। बीते हुए कल की और आज की रात्रियाँ वर्ष २०२२ की सबसे लंबी रात्रियाँ थीं और हैं। कल से रात्रियाँ छोटी और दिन बड़े होने आरंभ हो जाएंगे। यह एक खगोलीय घटना है, (जब सूर्य खगोलीय गोले में खगोलीय मध्य रेखा के सापेक्ष अपनी उच्चतम अथवा निम्नतम अवस्था में भ्रमण करता है) जो वर्ष में दो बार होती है। उत्तरी गोलार्ध में यह शीतकाल का मध्य बिन्दु है। दक्षिणी गोलार्ध में इस से विपरीत होता है।
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वर्तमान में चल रहा सर्दियों का मौसम, आध्यात्मिक साधना के लिए बहुत अनुकूल है। न तो पंखे या कूलर की आवाज़, और न कोई शोरगुल है। प्रकृति भी बड़ी शांत है। ऐसे में अपने भौतिक और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें, और भगवान ने जो २४ घंटों का समय दिया है, उसका १० प्रतिशत भाग तो बापस भगवान को बापस दें। सारा मार्गदर्शन - गीता आदि ग्रन्थों में है, जिनका स्वाध्याय करें। भगवान से प्रेम होगा तो वे स्वयं सारा मार्गदर्शन और सहायता करेंगे। इस मार्ग में कोई short cut नहीं है। सारी प्रगति और सफलता -- भगवान के अनुग्रह पर निर्भर है।
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मेरे नवरत्न तो भगवान स्वयं हैं। मैं न तो कोई अंगूठी पहनता हूँ, न कोई नवरत्न का कड़ा, या न कोई कंठीमाला। मेरे एकमात्र रत्न भगवान स्वयं हैं, जो निरंतर मेरे हृदय में रहते हैं। एक क्षण के लिए भी वे इधर-उधर नहीं होते। वे ही मेरी शोभा हैं। मेरा हृदय कूटस्थ सूर्यमंडल है, न कि यह भौतिक हृदय। कूटस्थ चैतन्य ही मेरा जीवन है। उस से च्युत होना ही मृत्यु है। भगवान की विस्मृति नर्क है, और उन की स्मृति ही स्वर्ग है। साधना का और साधक होने का भ्रम मिथ्या है।
आप सब को शुभ कामनाएँ और नमन !!
कृपा शंकर
२२ दिसंबर २०२२

Tuesday, 16 December 2025

परमात्मा को निश्चित रूप से हम कैसे उपलब्ध हों?

 (प्रश्न) : परमात्मा को निश्चित रूप से हम कैसे उपलब्ध हों?

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(उत्तर) : ये पंक्तियाँ लिखने की प्रेरणा मुझे जगन्माता से मिल रही है जो प्राण रूप में समस्त सृष्टि को धारण किये हुए हैं। परमात्मा की दृष्टि में हम वही हैं जो स्वयं की दृष्टि में हैं। हमें पता है कि हम कहाँ खड़े हैं। हम दुनियाँ को धोखा दे सकते हैं, लेकिन स्वयं को नहीं। छल-कपट, लोभ और अहंकार ने हमें परमात्मा से पृथक कर रखा है। इन रिपुओं से तो मुक्त हमें होना ही पड़ेगा। जब तक हम स्वयं को छल-कपट और लोभ-अहंकार से मुक्त नहीं कर लेते तब तक परमात्मा को भूल जाइये।
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व्यावहारिक रूप से हमारी दो साँसों के मध्य में यानि दो साँसों के मध्य में परमात्मा हैं। हम सांस छोड़ते हैं और लेते हैं, हम सांस लेते और छोड़ते हैं, उनके मध्य में कुछ पलों के लिए रुकते हैं। वह दो साँसों के मध्य का संधिकाल कुंभक कहलाता है। यह कुंभक यानि संधिकाल परमात्मा को पूर्णतः समर्पित हो। इस कुंभक का क्रमशः सतत् विस्तार हो और इस समय श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय में बताई हुई विधि से मूर्धा में प्रणव का मानसिक जप हो। मेरुदण्ड उन्नत रहे, ठुड्डी भूमि के समानान्तर, दृष्टिपथ भ्रूमध्य में, जिह्वा को ऊपर की ओर मोड़कर तालु से सटा कर रखें।
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फिर सांस कौन ले रहा है? हमारी हर सांस स्वयं परमात्मा ले रहे हैं। यदि आप ले रहे हो तो सांसें रोक कर दिखाइये। हर सांस के साथ अजपा-जप करें। यह एक वैदिक साधना है जिसे वेदों में हंसवतीऋक कहा गया है। इसे हंसःयोग भी कहते हैं। यह गोपनीय नहीं है। जगत्गुरु भगवान श्रीकृष्ण को, या दक्षिणामूर्ति रूप में भगवान शिव को गुरु मानकर, इसका अभ्यास कर सकते हैं।
गोपनीय तो एक दूसरी विद्या है जिसका संकेत भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के चौथे अध्याय के २९वें श्लोक में किया है --
"अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥४:२९॥"
इसका रहस्य बताने का अधिकार केवल एक अधिकृत सद्गुरु को ही है, जो पात्रता देखकर शिष्य को अपने सामने बैठाकर इसका ज्ञान प्रदान करता है।
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"ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्रौ ब्रह्मणा हुतम्‌।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥४:२४॥"
अब केवल ब्रह्मकर्म की बात करेंगे। भगवान के अतिरिक्त अन्य कोई भी कामना है तो भगवान ने इसे व्यभिचार की संज्ञा दी है। भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत में दो बार, दो अलग-अलग स्थानों पर, दो सगे भाइयों -- युधिष्ठिर व अर्जुन को "अव्यभिचारिणी भक्ति" का उपदेश दिया है। जिस के जीवन में यह "अव्यभिचारिणी भक्ति" और "अनन्य योग" फलीभूत हो जाते हैं, उसे इसी जीवन में भगवत्-प्राप्ति हो सकती है।
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महाभारत के अनुशासन पर्व में भगवान श्रीकृष्ण ने महाराजा युधिष्ठिर को तंडि ऋषि कृत "शिवसहस्त्रनाम" का उपदेश दिया है, जो भगवान श्रीकृष्ण को उपमन्यु ऋषि से प्राप्त हुआ था। उसका १६६वां श्लोक है --
"एतद् देवेषु दुष्प्रापं मनुष्येषु न लभ्यते।
निर्विघ्ना निश्चला रुद्रे भक्तिर्व्यभिचारिणी॥"
(यहाँ "निर्विघ्ना" और "निश्चला" शब्दों का भी प्रयोग हुआ है)
महाभारत के भीष्म पर्व में कुरुक्षेत्र की रण-भूमि में भगवान श्रीकृष्ण अपने प्रिय शिष्य अर्जुन को जो भगवद्गीता का उपदेश देते हैं, उसके १३वें अध्याय का ११वां श्लोक है --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥"
अर्थात् - अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
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भगवान श्रीकृष्ण ने अनन्ययोग के लिए अव्यभिचारिणी भक्ति, एकान्तवास के स्वभाव, और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि का होना बताया है।सत्यनिष्ठा पूर्वक भगवान के सिवा अन्य कुछ भी प्रिय न लगे, वह अव्यभिचारिणी भक्ति है। ऐसे नहीं कि जब सिनेमा अच्छा लगे तब सिनेमा देख लिया, नाच-गाना अच्छा लगे तब नाच-गाना कर लिया, गप-शप अच्छी लगे तब गप-शप कर ली; और भगवान अच्छे लगे तब भगवान की भक्ति कर ली। ऐसी भक्ति व्यभिचारिणी होती है। "सिर्फ भगवान ही अच्छे लगें, भगवान के सिवा अन्य कुछ भी अच्छा न लगे, निरंतर भगवान का ही स्मरण रहे वह "अव्यभिचारिणी भक्ति" है।"
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इस विषय पर और नहीं लिखूंगा अन्यथा लेख बहुत अधिक लंबा हो जाएगा। इसका समापन यहीं कर रहा हूँ। हमारा लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति है। हम परमात्मा का बोध इसी जन्म में कर सकते हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ नवंबर २०२५

हे प्रभु, स्वयं को मुझ में व्यक्त करो, आप और मैं एक हैं ---

 हे प्रभु, स्वयं को मुझ में व्यक्त करो, आप और मैं एक हैं ---

(O Divine, Reveal Thyself unto me. Thou and I art one.)​.
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परमात्मा स्वयं हमारे शरीर महाराज को माध्यम बनाकर साँसें ले रहे हैं। पूरा ब्रह्मांड, यानि समस्त सृष्टि ही हमारा शरीर है। यह पक्का प्रमाण है कि वे हमारे साथ हैं। जब साँस अंदर आती है तब वे स्वयं हमारे में खिंचे चले आते हैं। जब तक साँस भीतर है, तब तक वे हमारे शरीर महाराज में हैं। जब साँस बाहर निकलती है तब हम उन में चले जाते हैं। यह अंदर-बाहर होने का खेल पता नहीं, भगवान कितने जन्मों से खेल रहे हैं !! जो वे हैं, वह ही हम हैं।
जब साँस पूरी तरह बाहर निकल जाती है उस अवस्था को बाह्य कुंभक कहते है। इस अवधि को सहज रूप से बढ़ाते रहें। किसी तरह का बल-प्रयोग न करें। उस अवस्था में मूर्धा में प्रणव मंत्र का जप करते रहें। जब सांसें बाहर जाती हैं, और भीतर आती हैं, तब हम अजपा-जप "सो -- हं" मंत्र के साथ करते हैं। लेकिन गुरु की आज्ञा से मैं इसका उल्टा जप "हं -- सः" करता हूँ। अर्ध या पूर्ण खेचरी मुद्रा में मूर्धा में ओंकार का मानसिक जप -- "नादानुसंधान" कहलाता है। यह बहुत बड़ी साधना है जिसका महत्व इतना अधिक है कि बताना बहुत कठिन है।
मूलाधार चक्र में घनीभूत प्राण-तत्व कुंडलिनी को जागृत कर गुरु-प्रदत्त विधि से मंत्र शक्ति द्वारा मेरुदंड के चक्रों में संचलन "क्रिया योग" है। इसमें एक ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय सद्गुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य है। बिना गुरु के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन के यह साधना न करें, अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि ही हो सकती है।
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किसी भी साधना का एकमात्र उद्देश्य -- हमें अपने आत्म-स्वरूप में प्रतिष्ठित कराना है, न कि कुछ सांसारिक उपलब्धियाँ प्राप्त करवाना। हम परमात्मा की दृष्टि में क्या हैं? इसी का महत्व है। जो हम प्राप्त करना चाहते हैं वह तो हम स्वयं ही हैं। स्वयं से परे कुछ है ही नहीं।
हे प्रभु, स्वयं को मुझ में व्यक्त करो (Reveal Thyself unto me. Thou and I art one.)।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ नवंबर २०२५