Sunday, 8 June 2025

कामना की पूर्ति स्वयं के श्रद्धा-विश्वास से ही होती है ---

 कामना की पूर्ति स्वयं के श्रद्धा-विश्वास से ही होती है ---

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मेरा अनुभव यह है कि चाहे कोई भी किसी भी तरह की कामना हो, उसकी पूर्ति स्वयं की श्रद्धा और विश्वास से ही होती है, न कि पीर-फकीरों, दरगाहों, मजारों, समाधियों, और देवस्थानों पर जाकर दुआएँ और मनौतियाँ करने से। एक पूरी हुई कामना तुरंत अन्य अनेक कामनाओं को जन्म दे देती है, और हमारे दुःख का कारण बनती है। बाहरी अनुष्ठान तो एक बहाना मात्र हैं, वास्तविक शक्ति श्रद्धा और विश्वास में ही होती है। रामचरितमानस में स्पष्ट लिखा है --
"भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरुपिणौ।
याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥"
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श्रद्धावाला व्यक्ति ही ज्ञान को प्राप्त करता है, और वही अपने सदगुरु की कृपा को प्राप्त करने का पूर्ण अधिकारी होता है। गीता में भगवान कहते हैं --
"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥4:३९॥"
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ जून २०२४

"योगस्थ" का क्या अर्थ है? ---

 "योगस्थ" का क्या अर्थ है? ---

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थोड़ा सा जटिल मामला है। निष्ठापूर्वक सोचना पड़ेगा कि भगवान हमें योगस्थ होकर कर्म करने को क्यों कहते हैं? ---
"योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥२:४८॥"
अर्थात - हे धनंजय, आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुये तुम कर्म करो। यह समभाव ही योग कहलाता है॥
भगवान आगे फिर कहते हैं ---
"बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥२:५०॥"
अर्थात - समत्वबुद्धि युक्त पुरुष यहां (इस जीवन में) पुण्य और पाप इन दोनों कर्मों को त्याग देता है। इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ। कर्मों में कुशलता योग है॥
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एक बात तो स्वयंसिद्ध है कि -- योगसुत्रों में भगवान पातञ्जलि द्वारा बताए "योगः चित्तवृत्तिनिरोधः" और गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए "समत्वं योग उच्यते" में कोई अंतर नहीं है, क्योंकि चित्तवृत्तिनिरोध से समाधि की प्राप्ति होती है जो समत्व ही है।
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"योगस्थ" होना क्या है? --- सारा कर्ताभाव जहाँ तिरोहित हो जाए, भगवान स्वयं ही एकमात्र कर्ता जहाँ हो जाएँ, जहाँ कोई कामना व आसक्ति नहीं हो, भगवान स्वयं ही जहाँ हमारे माध्यम से प्रवाहित हो रहे हों, -- वही योगस्थ होना है, वही समत्व यानि समाधि में स्थिति है, और वही ज्ञान है।
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इस ज्ञान की प्राप्ति स्वयं की श्रद्धा, तत्परता और इंद्रिय-संयम से होती है, अन्य किसी उपाय से नहीं। आचार्य शंकर के अनुसार श्रद्धा वह है जिसके द्वारा मनुष्य शास्त्र एवं आचार्य द्वारा दिये गये उपदेश से तत्त्व का यथावत् ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ---
"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥४:३९॥"
अर्थात् - श्रद्धावान्, तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है॥
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सार की बात यह है कि गीता के अनुसार समत्व ही ज्ञान है। समत्व में स्थित व्यक्ति ही ज्ञानी है, और समत्व में स्थित व्यक्ति ही योगस्थ और समाधिस्थ है।
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ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
९ जून २०२२

जिनके हृदय में परमात्मा होते हैं ---

 जिनके हृदय में परमात्मा होते हैं, मुझे उनसे बात करने की कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ती। उनको देखते ही उनके भाव समझ में आ जाते हैं। वे भी मेरे भावों को समझ जाते हैं।

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भगवान से मैं किसी भी तरह की कोई प्रार्थना करने में असमर्थ हूँ। वे तो भाव उठने से पहिले ही समझ जाते हैं कि मैं क्या सोचने वाला हूँ। अतः प्रार्थना करना व्यर्थ है। उनका स्थायी निवास तो मेरे हृदय में ही है। क्या पता, हो सकता है, मैं भी उनके हृदय में ही हूँ।
सारे रंग-रूप भगवान के हैं, पर वे इन सब से परे हैं। किसी से कोई राग-द्वेष न रखो।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ९ जून २०२२

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं ---

 न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं ---

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मैं ध्यान तो कूटस्थ में परमशिव का करता हूँ, जिन की स्थिति सूक्ष्म जगत की अनंतता से भी परे परम ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में है। उस समय मैं इस शरीर में नहीं रहता। जिज्ञासा तो रहती ही है यह जानने की कि कर्ता कौन है। लेकिन यहाँ तो पुराण-पुरुष भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण के सिवाय पूरी सृष्टि में कोई अन्य है ही नहीं। वे ही नारायण हैं, और वे ही परमशिव हैं। वे स्वयं ही स्वयं का ध्यान कर रहे हैं। उनके सिवाय कुछ भी अन्य नहीं है। वे स्वयं ही यह सारी सृष्टि बन गए हैं। मेरा तो कोई अस्तित्व है ही नहीं। भगवान कहते हैं --
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
अर्थात् - "उसे न सूर्य प्रकाशित कर सकता है और न चन्द्रमा और न अग्नि। जिसे प्राप्त कर मनुष्य पुन: (संसार को) नहीं लौटते हैं, वह मेरा परम धाम है॥"
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श्रुति भगवती कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥" (कठोपनिषद २/२/१५)
अर्थात् -"वहाँ सूर्य प्रकाशमान नहीं हो सकता तथा चन्द्रमा आभाहीन हो जाता है, समस्त तारागण ज्योतिहीन हो जाते हैं; वहाँ विद्युत् भी नहीं चमकती, न ही कोई पार्थिव अग्नि प्रकाशित होती है। कारण, जो कुछ भी प्रकाशमान् है, वह 'उस' की ज्योति की प्रतिच्छाया है, 'उस' की आभा से ही यह सब प्रतिभासित होता है।''
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ॐ खं ब्रह्म:॥ "ख" शब्द ब्रह्म यानी परमात्मा के लिए प्रयुक्त हुआ है। आकाश तत्व को भी "ख" कहते हैं। दुःख का अर्थ है -- परमात्मा से दूरी, और सुख का अर्थ है -- परमात्मा से समीपता। सुख सिर्फ परमात्मा में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। संसार में सुख की खोज ही सब दुःखों का कारण है। मनुष्य संसार में सुख ढूंढ़ता है पर निराशा ही हाथ लगती है। सुख की अपेक्षा सदा दुःखदायी होती है। परमात्मा से अहैतुकी परम प्रेम ही आनंददायी है।
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भगवान के श्रीचरणों में ही सुख है। उनके श्री चरणों के दर्शन सहस्त्रारचक्र में एक ज्योति के रूप में होते हैं। ध्यान उस ज्योति का ही होता है। वह ज्योति ही हमें बड़े प्रेम से एक माँ की तरह इस देह से बाहर ले जाकर अनंतता का व उससे भी परे का बोध करा कर बापस इस देह में ले आती है।
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ जून २०२२

परमात्मा से हमारा क्या सम्बन्ध है ? ---

परमात्मा से हमारा क्या सम्बन्ध है ? ---

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यह प्रश्न ही गलत है| यह तो वैसे ही है जैसे कोई यह पूछे कि महासागर में पानी के बुलबुले का महासागर से क्या सम्बन्ध है| हम भगवान से कोई सुविधाजनक या भावानुकूल सम्बन्ध जोड़ना चाहें तो यह हमारा दुराग्रह ही होगा| ऐसा दुराग्रह नहीं होना चाहिए|

इस देह में जन्म लिया उससे पूर्व भी भगवान ही हमारे साथ थे| इस देह में जन्म लेने के पश्चात् भगवान ने ही माँ-बाप के रूप में अपना प्रेम दिया| वे ही भाई-बहिन और अन्य सम्बन्धी व मित्रों के रूप में आये| शत्रु-मित्र सब वे ही थे| इस देह को भी वे ही जीवंत रखे हुए हैं| इसके ह्रदय में वे ही धड़क रहे हैं, इन आँखों से वे ही देख रहे हैं, कानों से वे ही सुन रहे हैं, और पैरों से भी वे ही चल रहे हैं| जो दिखाई दे रहा है वह तो उनकी माया है| सब कुछ तो वे ही हैं| स्वयं की पृथकता का बोध भी एक भ्रम ही है|

अतः सारे सम्बन्ध तो उन्हीं के हैं| हमारा तो एकमात्र सम्बन्ध उन्हीं से है| उनके अतिरिक्त अन्य सारे सम्बन्ध भ्रम मात्र हैं| परमात्मा को पाने की लालसा भी एक भ्रम मात्र ही है| हम उनसे बिछुड़े ही कब थे?
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
९ जून २०१६

असत्य, अन्धकार और अज्ञान की शक्तियों का वर्चस्व ---

 असत्य, अन्धकार और अज्ञान की शक्तियों का वर्चस्व पिछले डेढ़-दो हजार वर्षों से चल रहा है| उनके अस्तित्व को चुनौतियां भी मिलती रही हैं और अब वे धीरे धीरे पराभूत भी हो रही हैं| मुझे मेरी इस आस्था में कण मात्र भी संदेह नहीं है कि उनका पराभव निश्चित रूप से होगा| यह सृष्टि .... प्रकाश और अन्धकार का खेल है जहाँ दोनों की आवश्यकता है| इस लीला से परे जाना ही हमारा प्राथमिक लक्ष्य है|

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असत्य और अंधकार उस प्रकाश से दूर होंगे जो हम अपने अंतस में जलायेंगे| ये दोनों ही एक दोष हैं| दोष हमेशा ही कमजोर हुआ करते हैं| रोग कमजोर होता है इसलिये तो औषधि उसे दूर करती है| वह प्रकाश जागृत होगा प्रभु के प्रेम से| अन्य कोई मार्ग नहीं है|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ जून २०१४

हमारे सभी दुःखों का कारण :----

 हमारे सभी दुःखों का कारण :----

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"खं" शब्द ब्रह्म यानी परमात्मा के लिए प्रयुक्त हुआ है| आकाश तत्व को भी "ख" कहते हैं| दुःख का अर्थ है .... परमात्मा से दूरी, और सुख का अर्थ है परमात्मा से समीपता| सुख सिर्फ परमात्मा में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं| संसार में सुख की खोज ही सब दुःखों का कारण है| मनुष्य संसार में सुख ढूंढ़ता है पर निराशा ही हाथ लगती है| सुख की अपेक्षा सदा दुःखदायी है| परमात्मा से अहैतुकी परम प्रेम -- आनंददायी है| उस आनंद की एक झलक पाने के पश्चात ही संसार की असारता का बोध होता है| प्रभुप्रेमी की सबसे बड़ी सम्पत्ति --- "उनके" श्री-चरणों में आश्रय पाना है|
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जो योग-मार्ग के पथिक हैं उनके लिए सहस्त्रार ही गुरुचरण है| आज्ञाचक्र का भेदन और सहस्त्रार में स्थिति बिना गुरुकृपा के नहीं होती| जब चेतना उत्तरा-सुषुम्ना यानि आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य विचरण करने लगे तब समझ लेना चाहिए कि गुरु की कृपा हो रही है| जब स्वाभाविक और सहज रूप से सहस्त्रार में व उससे ऊपर की ज्योतिर्मय विराटता में ध्यान होने लगे तब समझ लेना चाहिए कि श्रीगुरुचरणों में अर्थात प्रभुचरणों में आश्रय प्राप्त हो गया है| तब भूल से भी पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए| एक सिद्ध योगी की चेतना वैसे भी आज्ञा चक्र से ऊपर ही रहती है| लक्ष्य यही हो कि चैतन्य की स्थायी स्थिति सहस्त्रार व उससे उपर ही हो|
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परमात्मा से दूरी ही हमारे सभी दुःखों का कारण है| सुख सिर्फ परमात्मा में ही है, अन्यत्र कहीं भी नहीं| परमप्रेम, अभीप्सा और श्रीहरिः कृपा के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ जून २०१४